वैश्विक राजनीति में बदलाव के बाद सुरक्षा परिषद में भी बदलाव की ज़रूरत
Saturday - September 28, 2019 11:17 am ,
Category : WTN HINDI
एक बार फ़िर उठी सुरक्षा परिषद में बदलाव की मांग
भारत, जापान और जर्मनी जैसे देशों को कब मिलेगी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता?
SEP 28 (WTN) – संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि दुनिया भर के देशों की महापंचायत, जिसके न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में पिछले 74 सालों से संयुक्त राष्ट्र की सालाना बैठक में सदस्य देशों के प्रतिनिधि शिकरत करते हैं। हर साल आयोजित होने वाली बैठक में सदस्य देशों के प्रतिनिधि आपस में मिलते हैं और अपने विचार व्यक्त करते हैं। पिछले 74 सालों से यह परम्परा चली आ रही है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन बड़ा सवाल है कि आज से 74 साल पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय विश्व की जो राजनीतिक स्थिति थी, क्या वो राजनीति वर्तमान समय में भी है?
इस सवाल के जवाब में आप कहेंगे कि बेशक संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से लेकर आज तक, विश्व की राजनीति में काफ़ी परिवर्तन आ गया है। जब विश्व की राजनीति में परिवर्तन आ सकता है, तो क्या संयुक्त राष्ट्र संघ के ढाचे में भी परिवर्तन नहीं आना चाहिए? आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसा क्यों कह रहे हैं? दरअसल, संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय में और आज के समय में काफ़ी बदलाव हो चुका है, और परिस्थिति की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र में भी बदलाव ज़रूरी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध की पृष्टभूमि में हुई थी। जैसा कि आप जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध में कई देशों को जन-धन का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। दूसरे विश्व युद्ध के कारण पूरी दुनिया के अधिकांश देश प्रभावित हुए थे, और कई देशों के बीच दुश्मनी के कारण तत्कालीन वैश्विक राजनीति में तनाव चरम पर था। ऐसे में इस दुश्मनी को ख़त्म करने, दुनिया भर के देशों के बीच मित्रता बढ़ाने और विश्व में शान्ति की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ रूपी एक मंच की स्थापना की गई थी।
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था दुनिया भर के देशों के बीच समन्वय और शान्ति की स्थापना करना। संयुक्त राष्ट्र के वैसे तो कई अंग हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पूरी दुनिया की सबसे ताक़तवर परिषद मानी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन में अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन जैसे देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, और जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन हुआ तो यही पांच देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बन गये।
जैसा कि हमने आपको बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से लेकर आज तक विश्व की राजनीति में काफ़ी परिवर्तन हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके सदस्य देशों की संख्या 50 थी, जबकि आज संयुक्त राष्ट्र में सदस्य देशों की संख्या 193 हो चुकी है। लेकिन तब से लेकर आज तक, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है। सुरक्षा परिषद की स्थापना के समय भी इसके 5 स्थायी सदस्य थे, और सालों बाद भी इसके स्थायी सदस्यों की संख्या 5 ही है।
