वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच कहां खड़ी है भारतीय अर्थव्यवस्था?
Friday - October 11, 2019 2:46 pm ,
Category : WTN HINDI
मंदी से प्रभावित हुई भारतीय अर्थव्यवस्था
वैश्विक मंदी से जीडीपी ग्रोथ रेट पर पड़ा नकारात्मक असर
OCT 11 (WTN) – दुकानों में ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे व्यापारी हों या फ़िर गाड़ियों के शोरूम में पसरा सन्नाटा। यह संकेत हैं वैश्विक आर्थिक मंदी के, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक प्रभावित हुई है। वैसे गांवों से लेकर मेट्रो सिटीज़ तक की दुकानों पर ग्राहक इसलिए नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स ने छोटी दुकानों से लेकर मॉल तक के धंधे मंदे कर दिये हैं। लेकिन गाड़ियों के शोरूम पर पसरा सन्नाटा साफ़ दर्शा रहा है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के जकड़ में आ चुका है। लिपस्टिक इंडेक्स और पुरुषों के अण्डरगारमेन्ट्स इंडेक्स भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि भारत में मंदी के कारण अर्थव्यवस्था कछुए की चाल से चल रही है।
वैसे भारत अकेला देश नहीं है जो कि वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं इस समय मंदी से प्रभावित हैं। लेकिन भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार मंदी के निपटने के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है। कॉरपोरेट सेक्टर को राहत देने से लेकर कई उपाय मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए किये हैं। वहीं रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने भी ब्याज दरों में कमी करके बैंकों को राहत दी है कि वे लोन दें। पर इतना सब होने के बाद भी खुली अर्थव्यवस्था होने के कारण वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत अछूता नहीं रह सकता है।
किसी भी देश की सकल घरेलू उत्पाद की दर उस देश के आर्थिक विकास की सूचक होती है। मंदी के चलते समय-समय पर चालू वित्त वर्ष की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान बदलते जा रहे हैं। हाल ही में मूडीज इंवेस्टर्स सर्विस (Moody's Investors Service) ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ग्रोथ रेट (Growth Rate) का अनुमान 6.20 प्रतिशत से घटाकर 5.80 प्रतिशत कर दिया है। इस बारे में मूडीज का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई है, इसलिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को संशोधित किया गया है। मूडीज के अलावा हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने भी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक (MPC) के बाद GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाकर 6.10 प्रतिशत कर दिया है।
वैश्विक आर्थिक मंदी ने हाल फ़िलहाल में तो भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी प्रभावित किया है, और कहा जा रहा है कि इसके दीर्घकालिक परिणाम देखने को मिलेंगे। वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में नरमी का कारण निवेश में कमी है, जो बाद में रोज़गार सृजन में नरमी और ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय संकट के कारण उपभोग में भी प्रभावी हो गया।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि आर्थिक मंदी से वो प्रभावित हो सकती है, लेकिन पटरी से नहीं उतर सकती है। कहा जा रहा है कि अगले साल जून के महीने तक आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर दिखेगा और उसके बाद धीरे-धीरे यह कम होता जाएगा, जिसके बाद भारत समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं फ़िर से गति पकड़ने लगेंगी। मूडीज के मुताबिक़, भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट बाद में तेज़ होकर वित्त वर्ष 2020-21 में 6.6 प्रतिशत और मध्यम अवधि में 7 प्रतिशत के आसपास हो जाएगी।
जानकारों के मुताबिक, चूंकि वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है, इसलिए अगले दो साल तक जीडीपी की वास्तविक ग्रोथ और महंगाई में धीमे सुधार की उम्मीद है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक मंदी और महंगाई में धीमे सुधार के कारण जीडीपी ग्रोथ रेट पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। यदि दो साल पहले की स्थिति से तुलना की जाए, तो जीडीपी ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत या इससे अधिक बने रहने की उम्मीद कम ही हो गई है।
