मिशन चन्द्रयान: असफ़लता ही सफ़लता के रास्ते खोलती है!
Saturday - September 7, 2019 1:09 pm ,
Category : WTN HINDI
लैण्डर विक्रम से इसरो का सम्पर्क टूटने से देश में ‘निराशा’
इसरो के वैज्ञानिकों के ‘कठिन’ प्रयासों की हर तरफ़ ‘सराहना’
SEP 07 (WTN) – लगातार कोशिश करने से ही सफ़लता हासिल होती है। असफ़लताओं को दरकिनार करते हुए लगातार कोशिशों का ही नतीज़ा है कि इंसान ने आज इतनी तरक्की कर ली है। असफ़लताओं के बाद निराश बैठने से लक्ष्य हासिल नहीं होता है। प्रयत्नों, सफ़लताओं और असफ़लताओं के बीच, भारत के चन्द्रयान-2 मिशन को एक बहुत बड़ा झटका लगा है। चांद पर उतरने के इसरो के वैज्ञानिकों के प्रयासों को चांद की सतह से सिर्फ़ 2.1 किलोमीटर पहले तब झटका लगा, जब लैण्डर विक्रम से इसरो का सम्पर्क टूट गया। हालांकि, कोशिश जारी हैं कि किसी तरह से लैण्डर विक्रम से सम्पर्क स्थापित किया जा सके।
विशाल अंतरिक्ष को भेदते हुए चांद के इतने क़रीब पहुंचकर उसकी सतह पर ना उतर पाने का दर्द इसरो के वैज्ञानिकों के चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता है। दरअसल, विशाल अंतरिक्ष को भेदना और अंतरिक्ष मे जाकर वापस आना कभी भी इंसान के लिए आसान नहीं रहा है। भारत ने तो चांद की सतह के क़रीब पहुंचने से कुछ दूरी पर अपने एक लैण्डर को गंवाया है, लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने अंतरिक्ष यात्रियों को जलकर ख़ाक होते देखा है।
दरअसल, इंसान की अंतरिक्ष में उड़ान की कोशिशों को 28 जनवरी 1986 को बहुत बड़ा झटका लगा था, जब नासा का अंतरिक्ष शटल यान चैलेंजर हादसे का शिकार हुआ था। अमेरिकी समय के अनुसार 28 जनवरी 1986 के दिन सुबह 11.38 मिनट पर स्पेस शटल चैलेंजर ने फ्लोरिडा के केप कैनेवेरल से उड़ान भरी थी। इस शटल यान में छह अंतरिक्ष यात्रियों के अलावा क्रिस्ट मैकऑलिफ भी सवार थीं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मैकऑलिफ एक टीचर थीं, और वह पहली अमेरिकी नागरिक बनने जा रही थीं, जो अंतरिक्ष की यात्रा करतीं। मैकऑलिफ ने एक प्रतियोगिता जीतकर दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों के साथ अंतरिक्ष में जाने का मौक़ा पाया था।
अंतरिक्ष शटल यान चैलेंजर की उड़ान को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग स्पेस सेंटर के पास मौजूद थे। लेकिन कहते हैं ना कि विज्ञान की भी कुछ सीमाएं हैं। स्पेस शटल चैलेंजर उड़ान भरने के 73 सेकेंड बाद ही हादसे का शिकार हो गया और उसमें सवार सारे अंतरिक्ष यात्री मारे गए। स्पेस सेंटर के पास खड़े सैकड़ों लोगों और टीवी पर इसका सीधा प्रसारण देख रहे करोड़ों लोगों ने इस हादसे को देखा था।
चैलेंजर हादसे के बाद पूरी अमेरिका में सन्नाटा सा पसर गया था। इस हादसे के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनॉल्ड रीगन ने एक विशेष आयोग का गठन किया था, जिसे यह पता लगाना था कि चैलेंजर के साथ ऐसा हादसा क्यों हुआ और भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं से बचने के लिए क्या सुधार किए जाने चाहिए।
