जानिये क्या है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महाबलीपुरम कूटनीति?
Thursday - October 3, 2019 12:58 pm ,
Category : WTN HINDI
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात करेंगे प्रधानमंत्री मोदी
महाबलीपुरम मुलाक़ात’ लिखेगी भारत-चीन के नये सम्बन्धों का अध्याय!
OCT 03 (WTN) – भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कितने कुशल राजनेता हैं, इसे सभी भारतीय अच्छी तरह से जानते हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में जिस तरह से रणनीति बनाकर उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की है, वो साबित करता है कि मोदी एक कुशल रणनीतिकार हैं। देश की राजनीति में तो नरेन्द्र मोदी एक कुशल रणनीतिकार हैं ही, साथ ही मोदी विदेश नीति में भी अपनी कूटनीति का लोहा मनवा चुके हैं।
पुलवामा आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान पर ऐसा कूटनीतिक शिकंजा कसा कि आज पाकिस्तान की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही है। FATF (Financial Action Task Force) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं पाकिस्तान को ग्रे और ब्लेक लिस्ट में डाल रही हैं, जिसके कारण पाकिस्तान को क़र्ज़ मिलने में तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद मोदी सरकार ने जिस तरह से पाकिस्तान को पूरी दुनिया में अकेला कर दिया और कश्मीर में मानवाधिकार हनन आरोपों के पाकिस्तान के प्रौपेगैंडा की पोल खोली है, उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रधानमंत्री मोदी एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि दोस्त या दुश्मन बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं बदले जा सकते हैं। मोदी जानते और चाहते हैं कि भारत के पड़ोसी देश चीन के साथ सीमा पर शान्ति होना चाहिए, जिससे भारत और चीन के बीच कूटनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध मज़बूत बने रहें। आपकी जानकारी के लिए बता दे कि भारत और चीन के बाद सालों से सीमा विवाद चलता आ रहा है, लेकिन इस विवाद के बाद भी दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार जारी है।
वित्त वर्ष 2017-18 में दोनों देशों के बीच क़रीब 89.6 बिलियन डॉलर का आपसी व्यापार हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि सीमा पर शान्ति बनाए रखने और चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को गति देने के लिए भारत को कूटनीतिक स्तर पर काम करना होगा। इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री मोदी इस बार चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा पर उनका एक नये तरीक़े से स्वागत करने की तैयारी में हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले सप्ताह भारत दौरे पर आ रहे हैं। वैसे से चीन और भारत के शीर्ष नेताओं का एक दूसरे के देशों में आना-जाना और चर्चा करना आम बात है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस बार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से तमिलानाडु के शहर महाबलीपुरम में मुलाक़ात करने जा रहे हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आख़िर एक छोटे से प्राचीन शहर महाबलीपुरम में क्यों मुलाक़ात करने जा रहे हैं। तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीनी राष्ट्रपति से महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री मोदी की मुलाक़ात के कुछ अलग ही मायने हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चेन्नई से क़रीब 60 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन महाबलीपुरम शहर भारत और चीन को आपस में जोड़ने वाली एक प्राचीन कड़ी है। दरअसल, प्राचीन शहर महाबलीपुरम का चीन से काफ़ी पुराना व्यापारिक सम्बन्ध था और शायद इसी सम्बन्ध को याद दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात करने वाले हैं।
तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा महाबलीपुरम शहर एक प्राचीन शहर है। महाबलीपुरम को सातवीं सदी में पल्लव वंश के राजा नरसिंह देव बर्मन ने बसाया था। प्रतापी राजा नरसिंह देव बर्मन को उस क्षेत्र में मामल्लपुरम भी कहा जाता है, इसलिए महाबलीपुरम का एक और नाम मामल्लपुरम भी है। वैसे इस शहर का एक और प्राचीन नाम बाणपुर भी है।
प्रधानमंत्री मोदी का चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात का मक़सद ही यही है कि चीन को यह याद दिलाया जाए कि भारत के दक्षिण में स्थित शहर महाबलीपुरम का चीन के साथ रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में गहरा रिश्ता रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महाबलीपुरम और चीन के बीच क़रीब सदियों पुराने सम्बन्ध हैं।
महाबलीपुरम के पल्लव वंश के शासकों और चीन के बीच सम्बन्ध कोई साधारण सम्बन्ध नहीं थे बल्कि दोनों के बीच गहरे रक्षा सम्बन्ध थे। पल्लव वंश के राजा इतने शक्तिशाली थे कि चीन ने तिब्बत से लगी हुई अपनी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए पल्लव वंश के राजाओं के साथ बाक़ायदा समझौते तक किये थे।
जानकारी के लिए बता दें कि आठवीं शताब्दी में चीन के राजा और पल्लव वंश के शासक नरसिम्हन-2 के साथ पहली बार रक्षा के क्षेत्र में स्ट्रैटजिक पैक्ट हुआ था। नरसिम्हन-2 पल्लव वंश के शक्तिशाली शासकों में एक थे। चीन के राजा के ऊपर नरसिम्हन-2 का इतना प्रभाव था कि चीन ने उन्हें तिब्बत की सीमा से लगते दक्षिणी चीन का जनरल नियुक्त कर दिया था।
दरअसल, चीन ने यह क़दम अपने आप को बचाने के लिए उठाया था, क्योंकि चीन नरसिम्हन-2 की शक्ति से ख़ौफ़ खाता था। नरसिम्हन-2 की शक्ति से डरे चीन के राजा ने अपना एक प्रतिनिधिमण्डल राजा नरसिम्हन-2 के पास भेजा था। इस प्रतिनिधिमंडल के पास सिल्क के कपड़े पर लिखा राजा का पत्र था, जिसमें नरसिम्हन-2 को दक्षिणी चीन का जनरल नियुक्त करने की बात लिखी हुई थी।
यह तो थी चीन और पल्लव वंश के शासकों के बीच रक्षा सम्बन्धों की बात, वहीं चीन और महाबलीपुरम के बीच विकसित व्यापारिक सम्बन्ध भी थे। पल्लव शासकों ने महाबलीपुरम को बंगाल की खाड़ी के किनारे एक बिज़नेस हब की तरह विकसित किया था। महाबलीपुरम के बंदरगाह से चीन से सामान आयात और निर्यात किया जाता था। चीन और महाबलीपुरम के बीच सदियों तक व्यापारिक सम्बन्ध रहे।
इतना ही नहीं, चीन और पल्लव वंश के बीच उच्चस्तर के धार्मिक सम्बन्ध भी थे। पल्लव राजवंश के एक राजकुमार बोधिधर्म जब बौद्ध भिक्षु बन गए थे, तो वे उस समय चीन में एक मिसाल थे। 527 ईस्वी में बोधिधर्म ने कांचीपुरम से महाबलीपुरम होते हुए चीन की यात्रा की थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बोधिधर्म बौद्ध धर्म के 28वें पितृपुरुष बने और वे चीन में काफ़ी लोकप्रिय भी थे।
तमिलनाडु और चीन के बीच सम्बन्ध पल्लव वंश के साथ शुरू होकर चोल वंश तक बरकरार रहे। 7वीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आये थे, तो पल्लव वंश के राज्य में वो कांचीपुरम तक गये थे। यह वो समय था जब चीन और तमिलनाडु के प्रतिनिधिमण्डलों का एक दूसरे के यहां आना-जाना लगा रहता था।
प्रधानमंत्री मोदी अपने कूटनीति के तहत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को महाबलीपुरम का वैभव दिखाने ला रहे हैं, साथ ही वे जिनपिंग को यह सन्देश भी देना चाह रहे होंगे कि एक समय भारत के दक्षिण का एक राज्य इतना शक्तिशाली था, जिससे चीन के राजा तक ख़ौफ़ खाते थे।
वहीं मोदी चीन को यह भी बताना चाहेंगे कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने व्यापारिक और धार्मिक रिश्ते हैं, जिन्हें दोनों देशों को शान्ति के साथ आगे बढ़ाना चाहिए है। ऐसे में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात कर एक नये अध्याय की शुरूआत करने वाले हैं।
