मोदी सरकार की कूटनीति से फ़िर होगी पाकिस्तान की ‘हार’!
Friday - August 16, 2019 12:57 pm ,
Category : WTN HINDI
कश्मीर मुद्दे पूरी दुनिया ने पाकिस्तान को ‘नकारा’
कश्मीर मसले पर ‘अकेला’ पड़ा पाकिस्तान!
AUG 16 (WTN) – कश्मीर मुद्दे पर मोदी सरकार की कूटनीति के आगे एक बार फ़िर से पाकिस्तान पूरी दुनिया में अकेला पड़ता नज़र आ रहा है। जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर एक ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है। भारत सरकार के इस फ़ैसले से बौखलाया पाकिस्तान इस मुद्दे पर पूरी दुनिया के देशों से भारत के ख़िलाफ़ समर्थन मांग रहा है। लेकिन, मोदी सरकार की कूटनीति के सामने पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार को हर क़दम पर हार का सामना करना पड़ रहा है।
दुनिया के अधिकांश देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। लेकिन, विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आ रहा है। दरअसल, पाकिस्तान का साथ देना चीन की कूटनीति का एक हिस्सा है, जिसके जरिये वो भारत पर दबाव बना रहा है। लेकिन, इसे चीन सरकार की कूटनीति के साथ-साथ चीन की पाकिस्तान के साथ मजबूरी भी कहना होगा कि चीन सरकार, कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में उठाने जा रही है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह जो बैठक होने जा रही है, वह एक बंद कमरे में होने जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है कि किसी भी बैठक को बंद कमरे में करवाना पड़ा हो। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में यह दूसरा मौक़ा है, जब कश्मीर मुद्दे पर कोई बैठक होने जा रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें 5 स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य हैं। स्थाई सदस्यों में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल हैं, वहीं इस समय जो 10 अस्थाई देश हैं वे हैं; बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इण्डोनेशिया, कुवैत, पेरू, पोलैण्ड और दक्षिण अफ्रीका।
मोदी सरकार की कूटनीति का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों में चीन को छोड़ दिया जाए, तो बाक़ी देश जैसे कि फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देने से मना कर दिया है। इन देशों का साफ़तौर पर कहना है कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान का आंतरिक मसला है, इसलिए दोनों देश इस मसले को मिलकर निपटाएं और इसमें किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन आप सोच रहे होंगे कि आख़िर क्या कारण है कि चीन इस मसले पर पाकिस्तान का साथ दे रहा है। दरअसल, चीन यह जानता है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 का मामला भारत का आंतरिक मामला है, लेकिन पाकिस्तान का साथ देना चीन की मजबूरी भी है और कूटनीति भी। चीन के सामने सबसे बड़ी मजबूरी है कि उसने पाकिस्तान में करोड़ों डॉलर्स का निवेश करके रखा हुआ है। चीन ने बेल्ट रोड इनीशिएटिव (BRO) और CPEC में काफ़ी रुपया लगाया है। अपनी इन महात्वाकांक्षी परियोजनाओं को पूरा करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए चीन को पाकिस्तान के साथ की इस समय काफ़ी ज़रूरत है।
स्वाभाविक है कि पाकिस्तान में करोड़ों डॉलर्स निवेश करने के बाद चीन किसी भी क़ीमत पर पाकिस्तान को नाराज़ नहीं करना चाहेगा। इसी कारण से चीन, पाकिस्तान का साथ दे रहा है। यदि कश्मीर मुद्दे पर चीन, पाकिस्तान का साथ नहीं देता है, तो चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाएं पाकिस्तान में खटाई में पड़ जाएंगी। चीन यह बेहतरीन तरीक़े से जानता है कि पाकिस्तान, भारत में आतंक को बढ़ावा देता रहता है, लेकिन चीन के लिए यह बात फ़ायदेमंद है। ऐसा इसलिए, क्योंकि चीन, भारत को आतंक के मामले में उलझाए रखना चाहता है, जिससे भारत की तरक्की पर नकारात्मक असर पड़े।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार सदस्य देश कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ नहीं हैं। वहीं 10 अस्थाई देशों से भी पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर साथ मिले, इसकी सम्भावना कम ही है। बात करें पोलैण्ड की तो वह इस समय यूएनएससी का रोटेटिंग प्रेसिडेंट हैं। ऐसे में यह उसकी राजनयिक मजबूरी है कि वो स्थाई सदस्य चीन के कहने पर कहने पर इस बैठक को बुलाए। हालांकि, पोलैण्ड ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ नहीं है.
