चीन में अब इस्लामिक प्रतीक ‘निशाने’ पर!
Thursday - August 1, 2019 12:48 pm ,
Category : WTN HINDI
योजनाबद्ध तरीक़े से चीन से ‘हटाए’ जा रहे इस्लामिक सिम्बल
मुस्लिमों पर चीनी सरकार के ‘अत्याचार’ की एक नई तस्वीर
AUG 01 (WTN) – चीन एक ऐसा देश है जहां पर विरोध करना मना है। चीन में लोकतंत्र की मांग करने वाले विद्यार्थियों पर साल 1989 में चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने जो जुल्म किये थे उसकी गवाह पूरी दुनिया है। लोकतंत्र की मांग कर रहे विद्यार्थियों के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुचलने के लिए चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने सेना के टैंकों को सड़कों पर उतार दिया था और प्रदर्शनकारियों की ‘हत्या’ कर दी गई थी। इसी ‘विस्तारवादी’ चीन की राजधानी बीजिंग से अब इस्लाम से जुड़े प्रतीकों को हटाया जा रहा है।
बीजिंग प्रशासन ने हलाल रेस्टोरेंट से लेकर फूड स्टाल तक से इस्लामिक प्रतीकों को हटाने का फरमान जारी कर दिया है। जहां पर भी अरबी भाषा में लिखे शब्दों और इस्लाम समुदाय के प्रतीक हैं, उन सभी को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, अधिकारियों ने बीजिंग के रेस्टोरेंट और दुकानों को इस्लाम से जुड़े सभी प्रतीकों को हटाने का आदेश दिया है। इन प्रतीकों में चांद और अरबी भाषा में लिखे हुए हलाल शब्द के बोर्ड शामिल हैं। बीजिंग की कई दुकानों में अब हलाल के लिए चीनी शब्द क्विंग जेन लिख दिया गया है, जबकि कुछ दुकानदारों ने अरबी भाषा और इस्लामिक संकेतों के बोर्ड को छिपा दिया है।
चीन में ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि चीन का मानना है कि यह एक विदेशी संस्कृति है और चीन में रहने वालों को चीनी सभ्यता को ज़्यादा से ज़्यादा अपनाना चाहिए। यह पहली बार नहीं हो रहा कि चीन में अरबी भाषा और इस्लामिक प्रतीकों के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है। साल 2016 से ही इस तरह का कैम्पेन चल रहा है, जिसमें विदेशी संस्कृति को चीन से बाहर करना शामिल है। चीन की कम्यूनिस्ट सरकार चाहती है कि उसके देश में सारे धर्म चीन की मुख्य धारा की संस्कृति के अनुसार ही हों।
चीन में इस्लामीकरण के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे कैम्पेन में मस्जिदें भी सुरक्षित नहीं हैं। चीन में अब मध्य-पूर्वी शैली में बनी मस्जिदों के गुम्बदों को तोड़ा जा रहा है और उन्हें चीनी शैली के पगौडा में बदला जा रहा है। वैसे कहने को तो चीन में आधिकारिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता है, लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार अपनी पार्टी की विचारधारा के प्रति वफ़ादार रहने के लिए हर नागरिक को बाध्य कर रही है।
ऐसा नहीं है कि चीन की कम्यूनिस्ट सरकार की नज़र सिर्फ़ मुस्लिमों और उनके प्रतीकों पर ही है। चीन में स्थानीय प्रशासन ने कई अंडरग्राउंड चर्च को भी बंद करवाया है। इतना ही नहीं, कई चर्च के क्रॉसेस को सरकार ने अवैध घोषित कर हटा दिया है। चीनी सरकार के इस फ़ैसले की कई देशों ने निंदा की है।
दरअसल, चीन की कम्यूनिस्ट सरकार का तर्क है कि वो किसी भी क़ीमत पर अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को पनपने देना नहीं चाहती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2009 में चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों और चीन के हान समुदाय के लोगों के बीच दंगे हो गये थे। इन दंगों को चीनी सरकार ने काफ़ी बर्बरता से नियंत्रित किया था। इसी के बाद से चीन ने मुस्लिमों के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया, जिसमें उसने चीन के मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दमन करना शुरू किया।
चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर काफ़ी कड़े क़ानून चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने लागू करके रखे हैं। यहां पर मुस्लिमों को कड़ी निगरानी में रखा जाता है और उन्हें बिल्कुल भी धार्मिक आज़ादी नहीं है। उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार की सच्चाई समय-समय पर पूरी दुनिया के सामने आती रहती है, जिसकी पूरी दुनिया में कड़ी आलोचना होती है। लेकिन इस सबका चीन की सरकार पर कोई भी असर नहीं पड़ता है। इस पूरे मामले में चीन की सरकार का कहना है कि शिनजियांग प्रांत में उसकी कार्रवाई धार्मिक चरमपंथ को रोकने के लिए ज़रूरी है।
चीन में उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जमकर अत्याचार हो रहा है, लेकिन इतना होने के बाद भी सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देश चीन के साथ ही खड़े नज़र आ रहे हैं। चीन में मुस्लिमों पर अत्याचार के आरोप लगने के बाद कई मुस्लिमों देशों ने संयुक्त राष्ट्र को एक पत्र लिखकर चीनी सरकार की मुस्लिमों के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई का इस आधार पर समर्थन किया है कि चीन को अपनी सम्प्रभुता की रक्षा करने और आतंकी गतिविधियों पनपने से रोकने का पूरा अधिकार है।
इस समय मुस्लिम देशों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक मज़बूरी है कि वे चीन का विरोध नहीं कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका समेत कई अन्य देशों ने अल्पसंख्यकों के प्रति चीनी सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। चीनी सरकार धार्मिक चरमपंथ रोकने के नाम पर जो अत्याचार मुस्लिमों के ख़िलाफ़ कर रही है, उस पर मुस्लिम देशों की चुप्पी साबित करती है कि मुस्लिम एकता की भावना अब शायद राजनीतिक और आर्थिक दबावों के आगे फीकी पड़ती नज़र आ रही है।
AUG 01 (WTN) – चीन एक ऐसा देश है जहां पर विरोध करना मना है। चीन में लोकतंत्र की मांग करने वाले विद्यार्थियों पर साल 1989 में चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने जो जुल्म किये थे उसकी गवाह पूरी दुनिया है। लोकतंत्र की मांग कर रहे विद्यार्थियों के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुचलने के लिए चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने सेना के टैंकों को सड़कों पर उतार दिया था और प्रदर्शनकारियों की ‘हत्या’ कर दी गई थी। इसी ‘विस्तारवादी’ चीन की राजधानी बीजिंग से अब इस्लाम से जुड़े प्रतीकों को हटाया जा रहा है।
बीजिंग प्रशासन ने हलाल रेस्टोरेंट से लेकर फूड स्टाल तक से इस्लामिक प्रतीकों को हटाने का फरमान जारी कर दिया है। जहां पर भी अरबी भाषा में लिखे शब्दों और इस्लाम समुदाय के प्रतीक हैं, उन सभी को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, अधिकारियों ने बीजिंग के रेस्टोरेंट और दुकानों को इस्लाम से जुड़े सभी प्रतीकों को हटाने का आदेश दिया है। इन प्रतीकों में चांद और अरबी भाषा में लिखे हुए हलाल शब्द के बोर्ड शामिल हैं। बीजिंग की कई दुकानों में अब हलाल के लिए चीनी शब्द क्विंग जेन लिख दिया गया है, जबकि कुछ दुकानदारों ने अरबी भाषा और इस्लामिक संकेतों के बोर्ड को छिपा दिया है।
चीन में ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि चीन का मानना है कि यह एक विदेशी संस्कृति है और चीन में रहने वालों को चीनी सभ्यता को ज़्यादा से ज़्यादा अपनाना चाहिए। यह पहली बार नहीं हो रहा कि चीन में अरबी भाषा और इस्लामिक प्रतीकों के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है। साल 2016 से ही इस तरह का कैम्पेन चल रहा है, जिसमें विदेशी संस्कृति को चीन से बाहर करना शामिल है। चीन की कम्यूनिस्ट सरकार चाहती है कि उसके देश में सारे धर्म चीन की मुख्य धारा की संस्कृति के अनुसार ही हों।
