जानिए किस कॉन्सेप्ट से मोदी सरकार करेगी किसानों की आय दोगुनी!
Monday - July 8, 2019 3:16 pm ,
Category : WTN HINDI
प्राकृतिक तरीक़े के खेती करने में किसानों की मदद करेगी सरकार
किसानों को ‘जीरो बजट’ खेती के लिए प्रोत्साहित करेगी मोदी सरकार!
JULY 08 (WTN) – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा कहा करते हैं कि किसानों की आय दोगुनी करना उनकी सरकार का लक्ष्य है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी न देश के किसानों को विश्वास दिलाया था कि वे किसानों की आय दोगुनी करने का पूरा प्रयास करेंगे। लेकिन जैसा कि आज जानते हैं कि भारत में खेती करना अब उतना आसान नहीं रहा है, जितना किसी समय था।
दिनों दिन खेती की लागत बढ़ती जा रही है, जिसके कारण किसानों के लिए खेती अब फ़ायदे का धंधा कम साबित हो रही है। लेकिन मोदी सरकार ने चुंकि देश के किसानों को विश्वास दिलाया है कि उनकी सरकार किसानों की आय को दोगुनी करने का प्रयास करेगी, तो ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर वो कौन सा तरीक़ा है, जिसके दम पर किसानों की आय को दोगुनी किया जा सकता है।
यदि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले पूर्ण बजट पर नज़र डाली जाए, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजटीय भाषण में किसानों के हित के लिए जीरो बजट खेती की बात कही थी। जब वित्त मंत्री ने जीरो बजट खेती का उल्लेख अपने बजट भाषण में किया तो एक बार फ़िर से देश में जीरो बजट खेती के बारे में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आख़िर क्या है जीरो बजट खेती? क्या इस तरीक़े से खेती करने से किसानों को खेती करने में लागत नहीं लगती है? क्या जीरो बजट खेती से सही में किसानों की आय दोगुनी हो सकती है? आइये इन्हीं सवालों के जवाब हम पता लगाने की कोशिश करते हैं।
दरअसल, जीरो बजट खेती का मतलब यह नहीं है कि इस तरीक़े से खेती करने में किसानों को कोई लागत नहीं लगेगी। बल्कि जीरो बजट खेती का मतलब है कि किसान जो भी फसल उगाएं उसमें वे रासायनिक खाद, संकर बीज और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ना करें। यानी कि प्राकृतिक तरीक़े से खेती करने के कॉन्सेप्ट को आप जीरो बजट खेती करना कह सकते हैं।
जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट में फसलों के लिए रासायनिक खाद की जगह पर जानवरों के गोबर से तैयार की गई खाद का प्रयोग किया जाता है। वहीं रासायनिक कीटनाशकों की जगह पर गौमूत्र और नीम का प्रयोग किया जाता है। इस तरह की खेती में संकर बीजों का प्रयोग भी नहीं किया जाता है। दावा है कि इस तरह प्राकृतिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग करने से फसल अच्छी होती है, क्योंकि इससे फसल में रोग नहीं लगते हैं, और चुंकि रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता है तो यह स्वास्थ्य के लिए भी काफ़ी लाभदायक रहती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीरो बजट कॉन्सेप्ट पर खेती की शुरुआत करने का श्रेय महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के रहने वाले सुभाष पालेकर को जाता है। दावा है कि उन्होंने खेती के लिए खाद और कीटनाशाक को मार्केट से ख़रीदे बिना प्राकृतिक तरीक़े से खेती की, और उससे उन्हें लाभ भी हुआ। सुभाष पालेकर को उनके जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट के लिए साल 2016 में पदमश्री से सम्मानित किया गया था। सुभाष पालेकर की जीरो बजट खेती से प्रभावित होकर आंध्रप्रदेश की चन्द्रबाबू नायडू सरकार ने उन्हें आंध्रप्रदेश राज्य का कृषि सलाहकार भी बनाया था।
जानकारी के मुताबिक़, किसानों की आय दोगुनी करने और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग को कम करने के लिए मोदी सरकार जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने जा रही है। किसानों को जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट से परिचित कराने, और इस तरह की खेती करने को प्रोत्साहित करने के लिए मोदी सरकार किसानों को कई तरह की सुविधा, सहायता और सलाह देने जा रही है। जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट पर काम करने वालों का दावा है कि इस तरह से खेती करने से किसानों को खाद और कीटनाशक बाज़ार से लेने के लिए कर्ज़ लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। स्वाभाविक है कि बिना कर्ज लिये जब किसान प्राकृतिक तरीक़े से खेती करेगा तो उसकी फसल तो अच्छी होगी है, उसकी आय में भी वृद्धि होगी।
जीरो बजट खेती का कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है। बल्कि इस तरह से खेती सदियों से भारत में होती आ रही थी। देखा गया है कि ज़्यादा फसल के लालच में पिछले 40 सालों से देश में रासायनिक खाद और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ा है। खाद और कीटनाशक ख़रीदने में किसानों को काफी पैसा ख़र्च करना पड़ता है, जिससे वो धीरे-धीरे कर्ज़ में डूबने लगता है। वहीं खेती में रसायनों के प्रयोग से मनुष्य की सेहत पर भी विपरीत असर पड़ने लगा है। ऐसे में इन सभी बातों पर ध्यान देते हुए मोदी सरकार जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा देने जा रही है। अब देखना होगा कि इस कॉन्सेप्ट को किसान कितना अपनाते हैं?
