जानिए क्यों हो रहा है इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति का विरोध?
Tuesday - July 30, 2019 3:32 pm ,
Category : WTN HINDI
2030 तक चरणबद्ध तरीक़े से इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाने की नीति
इलेक्ट्रिक व्हीकल के ‘पक्ष’ और ‘विपक्ष’ में कई तर्क!
JULY 30 (WTN) - जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ, वायु प्रदूषण के महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। वहीं आप यह भी जानते होंगे कि भारत अपने तेल ज़रूरत का क़रीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसके कारण देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा इसमें ख़र्च करना पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल के दाम कई बार इतने ऊंचे हो जाते हैं कि केन्द्र सरकार को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है।
बढ़ते प्रदूषण और तेल के लिए विदेशी मुद्रा के ख़र्च को देखते हुए काफ़ी अध्ययन करने के बाद सरकार ने यह फ़ैसला लिया है कि साल 2030 तक देश में ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलाई जाएं। लेकिन सरकार के इस फ़ैसले का विरोध होना शुरू हो गया है। आख़िर क्यों इसका विरोध किया जा रहा है? आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आइये सबसे पहले आपको बताते हैं कि आख़िर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए केन्द्र सरकार की क्या नीति है? दरअसल, केन्द्र सरकार साल 2030 तक देश में मौजूद 30 प्रतिशत निजी कारों, 70 प्रतिशत कॉमर्शियल कारों, 40 प्रतिशत बसों और 80 प्रतिशत दोपहिया-तिपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक व्हीकल में बदलना चाहती है। इसके लिए चरणबद्ध तरीक़े से केन्द्र सरकार योजना बना रही है।
सबसे पहले तो केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक वाहनों की नीति से राज्य सरकारों को राजस्व हानि का डर सता रहा है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ इस बारे में राज्य सरकारों का कहना है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों के आने से पेट्रोल-डीज़ल की ख़पत कम होगी, जिससे इससे वैट के माध्यम से आने वाले राजस्व में कमी आएगी। राज्य सरकारों का तर्क है कि पेट्रोल-डीज़ल पर वैट से उन्हें काफ़ी राजस्व की प्राप्ति होती है, लेकिन यदि इलेक्ट्रिक वाहन आएंगे तो इससे राज्यों को मिलने वाला राजस्व कम हासिल होगा जिससे विकास कार्यों के लिए पैसों की कमी सामने आएगी।
राजस्व की कमी की आशंका को देखते हुए राज्य सरकारें चाहती हैं कि यदि केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति से उनके राजस्व में कमी आती है तो केन्द्र सरकार इस राजस्व कमी की भरपाई करे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी लागू करते समय केन्द्र सरकार ने कहा था कि जीएसटी लागू करने के बाद राज्य सरकारों के राजस्व में आई कमी को केन्द्र सरकार पांच साल तक पूरा करेगी। अब इलेक्ट्रिक व्हीकल की नीति से सहमी राज्य सरकारों की मांग है कि आने वाले पांच सालों तक और जीएसटी के मामले की अवधि को बढ़ाया जाए, जिससे केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक गाड़ियों की नीति से होने वाले नुकसान की थोड़ी-बहुत भरपाई हो सके।
राज्य सरकारों की चिंता के बीच केन्द्र सरकार का तर्क है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति देश के लिए काफ़ी ज़रूरी है। केन्द्र सरकार का कहना है कि काफ़ी रिसर्च के बाद अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों की क़ीमत काफ़ी कम हो गई है। वहीं यह गाड़ियां सस्ती भी पड़ेंगी, क्योंकि इस पर लगने वाला जीएसटी 12 प्रतिशत से कम होकर 5 प्रतिशत हो गया है। सरकार का तर्क है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल ईको-फ्रेंडली हैं, जिससे वायु और ध्वनि प्रदूषण में काफ़ी कमी आएगी। सरकार का इलेक्ट्रिक व्हीकल के बारे में कहना है कि पेट्रोल-डीज़ल जैसी पारम्परिक गाड़ियों की तुलना में इलेक्ट्रिक व्हीकल में मेंटनेंस लागत बहुत कम आती है।
