ओला-उबर के कारण क्या सच में संकट में है ऑटो सेक्टर?
Saturday - September 14, 2019 11:40 am ,
Category : WTN HINDI
ऑटो सेक्टर में मंदी के लिए ओला-उबर को ठहराया जा रहा ज़िम्मेदार!
वित्तमंत्री की ओला-उबर थ्योरी का ‘तुलनात्मक’ विश्लेषण
SEP 14 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी का भारत में सबसे पहला और सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ा है। पिछले एक साल से इस सेक्टर में मंदी का दौर जारी है। गाड़ियों की कम बिक्री के कारण ऑटोमोबाइल कम्पनियों को अपना उत्पादन कम करने से लेकर बंद तक करना पड़ा है। ऑटो सेक्टर में मंदी का असर उससे जुड़े अन्य उद्योगों और सेवाओं पर भी पड़ा है, जिसके कारण हज़ारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
मंदी के कारण लगातार बिगड़ती ऑटो सेक्टर की हालत पर विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है। वहीं ऑटो सेक्टर की कम्पनियां इस भयानक मंदी के लिए सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार बता रही हैं। ऑटो सेक्टर में जारी मंदी पर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप के बीच, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक बयान ने बहस को एक नई दिशा दे दी है। कारों की लगातार कम होती बिक्री पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि ऑटो क्षेत्र में नरमी के पीछे ओला और उबर जैसे टैक्सी एग्रीगेटर्स ज़िम्मेदार हैं।
अपनी बात के समर्थन में वित्त मंत्री ने कहा है कि धीरे-धीरे युवाओं की सोच बदल रही है। अब युवा ख़ुद का वाहन ख़रीदने और उसकी ईएमआई भरने के बजाए ओला और उबर टैक्सियों की बुकिंग को ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं। वित्त मंत्री के इस बयान के बाद विपक्ष ने सरकार पर जमकर निशाना साधा और कहा है कि सरकार मंदी से निपटने में नाकाम रही है। वहीं वित्त मंत्री के बयान पर ऑटो सेक्टर का कहना है कि वित्त मंत्री का दावा हक़ीकत से दूर है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर की मंदी के पीछे जो बयान दिया है, उस पर चर्चाएं जारी हैं। क्या सही में नई कार ख़रीदने की तुलना में ओला और उबर हायर करने में कम ख़र्च होता है? क्या युवा ऐसा करके अपनी बचत को बढ़ा रहे हैं? इसी ज्वलंत मुद्दे पर फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने नई कार ख़रीदने और उसके मेंटनेंस में ख़र्च और ओला-उबर को हायर करने पर आने वाले ख़र्च का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की केस स्टडी के मुताबिक़, यदि कोई व्यक्ति एक सामान्य कार ख़रीदता है तो उसकी क़ीमत क़रीब 6 लाख रुपये की होगी। 6 साल बाद कार की स्क्रैप वैल्यू क़रीब 1 लाख रुपये होगी, यानि कि 6 साल में कार ख़रीदने पर नेट खर्च 5 लाख रुपये होगा। यानि की 6 साल के 2200 दिनों के हिसाब से कार ख़रीदने का ख़र्च 230 रुपये प्रति दिन है।
कार पर बीमा की सालाना रक़म 15,000 रुपये होती है, यानी कि हर दिन बीमा पर 41 रुपये ख़र्च होते हैं। यदि कार सामान्य चलाई जाती है तो कार पर हर दिन क़रीब 150 रुपये का ईंधन ख़र्च होगा। वहीं तीन साल के बाद टायर और बैटरी बदलने पर इसका ख़र्च क़रीब 25,000 रुपये होगा यानी एक दिन का ख़र्च क़रीब 23 रुपये।
यदि कार ली है तो उसका मेंटेनेंस भी ज़रूरी है। ऐसे में कार का सालाना मेंटनेंस क़रीब 9000 रुपये होता है यानी कि हर दिन का मेटनेंस ख़र्च 25 रुपये। वहीं इंटरेस्ट लॉस की गणना की जाए तो यह हर दिन 131 रुपये के क़रीब होता है। यदि इन सभी ख़र्चों को जोड़ लिया जाए, तो एक नई कार ख़रीदने पर रोज़ का ख़र्च क़रीब 850 रुपये होता है। जो कि थोड़ा कम या बहुत ज़्यादा भी हो सकता है।