राष्ट्रपति द्वारा गठित आयोग ने जब चैलेंजर हादसे की जांच की तो जांच में पता चला कि यान में लगे सॉलिड ईंधन रॉकेट की "ओ रिंग" सील के काम नहीं कर पाने के कारण विस्फोट हुआ। इस हादसे के बाद नासा की साख पर सवाल उठने लगे थे। जिसकी भरपाई के लिए बाद में एंडेवर नाम के अंतरिक्ष शटल को प्रक्षेपित किया गया।
अंतरिक्ष में नासा की असफलता एक बार फ़िर देखने मिली जब 17 साल बाद 1 फरवरी 2003 को नासा की स्पेस शटल एक बार फ़िर हादसे का शिकार हो गई। 1 फरवरी 2003 को कोलम्बिया अंतरिक्ष शटल पृथ्वी पर आने से पहले ही ध्वस्त हो गई। इस हादसे से भारत में भी शोक की लहर फैल गई थी, क्योंकि इस दुर्घटना में भारतीय मूल की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला का भी निधन हो गया था।
अंतरिक्ष में जाना कभी भी इंसान के लिए आसान नहीं रहा है और ना ही होगा। नासा जैसे संस्थान को भी कई बार अंतरिक्ष मिशनों में असफ़लता का सामना करना पड़ा है। इसरो के वैज्ञानिकों की प्रशंसा की जाना चाहिए कि उन्होंने चन्द्रयान-2 मिशन में चांद के उस हिस्से पर पहुंचने का प्रयास किया, जहां दुनिया के किसी भी देश की पहुंच नहीं है।
अमेरिका के अपोलो मिशन सहित ज़्यादातर मिशन्स में लैण्डिंग चांद के मध्य में की गई और चीन का मिशन चांद के उत्तरी ध्रुव की तरफ था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इसरो के सामने चांद की पथरीली ज़मीन भी सॉफ्ट लैण्डिंग के लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि लैण्डर विक्रम को दो क्रेटरों के बीच सॉफ्ट लैण्डिंग की जगह तलाशनी थी।
इसरो के वैज्ञानिकों को हताश या निराश होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने का उनका यह पहला प्रयास ही था। जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका जैसे विकसित देश को भी चांद पर अपने कई मिशनों में असफ़लता हासिल हुई है। आज के रूस और तब के सोवियत संघ ने 1958 से 1976 के बीच क़रीब 33 मिशन चांद की तरफ रवाना किए, लेकिन इनमें से 26 अपनी मन्जिल पर नहीं पहुंच सके।
चांद मिशन की असफ़लताओं में अमेरिका भी पीछे नहीं है। साल 1958 से 1972 तक अमेरिका के 31 चांद मिशनों में से 17 नाकाम रहे। इतना ही नहीं, अमेरिका ने 1969 से 1972 के बीच 6 मानव मिशन भी चांद पर भेजे। इन चांद मिशनों में 24 अंतरिक्ष यात्री चांद के क़रीब पहुंच गए, लेकिन सिर्फ़ 12 ही चांद की ज़मीन पर उतर सके।
इसी साल अप्रैल में इज़रायल का भी मिशन चांद अधूरा रह गया था। इज़रायल की एक प्राइवेट कम्पनी का ये मिशन 4 अप्रैल को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश तो कर गया था, लेकिन 10 किलोमीटर दूर रहते ही पृथ्वी से इसका सम्पर्क टूट गया।
असफ़लताएं अंत नहीं होती हैं, असफ़लताओं से सीखा जाता है कि ग़लती कहां पर हो गई जिसके काऱण असफ़लता हासिल हुई। इसरो के वैज्ञानिकों को निराश होने की कतई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर पहुंचने का उनका यह पहला प्रयास था, जो कि तकनीकी कमियों के कारण पूरा ना हो सका। चांद की सतह के इतने पास पहुंचना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। आशा है एक बार फ़िर से अगले चन्द्रयान मिशन के लिए इसरो के वैज्ञानिक जुट जाएंगे और सफ़लता हासिल करेंगे।