नीति आयोग के अनुसार साल 2030 तक अगर तय फॉर्मूले के अनुसार इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलने लगीं तो भारत में सड़क पर चलने वाली गाड़ियों में लगने वाली ऊर्जा का 64 प्रतिशत हिस्सा बचेगा। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में क़रीब 30 प्रतिशत की कमी आएगी। यदि भारत में साल 2030 तक इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलने लगेंगी तो इससे देश में 153 मेगाटन पेट्रोल-डीज़ल की बचत होगी, जिससे क़रीब 3.9 लाख करोड़ रुपयों की सालाना बचेंगे।
लेकिन सरकार के दावों के विपरीत इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल के आने से भारत में विकास की रफ़्तार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। विरोधियों का तर्क है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों का पिकअप कमजोर होता है और उनकी गति भी धीमी होती है। ऐसे में देश में वाहनों की रफ़्तार कम होगी जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर देश के विकास पर पड़ेगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि लोगों को सफ़र में ज़्यादा समय लगेगा तो स्वाभाविक है कि वर्क कल्चर पर इसका असर पड़ेगा।
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के विरोध का एक बड़ा कारण है इलेक्ट्रिक चार्जिंग प्वाइंट और सेन्टर्स की कमी का होना। विरोधियों का तर्क है कि पहले देश में ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन बनाने होंगे, उसके बाद ही इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर सरकार की नीति सफल हो सकती है, और यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश की जनता को काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। अब देखना होगा कि विरोधियों के तर्क के क्या जवाब केन्द्र सरकार के पास हैं, क्योंकि विरोधियों का तर्क सही है कि यदि ज़रूरत के हिसाब से इलेक्ट्रिक चार्जिंग प्वाइंट और सेन्टर्स नहीं बनाए गए तो इससे देश में अफरातफरी का माहौल बन सकता है।
JULY 30 (WTN) - जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ, वायु प्रदूषण के महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। वहीं आप यह भी जानते होंगे कि भारत अपने तेल ज़रूरत का क़रीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसके कारण देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा इसमें ख़र्च करना पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल के दाम कई बार इतने ऊंचे हो जाते हैं कि केन्द्र सरकार को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है।
बढ़ते प्रदूषण और तेल के लिए विदेशी मुद्रा के ख़र्च को देखते हुए काफ़ी अध्ययन करने के बाद सरकार ने यह फ़ैसला लिया है कि साल 2030 तक देश में ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलाई जाएं। लेकिन सरकार के इस फ़ैसले का विरोध होना शुरू हो गया है। आख़िर क्यों इसका विरोध किया जा रहा है? आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आइये सबसे पहले आपको बताते हैं कि आख़िर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए केन्द्र सरकार की क्या नीति है? दरअसल, केन्द्र सरकार साल 2030 तक देश में मौजूद 30 प्रतिशत निजी कारों, 70 प्रतिशत कॉमर्शियल कारों, 40 प्रतिशत बसों और 80 प्रतिशत दोपहिया-तिपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक व्हीकल में बदलना चाहती है। इसके लिए चरणबद्ध तरीक़े से केन्द्र सरकार योजना बना रही है।
