कहीं ज़िम्मेदारी से बच तो नहीं रहे हैं राहुल गांधी?
Thursday - July 4, 2019 1:47 pm ,
Category : WTN HINDI
राहुल गांधी के इस्तीफ़े के बाद उठे सवाल
इस समय कांग्रेस को राहुल गांधी की और राहुल गांधी को कांग्रेस की है ज़रूरत!
JULY 04 (WTN) – आख़िरकार राहुल गांधी ने विधिवत रूप से कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद निराश और नाराज़ राहुल गांधी ने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी, और कांग्रेस पार्टी को एक महीने का समय दिया था कि वो नये अध्यक्ष का चुनाव कर लें। दरअसल, लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के अच्छे प्रदर्शन की आशा थी, लेकिन हुआ राहुल गांधी की आशा के विपरीत। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी, जिसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हार का ज़िम्मेदार बताया था।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की ख़ुद जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। हालांकि, राहुल गांधी को मनाने की काफ़ी कोशिशें कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने की, लेकिन राहुल गांधी ने किसी की भी नहीं सुनी, और आख़िरकार कांग्रेस अध्यक्ष पद से खुद को दूर कर लिया। वैसे कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने राहुल गांधी के इस फ़ैसले को साहसी बताया है, लेकिन सवाल उठता है कि राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला साहसी है या फ़िर अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर जाने वाला।
चुनावों में हार और जीत राजनीति का एक हिस्सा है। चुनाव में कभी जीत होती है तो कभी हार। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यूपीए सरकार लगातार 10 सालों तक सत्ता में रही थी, यानी कि लगातार दो लोकसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन भाजपा ने अपने नेता और रणनीति में बदवाव किया, और 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया।
यदि कांग्रेस पार्टी लगातार दो लोकसभा चुनावों में हारी है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आगे भी कांग्रेस हारती रहेगी। कांग्रेस को इस समय एक सशक्त नेतृत्व की ज़रूरत है, जो हार से निराश और हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भर सके। यह काम युवा राहुल गांधी आसानी से कर सकते थे, लेकिन बजाय अपनी ज़िम्मेदारी सम्भालने के राहुल गांधी अपनी ज़िम्मेदारी से बचते नज़र आ रहे हैं।
यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस में गांधी परिवार ही सर्वोपरि है। कांग्रेस में जो भी एकता नेताओं के बीच दिखाई दे रही है, उसके पीछे बस गांधी परिवार ही एकमात्र कारण है। ऐसे में हार से निराश कांग्रेस नेताओं को एकजुट करने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी राहुल गांधी के पास थी, लेकिन वे इस ज़िम्मेदारी से दूर जा रहे हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी अध्यक्ष बने रहते और संसद से लेकर सड़क तक मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते।
जैसा कि आप जानते हैं कि कई राज्यों में कांग्रेस में आपसी गुटबाजी है, जिसके कारण कांग्रेस को कई विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है। आने वाले समय में महाराष्ट्र और हरियाणा समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की हार को स्वीकार करते हुए इन राज्यों में पूरे दमखम के साथ कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए चुनाव मैदान में उतरना था, लेकिन राहुल गांधी इस बड़ी ज़िम्मेदारी से बचते नज़र आ रहे हैं।
राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की पार्टी की हार का विश्लेषण करने के साथ आने वाले चुनावों के लिए पार्टी को बूथ लेवल से लेकर केन्द्रीय स्तर तक सक्रिय और सजग करने की ज़रूरत थी। गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना कांग्रेस पार्टी में एकता सम्भव नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि 1991 से लेकर 1998 तक कांग्रेस में गैर गांधी परिवार के सदस्य अध्यक्ष रहे थे, और उस समय कांग्रेस पार्टी में कितनी टूट हुई थी यह जगजाहिर है।
कहा जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने के लिए पदयात्रा करेंगे, और पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करेंगे। राहुल गांधी यही पदयात्रा अध्यक्ष रहते हुए भी कर सकते थे, जिससे कार्यकर्ताओं में ज़्यादा उत्साह आता। आने वाले विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी लेते हुए अभी से तैयारी करना चाहिए थी, लेकिन वे इसकी ज़िम्मेदारी ना लेकर इससे बचना चाह रहे हैं।
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े के बाद इसका एक बड़ा राजनीतिक फ़ायदा भाजपा उठा सकती है। आने वाले चुनावों में भाजपा यह प्रचार कर सकती है कि राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद आने वाले विधानसभा चुनावों में हार के डर से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया, और अपनी ज़िम्मेदारी से बच गये।
कांग्रेस पार्टी की ऐतिहासिक हार के बाद कांग्रेस पार्टी को राहुल गांधी की और राहुल गांधी को अपने नेतृत्व क्षमता को परखने के लिए कांग्रेस पार्टी की ज़रूरत है। ऐसे में राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदार लेते हुए भविष्य के लिए कांग्रेस को मज़बूत करना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने की जगह पर वे अपनी ज़िम्मेदारी से दूर होते ही नज़र आ रहे हैं।
