चीन की ताक़त के सामने ‘ध्वस्त’ हुई मुस्लिम एकता!
Thursday - July 18, 2019 3:19 pm ,
Category : WTN HINDI
उइगर मुस्लिमों के मुद्दे के पर चीन के साथ कई मुस्लिम देश
चीन में प्रताड़ित उइगर मुस्लिमों की टूटी आस, मुस्लिम देश ही कर रहे उनकी दुर्दशा को नज़रअंदाज़!
JULY 18 (WTN) – विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन अपनी कठोर नीतियों के लिए पहचाना जाता है। 1989 में थियानमेन चौक पर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार द्वारा किये गये हत्याकाण्ड को पूरी दुनिया कभी नहीं भूल सकती है। पूरी दुनिया जानती है कि इस समय चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ अमानवीय बर्ताव किया जा रहा है। उइगर मुस्लिमों के खिलाफ चीन के रवैया के ख़िलाफ़ 22 पश्चिमी देशों ने सामूहिक आवाज उठाई है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद के उच्चायुक्त ने अपने एक साझा बयान में चीन में बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे डिटेंशन कैम्प और मुस्लिमों की कड़ी निगरानी करने की रिपोर्ट्स पर बीजिंग की आलोचना की है।
जैसा कि आप जानते हैं कि पूरी दुनिया में मुस्लिमों की एकता की बात कही जाती है। लेकिन यदि आपसे कहें कि चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव के ख़िलाफ़ मुस्लिम देश ही चीन के साथ नज़र आ रहे हैं, और उइगर मुस्लिमों की दुर्दशा को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं तो आपको आश्चर्य होगा। उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के बीजिंग के ख़िलाफ़ खड़े होने के बाद, 37 देश बीजिंग के समर्थन मे आ गये हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन देशों ने चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों को हिरासत कैम्पों में रखे जाने की रिपोर्ट्स को ख़ारिज कर दिया है। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इन 37 देशों में आधे से ज़्यादा हस्ताक्षरकर्ता मुस्लिम बहुल देश हैं।
पाकिस्तान, सीरिया, यूएई, और सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों का कहना है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ की गम्भीर समस्या से जूझ रहा चीन, आतंकवाद और कट्टरपंथ को रोकने के लिए कई कदम उठा रहा है, जिसके तहत ही इस तरह के प्रशिक्षण कैम्प खोले गये हैं। मुस्लिम बहुल देशों के लिखे पत्र की भाषा बिल्कुल चीन के उन दावों से मिलती है, जिसमें वह शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ प्रताड़ना और हिरासत कैम्पों में रखे जाने के आरोपों को ख़ारिज करता रहा है, और डिंटेशन कैम्पों को आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरपंथ से लड़ने के लिए प्रशिक्षण कैम्प करार देता रहा है।
दरअसल, सऊदी अरब समेत अन्य मुस्लिम देशों का चीन के उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर समर्थन दर्शाता है कि एक तो मुस्लिम एकता नाम का कोई भी मुद्दा अब नहीं बचा है, और दूसरा चीन की बढ़ी हुई आर्थिक और राजनीतिक ताक़त से मुस्लिम देश प्रभावित हैं। सऊदी अरब जो कि मुस्लिमों के लिए एक पवित्र देश है, जब वो ही चीन का उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर खुलकर समर्थन करे और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार पर आंख बंद कर ले तो फ़िर क्या कहा जाए। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने चीन दौरे पर उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर खुलकर चीन का समर्थन किया था और कहा था कि हम आतंकवाद खत्म करने और राष्ट्रीय सुरक्षा के चीन के अधिकार का सम्मान करते हैं।