SEP 07 (WTN) – लगातार कोशिश करने से ही सफ़लता हासिल होती है। असफ़लताओं को दरकिनार करते हुए लगातार कोशिशों का ही नतीज़ा है कि इंसान ने आज इतनी तरक्की कर ली है। असफ़लताओं के बाद निराश बैठने से लक्ष्य हासिल नहीं होता है। प्रयत्नों, सफ़लताओं और असफ़लताओं के बीच, भारत के चन्द्रयान-2 मिशन को एक बहुत बड़ा झटका लगा है। चांद पर उतरने के इसरो के वैज्ञानिकों के प्रयासों को चांद की सतह से सिर्फ़ 2.1 किलोमीटर पहले तब झटका लगा, जब लैण्डर विक्रम से इसरो का सम्पर्क टूट गया। हालांकि, कोशिश जारी हैं कि किसी तरह से लैण्डर विक्रम से सम्पर्क स्थापित किया जा सके।
विशाल अंतरिक्ष को भेदते हुए चांद के इतने क़रीब पहुंचकर उसकी सतह पर ना उतर पाने का दर्द इसरो के वैज्ञानिकों के चेहरे पर साफ़ देखा जा सकता है। दरअसल, विशाल अंतरिक्ष को भेदना और अंतरिक्ष मे जाकर वापस आना कभी भी इंसान के लिए आसान नहीं रहा है। भारत ने तो चांद की सतह के क़रीब पहुंचने से कुछ दूरी पर अपने एक लैण्डर को गंवाया है, लेकिन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने अंतरिक्ष यात्रियों को जलकर ख़ाक होते देखा है।
दरअसल, इंसान की अंतरिक्ष में उड़ान की कोशिशों को 28 जनवरी 1986 को बहुत बड़ा झटका लगा था, जब नासा का अंतरिक्ष शटल यान चैलेंजर हादसे का शिकार हुआ था। अमेरिकी समय के अनुसार 28 जनवरी 1986 के दिन सुबह 11.38 मिनट पर स्पेस शटल चैलेंजर ने फ्लोरिडा के केप कैनेवेरल से उड़ान भरी थी। इस शटल यान में छह अंतरिक्ष यात्रियों के अलावा क्रिस्ट मैकऑलिफ भी सवार थीं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मैकऑलिफ एक टीचर थीं, और वह पहली अमेरिकी नागरिक बनने जा रही थीं, जो अंतरिक्ष की यात्रा करतीं। मैकऑलिफ ने एक प्रतियोगिता जीतकर दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों के साथ अंतरिक्ष में जाने का मौक़ा पाया था।
अंतरिक्ष शटल यान चैलेंजर की उड़ान को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग स्पेस सेंटर के पास मौजूद थे। लेकिन कहते हैं ना कि विज्ञान की भी कुछ सीमाएं हैं। स्पेस शटल चैलेंजर उड़ान भरने के 73 सेकेंड बाद ही हादसे का शिकार हो गया और उसमें सवार सारे अंतरिक्ष यात्री मारे गए। स्पेस सेंटर के पास खड़े सैकड़ों लोगों और टीवी पर इसका सीधा प्रसारण देख रहे करोड़ों लोगों ने इस हादसे को देखा था।
चैलेंजर हादसे के बाद पूरी अमेरिका में सन्नाटा सा पसर गया था। इस हादसे के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनॉल्ड रीगन ने एक विशेष आयोग का गठन किया था, जिसे यह पता लगाना था कि चैलेंजर के साथ ऐसा हादसा क्यों हुआ और भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं से बचने के लिए क्या सुधार किए जाने चाहिए।
राष्ट्रपति द्वारा गठित आयोग ने जब चैलेंजर हादसे की जांच की तो जांच में पता चला कि यान में लगे सॉलिड ईंधन रॉकेट की "ओ रिंग" सील के काम नहीं कर पाने के कारण विस्फोट हुआ। इस हादसे के बाद नासा की साख पर सवाल उठने लगे थे। जिसकी भरपाई के लिए बाद में एंडेवर नाम के अंतरिक्ष शटल को प्रक्षेपित किया गया।
