आख़िर क्यों अमेरिका नहीं कर रहा है ईरान पर आक्रमण?
Saturday - September 21, 2019 4:09 pm ,
Category : WTN HINDI
अमेरिका और ईरान के बीच चरम पर पहुंचा तनाव
जानिए आख़िर क्यों ईरान पर हमला ना करने के लिए संयम बरत रहा है अमेरिका?
SEP 21 (WTN) – अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सालों पुरानी दुश्मनी कोई नयी बात नहीं है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच विवाद इतना बढ़ जाता कि पूरी दुनिया को इन दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका होने लगती है। लेकिन क्या कारण है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश, ईरान से जारी सालों पुरानी दुश्मनी और लगातार बढ़ रहे तनाव के बाद भी युद्ध नहीं कर रहा है?
अभी हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी अरामको के दो संयंत्रों पर सऊदी अरब में ड्रोन हमला होने और उसमें ईरान की साजिश होने के आरोपों के बाद आशंका ज़ाहिर की जा रही थी कि अमेरिका अब ईरान को नहीं बख्शेगा और उस पर हमला कर देगा, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। हालांकि, सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर ड्रोन हमले के बाद से अमेरिका एक्शन में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प साफ़तौर पर इस हमले के लिए ईरान को कसूरवार ठहरा चुके हैं।
तेल संयंत्रों पर हमले के लिए ईरान को कसूरवार ठहराते हुए अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा भी कर दी है, लेकिन उसी के साथ अमेरिका ने उस इलाके में सेना की तैनाती को भी मन्ज़ूरी दे दी है। हालांकि, पेन्टागन ने स्पष्ट किया है कि सेना की तैनाती हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षात्मक रूप के लिए की जा रही है, और यह मुख्य रूप से वायु और मिसाइल रक्षा पर केन्द्रित है।
ईरान पर दबाव की कूटनीति के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के राष्ट्रीय बैंक, ईरान सेन्ट्रल बैंक को प्रतिबंधित करने की घोषणा की है। कहा जा रहा है कि अमेरिकी द्वारा यह किसी भी देश पर लगाया गया अभी तक का सबसे बड़ा प्रतिबन्ध है।
जहां तक प्रतिबन्धों की बात है तो अमेरिका काफ़ी समय से ईरान पर आर्थिक और अन्य तरह के प्रतिबन्ध लगाता आ रहा है। लेकिन ईरान पर खाड़ी क्षेत्र में आशंति फैलाने के कई तरह के गम्भीर आरोप लगाने के बाद भी अमेरिका चाहकर भी उस पर हमला नहीं कर पा रहा है। दरअसल, अमेरिका जानता है कि यदि खाड़ी में एक बार फ़िर से युद्ध शुरू हुआ तो यह युद्ध इस बार काफ़ी भयावह होने वाला है।
इस समय मिडिल ईस्ट की स्थिति काफ़ी विस्फोटक है। दरअसल, यह पूरा इलाका शिया और सुन्नी वर्चस्व की लड़ाई का एक अखाड़ा बन गया है। ईरान शिया बहुल देश है, जबकि अमेरिका का खाड़ी में सबसे ख़ास मित्र सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है। यदि अमेरिका किसी भी कारण से ईरान पर हमला करता है, तो इस युद्ध में सिर्फ़ दो देश अमेरिका और ईरान ही शामिल नहीं रहेंगे। युद्ध होने की स्थिति में सऊदी अरब, इराक, सीरिया, यमन, बहरीन, लेबनान, जॉर्डन, यूएई, मिस्र और इज़रायल जैसे देश भी किसी ना किसी पक्ष में होंगे।
