अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर से रुपया हुआ ‘कमज़ोर’!
Tuesday - August 6, 2019 3:35 pm ,
Category : WTN HINDI
रुपये में एक दिन में 6 साल की सबसे बड़ी गिरावट
चीन की ‘चालाकी’ से भारतीय रुपये पर पड़ रहा ‘नकारात्मक’ असर
AUG 06 (WTN) – पूंजावादी देश अमेरिका और साम्यवादी देश चीन के बीच जारी कटुता, विवाद और प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ समय से दुनिया की इन दो बड़ी आर्थिक महाशक्तियों के बीच जारी ट्रेड वॉर तब और भी बढ़ गया, जब अमेरिका ने एक बड़ा फ़ैसला लेते हुए चीन की करेंसी युआन को 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने इतना बड़ा फ़ैसला 1990 के बाद एक बार फ़िर से लिया है। लेकिन चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर का 'नकारात्मक' असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है।
दोनों देशों के बीच जारी विवाद के बीच अमेरिका की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि चीन अपनी करेंसी युआन की ‘हेराफेरी’ कर रहा है। चीन और अमेरिका के बीच करेंसी का विवाद तब और गहरा गया, जब चीन ने अपनी करेंसी का 'अवमूल्यन' कर दिया। चीन का अपनी करेंसी का अवमूल्यन करने काम मतलब है कि चीन ने अपने सामान को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 'सस्ते' में बेचने के लिए अपनी करेंसी की वैल्यू को घटाया है। अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक़, चीन के इस क़दम से दुनियाभर के करेंसी बाज़ार पर 'बड़ा असर' हुआ है। भारत की बात की जाए तो चीन के इस फ़ैसले से भारतीय रूपये में एक दिन में 6 साल की 'सबसे बड़ी' गिरावट दर्ज की गई है।
दरअसल, चीन की मुद्रा युआन में क़रीब एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। सोमवार को शुरुआती कारोबार में युआन अमेरिका मुद्रा डॉलर के मुक़ाबले गिरकर 7 युआन प्रति डॉलर के नीचे आ गया, जो कि यह अगस्त 2010 के बाद का सबसे निचला स्तर है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन की करेंसी युआन दुनिया की अन्य करेंसी की तरह नहीं है। चीन का केन्द्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना हर दिन राष्ट्रीय मुद्रा युआन की क़ीमत तय करता है।
चीन का केन्द्रीय बैंक एक 'आधिकारिक मध्यबिंदु' के ज़रिए इस दर पर नियंत्रण रखता है, जिसके कारण किसी भी निश्चित दिन कारोबार में 'उठापटक' हो सकती है। चीन की केन्द्रीय बैंक का ऐसा करने का उद्देश्य विनिमय दर को और अधिक बाज़ार के मुताबिक बनाना है। चीन की मुद्रा युआन के कमज़ोर होने का सीधा सा अर्थ है कि इससे चीन का निर्यात सस्ता होगा, जिसका 'नकारात्मक' असर भारतीय रूपये और भारतीय निर्यात पर पड़ेगा।
चीन की करेंसी के अवमूल्यन का भारत पर भी ख़ासा 'असर' पड़ रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर में अमेरिकी क़दमों के 'ख़िलाफ़' चीन ने यह कदम उठाया है। यदि ऐसा ही जारी रहा तो इससे भारतीय रुपया और 'कमज़ोर' हो सकता है। भारतीय रूपया कमज़ोर होने से भारत के लिए कच्चा तेल ख़रीदना महंगा हो जाएगा। ऐसे में स्पष्ट रूप से भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ेंगे, जिससे महंगाई बढ़ने की 'आशंका' है।
यानी कि साफ़ है कि यदि चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर से भारतीय रूपये पर असर पड़ रहा है। चीन द्वारा अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के बाद भारतीय रूपया, अमेरिकी डॉलर की तुलना में कमज़ोर होगा। यदि रूपया कमज़ोर हुआ तो स्वाभाविक है कि देश में महंगाई बढ़ेगी। जानकारी के मुताबिक़ यदि रुपया एक डॉलर कमज़ोर होता है तो भारतीय तेल कम्पनियों पर 8,000 करोड़ रुपये का 'बोझ' पड़ता है। ऐसा होने पर तेल कम्पनियों को पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। यदि पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमतों में क़रीब 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो इससे महंगाई क़रीब 0.8 प्रतिशत बढ़ जाती है।
