कश्मीर मुद्दे पर चीन की ‘चालबाज़ी’!
Tuesday - August 20, 2019 10:17 am ,
Category : WTN HINDI
कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश में चीन
पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के ख़िलाफ़ ‘षड़यंत्र’ रच रहा चीन
AUG 20 (WTN) – विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन कोई भी ऐसा मौक़ा नहीं छोड़ता है, जबकि वो अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर भारत का विरोध कर सके। जैसा कि आप जानते हैं कि अपने एक आंतरिक मामले में फ़ैसला लेते हुए भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर राज्य का विभाजन किया है। भारत सरकार के इस फ़ैसले के बाद बौखलाया पाकिस्तान इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का पूरा प्रयास कर रहा है, जिसमें उसे चीन का भरपूर साथ मिल रहा है।
चीन की दख़लंदाज़ी के कारण ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर मुद्दे को लेकर बंद कमरे में एक अनौपचारिक चर्चा हुई। हालांकि, इस बैठक के बाद किसी भी तरह का बयान जारी नहीं किया गया। जैसा कि आप जानते हैं कि भारत हमेशा से ही कहता आया है कि कश्मीर मुद्दा भारत का आंतरिक मामला है, और इस मामले को भारत और पाकिस्तान दोनों देश मिलकर सुलझाएंगे। भारत, कश्मीर मुद्दे में किसी तीसरे देश या किसी वैश्विक संस्था की दख़ल को कभी भी स्वीकार नहीं करता है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी चीन कश्मीर मुद्दे को वैश्विक मंच पर उठा रहा है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करते हुए चीन ने पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बंद कमरे में चर्चा कराई। हालांकि, सुंयक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वर्तमान अध्यक्ष देश पोलैण्ड समेत सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी लगभग सभी देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के मत के साथ खड़े नज़र आए। साफ़ जाहिर है कि इससे चीन की पूरी दुनिया में किरकिरी हुई है।
कश्मीर मुद्दे पर चीन की आक्रामक कूटनीति के पीछे पाकिस्तान का साथ देने के अलावा कुछ अन्य कारण भी हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन का कश्मीर के एक बड़े हिस्से अक्साई चिन पर कब्जा है, जो लद्दाख के ठीक पूर्व में स्थित है। अनुच्छेद 370 ख़त्म होने और लद्दाख के केन्द्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब लद्दाख पर सीधे तौर पर भारत की केन्द्र सरकार का शासन होगा। यही वो ख़ास कारण है जिसके चलते चीन, कश्मीर मुद्दे पर ख़ुद को असहज महसूस कर रहा है।
चीन वैसे तो एक साम्यवादी देश है, लेकिन इन दिनों चीन एक पूंजीवादी देश की तरह कूटनीतिक क़दम उठा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ़िलहाल चीन और पाकिस्तान का व्यापार नवनिर्मित कराकोरम हाईवे से होता है, जो पश्चिमी कश्मीर क्षेत्र में दोनों देशों को जोड़ता है। अरबों डॉलर की लागत से बने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) के तहत इस सड़क को कई लेन वाले हाईवे में विकसित किया जा रहा है, ताकि पूरे साल इस रास्ते से व्यापार हो सके। चूंकि यह रास्ता कश्मीर से जुड़ा हुआ है, ऐसे में चीन कश्मीर मुद्दे पर जरा ज़्यादा ही दिलचस्पी ले रहा है।