अंतरिक्ष में नासा की असफलता एक बार फ़िर देखने मिली जब 17 साल बाद 1 फरवरी 2003 को नासा की स्पेस शटल एक बार फ़िर हादसे का शिकार हो गई। 1 फरवरी 2003 को कोलम्बिया अंतरिक्ष शटल पृथ्वी पर आने से पहले ही ध्वस्त हो गई। इस हादसे से भारत में भी शोक की लहर फैल गई थी, क्योंकि इस दुर्घटना में भारतीय मूल की प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला का भी निधन हो गया था।
अंतरिक्ष में जाना कभी भी इंसान के लिए आसान नहीं रहा है और ना ही होगा। नासा जैसे संस्थान को भी कई बार अंतरिक्ष मिशनों में असफ़लता का सामना करना पड़ा है। इसरो के वैज्ञानिकों की प्रशंसा की जाना चाहिए कि उन्होंने चन्द्रयान-2 मिशन में चांद के उस हिस्से पर पहुंचने का प्रयास किया, जहां दुनिया के किसी भी देश की पहुंच नहीं है।
अमेरिका के अपोलो मिशन सहित ज़्यादातर मिशन्स में लैण्डिंग चांद के मध्य में की गई और चीन का मिशन चांद के उत्तरी ध्रुव की तरफ था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इसरो के सामने चांद की पथरीली ज़मीन भी सॉफ्ट लैण्डिंग के लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि लैण्डर विक्रम को दो क्रेटरों के बीच सॉफ्ट लैण्डिंग की जगह तलाशनी थी।
इसरो के वैज्ञानिकों को हताश या निराश होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने का उनका यह पहला प्रयास ही था। जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका जैसे विकसित देश को भी चांद पर अपने कई मिशनों में असफ़लता हासिल हुई है। आज के रूस और तब के सोवियत संघ ने 1958 से 1976 के बीच क़रीब 33 मिशन चांद की तरफ रवाना किए, लेकिन इनमें से 26 अपनी मन्जिल पर नहीं पहुंच सके।
चांद मिशन की असफ़लताओं में अमेरिका भी पीछे नहीं है। साल 1958 से 1972 तक अमेरिका के 31 चांद मिशनों में से 17 नाकाम रहे। इतना ही नहीं, अमेरिका ने 1969 से 1972 के बीच 6 मानव मिशन भी चांद पर भेजे। इन चांद मिशनों में 24 अंतरिक्ष यात्री चांद के क़रीब पहुंच गए, लेकिन सिर्फ़ 12 ही चांद की ज़मीन पर उतर सके।
इसी साल अप्रैल में इज़रायल का भी मिशन चांद अधूरा रह गया था। इज़रायल की एक प्राइवेट कम्पनी का ये मिशन 4 अप्रैल को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश तो कर गया था, लेकिन 10 किलोमीटर दूर रहते ही पृथ्वी से इसका सम्पर्क टूट गया।
असफ़लताएं अंत नहीं होती हैं, असफ़लताओं से सीखा जाता है कि ग़लती कहां पर हो गई जिसके काऱण असफ़लता हासिल हुई। इसरो के वैज्ञानिकों को निराश होने की कतई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर पहुंचने का उनका यह पहला प्रयास था, जो कि तकनीकी कमियों के कारण पूरा ना हो सका। चांद की सतह के इतने पास पहुंचना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है। आशा है एक बार फ़िर से अगले चन्द्रयान मिशन के लिए इसरो के वैज्ञानिक जुट जाएंगे और सफ़लता हासिल करेंगे।