जानिए क्यों ‘विवादित’ है भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35-ए?
Monday - July 29, 2019 12:45 pm ,
Category : WTN HINDI
जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 35-ए हटाने की ‘अटकलें’
विरोध और समर्थन के बीच अनुच्छेद 35-ए पर फ़िर से छिड़ी ‘बहस’
JULY 29 (WTN) – क्या जम्मू कश्मीर राज्य से केन्द्र सरकार अनुच्छेद 35-ए को खत्म करने जा रही है। दरअसल, जब से राज्य में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश सामने आया है तभी से यह अटकलें तेज़ हो गई हैं। वहीं राज्य में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती के आदेश के बाद राजनीति शुरू हो गई है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत कई कश्मीरी नेताओं ने केन्द्र सरकार को अनुच्छेद 35-ए के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से बचने की सलाह, चेतावनी और धमकी दी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अनुच्छेद 35-ए का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है। हालांकि, इस पर अभी तक किसी भी तरह का कोई भी फ़ैसला नहीं आया है। साल 2014 में अनुच्छेद 35-ए के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने याचिका डाली थी। तभी से यह मामला देश में बहस और विवाद का केन्द्र बना हुआ है। क्या है अनुच्छेद 35-ए और क्यों इसका काफ़ी समय से विरोध हो रहा है, आइये इसके बारे में आपको विस्तार से जानकारी देते हैं।
दरअसल, अनुच्छेद 35-ए भारत के संविधान का मूल हिस्सा नहीं है। साल 1954 में इसे संविधान में जोड़ा गया था। अनुच्छेद 35-ए को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कैबिनेट की सिफ़ारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के एक आदेश से संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद का आधार था साल 1952 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ दिल्ली समझौता। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली समझौते के तहत भारतीय नागरिकता के मामले को जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में इसे राज्य का विषय माना गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी निवासियों के लिए नियम तय हुए हैं। इस अनुच्छेद के अंतर्गत कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और सुविधाएं दी गई हैं। यह अधिकार और सुविधाएं सरकारी नौकरियों, सरकारी मदद, सम्पत्ति की ख़रीदी, कल्याणकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप और विरासत से जुड़ी हुए हैं।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि अनुच्छेद 35-ए भारतीय संविधान का मूल हिस्सा नहीं है। अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जोड़ने सम्बन्धित राष्ट्रपति का ये आदेश संविधान के अनुच्छेद 370 (1) (डी) के तहत जारी किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह प्रावधान राष्ट्रपति को जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्य के विषय पर संविधान में आवश्यकता पड़ने पर बदलावों और छूट देने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जोड़ते समय संसदीय प्रणाली से क़ानून बनाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था बल्कि उसकी जगह पर राष्ट्रपति के आदेश के जरिए इसे संविधान में जोड़ा गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 (आई) संविधान में किसी भी संशोधन का अधिकार सिर्फ संसद को देता है।
जैसा कि हने आपको पहले बताया कि अनुच्छेद 35-ए को साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस अनुच्छेद को भारत की एकता की भावना के ख़िलाफ़ और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला प्रावधान बताया गया है। इस याचिका में अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद 370 की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि 35-ए अपने आप में एक अस्थायी उपबंध था, जिसे उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य के हालात को स्थिर करने के लिए जोड़ा गया था और इस अनुच्छेद को संविधान के निर्माताओं ने नहीं बनाया।
दरअसल, पूरे भारत में अनुच्छेद 35-ए का विरोध इसलिए होता है कि क्योंकि यह अनुच्छेद भारतीय नागरिकों के बीच भेद उत्पन्न करता है। यह विवादित अनुच्छेद बाकी राज्यों के लोगों को जम्मू-कश्मीर में नौकरी हासिल करने और सम्पत्ति ख़रीदने से रोकता है जो कि भारत के संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का सरासर उल्लंघन है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के हर नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में मूल अधिकार दिये गये हैं। अनुच्छेद 35-ए के विरोधियों का तर्क है यह अनुच्छेद भारतीय संविधान द्वारा दिये गये मूल अधिकारों के विपरीत है। विरोधियों का तर्क है कि इस अनुच्छेद की आड़ में कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दिया जाता है और पाकिस्तान की शह पर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठनों समेत भाजपा और शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टियां काफ़ी समय से यह मांग करती आ रही हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य से विवादित अनुच्छेद 35-ए को हटाया जाए और पूरे देश में एक देश-एक क़ानून लागू किया जाए। भाजपा की विचारधारा और घोषणा पत्र में हमेशा से ही अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद 370 को हटाने का जिक्र रहता है। अब देखना होगा कि इस विवादित अनुच्छेद को पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार हटाने का साहस कर पाती है कि नहीं?