आधुनिक युग में किसी भी देश के राजनीतिक और आर्थिक हित सबसे ऊपर होते हैं। कई बार देखा गया है कि दो देशों के बीच राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक मतभेद होने के बाद भी व्यापारिक गतिविधियां जारी रहती हैं। लगता है कुछ इसी तरह का काम अब मुस्लिम देश कर रहे हैं ताक़ि चीन को खुश रखा जा सके। ऐसा नहीं है कि मुस्लिम एकता कभी थी ही नहीं। मुस्लिम नेताओं ने फिलिस्तीन से लेकर कोसोवो के मुद्दों पर पूरी दुनिया में एकजुटता दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन उइगर मुस्लिमों के मामले में चीन से राजनीतिक और आर्थिक दुश्मनी शायद मुस्लिम देश लेना नहीं चाहते हैं, इसलिए चीन के ख़िलाफ़ मुंह खोलने से ये सभी देश डरते हैं, या फ़िर यह कहा जाए कि अपने हितों के लिए मुस्लिम देश चीन का विरोध नहीं करना चाहते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता देश है। पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों को चीन ने कर्ज देकर अपने चंगुल में फंसा लिया है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ चीन के कर्जदार या फ़िर व्यापारिक मित्रों ने ही चीन का उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर साथ दिया हो। यूएई और कतर जैसे समृद्ध मुस्लिम देश भी मुस्लिम अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ चीन की नीतियां के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि मुस्लिम एकता जैसी कोई भावना अब बची है।
दरअसल, उइगर मुस्लिमों के मामले में चीन का साथ देने के पीछे मुस्लिमों देशों की एक वजह यह भी हो सकती है कि जब मानवाधिकारों मामलों की बात हो तो सम्प्रभूता को शीर्ष पर रख दिया जाए। यूएई और कतर समेत कई मुस्लिम देशों पर समय-समय पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। चीन का उइगर मुस्लिमों के मामले में साथ देकर मुस्लिम देश चीन के सामने खुद को उसका वफादार साबित करना चाहते हैं ताक़ि यदि इन देशों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगे तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन इनका साथ दे सके।
जिस तरह से मुस्लिम देशों ने उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अत्याचारों पर आंख बंद कर रखी है, उससे साबित होता है कि मुस्लिम एकता जैसी भावना अब धीरे-धीरे मुस्लिमों देशों से ख़त्म होती जा रही है। राजनीतिक और आर्थिक लाभ की सम्भावनाओं को देखते हुए अब मुस्लिम देश धार्मिक की जगह पर व्यवहारिक होते जा रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम ब्रदरहूड की बात करने वाले मुस्लिम देश, चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव पर चुप्पी साधे बैठे हैं।
JULY 18 (WTN) – विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन अपनी कठोर नीतियों के लिए पहचाना जाता है। 1989 में थियानमेन चौक पर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार द्वारा किये गये हत्याकाण्ड को पूरी दुनिया कभी नहीं भूल सकती है। पूरी दुनिया जानती है कि इस समय चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ अमानवीय बर्ताव किया जा रहा है। उइगर मुस्लिमों के खिलाफ चीन के रवैया के ख़िलाफ़ 22 पश्चिमी देशों ने सामूहिक आवाज उठाई है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद के उच्चायुक्त ने अपने एक साझा बयान में चीन में बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे डिटेंशन कैम्प और मुस्लिमों की कड़ी निगरानी करने की रिपोर्ट्स पर बीजिंग की आलोचना की है।
जैसा कि आप जानते हैं कि पूरी दुनिया में मुस्लिमों की एकता की बात कही जाती है। लेकिन यदि आपसे कहें कि चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव के ख़िलाफ़ मुस्लिम देश ही चीन के साथ नज़र आ रहे हैं, और उइगर मुस्लिमों की दुर्दशा को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं तो आपको आश्चर्य होगा। उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के बीजिंग के ख़िलाफ़ खड़े होने के बाद, 37 देश बीजिंग के समर्थन मे आ गये हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन देशों ने चीन के शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों को हिरासत कैम्पों में रखे जाने की रिपोर्ट्स को ख़ारिज कर दिया है। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इन 37 देशों में आधे से ज़्यादा हस्ताक्षरकर्ता मुस्लिम बहुल देश हैं।
