जानिए क्या होता है स्पेस स्टेशन और क्या है इसरो के सामने इसकी चुनौतियां?
Thursday - October 3, 2019 2:46 pm ,
Category : WTN HINDI
स्पेस स्टेशन की दिशा में इसरो के बढ़ते क़दम
क्या इसरो स्पेस स्टेशन की चुनौती में हासिल कर पाएगा सफ़लता?
OCT 03 (WTN) – लगातार प्रयत्न करने से ही एक ना एक दिन सफ़लता हासिल होती है। वहीं विज्ञान में तो लगातार प्रयोग करते रहने की हमेशा ज़रूरत होती है, क्योंकि इन्हीं प्रयासों से एक ना एक दिन सफ़लता हासिल होती है। भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिक संस्थान इसरो ने भी अपने मून मिशन चंद्रयान-2 के विक्रम लैण्डर की ख़राब लैण्डिंग के बाद हार नहीं मानी है। अब इसरो अपने पुराने असफ़ल प्रयासों से सबक लेकर कुछ नया ही करने जा रहा है, जो कि दुनिया के कम ही देश कर सके हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत अब अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने की दिशा में क़दम आगे बढ़ा रहा है। यदि भारत ऐसा करने में कामयाब हो जाता है, तो वो दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनका अपना स्पेस स्टेशन है। वैसे स्पेस स्टेशन बनाना बेहद ही कठिन काम है, जिसके लिए इसरो को अत्याधिक निपुणता और बारीकी की ज़रूरत पड़ेगी।
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर स्पेस स्टेशन होता क्या है और इसे क्यों और कैसे बनाया जाता है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्पेस स्टेशन को ऑर्बिटल स्टेशन या ऑर्बिटल स्पेस स्टेशन के रूप में भी जाना जाता है। दरअसल, स्पेस स्टेशन एक एक अंतरिक्ष यान ही होता है, जो कि अंतरिक्ष में मानव चालक दल के लिए ठहराव का एक स्थान होता है। इसे इस तरह से बनाया जाता है कि इसमें इंसानों के रहने लायक सभी सुविधाएं हों। आपकी जानकारी के लए बता दें कि स्पेस स्टेशन को पृथ्वी की लो-ऑर्बिट कक्षा में ही स्थापित किया जाता है।
स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में मानव निर्मित एक ऐसा स्टेशन है, जिससे पृथ्वी से कोई अंतरिक्ष यान जाकर मिल सकता है। इसके अलावा इसमें इतनी क्षमता होती है कि इस पर अंतरिक्ष यान उतारा भी जा सकता है। साफ़ है कि स्पेस स्टेशन इसलिए बनाए जाते हैं ताकि वैज्ञानिक लम्बे समय तक अंतरिक्ष में काम कर सकें।
यदि आप सोच रहे हैं कि अंतरिक्ष में उड़ता हुआ स्पेस स्टेशन, नई तकनीक, खगोलीय, पर्यावरण और भूगर्भीय शोध के लिए एक प्रयोगशाला है, तो आपका सोचना ग़लत है। दरअसल, स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया एक ऐसा स्टेशन है, जहां से वैज्ञानिक अंतरिक्ष के बारे गहराई से अध्ययन कर सकते हैं।
अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन बनाने के लिए ज़रूरी है, दो अंतरिक्षयानों या उपग्रहों को आपस में जोड़ना। यह जितना सरल लगता है, लेकिन वास्तव में यह मिशन बेहद जटिल होता है और दो अंतरिक्षयानों या उपग्रहों को आपस में जोड़ने के लिए काफ़ी निपुणता की ज़रूरत होती है।
इस बारे में इसरो चीफ डॉ. के. सिवन का कहना है कि स्पेस स्टेशन बनाना अपने आप में एक बहुत बड़ा चैलेंज भारतीय वैज्ञानिकों के सामने है। इसरो ने अपने इस बहुउद्देशीय मिशन का नाम ‘स्पेडेक्स’ यानी ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरीमेंट’ रखा है। स्पेडेक्स के लिए इसरो दो प्रायोगिक सैटेलाइट्स को पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च करेगा, जिन्हें बाद में अंतरिक्ष में जोड़ा जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस मिशन में सबसे बड़ी जटिलता यह है कि कि इन दोनों सैटेलाइट्स की गति को कम करके उन्हें अंतरिक्ष में जोड़ना होगा। यदि इस दौरान दोनों सैटेलाइट्स की गति निर्धारित रूप से कम नहीं हुई, तो यह दोनों आपस में टकरा भी सकते हैं।
हालांकि, इस मिशन का मतलब यह नहीं है कि इसरो अपने स्पेस स्टेशन के मिशन की शुरुआत करने जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह एक प्रायोगिक मिशन है। इसरो के इस बुहप्रतीक्षित स्पेस स्टेशन मिशन को दिसम्बर 2021 के गगनयान अभियान के बाद ही शुरू किया जाएगा, क्योंकि अंतरिक्ष में इंसानों को भेजने और डॉकिंग में महारत हासिल करने के बाद ही स्पेस स्टेशन मिशन की शुरूआत की जा सकेगी।