पोलैण्ड के अलावा अन्य अस्थायी देश जैसे कि बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इण्डोनेशिया, कुवैत, पेरू और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश वर्तमान कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई नहीं देते हैं। इन देशों से मोदी सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर चर्चा कर अपना पक्ष पहले ही रख दिया है, जिसके बाद कहा जा रहा है कि यह देश कश्मीर मुद्दे पर शायद ही पाकिस्तान का साथ दें।
इधर, पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ख़ुद कबूल कर चुके हैं कि पूरी दुनिया के अधिकांश देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ हैं। चुंकि पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर पूरी दुनिया के देश नकार चुके हैं, ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान और चीन के कहने पर जो बैठक बुलाई जा रही है उसे बंद कमरे में किया जा रहा है। अब जबकि यह बैठक बंद दरवाज़े के पीछे चलेगी, ऐसे में इसमें पाकिस्तान का शामिल होना नामुमकिन है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का ना तो स्थाई सदस्य है और न ही अस्थाई सदस्य। बंद कमरे में होने जा रही इस बैठक का प्रसारण भी नहीं किया जाएगा।
साफ़ जाहिर है कि मोदी सरकार की कुशल कूटनीति के कारण ही कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पूरी दुनिया में अकेला पड़ गया है। मोदी सरकार की कूटनीति के कारण ही पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर पूरे दुनिया के अधिकांश देशों से समर्थन हासिल नहीं हो सका है। अब जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि चीन मजबूरी और कूटनीति के कारण इस मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दे रहा है। लेकिन, इतना तो तय है कि कश्मीर मुद्दे पर बंद दरवाज़े में होने जा रही बैठक में यदि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को मात खाना पड़ती है, तो यह तय है कि पूरी दुनिया में कश्मीर मुद्दे पर भारत की कूटनीतिक जीत होगी।
AUG 16 (WTN) – कश्मीर मुद्दे पर मोदी सरकार की कूटनीति के आगे एक बार फ़िर से पाकिस्तान पूरी दुनिया में अकेला पड़ता नज़र आ रहा है। जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर एक ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है। भारत सरकार के इस फ़ैसले से बौखलाया पाकिस्तान इस मुद्दे पर पूरी दुनिया के देशों से भारत के ख़िलाफ़ समर्थन मांग रहा है। लेकिन, मोदी सरकार की कूटनीति के सामने पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार को हर क़दम पर हार का सामना करना पड़ रहा है।
दुनिया के अधिकांश देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं। लेकिन, विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आ रहा है। दरअसल, पाकिस्तान का साथ देना चीन की कूटनीति का एक हिस्सा है, जिसके जरिये वो भारत पर दबाव बना रहा है। लेकिन, इसे चीन सरकार की कूटनीति के साथ-साथ चीन की पाकिस्तान के साथ मजबूरी भी कहना होगा कि चीन सरकार, कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में उठाने जा रही है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह जो बैठक होने जा रही है, वह एक बंद कमरे में होने जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है कि किसी भी बैठक को बंद कमरे में करवाना पड़ा हो। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में यह दूसरा मौक़ा है, जब कश्मीर मुद्दे पर कोई बैठक होने जा रही है। जैसा कि आप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें 5 स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य हैं। स्थाई सदस्यों में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस शामिल हैं, वहीं इस समय जो 10 अस्थाई देश हैं वे हैं; बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इण्डोनेशिया, कुवैत, पेरू, पोलैण्ड और दक्षिण अफ्रीका।
मोदी सरकार की कूटनीति का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों में चीन को छोड़ दिया जाए, तो बाक़ी देश जैसे कि फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देने से मना कर दिया है। इन देशों का साफ़तौर पर कहना है कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान का आंतरिक मसला है, इसलिए दोनों देश इस मसले को मिलकर निपटाएं और इसमें किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं है।