पाकिस्तान, सीरिया, यूएई, और सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों का कहना है कि आतंकवाद और कट्टरपंथ की गम्भीर समस्या से जूझ रहा चीन, आतंकवाद और कट्टरपंथ को रोकने के लिए कई कदम उठा रहा है, जिसके तहत ही इस तरह के प्रशिक्षण कैम्प खोले गये हैं। मुस्लिम बहुल देशों के लिखे पत्र की भाषा बिल्कुल चीन के उन दावों से मिलती है, जिसमें वह शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ प्रताड़ना और हिरासत कैम्पों में रखे जाने के आरोपों को ख़ारिज करता रहा है, और डिंटेशन कैम्पों को आतंकवाद और इस्लामिक कट्टरपंथ से लड़ने के लिए प्रशिक्षण कैम्प करार देता रहा है।
दरअसल, सऊदी अरब समेत अन्य मुस्लिम देशों का चीन के उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर समर्थन दर्शाता है कि एक तो मुस्लिम एकता नाम का कोई भी मुद्दा अब नहीं बचा है, और दूसरा चीन की बढ़ी हुई आर्थिक और राजनीतिक ताक़त से मुस्लिम देश प्रभावित हैं। सऊदी अरब जो कि मुस्लिमों के लिए एक पवित्र देश है, जब वो ही चीन का उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर खुलकर समर्थन करे और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार पर आंख बंद कर ले तो फ़िर क्या कहा जाए। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने चीन दौरे पर उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर खुलकर चीन का समर्थन किया था और कहा था कि हम आतंकवाद खत्म करने और राष्ट्रीय सुरक्षा के चीन के अधिकार का सम्मान करते हैं।
आधुनिक युग में किसी भी देश के राजनीतिक और आर्थिक हित सबसे ऊपर होते हैं। कई बार देखा गया है कि दो देशों के बीच राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक मतभेद होने के बाद भी व्यापारिक गतिविधियां जारी रहती हैं। लगता है कुछ इसी तरह का काम अब मुस्लिम देश कर रहे हैं ताक़ि चीन को खुश रखा जा सके। ऐसा नहीं है कि मुस्लिम एकता कभी थी ही नहीं। मुस्लिम नेताओं ने फिलिस्तीन से लेकर कोसोवो के मुद्दों पर पूरी दुनिया में एकजुटता दिखाने की कोशिश की थी। लेकिन उइगर मुस्लिमों के मामले में चीन से राजनीतिक और आर्थिक दुश्मनी शायद मुस्लिम देश लेना नहीं चाहते हैं, इसलिए चीन के ख़िलाफ़ मुंह खोलने से ये सभी देश डरते हैं, या फ़िर यह कहा जाए कि अपने हितों के लिए मुस्लिम देश चीन का विरोध नहीं करना चाहते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता देश है। पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों को चीन ने कर्ज देकर अपने चंगुल में फंसा लिया है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ चीन के कर्जदार या फ़िर व्यापारिक मित्रों ने ही चीन का उइगर मुस्लिमों के मुद्दे पर साथ दिया हो। यूएई और कतर जैसे समृद्ध मुस्लिम देश भी मुस्लिम अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ चीन की नीतियां के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि मुस्लिम एकता जैसी कोई भावना अब बची है।
दरअसल, उइगर मुस्लिमों के मामले में चीन का साथ देने के पीछे मुस्लिमों देशों की एक वजह यह भी हो सकती है कि जब मानवाधिकारों मामलों की बात हो तो सम्प्रभूता को शीर्ष पर रख दिया जाए। यूएई और कतर समेत कई मुस्लिम देशों पर समय-समय पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहते हैं। चीन का उइगर मुस्लिमों के मामले में साथ देकर मुस्लिम देश चीन के सामने खुद को उसका वफादार साबित करना चाहते हैं ताक़ि यदि इन देशों पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगे तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन इनका साथ दे सके।
जिस तरह से मुस्लिम देशों ने उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अत्याचारों पर आंख बंद कर रखी है, उससे साबित होता है कि मुस्लिम एकता जैसी भावना अब धीरे-धीरे मुस्लिमों देशों से ख़त्म होती जा रही है। राजनीतिक और आर्थिक लाभ की सम्भावनाओं को देखते हुए अब मुस्लिम देश धार्मिक की जगह पर व्यवहारिक होते जा रहे हैं। यही कारण है कि मुस्लिम ब्रदरहूड की बात करने वाले मुस्लिम देश, चीन में उइगर मुस्लिमों के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव पर चुप्पी साधे बैठे हैं।