JULY 08 (WTN) – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा कहा करते हैं कि किसानों की आय दोगुनी करना उनकी सरकार का लक्ष्य है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी न देश के किसानों को विश्वास दिलाया था कि वे किसानों की आय दोगुनी करने का पूरा प्रयास करेंगे। लेकिन जैसा कि आज जानते हैं कि भारत में खेती करना अब उतना आसान नहीं रहा है, जितना किसी समय था।
दिनों दिन खेती की लागत बढ़ती जा रही है, जिसके कारण किसानों के लिए खेती अब फ़ायदे का धंधा कम साबित हो रही है। लेकिन मोदी सरकार ने चुंकि देश के किसानों को विश्वास दिलाया है कि उनकी सरकार किसानों की आय को दोगुनी करने का प्रयास करेगी, तो ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर वो कौन सा तरीक़ा है, जिसके दम पर किसानों की आय को दोगुनी किया जा सकता है।
यदि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले पूर्ण बजट पर नज़र डाली जाए, तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजटीय भाषण में किसानों के हित के लिए जीरो बजट खेती की बात कही थी। जब वित्त मंत्री ने जीरो बजट खेती का उल्लेख अपने बजट भाषण में किया तो एक बार फ़िर से देश में जीरो बजट खेती के बारे में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आख़िर क्या है जीरो बजट खेती? क्या इस तरीक़े से खेती करने से किसानों को खेती करने में लागत नहीं लगती है? क्या जीरो बजट खेती से सही में किसानों की आय दोगुनी हो सकती है? आइये इन्हीं सवालों के जवाब हम पता लगाने की कोशिश करते हैं।
दरअसल, जीरो बजट खेती का मतलब यह नहीं है कि इस तरीक़े से खेती करने में किसानों को कोई लागत नहीं लगेगी। बल्कि जीरो बजट खेती का मतलब है कि किसान जो भी फसल उगाएं उसमें वे रासायनिक खाद, संकर बीज और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ना करें। यानी कि प्राकृतिक तरीक़े से खेती करने के कॉन्सेप्ट को आप जीरो बजट खेती करना कह सकते हैं।
जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट में फसलों के लिए रासायनिक खाद की जगह पर जानवरों के गोबर से तैयार की गई खाद का प्रयोग किया जाता है। वहीं रासायनिक कीटनाशकों की जगह पर गौमूत्र और नीम का प्रयोग किया जाता है। इस तरह की खेती में संकर बीजों का प्रयोग भी नहीं किया जाता है। दावा है कि इस तरह प्राकृतिक खाद और कीटनाशक का प्रयोग करने से फसल अच्छी होती है, क्योंकि इससे फसल में रोग नहीं लगते हैं, और चुंकि रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता है तो यह स्वास्थ्य के लिए भी काफ़ी लाभदायक रहती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीरो बजट कॉन्सेप्ट पर खेती की शुरुआत करने का श्रेय महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के रहने वाले सुभाष पालेकर को जाता है। दावा है कि उन्होंने खेती के लिए खाद और कीटनाशाक को मार्केट से ख़रीदे बिना प्राकृतिक तरीक़े से खेती की, और उससे उन्हें लाभ भी हुआ। सुभाष पालेकर को उनके जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट के लिए साल 2016 में पदमश्री से सम्मानित किया गया था। सुभाष पालेकर की जीरो बजट खेती से प्रभावित होकर आंध्रप्रदेश की चन्द्रबाबू नायडू सरकार ने उन्हें आंध्रप्रदेश राज्य का कृषि सलाहकार भी बनाया था।
जानकारी के मुताबिक़, किसानों की आय दोगुनी करने और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग को कम करने के लिए मोदी सरकार जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने जा रही है। किसानों को जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट से परिचित कराने, और इस तरह की खेती करने को प्रोत्साहित करने के लिए मोदी सरकार किसानों को कई तरह की सुविधा, सहायता और सलाह देने जा रही है। जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट पर काम करने वालों का दावा है कि इस तरह से खेती करने से किसानों को खाद और कीटनाशक बाज़ार से लेने के लिए कर्ज़ लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। स्वाभाविक है कि बिना कर्ज लिये जब किसान प्राकृतिक तरीक़े से खेती करेगा तो उसकी फसल तो अच्छी होगी है, उसकी आय में भी वृद्धि होगी।
जीरो बजट खेती का कॉन्सेप्ट कोई नया नहीं है। बल्कि इस तरह से खेती सदियों से भारत में होती आ रही थी। देखा गया है कि ज़्यादा फसल के लालच में पिछले 40 सालों से देश में रासायनिक खाद और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ा है। खाद और कीटनाशक ख़रीदने में किसानों को काफी पैसा ख़र्च करना पड़ता है, जिससे वो धीरे-धीरे कर्ज़ में डूबने लगता है। वहीं खेती में रसायनों के प्रयोग से मनुष्य की सेहत पर भी विपरीत असर पड़ने लगा है। ऐसे में इन सभी बातों पर ध्यान देते हुए मोदी सरकार जीरो बजट खेती के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा देने जा रही है। अब देखना होगा कि इस कॉन्सेप्ट को किसान कितना अपनाते हैं?