ईरान पर हमले की स्थिति में ईरान के समर्थन में यमन के हूती विद्रोही, ईरान समर्थित देश लेबनान के शिया मिलिशिया समूह हिजबुल्लाह और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद खड़े हो सकते हैं। युद्ध की स्थिति होने पर अमेरिका के विरोध में रूस, ईरान का साथ दे सकता है। जाहिर है कि अमेरिका-ईरान युद्ध अमेरिकी की ज़मीन से काफ़ी दूर खाड़ी में होगा। ऐसे में ईरान, अमेरिका के सहयोगी सऊदी अरब पर हमला करेगा। ऐसे में सऊदी अरब भी अकेला नहीं रहेगा और उसकी सहायता के लिए यूएई, बहरीन, मिस्र और जॉर्डन जैसे देश खड़े हो सकते हैं।
जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका शुरू से ही ईरान का विरोध इसलिए करता आया है, क्योंकि उसे शक है कि ईरान परमाणु बम बना चुका है। ऐसे में अमेरिका जानता है कि युद्ध की स्थिति में यदि ईरान ने सऊदी अरब पर परमाणु बम का इस्तेमाल कर दिया, तो कई देशों को होने वाली तेल आपूर्ति ठप पड़ जाएगी। वहीं अमेरिका यह भी जानता है कि खाड़ी युद्ध होने की स्थिति में पूरी दुनिया को तेल की आपूर्ति बाधित होगी। 1991 के खाड़ी युद्ध के समय जिस तरह तेल के कुंओं में आग लगा दी गई थी, उसी से सबक लेते हुए अमेरिका, ईरान पर हमला ना करने के लिए संयम बरत रहा है।
इसलिये ही दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त होने के बाद भी अमेरिका, ईरान पर सैन्य कार्रवाई को टाल रहा है। ऐसा इसलिये, क्योंकि अमेरिका जानता है कि ईरान के साथ उसका युद्ध सिर्फ़ दो देशों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। युद्ध होने, उसके बढ़ने और उसके भयावह होने पर ईरान से ज़्यादा नुकसान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को होगा। ऐसे में ईरान की अभी तक की सभी ग़लतियों को अमेरिका नज़र अन्दाज़ और माफ़ करता जा रहा है और उसके ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई नहीं कर रहा है। लेकिन देखना होगा कि खाड़ी के तनाव भरे माहौल के बीच आख़िर कब तक अमेरिका संयम रखता है?
SEP 21 (WTN) – अमेरिका और ईरान के बीच चल रही सालों पुरानी दुश्मनी कोई नयी बात नहीं है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच विवाद इतना बढ़ जाता कि पूरी दुनिया को इन दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका होने लगती है। लेकिन क्या कारण है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश, ईरान से जारी सालों पुरानी दुश्मनी और लगातार बढ़ रहे तनाव के बाद भी युद्ध नहीं कर रहा है?
अभी हाल ही में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी अरामको के दो संयंत्रों पर सऊदी अरब में ड्रोन हमला होने और उसमें ईरान की साजिश होने के आरोपों के बाद आशंका ज़ाहिर की जा रही थी कि अमेरिका अब ईरान को नहीं बख्शेगा और उस पर हमला कर देगा, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। हालांकि, सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर ड्रोन हमले के बाद से अमेरिका एक्शन में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प साफ़तौर पर इस हमले के लिए ईरान को कसूरवार ठहरा चुके हैं।
तेल संयंत्रों पर हमले के लिए ईरान को कसूरवार ठहराते हुए अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा भी कर दी है, लेकिन उसी के साथ अमेरिका ने उस इलाके में सेना की तैनाती को भी मन्ज़ूरी दे दी है। हालांकि, पेन्टागन ने स्पष्ट किया है कि सेना की तैनाती हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षात्मक रूप के लिए की जा रही है, और यह मुख्य रूप से वायु और मिसाइल रक्षा पर केन्द्रित है।