सबसे पहले तो केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक वाहनों की नीति से राज्य सरकारों को राजस्व हानि का डर सता रहा है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़ इस बारे में राज्य सरकारों का कहना है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों के आने से पेट्रोल-डीज़ल की ख़पत कम होगी, जिससे इससे वैट के माध्यम से आने वाले राजस्व में कमी आएगी। राज्य सरकारों का तर्क है कि पेट्रोल-डीज़ल पर वैट से उन्हें काफ़ी राजस्व की प्राप्ति होती है, लेकिन यदि इलेक्ट्रिक वाहन आएंगे तो इससे राज्यों को मिलने वाला राजस्व कम हासिल होगा जिससे विकास कार्यों के लिए पैसों की कमी सामने आएगी।
राजस्व की कमी की आशंका को देखते हुए राज्य सरकारें चाहती हैं कि यदि केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति से उनके राजस्व में कमी आती है तो केन्द्र सरकार इस राजस्व कमी की भरपाई करे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जीएसटी लागू करते समय केन्द्र सरकार ने कहा था कि जीएसटी लागू करने के बाद राज्य सरकारों के राजस्व में आई कमी को केन्द्र सरकार पांच साल तक पूरा करेगी। अब इलेक्ट्रिक व्हीकल की नीति से सहमी राज्य सरकारों की मांग है कि आने वाले पांच सालों तक और जीएसटी के मामले की अवधि को बढ़ाया जाए, जिससे केन्द्र सरकार की इलेक्ट्रिक गाड़ियों की नीति से होने वाले नुकसान की थोड़ी-बहुत भरपाई हो सके।
राज्य सरकारों की चिंता के बीच केन्द्र सरकार का तर्क है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति देश के लिए काफ़ी ज़रूरी है। केन्द्र सरकार का कहना है कि काफ़ी रिसर्च के बाद अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों की क़ीमत काफ़ी कम हो गई है। वहीं यह गाड़ियां सस्ती भी पड़ेंगी, क्योंकि इस पर लगने वाला जीएसटी 12 प्रतिशत से कम होकर 5 प्रतिशत हो गया है। सरकार का तर्क है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल ईको-फ्रेंडली हैं, जिससे वायु और ध्वनि प्रदूषण में काफ़ी कमी आएगी। सरकार का इलेक्ट्रिक व्हीकल के बारे में कहना है कि पेट्रोल-डीज़ल जैसी पारम्परिक गाड़ियों की तुलना में इलेक्ट्रिक व्हीकल में मेंटनेंस लागत बहुत कम आती है।
नीति आयोग के अनुसार साल 2030 तक अगर तय फॉर्मूले के अनुसार इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलने लगीं तो भारत में सड़क पर चलने वाली गाड़ियों में लगने वाली ऊर्जा का 64 प्रतिशत हिस्सा बचेगा। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में क़रीब 30 प्रतिशत की कमी आएगी। यदि भारत में साल 2030 तक इलेक्ट्रिक गाड़ियां चलने लगेंगी तो इससे देश में 153 मेगाटन पेट्रोल-डीज़ल की बचत होगी, जिससे क़रीब 3.9 लाख करोड़ रुपयों की सालाना बचेंगे।
लेकिन सरकार के दावों के विपरीत इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल के आने से भारत में विकास की रफ़्तार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। विरोधियों का तर्क है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों का पिकअप कमजोर होता है और उनकी गति भी धीमी होती है। ऐसे में देश में वाहनों की रफ़्तार कम होगी जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर देश के विकास पर पड़ेगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि लोगों को सफ़र में ज़्यादा समय लगेगा तो स्वाभाविक है कि वर्क कल्चर पर इसका असर पड़ेगा।
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के विरोध का एक बड़ा कारण है इलेक्ट्रिक चार्जिंग प्वाइंट और सेन्टर्स की कमी का होना। विरोधियों का तर्क है कि पहले देश में ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन बनाने होंगे, उसके बाद ही इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर सरकार की नीति सफल हो सकती है, और यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश की जनता को काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। अब देखना होगा कि विरोधियों के तर्क के क्या जवाब केन्द्र सरकार के पास हैं, क्योंकि विरोधियों का तर्क सही है कि यदि ज़रूरत के हिसाब से इलेक्ट्रिक चार्जिंग प्वाइंट और सेन्टर्स नहीं बनाए गए तो इससे देश में अफरातफरी का माहौल बन सकता है।