लेकिन आप सोच रहे होंगे कि आख़िर क्या कारण है कि चीन इस मसले पर पाकिस्तान का साथ दे रहा है। दरअसल, चीन यह जानता है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 का मामला भारत का आंतरिक मामला है, लेकिन पाकिस्तान का साथ देना चीन की मजबूरी भी है और कूटनीति भी। चीन के सामने सबसे बड़ी मजबूरी है कि उसने पाकिस्तान में करोड़ों डॉलर्स का निवेश करके रखा हुआ है। चीन ने बेल्ट रोड इनीशिएटिव (BRO) और CPEC में काफ़ी रुपया लगाया है। अपनी इन महात्वाकांक्षी परियोजनाओं को पूरा करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए चीन को पाकिस्तान के साथ की इस समय काफ़ी ज़रूरत है।
स्वाभाविक है कि पाकिस्तान में करोड़ों डॉलर्स निवेश करने के बाद चीन किसी भी क़ीमत पर पाकिस्तान को नाराज़ नहीं करना चाहेगा। इसी कारण से चीन, पाकिस्तान का साथ दे रहा है। यदि कश्मीर मुद्दे पर चीन, पाकिस्तान का साथ नहीं देता है, तो चीन की महत्वाकांक्षी परियोजनाएं पाकिस्तान में खटाई में पड़ जाएंगी। चीन यह बेहतरीन तरीक़े से जानता है कि पाकिस्तान, भारत में आतंक को बढ़ावा देता रहता है, लेकिन चीन के लिए यह बात फ़ायदेमंद है। ऐसा इसलिए, क्योंकि चीन, भारत को आतंक के मामले में उलझाए रखना चाहता है, जिससे भारत की तरक्की पर नकारात्मक असर पड़े।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चार सदस्य देश कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ नहीं हैं। वहीं 10 अस्थाई देशों से भी पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर साथ मिले, इसकी सम्भावना कम ही है। बात करें पोलैण्ड की तो वह इस समय यूएनएससी का रोटेटिंग प्रेसिडेंट हैं। ऐसे में यह उसकी राजनयिक मजबूरी है कि वो स्थाई सदस्य चीन के कहने पर कहने पर इस बैठक को बुलाए। हालांकि, पोलैण्ड ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ नहीं है.
पोलैण्ड के अलावा अन्य अस्थायी देश जैसे कि बेल्जियम, कोट डीवोएर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गुएनी, जर्मनी, इण्डोनेशिया, कुवैत, पेरू और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश वर्तमान कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़े दिखाई नहीं देते हैं। इन देशों से मोदी सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर चर्चा कर अपना पक्ष पहले ही रख दिया है, जिसके बाद कहा जा रहा है कि यह देश कश्मीर मुद्दे पर शायद ही पाकिस्तान का साथ दें।
इधर, पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ख़ुद कबूल कर चुके हैं कि पूरी दुनिया के अधिकांश देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के साथ हैं। चुंकि पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर पूरी दुनिया के देश नकार चुके हैं, ऐसे में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान और चीन के कहने पर जो बैठक बुलाई जा रही है उसे बंद कमरे में किया जा रहा है। अब जबकि यह बैठक बंद दरवाज़े के पीछे चलेगी, ऐसे में इसमें पाकिस्तान का शामिल होना नामुमकिन है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का ना तो स्थाई सदस्य है और न ही अस्थाई सदस्य। बंद कमरे में होने जा रही इस बैठक का प्रसारण भी नहीं किया जाएगा।
साफ़ जाहिर है कि मोदी सरकार की कुशल कूटनीति के कारण ही कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पूरी दुनिया में अकेला पड़ गया है। मोदी सरकार की कूटनीति के कारण ही पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर पूरे दुनिया के अधिकांश देशों से समर्थन हासिल नहीं हो सका है। अब जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि चीन मजबूरी और कूटनीति के कारण इस मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दे रहा है। लेकिन, इतना तो तय है कि कश्मीर मुद्दे पर बंद दरवाज़े में होने जा रही बैठक में यदि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को मात खाना पड़ती है, तो यह तय है कि पूरी दुनिया में कश्मीर मुद्दे पर भारत की कूटनीतिक जीत होगी।