JULY 04 (WTN) – आख़िरकार राहुल गांधी ने विधिवत रूप से कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया है। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद निराश और नाराज़ राहुल गांधी ने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी, और कांग्रेस पार्टी को एक महीने का समय दिया था कि वो नये अध्यक्ष का चुनाव कर लें। दरअसल, लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के अच्छे प्रदर्शन की आशा थी, लेकिन हुआ राहुल गांधी की आशा के विपरीत। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी, जिसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हार का ज़िम्मेदार बताया था।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार की ख़ुद जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। हालांकि, राहुल गांधी को मनाने की काफ़ी कोशिशें कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने की, लेकिन राहुल गांधी ने किसी की भी नहीं सुनी, और आख़िरकार कांग्रेस अध्यक्ष पद से खुद को दूर कर लिया। वैसे कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने राहुल गांधी के इस फ़ैसले को साहसी बताया है, लेकिन सवाल उठता है कि राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला साहसी है या फ़िर अपनी ज़िम्मेदारियों से दूर जाने वाला।
चुनावों में हार और जीत राजनीति का एक हिस्सा है। चुनाव में कभी जीत होती है तो कभी हार। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यूपीए सरकार लगातार 10 सालों तक सत्ता में रही थी, यानी कि लगातार दो लोकसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन भाजपा ने अपने नेता और रणनीति में बदवाव किया, और 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया।
यदि कांग्रेस पार्टी लगातार दो लोकसभा चुनावों में हारी है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आगे भी कांग्रेस हारती रहेगी। कांग्रेस को इस समय एक सशक्त नेतृत्व की ज़रूरत है, जो हार से निराश और हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भर सके। यह काम युवा राहुल गांधी आसानी से कर सकते थे, लेकिन बजाय अपनी ज़िम्मेदारी सम्भालने के राहुल गांधी अपनी ज़िम्मेदारी से बचते नज़र आ रहे हैं।
यह सभी जानते हैं कि कांग्रेस में गांधी परिवार ही सर्वोपरि है। कांग्रेस में जो भी एकता नेताओं के बीच दिखाई दे रही है, उसके पीछे बस गांधी परिवार ही एकमात्र कारण है। ऐसे में हार से निराश कांग्रेस नेताओं को एकजुट करने की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी राहुल गांधी के पास थी, लेकिन वे इस ज़िम्मेदारी से दूर जा रहे हैं। बेहतर होता कि राहुल गांधी अध्यक्ष बने रहते और संसद से लेकर सड़क तक मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते।
जैसा कि आप जानते हैं कि कई राज्यों में कांग्रेस में आपसी गुटबाजी है, जिसके कारण कांग्रेस को कई विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है। आने वाले समय में महाराष्ट्र और हरियाणा समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की हार को स्वीकार करते हुए इन राज्यों में पूरे दमखम के साथ कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए चुनाव मैदान में उतरना था, लेकिन राहुल गांधी इस बड़ी ज़िम्मेदारी से बचते नज़र आ रहे हैं।
राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की पार्टी की हार का विश्लेषण करने के साथ आने वाले चुनावों के लिए पार्टी को बूथ लेवल से लेकर केन्द्रीय स्तर तक सक्रिय और सजग करने की ज़रूरत थी। गांधी परिवार के नेतृत्व के बिना कांग्रेस पार्टी में एकता सम्भव नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि 1991 से लेकर 1998 तक कांग्रेस में गैर गांधी परिवार के सदस्य अध्यक्ष रहे थे, और उस समय कांग्रेस पार्टी में कितनी टूट हुई थी यह जगजाहिर है।
कहा जा रहा है कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को मज़बूत करने के लिए पदयात्रा करेंगे, और पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करेंगे। राहुल गांधी यही पदयात्रा अध्यक्ष रहते हुए भी कर सकते थे, जिससे कार्यकर्ताओं में ज़्यादा उत्साह आता। आने वाले विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी लेते हुए अभी से तैयारी करना चाहिए थी, लेकिन वे इसकी ज़िम्मेदारी ना लेकर इससे बचना चाह रहे हैं।
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े के बाद इसका एक बड़ा राजनीतिक फ़ायदा भाजपा उठा सकती है। आने वाले चुनावों में भाजपा यह प्रचार कर सकती है कि राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद आने वाले विधानसभा चुनावों में हार के डर से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया, और अपनी ज़िम्मेदारी से बच गये।
कांग्रेस पार्टी की ऐतिहासिक हार के बाद कांग्रेस पार्टी को राहुल गांधी की और राहुल गांधी को अपने नेतृत्व क्षमता को परखने के लिए कांग्रेस पार्टी की ज़रूरत है। ऐसे में राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदार लेते हुए भविष्य के लिए कांग्रेस को मज़बूत करना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने की जगह पर वे अपनी ज़िम्मेदारी से दूर होते ही नज़र आ रहे हैं।