चीन में इस्लामीकरण के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे कैम्पेन में मस्जिदें भी सुरक्षित नहीं हैं। चीन में अब मध्य-पूर्वी शैली में बनी मस्जिदों के गुम्बदों को तोड़ा जा रहा है और उन्हें चीनी शैली के पगौडा में बदला जा रहा है। वैसे कहने को तो चीन में आधिकारिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता है, लेकिन चीन की कम्युनिस्ट सरकार अपनी पार्टी की विचारधारा के प्रति वफ़ादार रहने के लिए हर नागरिक को बाध्य कर रही है।
ऐसा नहीं है कि चीन की कम्यूनिस्ट सरकार की नज़र सिर्फ़ मुस्लिमों और उनके प्रतीकों पर ही है। चीन में स्थानीय प्रशासन ने कई अंडरग्राउंड चर्च को भी बंद करवाया है। इतना ही नहीं, कई चर्च के क्रॉसेस को सरकार ने अवैध घोषित कर हटा दिया है। चीनी सरकार के इस फ़ैसले की कई देशों ने निंदा की है।
दरअसल, चीन की कम्यूनिस्ट सरकार का तर्क है कि वो किसी भी क़ीमत पर अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को पनपने देना नहीं चाहती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 2009 में चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों और चीन के हान समुदाय के लोगों के बीच दंगे हो गये थे। इन दंगों को चीनी सरकार ने काफ़ी बर्बरता से नियंत्रित किया था। इसी के बाद से चीन ने मुस्लिमों के ख़िलाफ़ आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया, जिसमें उसने चीन के मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दमन करना शुरू किया।
चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर काफ़ी कड़े क़ानून चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने लागू करके रखे हैं। यहां पर मुस्लिमों को कड़ी निगरानी में रखा जाता है और उन्हें बिल्कुल भी धार्मिक आज़ादी नहीं है। उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार की सच्चाई समय-समय पर पूरी दुनिया के सामने आती रहती है, जिसकी पूरी दुनिया में कड़ी आलोचना होती है। लेकिन इस सबका चीन की सरकार पर कोई भी असर नहीं पड़ता है। इस पूरे मामले में चीन की सरकार का कहना है कि शिनजियांग प्रांत में उसकी कार्रवाई धार्मिक चरमपंथ को रोकने के लिए ज़रूरी है।
चीन में उइगर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जमकर अत्याचार हो रहा है, लेकिन इतना होने के बाद भी सऊदी अरब और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देश चीन के साथ ही खड़े नज़र आ रहे हैं। चीन में मुस्लिमों पर अत्याचार के आरोप लगने के बाद कई मुस्लिमों देशों ने संयुक्त राष्ट्र को एक पत्र लिखकर चीनी सरकार की मुस्लिमों के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई का इस आधार पर समर्थन किया है कि चीन को अपनी सम्प्रभुता की रक्षा करने और आतंकी गतिविधियों पनपने से रोकने का पूरा अधिकार है।
इस समय मुस्लिम देशों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक मज़बूरी है कि वे चीन का विरोध नहीं कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका समेत कई अन्य देशों ने अल्पसंख्यकों के प्रति चीनी सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। चीनी सरकार धार्मिक चरमपंथ रोकने के नाम पर जो अत्याचार मुस्लिमों के ख़िलाफ़ कर रही है, उस पर मुस्लिम देशों की चुप्पी साबित करती है कि मुस्लिम एकता की भावना अब शायद राजनीतिक और आर्थिक दबावों के आगे फीकी पड़ती नज़र आ रही है।