यानी कि साफ़ जाहिर है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य ही पूरी दुनिया के पावर सेन्टर बने हुए हैं। अब जबकि दुनिया में भारत समेत अन्य देश आर्थिक और सामरिक रूप से काफ़ी सशक्त और ज़िम्मेदार हो चुके हैं, तो ऐसे में क्या सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार नहीं किया जाना चाहिए, और भारत समेत कुछ अन्य देशों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन ने हमेशा से ही अपने हितों के अनुसार ही सुरक्षा परिषद में फ़ैसले लिये हैं और वीटो पावर का इस्तेमाल किया है। सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के कारण इन्हीं पांचों देशों को साल भर अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है, जबकि बाक़ी सदस्य देशों को जब संयुक्त राष्ट्र की सालाना बैठक होती है तभी बोलने का मौक़ा मिलता है।
एक समय था जब शीत युद्ध के समय दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी। समय के साथ दुनिया की राजनीति में काफ़ी बदलाव आए हैं। USSR के विघटन से लेकर यूगोस्लाविया के विघटन तक पूरी दुनिया की भौगोलिक स्थिति भी बदल गई है। लेकिन इतना होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में उसकी स्थापना से लेकर अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है।
सुरक्षा परिषद के स्थापना के समय अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन जैसे देश शक्तिशाली थे, लेकिन अब भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश समय के साथ काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं। ऐसे में वैश्विक राजनीति में परिवर्तन को देखते हुए, परिस्थितियों की मांग है कि सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव होना चाहिए और भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलना चाहिए, जिससे सुरक्षा परिषद में अन्य शक्तिशाली देशों को भी अपनी बात कहने का मौक़ा मिला और पूरी दुनिया में शक्ति सन्तुलन बना रहे।
यदि तटस्थ रहकर सुरक्षा परिषद के कामों की विवेचना की जाए, तो साफ़ दिखता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों ने कई बार अपने हितों की परवाह ज़्यादा की है, जिसके कारण दुनिया को कई तरह के युद्ध और संघर्ष देखने पड़े हैं। वहीं आतंकवाद और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर भी सुरक्षा परिषद की भूमिका ज़्यादा प्रभावी नहीं रही है। एक आंकड़े के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से अब तक लगभग 50 युद्ध हो चुके हैं, और ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद के गठन के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाते हैं।
समय-समय पर भारत, जर्मनी, जापान, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देश मांग करते रहे हैं कि मौजूदा वैश्विक राजनीति को देखते हुए अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को और ज़्यादा प्रवाभी बनाने के लिए सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना अब ज़रूरी हो गया है। भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश जब सुरक्षा परिषद के स्थायी बनेंगे तो सालों से पावर सेन्टर बने पांच बड़े देशों का वर्चस्व कम होगा, और सुरक्षा परिषद में नए स्थायी देश बनने से संयुक्त राष्ट्र पहले से और भी ज़्यादा प्रभावी हो सकेगा।
SEP 28 (WTN) – संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि दुनिया भर के देशों की महापंचायत, जिसके न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में पिछले 74 सालों से संयुक्त राष्ट्र की सालाना बैठक में सदस्य देशों के प्रतिनिधि शिकरत करते हैं। हर साल आयोजित होने वाली बैठक में सदस्य देशों के प्रतिनिधि आपस में मिलते हैं और अपने विचार व्यक्त करते हैं। पिछले 74 सालों से यह परम्परा चली आ रही है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन बड़ा सवाल है कि आज से 74 साल पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय विश्व की जो राजनीतिक स्थिति थी, क्या वो राजनीति वर्तमान समय में भी है?
