जानिए क्या है इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती?
Wednesday - October 9, 2019 4:33 pm ,
Category : WTN HINDI
आईएमएफ ने बढ़ा दी प्रधानमंत्री मोदी की चिंता
वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई भारत के विकास की रफ़्तार
OCT 09 (WTN) – 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने वैश्विक आर्थिक मंदी एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आ खड़ी हुई है। देश के अन्दर राजनीतिक स्तर पर और विदेश में कूटनीतिक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी अपने विरोधियों को पराजित करते जा रहे हैं, लेकिन आर्थिक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी के सामने आर्थिक मंदी एक ऐसी चुनौती बनकर सामने आ रही है, जिससे निपटना उनके लिए इस समय की एक सबसे बड़ी चुनौती है।
जैसा कि आप जानते हैं कि आर्थिक मंदी एक ऐसी बाधा है, जिससे देश का कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर पिछले एक साल से आर्थिक मंदी के कारण बेहाल हुआ पड़ा है। वहीं अन्य सेक्टर भी धीरे-धीरे आर्थिक मंदी की चपेट में आते जा रहे हैं। इस सबके बीच, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर जो चेतावनी जारी की है, उससे प्रधानमंत्री मोदी की चिंताएं ज़रूर बढ़ गई होंगी।
आईएमफ की चीफ क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने साफ़ कर दिया है कि इस वक़्त वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुस्ती देखी जा रही है, जिसके कारण 90 प्रतिशत देशों की विकास की रफ़्तार प्रभावित हुई है और धीमी चल रही है। वहीं तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत पर इसका अन्य देशों के मुक़ाबले ज़्यादा असर देखने को मिल सकता है।
यानी कि आईएमएफ चीफ़ क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जॉर्जिएवा के मुताबिक़, वैश्विक अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक ही समय में कई कारणों से नरमी के दौर से गुजर रही है। यानी कि दुनिया की वृद्धि दर इस दशक की शुरुआत के बाद से अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंच जाएगी ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।
वैसे जॉर्जिएवा का कहना है कि आईएमएफ चालू और अगले वर्ष के लिए अपने वृद्धि दर अनुमान को घटा रहा है। हालांकि, इसके आधिकारिक संशोधित आंकड़े 15 अक्टूबर को जारी किये जाएंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले आईएमएफ ने साल 2019 में वैश्विक वृद्धि दर 3.2 प्रतिशत और साल 2020 में 3.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। वहीं आईएमएफ के मुताबिक़, क़रीब 40 उभरती तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर पांच प्रतिशत से अधिक रहेगी, जो कि संतोषजनक है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में बेरोज़गारी एक बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसके पीछे की वजह है भारत की विशाल जनसंख्या। लेकिन कम जनसंख्या होने के बाद भी अमेरिका और जर्मनी जैसे देश बेरोज़गारी की समस्या का सामना कर रहे हैं। आईएमएफ के मुताबिक़, अमेरिका और जर्मनी में बेरोज़गारी की दर ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। वहीं वैश्विक आर्थिक मंदी का ऐसा असर है कि अमेरिका और जापान समेत यूरोप की विकसित अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक गतिविधियों में नरमी देखने को मिल रही है।
लेकिन इस बार की आर्थिक मंदी का सबसे ज़्याद असर भारत और ब्राजील जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। इतना ही नहीं, ट्रेड वॉर में अमेरिका को टक्कर दे रहे चीन को भी कम आर्थिक वृद्धि दर का सामना करना पड़ रहा है। हालत यह है कि चीन की आर्थिक वृद्धि दर तीस साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।
साफ़ ज़ाहिर है कि पूरी दुनिया को वैश्विक आर्थिक मंदी ने अपनी चपेट में ले लिया है, लेकिन भारत जैसे तेज़ी से विकास करने वाले देशों के लिए इस बार की आर्थिक मंदी एक चुनौती बनकर सामने आ रही है। दरअसल, इससे पहले की साल 2008-09 की आर्थिक मंदी के समय सोशल मीडिया अस्तित्व में नहीं था, जिसके कारण मंदी से परेशान और प्रभावित जनता अपने विचारों की अभिव्यक्ति खुलेतौर पर नहीं कर पाती थी।
लेकिन अब जबकि लगभग हर वयस्क के हाथ में स्मार्टफोन है तो आर्थिक मंदी पर मोदी सरकार से सवाल जवाब किये जा रहे हैं कि आर्थिक मंदी से उबरने के लिए मोदी सरकार क्या कुछ उपाय कर रही है? प्रधानमंत्री मोदी से देश की जनता सोशल मीडिया के ज़रिये पूछ रही है कि इस आर्थिक मंदी का सामना करने और इसके प्रभावों से उबरने के लिए क्या कुछ उपाय मोदी सरकार कर रही है। अब देखना होगा कि मंदी की मार से निपटने के लिए मोदी सरकार क्या कुछ फार्मूला आजमाती है, जिससे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के बाशिदों को राहत मिल सके।