स्टडी के मुताबिक़, कार के केस में हर रोज़ पेट्रोल या डीज़ल का ख़र्च 150 रुपये प्रति दिन दिखाया गया है। यानी कि इस हिसाब से कार रोज़ना 25 से 30 किलोमीटर चल रही है। अब बात करते हैं ओला और उबर को हायर करने पर आने वाले ख़र्च की। ओला और उबर को हायर करने पर 15 किलोमीटर तक की यात्रा का फ्लेक्सी फेयर किराया 170 से 215 रुपये होता है। वहीं 30 किलोमीटर यात्रा का किराया क़रीब 340 से 430 रुपये के बीच होगा। एवरेज में इसे 450 रुपये रोज़ का ख़र्च माना जा सकता है।
यानी कि कार की ख़रीदी और उसका उपयोग करने जहां हर रोज़ 850 रुपये ख़र्च हो रहे हैं, वहीं ओला और उबर का उपयोग करने पर यही ख़र्च 450 रुपये प्रति दिन हो रहा है। यानी कि साफ़ है कि इस गणना के हिसाब से कार लेने की तुलना में किराये की टैक्सी लेने पर हर रोज़ कम से कम 400 रुपयों की बचत हो रही है।
आइये अब इस केस स्टडी का विश्लेषण किया जाए। दरअसल, देखा गया है कि महंगाई के इस दौर में ख़र्चे काफ़ी बढ़ गये हैं। ऐसे में समझदार मध्यम वर्ग और यूथ जनरेशन ख़र्चों को और ज़्यादा नहीं बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में नई कार ख़रीदने के बजाय टैक्सी से सवारी करना इन दिनों ज़्यादा फ़ायदे का सौदा लोगों को लग रहा है। साथ ही टैक्सी में सफ़र करने से एक तो सुरक्षा का अहसास होता है, वहीं ट्रैफिक के नियमों और पार्किंग जैसी समस्याओं से भी लोगों को निजात मिलती है। इस तरह से जो बचत हो रही है, उसका इस्तेमाल लोग भविष्य की प्लानिंग के लिए कर रहे हैं।
वहीं चलिए माना कि युवा और मध्यम वर्ग बचत के चलते कार की बजाए टैक्सी को ज़्यादा तरजीह दे रहा है। लेकिन ऐसा कल्चर अभी सिर्फ़ मेट्रो शहरों में ही है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में आज भी कार का क्रेज कम नहीं हुआ है। इन इलाकों में आज भी कार एक स्टेटस सिम्बल माना जाता है। पिछले कुछ सालों का अध्ययन किया जाए, तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि कारों की बिक्री मेट्रो शहरों की तुलना में छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा हुई है।
वहीं अब कार लैक्ज़री कम और ज़रूरत ज़्यादा बन गई है। ऐसे में ओला-उबर वाली थ्योरी सिर्फ़ मेट्रो शहरों तक ही सीमित कही जा सकती है। वहीं मंदी के कारण दो पहिया वाहनों की बिक्री पर भी असर पड़ा है, ऐसे में यहां पर तो ओला-उबर थ्योरी काम नहीं करती है।
वित्तमंत्री के बयान के बाद ऑटो सेक्टर से जुड़े लोगों ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि ओला-उबर थ्योरी का ऑटो सेक्टर में मंदी से कोई लेना-देना नहीं है। माना कि युवा आबादी में ओला-उबर सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन इसे ही मंदी के लिए ठोस कारण मान लेना कही से भी सही नहीं है बल्कि इससे हटकर मंदी के सही कारणों की खोज की जानी चाहिए। ऑटो सेक्टर से जुड़े लोगों के मुताबिक़, भारत में कार ख़रीदने को लेकर जो धारणा पहले थी वो ही अभी भी है और इसमें अभी भी कोई बदलाव नहीं आया है। भारत में लोग अपनी ज़रूरत और शौक पूरा करने के लिए कार खरीदते हैं।
देश में पिछले एक साल से जारी ऑटो सेक्टर की मंदी के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओला-उबर थ्योरी को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है, वहीं मंदी के लिए सिर्फ़ इसी थ्योरी को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। कई कारण हैं जो ऑटो सेक्टर में मंदी के लिए ज़िम्मेदार हैं वैसे जानकारों का कहना है कि ऑटो सेक्टर में समय-समय पर मंदी आती रहती है, लेकिन यह कभी भी स्थायी नहीं होती है। ऑटो सेक्टर में जारी मंदी को दूर करने के लिए जहां सरकार को काफ़ी कुछ उपाय करने होंगे, वहीं ऑटो सेक्टर को भी चिंता छोड़कर बिक्री बढ़ाने की तरफ़ ज़्यादा ध्यान देना चाहिए।