ईरान पर दबाव की कूटनीति के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के राष्ट्रीय बैंक, ईरान सेन्ट्रल बैंक को प्रतिबंधित करने की घोषणा की है। कहा जा रहा है कि अमेरिकी द्वारा यह किसी भी देश पर लगाया गया अभी तक का सबसे बड़ा प्रतिबन्ध है।
जहां तक प्रतिबन्धों की बात है तो अमेरिका काफ़ी समय से ईरान पर आर्थिक और अन्य तरह के प्रतिबन्ध लगाता आ रहा है। लेकिन ईरान पर खाड़ी क्षेत्र में आशंति फैलाने के कई तरह के गम्भीर आरोप लगाने के बाद भी अमेरिका चाहकर भी उस पर हमला नहीं कर पा रहा है। दरअसल, अमेरिका जानता है कि यदि खाड़ी में एक बार फ़िर से युद्ध शुरू हुआ तो यह युद्ध इस बार काफ़ी भयावह होने वाला है।
इस समय मिडिल ईस्ट की स्थिति काफ़ी विस्फोटक है। दरअसल, यह पूरा इलाका शिया और सुन्नी वर्चस्व की लड़ाई का एक अखाड़ा बन गया है। ईरान शिया बहुल देश है, जबकि अमेरिका का खाड़ी में सबसे ख़ास मित्र सऊदी अरब सुन्नी बहुल देश है। यदि अमेरिका किसी भी कारण से ईरान पर हमला करता है, तो इस युद्ध में सिर्फ़ दो देश अमेरिका और ईरान ही शामिल नहीं रहेंगे। युद्ध होने की स्थिति में सऊदी अरब, इराक, सीरिया, यमन, बहरीन, लेबनान, जॉर्डन, यूएई, मिस्र और इज़रायल जैसे देश भी किसी ना किसी पक्ष में होंगे।
ईरान पर हमले की स्थिति में ईरान के समर्थन में यमन के हूती विद्रोही, ईरान समर्थित देश लेबनान के शिया मिलिशिया समूह हिजबुल्लाह और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद खड़े हो सकते हैं। युद्ध की स्थिति होने पर अमेरिका के विरोध में रूस, ईरान का साथ दे सकता है। जाहिर है कि अमेरिका-ईरान युद्ध अमेरिकी की ज़मीन से काफ़ी दूर खाड़ी में होगा। ऐसे में ईरान, अमेरिका के सहयोगी सऊदी अरब पर हमला करेगा। ऐसे में सऊदी अरब भी अकेला नहीं रहेगा और उसकी सहायता के लिए यूएई, बहरीन, मिस्र और जॉर्डन जैसे देश खड़े हो सकते हैं।
जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका शुरू से ही ईरान का विरोध इसलिए करता आया है, क्योंकि उसे शक है कि ईरान परमाणु बम बना चुका है। ऐसे में अमेरिका जानता है कि युद्ध की स्थिति में यदि ईरान ने सऊदी अरब पर परमाणु बम का इस्तेमाल कर दिया, तो कई देशों को होने वाली तेल आपूर्ति ठप पड़ जाएगी। वहीं अमेरिका यह भी जानता है कि खाड़ी युद्ध होने की स्थिति में पूरी दुनिया को तेल की आपूर्ति बाधित होगी। 1991 के खाड़ी युद्ध के समय जिस तरह तेल के कुंओं में आग लगा दी गई थी, उसी से सबक लेते हुए अमेरिका, ईरान पर हमला ना करने के लिए संयम बरत रहा है।
इसलिये ही दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त होने के बाद भी अमेरिका, ईरान पर सैन्य कार्रवाई को टाल रहा है। ऐसा इसलिये, क्योंकि अमेरिका जानता है कि ईरान के साथ उसका युद्ध सिर्फ़ दो देशों तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। युद्ध होने, उसके बढ़ने और उसके भयावह होने पर ईरान से ज़्यादा नुकसान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को होगा। ऐसे में ईरान की अभी तक की सभी ग़लतियों को अमेरिका नज़र अन्दाज़ और माफ़ करता जा रहा है और उसके ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई नहीं कर रहा है। लेकिन देखना होगा कि खाड़ी के तनाव भरे माहौल के बीच आख़िर कब तक अमेरिका संयम रखता है?