OCT 09 (WTN) – 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने वैश्विक आर्थिक मंदी एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आ खड़ी हुई है। देश के अन्दर राजनीतिक स्तर पर और विदेश में कूटनीतिक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी अपने विरोधियों को पराजित करते जा रहे हैं, लेकिन आर्थिक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी के सामने आर्थिक मंदी एक ऐसी चुनौती बनकर सामने आ रही है, जिससे निपटना उनके लिए इस समय की एक सबसे बड़ी चुनौती है।
जैसा कि आप जानते हैं कि आर्थिक मंदी एक ऐसी बाधा है, जिससे देश का कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर पिछले एक साल से आर्थिक मंदी के कारण बेहाल हुआ पड़ा है। वहीं अन्य सेक्टर भी धीरे-धीरे आर्थिक मंदी की चपेट में आते जा रहे हैं। इस सबके बीच, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने वैश्विक आर्थिक मंदी को लेकर जो चेतावनी जारी की है, उससे प्रधानमंत्री मोदी की चिंताएं ज़रूर बढ़ गई होंगी।
आईएमफ की चीफ क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने साफ़ कर दिया है कि इस वक़्त वैश्विक अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुस्ती देखी जा रही है, जिसके कारण 90 प्रतिशत देशों की विकास की रफ़्तार प्रभावित हुई है और धीमी चल रही है। वहीं तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत पर इसका अन्य देशों के मुक़ाबले ज़्यादा असर देखने को मिल सकता है।
यानी कि आईएमएफ चीफ़ क्रिस्टालिना जॉर्जिएवा ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जॉर्जिएवा के मुताबिक़, वैश्विक अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक ही समय में कई कारणों से नरमी के दौर से गुजर रही है। यानी कि दुनिया की वृद्धि दर इस दशक की शुरुआत के बाद से अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंच जाएगी ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।
वैसे जॉर्जिएवा का कहना है कि आईएमएफ चालू और अगले वर्ष के लिए अपने वृद्धि दर अनुमान को घटा रहा है। हालांकि, इसके आधिकारिक संशोधित आंकड़े 15 अक्टूबर को जारी किये जाएंगे। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले आईएमएफ ने साल 2019 में वैश्विक वृद्धि दर 3.2 प्रतिशत और साल 2020 में 3.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। वहीं आईएमएफ के मुताबिक़, क़रीब 40 उभरती तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर पांच प्रतिशत से अधिक रहेगी, जो कि संतोषजनक है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में बेरोज़गारी एक बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसके पीछे की वजह है भारत की विशाल जनसंख्या। लेकिन कम जनसंख्या होने के बाद भी अमेरिका और जर्मनी जैसे देश बेरोज़गारी की समस्या का सामना कर रहे हैं। आईएमएफ के मुताबिक़, अमेरिका और जर्मनी में बेरोज़गारी की दर ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। वहीं वैश्विक आर्थिक मंदी का ऐसा असर है कि अमेरिका और जापान समेत यूरोप की विकसित अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक गतिविधियों में नरमी देखने को मिल रही है।
लेकिन इस बार की आर्थिक मंदी का सबसे ज़्याद असर भारत और ब्राजील जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। इतना ही नहीं, ट्रेड वॉर में अमेरिका को टक्कर दे रहे चीन को भी कम आर्थिक वृद्धि दर का सामना करना पड़ रहा है। हालत यह है कि चीन की आर्थिक वृद्धि दर तीस साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।
साफ़ ज़ाहिर है कि पूरी दुनिया को वैश्विक आर्थिक मंदी ने अपनी चपेट में ले लिया है, लेकिन भारत जैसे तेज़ी से विकास करने वाले देशों के लिए इस बार की आर्थिक मंदी एक चुनौती बनकर सामने आ रही है। दरअसल, इससे पहले की साल 2008-09 की आर्थिक मंदी के समय सोशल मीडिया अस्तित्व में नहीं था, जिसके कारण मंदी से परेशान और प्रभावित जनता अपने विचारों की अभिव्यक्ति खुलेतौर पर नहीं कर पाती थी।
लेकिन अब जबकि लगभग हर वयस्क के हाथ में स्मार्टफोन है तो आर्थिक मंदी पर मोदी सरकार से सवाल जवाब किये जा रहे हैं कि आर्थिक मंदी से उबरने के लिए मोदी सरकार क्या कुछ उपाय कर रही है? प्रधानमंत्री मोदी से देश की जनता सोशल मीडिया के ज़रिये पूछ रही है कि इस आर्थिक मंदी का सामना करने और इसके प्रभावों से उबरने के लिए क्या कुछ उपाय मोदी सरकार कर रही है। अब देखना होगा कि मंदी की मार से निपटने के लिए मोदी सरकार क्या कुछ फार्मूला आजमाती है, जिससे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के बाशिदों को राहत मिल सके।