SEP 14 (WTN) – वैश्विक आर्थिक मंदी का भारत में सबसे पहला और सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल सेक्टर पर पड़ा है। पिछले एक साल से इस सेक्टर में मंदी का दौर जारी है। गाड़ियों की कम बिक्री के कारण ऑटोमोबाइल कम्पनियों को अपना उत्पादन कम करने से लेकर बंद तक करना पड़ा है। ऑटो सेक्टर में मंदी का असर उससे जुड़े अन्य उद्योगों और सेवाओं पर भी पड़ा है, जिसके कारण हज़ारों लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
मंदी के कारण लगातार बिगड़ती ऑटो सेक्टर की हालत पर विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है। वहीं ऑटो सेक्टर की कम्पनियां इस भयानक मंदी के लिए सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार बता रही हैं। ऑटो सेक्टर में जारी मंदी पर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप के बीच, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक बयान ने बहस को एक नई दिशा दे दी है। कारों की लगातार कम होती बिक्री पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि ऑटो क्षेत्र में नरमी के पीछे ओला और उबर जैसे टैक्सी एग्रीगेटर्स ज़िम्मेदार हैं।
अपनी बात के समर्थन में वित्त मंत्री ने कहा है कि धीरे-धीरे युवाओं की सोच बदल रही है। अब युवा ख़ुद का वाहन ख़रीदने और उसकी ईएमआई भरने के बजाए ओला और उबर टैक्सियों की बुकिंग को ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं। वित्त मंत्री के इस बयान के बाद विपक्ष ने सरकार पर जमकर निशाना साधा और कहा है कि सरकार मंदी से निपटने में नाकाम रही है। वहीं वित्त मंत्री के बयान पर ऑटो सेक्टर का कहना है कि वित्त मंत्री का दावा हक़ीकत से दूर है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर की मंदी के पीछे जो बयान दिया है, उस पर चर्चाएं जारी हैं। क्या सही में नई कार ख़रीदने की तुलना में ओला और उबर हायर करने में कम ख़र्च होता है? क्या युवा ऐसा करके अपनी बचत को बढ़ा रहे हैं? इसी ज्वलंत मुद्दे पर फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने नई कार ख़रीदने और उसके मेंटनेंस में ख़र्च और ओला-उबर को हायर करने पर आने वाले ख़र्च का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की केस स्टडी के मुताबिक़, यदि कोई व्यक्ति एक सामान्य कार ख़रीदता है तो उसकी क़ीमत क़रीब 6 लाख रुपये की होगी। 6 साल बाद कार की स्क्रैप वैल्यू क़रीब 1 लाख रुपये होगी, यानि कि 6 साल में कार ख़रीदने पर नेट खर्च 5 लाख रुपये होगा। यानि की 6 साल के 2200 दिनों के हिसाब से कार ख़रीदने का ख़र्च 230 रुपये प्रति दिन है।
कार पर बीमा की सालाना रक़म 15,000 रुपये होती है, यानी कि हर दिन बीमा पर 41 रुपये ख़र्च होते हैं। यदि कार सामान्य चलाई जाती है तो कार पर हर दिन क़रीब 150 रुपये का ईंधन ख़र्च होगा। वहीं तीन साल के बाद टायर और बैटरी बदलने पर इसका ख़र्च क़रीब 25,000 रुपये होगा यानी एक दिन का ख़र्च क़रीब 23 रुपये।
यदि कार ली है तो उसका मेंटेनेंस भी ज़रूरी है। ऐसे में कार का सालाना मेंटनेंस क़रीब 9000 रुपये होता है यानी कि हर दिन का मेटनेंस ख़र्च 25 रुपये। वहीं इंटरेस्ट लॉस की गणना की जाए तो यह हर दिन 131 रुपये के क़रीब होता है। यदि इन सभी ख़र्चों को जोड़ लिया जाए, तो एक नई कार ख़रीदने पर रोज़ का ख़र्च क़रीब 850 रुपये होता है। जो कि थोड़ा कम या बहुत ज़्यादा भी हो सकता है।