भारतीय रिज़र्व बैंक और मूडीज के अलावा एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भी भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ का अनुमान कम कर दिया है। वहीं रेटिंग एजेंसियों स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स और फिच ने भी जीडीपी ग्रोथ रेट के पूर्वानुमान में कटौती की है। बात करें मूडीज की तो उसने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और कम जीडीपी ग्रोथ रेट के कारण राजकोषीय घाटा सरकार के लक्ष्य से 0.40 प्रतिशत अधिक होने का अनुमान लगाया है। मूडीज के मुताबिक़, इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 3.70 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है।
जानकारों के मुताबिक़, आर्थिक मंदी के चलते अंतर्राष्ट्रीय मानक के हिसाब से वास्तविक जीडीपी में पांच प्रतिशत की वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में यह कम है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल के सालों में मुद्रास्फीति में अच्छी खासी गिरावट के कारण सांकेतिक जीडीपी की वृद्धि दर पिछले दशक के क़रीब 11 प्रतिशत से गिरकर 2019 की दूसरी तिमाही में क़रीब 8 प्रतिशत पर आ गयी है।
लेकिन आर्थिक मंदी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और ख़ासकर ऑटो सेक्टर को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। हालंकि, बीते दो महीनों से मोदी सरकार ने देश की आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए काफ़ी प्रयास किये, और इसके लिए सरकार की ओर से कॉरपोरेट टैक्स में कटौती समेत कई बड़े फ़ैसले लिए गए हैं। लेकिन सरकार की इन कोशिशों के बावजूद ऑटो इण्डस्ट्री की मंदी बरकरार है।
बात करें सितम्बर के महीने की तो इस महीने में कारों की बिक्री एक बार फिर से कम हुई है। आंकड़ों के मुताबिक सितम्बर के महीने में पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 23.69 प्रतिशत गिर गई है तो वहीं कॉमर्शियल व्हीकल्स की बिक्री में 62.11 प्रतिशत की कमी दर्ज़ की गई है।
यानी कि आंकड़े साफ़ बयां कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक मंदी ने अच्छा ख़ासा प्रभावित किया है। वैसे मंदी से निपटने के लिए मोदी सरकार अपने स्तर पर काफ़ी क़दम उठा रही है, लेकिन चूंकि मंदी वैश्विक है इसलिए इसका प्रभाव कम होने और उसके बाद ख़त्म होने में समय लगना लाजिमी है। जानकारों के मुताबिक़, भारतीय अर्थव्यवस्था समय के साथ-साथ आर्थिक मंदी से उबर जाएगी, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि इसके लिए वक़्त कितना लगेगा और यह कितना नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था को पहुंचाकर जाएगी।
OCT 11 (WTN) – दुकानों में ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे व्यापारी हों या फ़िर गाड़ियों के शोरूम में पसरा सन्नाटा। यह संकेत हैं वैश्विक आर्थिक मंदी के, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक प्रभावित हुई है। वैसे गांवों से लेकर मेट्रो सिटीज़ तक की दुकानों पर ग्राहक इसलिए नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स ने छोटी दुकानों से लेकर मॉल तक के धंधे मंदे कर दिये हैं। लेकिन गाड़ियों के शोरूम पर पसरा सन्नाटा साफ़ दर्शा रहा है कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के जकड़ में आ चुका है। लिपस्टिक इंडेक्स और पुरुषों के अण्डरगारमेन्ट्स इंडेक्स भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि भारत में मंदी के कारण अर्थव्यवस्था कछुए की चाल से चल रही है।
वैसे भारत अकेला देश नहीं है जो कि वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं इस समय मंदी से प्रभावित हैं। लेकिन भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर दिख रहा है। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार मंदी के निपटने के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है। कॉरपोरेट सेक्टर को राहत देने से लेकर कई उपाय मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए किये हैं। वहीं रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने भी ब्याज दरों में कमी करके बैंकों को राहत दी है कि वे लोन दें। पर इतना सब होने के बाद भी खुली अर्थव्यवस्था होने के कारण वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत अछूता नहीं रह सकता है।