JULY 29 (WTN) – क्या जम्मू कश्मीर राज्य से केन्द्र सरकार अनुच्छेद 35-ए को खत्म करने जा रही है। दरअसल, जब से राज्य में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश सामने आया है तभी से यह अटकलें तेज़ हो गई हैं। वहीं राज्य में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती के आदेश के बाद राजनीति शुरू हो गई है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यंत्रियों उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत कई कश्मीरी नेताओं ने केन्द्र सरकार को अनुच्छेद 35-ए के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ से बचने की सलाह, चेतावनी और धमकी दी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अनुच्छेद 35-ए का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है। हालांकि, इस पर अभी तक किसी भी तरह का कोई भी फ़ैसला नहीं आया है। साल 2014 में अनुच्छेद 35-ए के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने याचिका डाली थी। तभी से यह मामला देश में बहस और विवाद का केन्द्र बना हुआ है। क्या है अनुच्छेद 35-ए और क्यों इसका काफ़ी समय से विरोध हो रहा है, आइये इसके बारे में आपको विस्तार से जानकारी देते हैं।
दरअसल, अनुच्छेद 35-ए भारत के संविधान का मूल हिस्सा नहीं है। साल 1954 में इसे संविधान में जोड़ा गया था। अनुच्छेद 35-ए को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कैबिनेट की सिफ़ारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के एक आदेश से संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद का आधार था साल 1952 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ दिल्ली समझौता। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली समझौते के तहत भारतीय नागरिकता के मामले को जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में इसे राज्य का विषय माना गया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी निवासियों के लिए नियम तय हुए हैं। इस अनुच्छेद के अंतर्गत कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और सुविधाएं दी गई हैं। यह अधिकार और सुविधाएं सरकारी नौकरियों, सरकारी मदद, सम्पत्ति की ख़रीदी, कल्याणकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप और विरासत से जुड़ी हुए हैं।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि अनुच्छेद 35-ए भारतीय संविधान का मूल हिस्सा नहीं है। अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जोड़ने सम्बन्धित राष्ट्रपति का ये आदेश संविधान के अनुच्छेद 370 (1) (डी) के तहत जारी किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह प्रावधान राष्ट्रपति को जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्य के विषय पर संविधान में आवश्यकता पड़ने पर बदलावों और छूट देने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जोड़ते समय संसदीय प्रणाली से क़ानून बनाने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था बल्कि उसकी जगह पर राष्ट्रपति के आदेश के जरिए इसे संविधान में जोड़ा गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368 (आई) संविधान में किसी भी संशोधन का अधिकार सिर्फ संसद को देता है।
जैसा कि हने आपको पहले बताया कि अनुच्छेद 35-ए को साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस अनुच्छेद को भारत की एकता की भावना के ख़िलाफ़ और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला प्रावधान बताया गया है। इस याचिका में अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद 370 की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया है कि 35-ए अपने आप में एक अस्थायी उपबंध था, जिसे उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य के हालात को स्थिर करने के लिए जोड़ा गया था और इस अनुच्छेद को संविधान के निर्माताओं ने नहीं बनाया।
दरअसल, पूरे भारत में अनुच्छेद 35-ए का विरोध इसलिए होता है कि क्योंकि यह अनुच्छेद भारतीय नागरिकों के बीच भेद उत्पन्न करता है। यह विवादित अनुच्छेद बाकी राज्यों के लोगों को जम्मू-कश्मीर में नौकरी हासिल करने और सम्पत्ति ख़रीदने से रोकता है जो कि भारत के संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का सरासर उल्लंघन है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि देश के हर नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 में मूल अधिकार दिये गये हैं। अनुच्छेद 35-ए के विरोधियों का तर्क है यह अनुच्छेद भारतीय संविधान द्वारा दिये गये मूल अधिकारों के विपरीत है। विरोधियों का तर्क है कि इस अनुच्छेद की आड़ में कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा दिया जाता है और पाकिस्तान की शह पर भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके संगठनों समेत भाजपा और शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टियां काफ़ी समय से यह मांग करती आ रही हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य से विवादित अनुच्छेद 35-ए को हटाया जाए और पूरे देश में एक देश-एक क़ानून लागू किया जाए। भाजपा की विचारधारा और घोषणा पत्र में हमेशा से ही अनुच्छेद 35-ए और अनुच्छेद 370 को हटाने का जिक्र रहता है। अब देखना होगा कि इस विवादित अनुच्छेद को पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार हटाने का साहस कर पाती है कि नहीं?