इसरो इसके ज़रिये यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि वो अपने स्पेस स्टेशन में ईंधन और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ज़रूरी वस्तुएं पहुंचा पाएंगा या नहीं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले स्पेडेक्स मिशन को 2025 तक पीएसएलवी रॉकेट से छोड़ने की तैयारी है और इस प्रयोग में रोबोटिक आर्म एक्सपेरीमेंट भी शामिल होगा।
वैसे आप सभी ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का नाम तो सुना ही होगा, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इंटननेशनल स्पेस स्टेशन को पांच अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर बनाया है। यह पांच एजेसियां हैं, अमेरिका की NASA, रूस की ROSCOSMOS, जापान की JAXA, यूरोप की ESA और कनाडा की CSA, वहीं इनके अतिरिक्त ब्राजीलियन स्पेस एजेंसी (AEB) भी कुछ अनुबंधों के साथ नासा के साथ कार्यरत है। इसी तरह इटालियन स्पेस एजेंसी (ASI) भी कुछ अलग अनुबंधों के साथ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में कार्यरत है।
दरअसल, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अपने आप में इन देशों के लिए एक काफ़ी बड़ी चुनौती थी। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन बनाने में इन देशों को 13 साल लग गये थे। ख़ास बात है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन बनाने में डॉकिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया था, और इसे बनाने के लिए 40 बार डॉकिंग की गई थी।
सम्भावित 20 टन वजनी भारतीय स्पेस स्टेशन के ज़रिये इसरो के वैज्ञानिक कई तरह के प्रयोग कर सकेंगे। इसके साथ ही वैज्ञानिक माइक्रोग्रैविटी का अध्ययन भी कर पाएंगे। इसरो के मुताबिक़, भारतीय स्पेस स्टेशन में 15 से 20 दिनों के लिए कुछ अंतरिक्षयात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होगी। अगर इसरो 5 से 7 साल में अपना स्पेस स्टेशन बनाने में कामयाब होता है, तो भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश होगा, जिसका ख़ुद का स्पेस स्टेशन होगा। अभी तक रूस, अमेरिका और चीन के पास अपने-अपने स्पेस स्टेशन हैं।
OCT 03 (WTN) – लगातार प्रयत्न करने से ही एक ना एक दिन सफ़लता हासिल होती है। वहीं विज्ञान में तो लगातार प्रयोग करते रहने की हमेशा ज़रूरत होती है, क्योंकि इन्हीं प्रयासों से एक ना एक दिन सफ़लता हासिल होती है। भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिक संस्थान इसरो ने भी अपने मून मिशन चंद्रयान-2 के विक्रम लैण्डर की ख़राब लैण्डिंग के बाद हार नहीं मानी है। अब इसरो अपने पुराने असफ़ल प्रयासों से सबक लेकर कुछ नया ही करने जा रहा है, जो कि दुनिया के कम ही देश कर सके हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत अब अंतरिक्ष में अपना स्पेस स्टेशन बनाने की दिशा में क़दम आगे बढ़ा रहा है। यदि भारत ऐसा करने में कामयाब हो जाता है, तो वो दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनका अपना स्पेस स्टेशन है। वैसे स्पेस स्टेशन बनाना बेहद ही कठिन काम है, जिसके लिए इसरो को अत्याधिक निपुणता और बारीकी की ज़रूरत पड़ेगी।
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर स्पेस स्टेशन होता क्या है और इसे क्यों और कैसे बनाया जाता है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि स्पेस स्टेशन को ऑर्बिटल स्टेशन या ऑर्बिटल स्पेस स्टेशन के रूप में भी जाना जाता है। दरअसल, स्पेस स्टेशन एक एक अंतरिक्ष यान ही होता है, जो कि अंतरिक्ष में मानव चालक दल के लिए ठहराव का एक स्थान होता है। इसे इस तरह से बनाया जाता है कि इसमें इंसानों के रहने लायक सभी सुविधाएं हों। आपकी जानकारी के लए बता दें कि स्पेस स्टेशन को पृथ्वी की लो-ऑर्बिट कक्षा में ही स्थापित किया जाता है।
स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में मानव निर्मित एक ऐसा स्टेशन है, जिससे पृथ्वी से कोई अंतरिक्ष यान जाकर मिल सकता है। इसके अलावा इसमें इतनी क्षमता होती है कि इस पर अंतरिक्ष यान उतारा भी जा सकता है। साफ़ है कि स्पेस स्टेशन इसलिए बनाए जाते हैं ताकि वैज्ञानिक लम्बे समय तक अंतरिक्ष में काम कर सकें।