AUG 06 (WTN) – पूंजावादी देश अमेरिका और साम्यवादी देश चीन के बीच जारी कटुता, विवाद और प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ समय से दुनिया की इन दो बड़ी आर्थिक महाशक्तियों के बीच जारी ट्रेड वॉर तब और भी बढ़ गया, जब अमेरिका ने एक बड़ा फ़ैसला लेते हुए चीन की करेंसी युआन को 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने इतना बड़ा फ़ैसला 1990 के बाद एक बार फ़िर से लिया है। लेकिन चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर का 'नकारात्मक' असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है।
दोनों देशों के बीच जारी विवाद के बीच अमेरिका की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि चीन अपनी करेंसी युआन की ‘हेराफेरी’ कर रहा है। चीन और अमेरिका के बीच करेंसी का विवाद तब और गहरा गया, जब चीन ने अपनी करेंसी का 'अवमूल्यन' कर दिया। चीन का अपनी करेंसी का अवमूल्यन करने काम मतलब है कि चीन ने अपने सामान को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 'सस्ते' में बेचने के लिए अपनी करेंसी की वैल्यू को घटाया है। अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक़, चीन के इस क़दम से दुनियाभर के करेंसी बाज़ार पर 'बड़ा असर' हुआ है। भारत की बात की जाए तो चीन के इस फ़ैसले से भारतीय रूपये में एक दिन में 6 साल की 'सबसे बड़ी' गिरावट दर्ज की गई है।
दरअसल, चीन की मुद्रा युआन में क़रीब एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। सोमवार को शुरुआती कारोबार में युआन अमेरिका मुद्रा डॉलर के मुक़ाबले गिरकर 7 युआन प्रति डॉलर के नीचे आ गया, जो कि यह अगस्त 2010 के बाद का सबसे निचला स्तर है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन की करेंसी युआन दुनिया की अन्य करेंसी की तरह नहीं है। चीन का केन्द्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना हर दिन राष्ट्रीय मुद्रा युआन की क़ीमत तय करता है।
चीन का केन्द्रीय बैंक एक 'आधिकारिक मध्यबिंदु' के ज़रिए इस दर पर नियंत्रण रखता है, जिसके कारण किसी भी निश्चित दिन कारोबार में 'उठापटक' हो सकती है। चीन की केन्द्रीय बैंक का ऐसा करने का उद्देश्य विनिमय दर को और अधिक बाज़ार के मुताबिक बनाना है। चीन की मुद्रा युआन के कमज़ोर होने का सीधा सा अर्थ है कि इससे चीन का निर्यात सस्ता होगा, जिसका 'नकारात्मक' असर भारतीय रूपये और भारतीय निर्यात पर पड़ेगा।
चीन की करेंसी के अवमूल्यन का भारत पर भी ख़ासा 'असर' पड़ रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर में अमेरिकी क़दमों के 'ख़िलाफ़' चीन ने यह कदम उठाया है। यदि ऐसा ही जारी रहा तो इससे भारतीय रुपया और 'कमज़ोर' हो सकता है। भारतीय रूपया कमज़ोर होने से भारत के लिए कच्चा तेल ख़रीदना महंगा हो जाएगा। ऐसे में स्पष्ट रूप से भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ेंगे, जिससे महंगाई बढ़ने की 'आशंका' है।
यानी कि साफ़ है कि यदि चीन और अमेरिका के बीच जारी ट्रेड वॉर से भारतीय रूपये पर असर पड़ रहा है। चीन द्वारा अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के बाद भारतीय रूपया, अमेरिकी डॉलर की तुलना में कमज़ोर होगा। यदि रूपया कमज़ोर हुआ तो स्वाभाविक है कि देश में महंगाई बढ़ेगी। जानकारी के मुताबिक़ यदि रुपया एक डॉलर कमज़ोर होता है तो भारतीय तेल कम्पनियों पर 8,000 करोड़ रुपये का 'बोझ' पड़ता है। ऐसा होने पर तेल कम्पनियों को पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। यदि पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमतों में क़रीब 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो इससे महंगाई क़रीब 0.8 प्रतिशत बढ़ जाती है।