स्टडी के मुताबिक़, कार के केस में हर रोज़ पेट्रोल या डीज़ल का ख़र्च 150 रुपये प्रति दिन दिखाया गया है। यानी कि इस हिसाब से कार रोज़ना 25 से 30 किलोमीटर चल रही है। अब बात करते हैं ओला और उबर को हायर करने पर आने वाले ख़र्च की। ओला और उबर को हायर करने पर 15 किलोमीटर तक की यात्रा का फ्लेक्सी फेयर किराया 170 से 215 रुपये होता है। वहीं 30 किलोमीटर यात्रा का किराया क़रीब 340 से 430 रुपये के बीच होगा। एवरेज में इसे 450 रुपये रोज़ का ख़र्च माना जा सकता है।
यानी कि कार की ख़रीदी और उसका उपयोग करने जहां हर रोज़ 850 रुपये ख़र्च हो रहे हैं, वहीं ओला और उबर का उपयोग करने पर यही ख़र्च 450 रुपये प्रति दिन हो रहा है। यानी कि साफ़ है कि इस गणना के हिसाब से कार लेने की तुलना में किराये की टैक्सी लेने पर हर रोज़ कम से कम 400 रुपयों की बचत हो रही है।
आइये अब इस केस स्टडी का विश्लेषण किया जाए। दरअसल, देखा गया है कि महंगाई के इस दौर में ख़र्चे काफ़ी बढ़ गये हैं। ऐसे में समझदार मध्यम वर्ग और यूथ जनरेशन ख़र्चों को और ज़्यादा नहीं बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में नई कार ख़रीदने के बजाय टैक्सी से सवारी करना इन दिनों ज़्यादा फ़ायदे का सौदा लोगों को लग रहा है। साथ ही टैक्सी में सफ़र करने से एक तो सुरक्षा का अहसास होता है, वहीं ट्रैफिक के नियमों और पार्किंग जैसी समस्याओं से भी लोगों को निजात मिलती है। इस तरह से जो बचत हो रही है, उसका इस्तेमाल लोग भविष्य की प्लानिंग के लिए कर रहे हैं।
वहीं चलिए माना कि युवा और मध्यम वर्ग बचत के चलते कार की बजाए टैक्सी को ज़्यादा तरजीह दे रहा है। लेकिन ऐसा कल्चर अभी सिर्फ़ मेट्रो शहरों में ही है। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में आज भी कार का क्रेज कम नहीं हुआ है। इन इलाकों में आज भी कार एक स्टेटस सिम्बल माना जाता है। पिछले कुछ सालों का अध्ययन किया जाए, तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि कारों की बिक्री मेट्रो शहरों की तुलना में छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में ज़्यादा हुई है।
वहीं अब कार लैक्ज़री कम और ज़रूरत ज़्यादा बन गई है। ऐसे में ओला-उबर वाली थ्योरी सिर्फ़ मेट्रो शहरों तक ही सीमित कही जा सकती है। वहीं मंदी के कारण दो पहिया वाहनों की बिक्री पर भी असर पड़ा है, ऐसे में यहां पर तो ओला-उबर थ्योरी काम नहीं करती है।
वित्तमंत्री के बयान के बाद ऑटो सेक्टर से जुड़े लोगों ने भी अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि ओला-उबर थ्योरी का ऑटो सेक्टर में मंदी से कोई लेना-देना नहीं है। माना कि युवा आबादी में ओला-उबर सेवाओं का इस्तेमाल बढ़ा है, लेकिन इसे ही मंदी के लिए ठोस कारण मान लेना कही से भी सही नहीं है बल्कि इससे हटकर मंदी के सही कारणों की खोज की जानी चाहिए। ऑटो सेक्टर से जुड़े लोगों के मुताबिक़, भारत में कार ख़रीदने को लेकर जो धारणा पहले थी वो ही अभी भी है और इसमें अभी भी कोई बदलाव नहीं आया है। भारत में लोग अपनी ज़रूरत और शौक पूरा करने के लिए कार खरीदते हैं।
देश में पिछले एक साल से जारी ऑटो सेक्टर की मंदी के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओला-उबर थ्योरी को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है, वहीं मंदी के लिए सिर्फ़ इसी थ्योरी को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। कई कारण हैं जो ऑटो सेक्टर में मंदी के लिए ज़िम्मेदार हैं वैसे जानकारों का कहना है कि ऑटो सेक्टर में समय-समय पर मंदी आती रहती है, लेकिन यह कभी भी स्थायी नहीं होती है। ऑटो सेक्टर में जारी मंदी को दूर करने के लिए जहां सरकार को काफ़ी कुछ उपाय करने होंगे, वहीं ऑटो सेक्टर को भी चिंता छोड़कर बिक्री बढ़ाने की तरफ़ ज़्यादा ध्यान देना चाहिए।