चीन को चिंता है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने और लद्दाख के अलग केन्द्र शासित प्रदेश बनने से भारत-चीन की सीमाओं पर तनाव बढ़ सकता है। चीन की इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन जाकर बीजिंग को विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फ़ैसले का उद्देश्य किसी भी तरह के अतिरिक्त भूखण्ड पर कब्ज़ा जमाना नहीं है। भारत ने चीन को स्पष्ट बता दिया है कि भारत सरकार के फ़ैसले से चीन-पाकिस्तान के साथ सीमा रेखा की यथास्थिति पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन चीन, भारत के आंतरिक मुद्दे कश्मीर के अंतर्राष्ट्रीयकरण की जो कोशिश कर रहा है, ऐसे में चीन यह भूल गया है कि उसे खुद भी ताइवान और हांगकांग के मुद्दे पर पूरी दुनिया को जवाब देना है। चीन हमेशा से ही ताइवान और हांगकांग में हो रही गतिविधियों पर किसी भी तरह के हस्तक्षेप का इस तथ्य पर विरोध करता आया है कि ताइवान और हांगहांग उसके आंतरिक मामले हैं, और दुनिया को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लेकिन कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, भारत सरकार का यह पक्ष जानते हुए भी चीन कश्मीर मुद्दे का अतंर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश कर रहा है।
वैसे कूटनीतिक स्तर पर भारत ने चीन को इशारों-इशारों में ही चेतावनी दे दी है कि भारत किसी भी देश के आंतरिक मामले में ना तो हस्तक्षेप करता है और ना ही टिप्पणी करता है। इसलिए चीन को भी भारत सरकार के पक्ष को जानते हुए कश्मीर मुद्दे पर पर शान्त ही रहना चाहिए। दुनिया के लगभग हर मंच पर भारत का विरोध करता आया चीन कश्मीर मुद्दे का पाकिस्तान के कहने पर अंतर्राष्ट्रीयकरण को कोशिश कर रहा है। लेकिन लगता है चीन यह भूल गया है कि भारत के क़रीब 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाज़ार से वो पंगा नहीं ले सकता है।
चीन ने यदि पाकिस्तान के कहने पर कश्मीर मुद्दे पर उसका साथ दिया, तो हो सकता है कि भारत सरकार कूटनीति के तहत हांगकांग मुद्दे पर चीन को घेरे। वैसे चीन की साम्यवादी सरकार इतना जानती है कि पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का साथ देकर वो भारत के 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाज़ार से हाथ धोना नहीं चाहेगा। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान का साथ देना इस समय चीन की मजबूरी है, क्योंकि चीन के करोडों डॉलर्स के प्रोजेक्ट्स इस समय पाकिस्तान में चल रहे हैं। ऐसे में इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने तक चीन को मजबूरी में ही सही, लेकिन पाकिस्तान का साथ देना पड़ रहा है।
AUG 20 (WTN) – विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन कोई भी ऐसा मौक़ा नहीं छोड़ता है, जबकि वो अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर भारत का विरोध कर सके। जैसा कि आप जानते हैं कि अपने एक आंतरिक मामले में फ़ैसला लेते हुए भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर राज्य का विभाजन किया है। भारत सरकार के इस फ़ैसले के बाद बौखलाया पाकिस्तान इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का पूरा प्रयास कर रहा है, जिसमें उसे चीन का भरपूर साथ मिल रहा है।
चीन की दख़लंदाज़ी के कारण ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर मुद्दे को लेकर बंद कमरे में एक अनौपचारिक चर्चा हुई। हालांकि, इस बैठक के बाद किसी भी तरह का बयान जारी नहीं किया गया। जैसा कि आप जानते हैं कि भारत हमेशा से ही कहता आया है कि कश्मीर मुद्दा भारत का आंतरिक मामला है, और इस मामले को भारत और पाकिस्तान दोनों देश मिलकर सुलझाएंगे। भारत, कश्मीर मुद्दे में किसी तीसरे देश या किसी वैश्विक संस्था की दख़ल को कभी भी स्वीकार नहीं करता है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी चीन कश्मीर मुद्दे को वैश्विक मंच पर उठा रहा है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करते हुए चीन ने पाकिस्तान की ओर से कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बंद कमरे में चर्चा कराई। हालांकि, सुंयक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वर्तमान अध्यक्ष देश पोलैण्ड समेत सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी लगभग सभी देश कश्मीर मुद्दे पर भारत के मत के साथ खड़े नज़र आए। साफ़ जाहिर है कि इससे चीन की पूरी दुनिया में किरकिरी हुई है।