यदि आप सोच रहे हैं कि अंतरिक्ष में उड़ता हुआ स्पेस स्टेशन, नई तकनीक, खगोलीय, पर्यावरण और भूगर्भीय शोध के लिए एक प्रयोगशाला है, तो आपका सोचना ग़लत है। दरअसल, स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया एक ऐसा स्टेशन है, जहां से वैज्ञानिक अंतरिक्ष के बारे गहराई से अध्ययन कर सकते हैं।
अंतरिक्ष में स्पेस स्टेशन बनाने के लिए ज़रूरी है, दो अंतरिक्षयानों या उपग्रहों को आपस में जोड़ना। यह जितना सरल लगता है, लेकिन वास्तव में यह मिशन बेहद जटिल होता है और दो अंतरिक्षयानों या उपग्रहों को आपस में जोड़ने के लिए काफ़ी निपुणता की ज़रूरत होती है।
इस बारे में इसरो चीफ डॉ. के. सिवन का कहना है कि स्पेस स्टेशन बनाना अपने आप में एक बहुत बड़ा चैलेंज भारतीय वैज्ञानिकों के सामने है। इसरो ने अपने इस बहुउद्देशीय मिशन का नाम ‘स्पेडेक्स’ यानी ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरीमेंट’ रखा है। स्पेडेक्स के लिए इसरो दो प्रायोगिक सैटेलाइट्स को पीएसएलवी रॉकेट से लॉन्च करेगा, जिन्हें बाद में अंतरिक्ष में जोड़ा जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस मिशन में सबसे बड़ी जटिलता यह है कि कि इन दोनों सैटेलाइट्स की गति को कम करके उन्हें अंतरिक्ष में जोड़ना होगा। यदि इस दौरान दोनों सैटेलाइट्स की गति निर्धारित रूप से कम नहीं हुई, तो यह दोनों आपस में टकरा भी सकते हैं।
हालांकि, इस मिशन का मतलब यह नहीं है कि इसरो अपने स्पेस स्टेशन के मिशन की शुरुआत करने जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह एक प्रायोगिक मिशन है। इसरो के इस बुहप्रतीक्षित स्पेस स्टेशन मिशन को दिसम्बर 2021 के गगनयान अभियान के बाद ही शुरू किया जाएगा, क्योंकि अंतरिक्ष में इंसानों को भेजने और डॉकिंग में महारत हासिल करने के बाद ही स्पेस स्टेशन मिशन की शुरूआत की जा सकेगी।
इसरो इसके ज़रिये यह पता लगाने की कोशिश करेगा कि वो अपने स्पेस स्टेशन में ईंधन और अंतरिक्ष यात्रियों के लिए ज़रूरी वस्तुएं पहुंचा पाएंगा या नहीं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले स्पेडेक्स मिशन को 2025 तक पीएसएलवी रॉकेट से छोड़ने की तैयारी है और इस प्रयोग में रोबोटिक आर्म एक्सपेरीमेंट भी शामिल होगा।
वैसे आप सभी ने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का नाम तो सुना ही होगा, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इंटननेशनल स्पेस स्टेशन को पांच अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर बनाया है। यह पांच एजेसियां हैं, अमेरिका की NASA, रूस की ROSCOSMOS, जापान की JAXA, यूरोप की ESA और कनाडा की CSA, वहीं इनके अतिरिक्त ब्राजीलियन स्पेस एजेंसी (AEB) भी कुछ अनुबंधों के साथ नासा के साथ कार्यरत है। इसी तरह इटालियन स्पेस एजेंसी (ASI) भी कुछ अलग अनुबंधों के साथ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में कार्यरत है।
दरअसल, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन अपने आप में इन देशों के लिए एक काफ़ी बड़ी चुनौती थी। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन बनाने में इन देशों को 13 साल लग गये थे। ख़ास बात है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन बनाने में डॉकिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया था, और इसे बनाने के लिए 40 बार डॉकिंग की गई थी।
सम्भावित 20 टन वजनी भारतीय स्पेस स्टेशन के ज़रिये इसरो के वैज्ञानिक कई तरह के प्रयोग कर सकेंगे। इसके साथ ही वैज्ञानिक माइक्रोग्रैविटी का अध्ययन भी कर पाएंगे। इसरो के मुताबिक़, भारतीय स्पेस स्टेशन में 15 से 20 दिनों के लिए कुछ अंतरिक्षयात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होगी। अगर इसरो 5 से 7 साल में अपना स्पेस स्टेशन बनाने में कामयाब होता है, तो भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश होगा, जिसका ख़ुद का स्पेस स्टेशन होगा। अभी तक रूस, अमेरिका और चीन के पास अपने-अपने स्पेस स्टेशन हैं।