मोदी-शाह की जोड़ी से क्या हार मान गये हैं राहुल गांधी?
Thursday - October 10, 2019 11:51 am ,
Category : WTN HINDI
लोकसभा चुनाव में हार से हताश और निराश हैं राहुल गांधी
विधानसभा चुनाव में जनता और प्रचार से राहुल गांधी ने बनाई दूरी
OCT 10 (WTN) – राजनीति में चुनाव होते रहे हैं, और इन चुनावों में हार और जीत भी होती रहती है। लेकिन राजनीति का असली योद्धा वही है, जो चुनाव में हार के बाद हार के कारणों का विश्लेषण करे और जीत के बाद अभिमानी ना होकर जीत को विनम्रता से स्वीकार करे। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के करिश्मे और भाजपा के राष्ट्रवाद ने कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियों को बुरी तरह से पराजित कर दिया। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कि जिस तरह से हार हुई है, वो अपने आप में ऐतिहासिक है।
जैसा कि आप जानते हैं कि कांग्रेस को इस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को देश की जनता ने इस तरह से नकारा है कि राहुल गांधी अपनी परम्परागत अमेठी सीट से चुनाव हार गये। वहीं कई बड़े दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है।
लगातार दो लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस पार्टी में एक तूफान सा आ गया। पार्टी और ख़ुद की हार से निराश और नाराज़ राहुल गांधी ने आनन फ़ानन में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया हालांकि, राहुल गांधी को मनाने की काफ़ी कोशिशें पार्टी ने की लेकिन राहुल गांधी अपने इस्तीफ़े पर अड़े रहे। वैसे लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में हार ज़रूर गई है, लेकिन वे और उनकी पार्टी आम लोगों की परेशानियों के साथ खड़ी है और एनडीए सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध वे करते रहेंगे।
लेकिन बातें हैं बातों का क्या! अब जबकि महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव प्रचार चरम पर हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ख़ुद को इन चुनावों से दूर रखना आप में काफ़ी सवाल खड़े करता है कि कहीं राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से हार तो नहीं मान गये हैं? दरअसल, आर्थिक मंदी समेत कई अन्य मुद्दों पर राहुल गांधी इन दो राज्यों की और केन्द्र की भाजपा सरकारों के ख़िलाफ़ आक्रमक प्रचार कर सकते थे, लेकिन ऐसा ना करके राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गये हैं।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद से राहुल गांधी अपने ही पार्टी के कुछ नेताओं से नाराज़ बताए जाते हैं। लगातार दो लोकसभा चुनावों में हार के बाद राहुल गांधी खुद भी निराश दिखाई दे रहे हैं। लेकिन निराशा और हताशा से जीत हासिल नहीं होती है। राहुल गांधी को एक परिपक्व राजनेता की तरह लोकसभा चुनाव में हुई हार को स्वीकार कर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए प्रचार करना चाहिए था।
यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में गांधी परिवार ही सर्वोपरि है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक, कांग्रेसी नेताओं ने एक परिवार विशेष के प्रति ही अपनी वफ़ादारी निभाई है। ऐसे में जबकि कांग्रेसी नेताओं के लिए राहुल गांधी ही सर्वोच्च नेता हैं, राहुल गांधी को दो बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी के समय आगे आकर पार्टी के लिए प्रचार करना चाहिए थी। लेकिन ऐसा ना करके राहुल गांधी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गये।
कहा गया है कि यदि कहीं से कुछ सीखने मिले तो सीख लेना चाहिए; इस बात पर अमल करते हुए राहुल गांधी को भाजपा से कुछ सीखना चाहिए। भाजपा 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की आंधी के सामने टिक ना सकी थी, और उस चुनाव में भाजपा सिर्फ़ 2 सीटों पर ही चुनाव जीत सकी थी। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावार भाजपा नेता तक चुनाव हार गये थे। इसके बाद कई लोकसभा चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन भाजपा के नेताओं ने हिम्मत नहीं हारी और मेहनत करते गये।
भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की मेहनत का ही नतीज़ा है कि भाजपा लगातार दो लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत की सरकार बना सकी है। हार और जीत तो राजनीति का हिस्सा है। लोकसभा चुनाव में मिली हार से सबक लेकर राहुल गांधी को एक बार फ़िर से देश की जनता के बीच जाना चाहिए और उनसे चर्चा करके उनके विचारों को जानना चाहिए।
लेकिन ना तो राहुल गांधी देश की जनता से सीधा सम्वाद कर रहे हैं और ना ही विधानसभा चुनावों में अपने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौंसला बढ़ाने के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। भाजपा अजेय नहीं है, भाजपा को भी हराया जा सकता है और भाजपा की भी कई कमजोरियां हैं। लेकिन बजाय भाजपा को उनकी ग़लतियों के लिए घेरने के, राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गये हैं, जिससे उनकी ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नाराज़ हैं।
लोकसभा चुनाव की हार को भूलकर और उससे सीखकर राहुल गांधी को अब आगे भविष्य की तरफ़ देखना चाहिए। लेकिन यदि इसी तरह से नाराज़ और निराश होकर वे जनता से और चुनावों से दूरी बनाएंगे तो जनता उनसे और भी दूर होती चली जाएगी। राजनीति में सब्र बहुत मायने रखता है। इसी सब्र को अपना साथी बनाते हुए राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की हार से सबक सीखते हुए जनता के बीच जाना चाहिए और भाजपा सरकारों की असफ़लताओं पर उन्हें घेरना चाहिए। यदि राहुल गांधी अभी से ऐसा करेंगे, तो ही 2024 के लोकसभा चुनाव में वे मोदी और शाह की जोड़ी को टक्कर दे पाएंगे।