OCT 03 (WTN) – भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कितने कुशल राजनेता हैं, इसे सभी भारतीय अच्छी तरह से जानते हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में जिस तरह से रणनीति बनाकर उन्होंने चुनाव में जीत हासिल की है, वो साबित करता है कि मोदी एक कुशल रणनीतिकार हैं। देश की राजनीति में तो नरेन्द्र मोदी एक कुशल रणनीतिकार हैं ही, साथ ही मोदी विदेश नीति में भी अपनी कूटनीति का लोहा मनवा चुके हैं।
पुलवामा आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान पर ऐसा कूटनीतिक शिकंजा कसा कि आज पाकिस्तान की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही है। FATF (Financial Action Task Force) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं पाकिस्तान को ग्रे और ब्लेक लिस्ट में डाल रही हैं, जिसके कारण पाकिस्तान को क़र्ज़ मिलने में तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद मोदी सरकार ने जिस तरह से पाकिस्तान को पूरी दुनिया में अकेला कर दिया और कश्मीर में मानवाधिकार हनन आरोपों के पाकिस्तान के प्रौपेगैंडा की पोल खोली है, उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रधानमंत्री मोदी एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि दोस्त या दुश्मन बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं बदले जा सकते हैं। मोदी जानते और चाहते हैं कि भारत के पड़ोसी देश चीन के साथ सीमा पर शान्ति होना चाहिए, जिससे भारत और चीन के बीच कूटनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध मज़बूत बने रहें। आपकी जानकारी के लिए बता दे कि भारत और चीन के बाद सालों से सीमा विवाद चलता आ रहा है, लेकिन इस विवाद के बाद भी दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार जारी है।
वित्त वर्ष 2017-18 में दोनों देशों के बीच क़रीब 89.6 बिलियन डॉलर का आपसी व्यापार हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि सीमा पर शान्ति बनाए रखने और चीन के साथ व्यापारिक सम्बन्धों को गति देने के लिए भारत को कूटनीतिक स्तर पर काम करना होगा। इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री मोदी इस बार चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा पर उनका एक नये तरीक़े से स्वागत करने की तैयारी में हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले सप्ताह भारत दौरे पर आ रहे हैं। वैसे से चीन और भारत के शीर्ष नेताओं का एक दूसरे के देशों में आना-जाना और चर्चा करना आम बात है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस बार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से तमिलानाडु के शहर महाबलीपुरम में मुलाक़ात करने जा रहे हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आख़िर एक छोटे से प्राचीन शहर महाबलीपुरम में क्यों मुलाक़ात करने जा रहे हैं। तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीनी राष्ट्रपति से महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री मोदी की मुलाक़ात के कुछ अलग ही मायने हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चेन्नई से क़रीब 60 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन महाबलीपुरम शहर भारत और चीन को आपस में जोड़ने वाली एक प्राचीन कड़ी है। दरअसल, प्राचीन शहर महाबलीपुरम का चीन से काफ़ी पुराना व्यापारिक सम्बन्ध था और शायद इसी सम्बन्ध को याद दिलाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात करने वाले हैं।
तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा महाबलीपुरम शहर एक प्राचीन शहर है। महाबलीपुरम को सातवीं सदी में पल्लव वंश के राजा नरसिंह देव बर्मन ने बसाया था। प्रतापी राजा नरसिंह देव बर्मन को उस क्षेत्र में मामल्लपुरम भी कहा जाता है, इसलिए महाबलीपुरम का एक और नाम मामल्लपुरम भी है। वैसे इस शहर का एक और प्राचीन नाम बाणपुर भी है।
प्रधानमंत्री मोदी का चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात का मक़सद ही यही है कि चीन को यह याद दिलाया जाए कि भारत के दक्षिण में स्थित शहर महाबलीपुरम का चीन के साथ रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में गहरा रिश्ता रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महाबलीपुरम और चीन के बीच क़रीब सदियों पुराने सम्बन्ध हैं।
महाबलीपुरम के पल्लव वंश के शासकों और चीन के बीच सम्बन्ध कोई साधारण सम्बन्ध नहीं थे बल्कि दोनों के बीच गहरे रक्षा सम्बन्ध थे। पल्लव वंश के राजा इतने शक्तिशाली थे कि चीन ने तिब्बत से लगी हुई अपनी सीमा को सुरक्षित रखने के लिए पल्लव वंश के राजाओं के साथ बाक़ायदा समझौते तक किये थे।
जानकारी के लिए बता दें कि आठवीं शताब्दी में चीन के राजा और पल्लव वंश के शासक नरसिम्हन-2 के साथ पहली बार रक्षा के क्षेत्र में स्ट्रैटजिक पैक्ट हुआ था। नरसिम्हन-2 पल्लव वंश के शक्तिशाली शासकों में एक थे। चीन के राजा के ऊपर नरसिम्हन-2 का इतना प्रभाव था कि चीन ने उन्हें तिब्बत की सीमा से लगते दक्षिणी चीन का जनरल नियुक्त कर दिया था।
दरअसल, चीन ने यह क़दम अपने आप को बचाने के लिए उठाया था, क्योंकि चीन नरसिम्हन-2 की शक्ति से ख़ौफ़ खाता था। नरसिम्हन-2 की शक्ति से डरे चीन के राजा ने अपना एक प्रतिनिधिमण्डल राजा नरसिम्हन-2 के पास भेजा था। इस प्रतिनिधिमंडल के पास सिल्क के कपड़े पर लिखा राजा का पत्र था, जिसमें नरसिम्हन-2 को दक्षिणी चीन का जनरल नियुक्त करने की बात लिखी हुई थी।
यह तो थी चीन और पल्लव वंश के शासकों के बीच रक्षा सम्बन्धों की बात, वहीं चीन और महाबलीपुरम के बीच विकसित व्यापारिक सम्बन्ध भी थे। पल्लव शासकों ने महाबलीपुरम को बंगाल की खाड़ी के किनारे एक बिज़नेस हब की तरह विकसित किया था। महाबलीपुरम के बंदरगाह से चीन से सामान आयात और निर्यात किया जाता था। चीन और महाबलीपुरम के बीच सदियों तक व्यापारिक सम्बन्ध रहे।
इतना ही नहीं, चीन और पल्लव वंश के बीच उच्चस्तर के धार्मिक सम्बन्ध भी थे। पल्लव राजवंश के एक राजकुमार बोधिधर्म जब बौद्ध भिक्षु बन गए थे, तो वे उस समय चीन में एक मिसाल थे। 527 ईस्वी में बोधिधर्म ने कांचीपुरम से महाबलीपुरम होते हुए चीन की यात्रा की थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बोधिधर्म बौद्ध धर्म के 28वें पितृपुरुष बने और वे चीन में काफ़ी लोकप्रिय भी थे।
तमिलनाडु और चीन के बीच सम्बन्ध पल्लव वंश के साथ शुरू होकर चोल वंश तक बरकरार रहे। 7वीं शताब्दी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आये थे, तो पल्लव वंश के राज्य में वो कांचीपुरम तक गये थे। यह वो समय था जब चीन और तमिलनाडु के प्रतिनिधिमण्डलों का एक दूसरे के यहां आना-जाना लगा रहता था।
प्रधानमंत्री मोदी अपने कूटनीति के तहत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को महाबलीपुरम का वैभव दिखाने ला रहे हैं, साथ ही वे जिनपिंग को यह सन्देश भी देना चाह रहे होंगे कि एक समय भारत के दक्षिण का एक राज्य इतना शक्तिशाली था, जिससे चीन के राजा तक ख़ौफ़ खाते थे।
वहीं मोदी चीन को यह भी बताना चाहेंगे कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने व्यापारिक और धार्मिक रिश्ते हैं, जिन्हें दोनों देशों को शान्ति के साथ आगे बढ़ाना चाहिए है। ऐसे में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी, चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग से महाबलीपुरम में मुलाक़ात कर एक नये अध्याय की शुरूआत करने वाले हैं।