इस सवाल के जवाब में आप कहेंगे कि बेशक संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से लेकर आज तक, विश्व की राजनीति में काफ़ी परिवर्तन आ गया है। जब विश्व की राजनीति में परिवर्तन आ सकता है, तो क्या संयुक्त राष्ट्र संघ के ढाचे में भी परिवर्तन नहीं आना चाहिए? आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसा क्यों कह रहे हैं? दरअसल, संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय में और आज के समय में काफ़ी बदलाव हो चुका है, और परिस्थिति की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र में भी बदलाव ज़रूरी है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध की पृष्टभूमि में हुई थी। जैसा कि आप जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध में कई देशों को जन-धन का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। दूसरे विश्व युद्ध के कारण पूरी दुनिया के अधिकांश देश प्रभावित हुए थे, और कई देशों के बीच दुश्मनी के कारण तत्कालीन वैश्विक राजनीति में तनाव चरम पर था। ऐसे में इस दुश्मनी को ख़त्म करने, दुनिया भर के देशों के बीच मित्रता बढ़ाने और विश्व में शान्ति की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ रूपी एक मंच की स्थापना की गई थी।
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था दुनिया भर के देशों के बीच समन्वय और शान्ति की स्थापना करना। संयुक्त राष्ट्र के वैसे तो कई अंग हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पूरी दुनिया की सबसे ताक़तवर परिषद मानी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन में अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन जैसे देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, और जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन हुआ तो यही पांच देश सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बन गये।
जैसा कि हमने आपको बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना से लेकर आज तक विश्व की राजनीति में काफ़ी परिवर्तन हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय इसके सदस्य देशों की संख्या 50 थी, जबकि आज संयुक्त राष्ट्र में सदस्य देशों की संख्या 193 हो चुकी है। लेकिन तब से लेकर आज तक, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है। सुरक्षा परिषद की स्थापना के समय भी इसके 5 स्थायी सदस्य थे, और सालों बाद भी इसके स्थायी सदस्यों की संख्या 5 ही है।
यानी कि साफ़ जाहिर है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य ही पूरी दुनिया के पावर सेन्टर बने हुए हैं। अब जबकि दुनिया में भारत समेत अन्य देश आर्थिक और सामरिक रूप से काफ़ी सशक्त और ज़िम्मेदार हो चुके हैं, तो ऐसे में क्या सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार नहीं किया जाना चाहिए, और भारत समेत कुछ अन्य देशों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन ने हमेशा से ही अपने हितों के अनुसार ही सुरक्षा परिषद में फ़ैसले लिये हैं और वीटो पावर का इस्तेमाल किया है। सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के कारण इन्हीं पांचों देशों को साल भर अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है, जबकि बाक़ी सदस्य देशों को जब संयुक्त राष्ट्र की सालाना बैठक होती है तभी बोलने का मौक़ा मिलता है।
एक समय था जब शीत युद्ध के समय दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी। समय के साथ दुनिया की राजनीति में काफ़ी बदलाव आए हैं। USSR के विघटन से लेकर यूगोस्लाविया के विघटन तक पूरी दुनिया की भौगोलिक स्थिति भी बदल गई है। लेकिन इतना होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या में उसकी स्थापना से लेकर अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है।
सुरक्षा परिषद के स्थापना के समय अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड, फ्रांस और चीन जैसे देश शक्तिशाली थे, लेकिन अब भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश समय के साथ काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं। ऐसे में वैश्विक राजनीति में परिवर्तन को देखते हुए, परिस्थितियों की मांग है कि सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव होना चाहिए और भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलना चाहिए, जिससे सुरक्षा परिषद में अन्य शक्तिशाली देशों को भी अपनी बात कहने का मौक़ा मिला और पूरी दुनिया में शक्ति सन्तुलन बना रहे।
यदि तटस्थ रहकर सुरक्षा परिषद के कामों की विवेचना की जाए, तो साफ़ दिखता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों ने कई बार अपने हितों की परवाह ज़्यादा की है, जिसके कारण दुनिया को कई तरह के युद्ध और संघर्ष देखने पड़े हैं। वहीं आतंकवाद और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर भी सुरक्षा परिषद की भूमिका ज़्यादा प्रभावी नहीं रही है। एक आंकड़े के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से अब तक लगभग 50 युद्ध हो चुके हैं, और ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद के गठन के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाते हैं।
समय-समय पर भारत, जर्मनी, जापान, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देश मांग करते रहे हैं कि मौजूदा वैश्विक राजनीति को देखते हुए अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को और ज़्यादा प्रवाभी बनाने के लिए सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना अब ज़रूरी हो गया है। भारत, जापान, ब्राजील, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश जब सुरक्षा परिषद के स्थायी बनेंगे तो सालों से पावर सेन्टर बने पांच बड़े देशों का वर्चस्व कम होगा, और सुरक्षा परिषद में नए स्थायी देश बनने से संयुक्त राष्ट्र पहले से और भी ज़्यादा प्रभावी हो सकेगा।