OCT 10 (WTN) – राजनीति में चुनाव होते रहे हैं, और इन चुनावों में हार और जीत भी होती रहती है। लेकिन राजनीति का असली योद्धा वही है, जो चुनाव में हार के बाद हार के कारणों का विश्लेषण करे और जीत के बाद अभिमानी ना होकर जीत को विनम्रता से स्वीकार करे। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के करिश्मे और भाजपा के राष्ट्रवाद ने कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियों को बुरी तरह से पराजित कर दिया। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कि जिस तरह से हार हुई है, वो अपने आप में ऐतिहासिक है।
जैसा कि आप जानते हैं कि कांग्रेस को इस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस पार्टी सिर्फ़ 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को देश की जनता ने इस तरह से नकारा है कि राहुल गांधी अपनी परम्परागत अमेठी सीट से चुनाव हार गये। वहीं कई बड़े दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा है।
लगातार दो लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस पार्टी में एक तूफान सा आ गया। पार्टी और ख़ुद की हार से निराश और नाराज़ राहुल गांधी ने आनन फ़ानन में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया हालांकि, राहुल गांधी को मनाने की काफ़ी कोशिशें पार्टी ने की लेकिन राहुल गांधी अपने इस्तीफ़े पर अड़े रहे। वैसे लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में हार ज़रूर गई है, लेकिन वे और उनकी पार्टी आम लोगों की परेशानियों के साथ खड़ी है और एनडीए सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध वे करते रहेंगे।
लेकिन बातें हैं बातों का क्या! अब जबकि महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव प्रचार चरम पर हैं। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ख़ुद को इन चुनावों से दूर रखना आप में काफ़ी सवाल खड़े करता है कि कहीं राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से हार तो नहीं मान गये हैं? दरअसल, आर्थिक मंदी समेत कई अन्य मुद्दों पर राहुल गांधी इन दो राज्यों की और केन्द्र की भाजपा सरकारों के ख़िलाफ़ आक्रमक प्रचार कर सकते थे, लेकिन ऐसा ना करके राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गये हैं।
लोकसभा चुनाव में हार के बाद से राहुल गांधी अपने ही पार्टी के कुछ नेताओं से नाराज़ बताए जाते हैं। लगातार दो लोकसभा चुनावों में हार के बाद राहुल गांधी खुद भी निराश दिखाई दे रहे हैं। लेकिन निराशा और हताशा से जीत हासिल नहीं होती है। राहुल गांधी को एक परिपक्व राजनेता की तरह लोकसभा चुनाव में हुई हार को स्वीकार कर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए प्रचार करना चाहिए था।
यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में गांधी परिवार ही सर्वोपरि है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक, कांग्रेसी नेताओं ने एक परिवार विशेष के प्रति ही अपनी वफ़ादारी निभाई है। ऐसे में जबकि कांग्रेसी नेताओं के लिए राहुल गांधी ही सर्वोच्च नेता हैं, राहुल गांधी को दो बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी के समय आगे आकर पार्टी के लिए प्रचार करना चाहिए थी। लेकिन ऐसा ना करके राहुल गांधी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को अकेला छोड़कर विदेश यात्रा पर चले गये।
कहा गया है कि यदि कहीं से कुछ सीखने मिले तो सीख लेना चाहिए; इस बात पर अमल करते हुए राहुल गांधी को भाजपा से कुछ सीखना चाहिए। भाजपा 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की आंधी के सामने टिक ना सकी थी, और उस चुनाव में भाजपा सिर्फ़ 2 सीटों पर ही चुनाव जीत सकी थी। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावार भाजपा नेता तक चुनाव हार गये थे। इसके बाद कई लोकसभा चुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन भाजपा के नेताओं ने हिम्मत नहीं हारी और मेहनत करते गये।
भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की मेहनत का ही नतीज़ा है कि भाजपा लगातार दो लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत की सरकार बना सकी है। हार और जीत तो राजनीति का हिस्सा है। लोकसभा चुनाव में मिली हार से सबक लेकर राहुल गांधी को एक बार फ़िर से देश की जनता के बीच जाना चाहिए और उनसे चर्चा करके उनके विचारों को जानना चाहिए।
लेकिन ना तो राहुल गांधी देश की जनता से सीधा सम्वाद कर रहे हैं और ना ही विधानसभा चुनावों में अपने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौंसला बढ़ाने के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। भाजपा अजेय नहीं है, भाजपा को भी हराया जा सकता है और भाजपा की भी कई कमजोरियां हैं। लेकिन बजाय भाजपा को उनकी ग़लतियों के लिए घेरने के, राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गये हैं, जिससे उनकी ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नाराज़ हैं।
लोकसभा चुनाव की हार को भूलकर और उससे सीखकर राहुल गांधी को अब आगे भविष्य की तरफ़ देखना चाहिए। लेकिन यदि इसी तरह से नाराज़ और निराश होकर वे जनता से और चुनावों से दूरी बनाएंगे तो जनता उनसे और भी दूर होती चली जाएगी। राजनीति में सब्र बहुत मायने रखता है। इसी सब्र को अपना साथी बनाते हुए राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव की हार से सबक सीखते हुए जनता के बीच जाना चाहिए और भाजपा सरकारों की असफ़लताओं पर उन्हें घेरना चाहिए। यदि राहुल गांधी अभी से ऐसा करेंगे, तो ही 2024 के लोकसभा चुनाव में वे मोदी और शाह की जोड़ी को टक्कर दे पाएंगे।