कश्मीर मुद्दे पर चीन की आक्रामक कूटनीति के पीछे पाकिस्तान का साथ देने के अलावा कुछ अन्य कारण भी हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन का कश्मीर के एक बड़े हिस्से अक्साई चिन पर कब्जा है, जो लद्दाख के ठीक पूर्व में स्थित है। अनुच्छेद 370 ख़त्म होने और लद्दाख के केन्द्र शासित प्रदेश बनने के बाद अब लद्दाख पर सीधे तौर पर भारत की केन्द्र सरकार का शासन होगा। यही वो ख़ास कारण है जिसके चलते चीन, कश्मीर मुद्दे पर ख़ुद को असहज महसूस कर रहा है।
चीन वैसे तो एक साम्यवादी देश है, लेकिन इन दिनों चीन एक पूंजीवादी देश की तरह कूटनीतिक क़दम उठा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ़िलहाल चीन और पाकिस्तान का व्यापार नवनिर्मित कराकोरम हाईवे से होता है, जो पश्चिमी कश्मीर क्षेत्र में दोनों देशों को जोड़ता है। अरबों डॉलर की लागत से बने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) के तहत इस सड़क को कई लेन वाले हाईवे में विकसित किया जा रहा है, ताकि पूरे साल इस रास्ते से व्यापार हो सके। चूंकि यह रास्ता कश्मीर से जुड़ा हुआ है, ऐसे में चीन कश्मीर मुद्दे पर जरा ज़्यादा ही दिलचस्पी ले रहा है।
चीन को चिंता है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने और लद्दाख के अलग केन्द्र शासित प्रदेश बनने से भारत-चीन की सीमाओं पर तनाव बढ़ सकता है। चीन की इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन जाकर बीजिंग को विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फ़ैसले का उद्देश्य किसी भी तरह के अतिरिक्त भूखण्ड पर कब्ज़ा जमाना नहीं है। भारत ने चीन को स्पष्ट बता दिया है कि भारत सरकार के फ़ैसले से चीन-पाकिस्तान के साथ सीमा रेखा की यथास्थिति पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन चीन, भारत के आंतरिक मुद्दे कश्मीर के अंतर्राष्ट्रीयकरण की जो कोशिश कर रहा है, ऐसे में चीन यह भूल गया है कि उसे खुद भी ताइवान और हांगकांग के मुद्दे पर पूरी दुनिया को जवाब देना है। चीन हमेशा से ही ताइवान और हांगकांग में हो रही गतिविधियों पर किसी भी तरह के हस्तक्षेप का इस तथ्य पर विरोध करता आया है कि ताइवान और हांगहांग उसके आंतरिक मामले हैं, और दुनिया को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लेकिन कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, भारत सरकार का यह पक्ष जानते हुए भी चीन कश्मीर मुद्दे का अतंर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश कर रहा है।
वैसे कूटनीतिक स्तर पर भारत ने चीन को इशारों-इशारों में ही चेतावनी दे दी है कि भारत किसी भी देश के आंतरिक मामले में ना तो हस्तक्षेप करता है और ना ही टिप्पणी करता है। इसलिए चीन को भी भारत सरकार के पक्ष को जानते हुए कश्मीर मुद्दे पर पर शान्त ही रहना चाहिए। दुनिया के लगभग हर मंच पर भारत का विरोध करता आया चीन कश्मीर मुद्दे का पाकिस्तान के कहने पर अंतर्राष्ट्रीयकरण को कोशिश कर रहा है। लेकिन लगता है चीन यह भूल गया है कि भारत के क़रीब 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाज़ार से वो पंगा नहीं ले सकता है।
चीन ने यदि पाकिस्तान के कहने पर कश्मीर मुद्दे पर उसका साथ दिया, तो हो सकता है कि भारत सरकार कूटनीति के तहत हांगकांग मुद्दे पर चीन को घेरे। वैसे चीन की साम्यवादी सरकार इतना जानती है कि पाकिस्तान जैसे आतंकी देश का साथ देकर वो भारत के 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाले बाज़ार से हाथ धोना नहीं चाहेगा। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान का साथ देना इस समय चीन की मजबूरी है, क्योंकि चीन के करोडों डॉलर्स के प्रोजेक्ट्स इस समय पाकिस्तान में चल रहे हैं। ऐसे में इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने तक चीन को मजबूरी में ही सही, लेकिन पाकिस्तान का साथ देना पड़ रहा है।