किसी भी देश की सकल घरेलू उत्पाद की दर उस देश के आर्थिक विकास की सूचक होती है। मंदी के चलते समय-समय पर चालू वित्त वर्ष की जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान बदलते जा रहे हैं। हाल ही में मूडीज इंवेस्टर्स सर्विस (Moody's Investors Service) ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ग्रोथ रेट (Growth Rate) का अनुमान 6.20 प्रतिशत से घटाकर 5.80 प्रतिशत कर दिया है। इस बारे में मूडीज का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई है, इसलिए जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को संशोधित किया गया है। मूडीज के अलावा हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने भी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक (MPC) के बाद GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाकर 6.10 प्रतिशत कर दिया है।
वैश्विक आर्थिक मंदी ने हाल फ़िलहाल में तो भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी प्रभावित किया है, और कहा जा रहा है कि इसके दीर्घकालिक परिणाम देखने को मिलेंगे। वैसे भारतीय अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में नरमी का कारण निवेश में कमी है, जो बाद में रोज़गार सृजन में नरमी और ग्रामीण क्षेत्र में वित्तीय संकट के कारण उपभोग में भी प्रभावी हो गया।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि आर्थिक मंदी से वो प्रभावित हो सकती है, लेकिन पटरी से नहीं उतर सकती है। कहा जा रहा है कि अगले साल जून के महीने तक आर्थिक मंदी का ज़्यादा असर दिखेगा और उसके बाद धीरे-धीरे यह कम होता जाएगा, जिसके बाद भारत समेत दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं फ़िर से गति पकड़ने लगेंगी। मूडीज के मुताबिक़, भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट बाद में तेज़ होकर वित्त वर्ष 2020-21 में 6.6 प्रतिशत और मध्यम अवधि में 7 प्रतिशत के आसपास हो जाएगी।
जानकारों के मुताबिक, चूंकि वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है, इसलिए अगले दो साल तक जीडीपी की वास्तविक ग्रोथ और महंगाई में धीमे सुधार की उम्मीद है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि आर्थिक मंदी और महंगाई में धीमे सुधार के कारण जीडीपी ग्रोथ रेट पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है। यदि दो साल पहले की स्थिति से तुलना की जाए, तो जीडीपी ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत या इससे अधिक बने रहने की उम्मीद कम ही हो गई है।
भारतीय रिज़र्व बैंक और मूडीज के अलावा एशियाई विकास बैंक (ADB) ने भी भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ का अनुमान कम कर दिया है। वहीं रेटिंग एजेंसियों स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर्स और फिच ने भी जीडीपी ग्रोथ रेट के पूर्वानुमान में कटौती की है। बात करें मूडीज की तो उसने कॉरपोरेट टैक्स में कटौती और कम जीडीपी ग्रोथ रेट के कारण राजकोषीय घाटा सरकार के लक्ष्य से 0.40 प्रतिशत अधिक होने का अनुमान लगाया है। मूडीज के मुताबिक़, इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 3.70 प्रतिशत तक पहुंचने की आशंका है।
जानकारों के मुताबिक़, आर्थिक मंदी के चलते अंतर्राष्ट्रीय मानक के हिसाब से वास्तविक जीडीपी में पांच प्रतिशत की वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में यह कम है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल के सालों में मुद्रास्फीति में अच्छी खासी गिरावट के कारण सांकेतिक जीडीपी की वृद्धि दर पिछले दशक के क़रीब 11 प्रतिशत से गिरकर 2019 की दूसरी तिमाही में क़रीब 8 प्रतिशत पर आ गयी है।
लेकिन आर्थिक मंदी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और ख़ासकर ऑटो सेक्टर को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। हालंकि, बीते दो महीनों से मोदी सरकार ने देश की आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए काफ़ी प्रयास किये, और इसके लिए सरकार की ओर से कॉरपोरेट टैक्स में कटौती समेत कई बड़े फ़ैसले लिए गए हैं। लेकिन सरकार की इन कोशिशों के बावजूद ऑटो इण्डस्ट्री की मंदी बरकरार है।
बात करें सितम्बर के महीने की तो इस महीने में कारों की बिक्री एक बार फिर से कम हुई है। आंकड़ों के मुताबिक सितम्बर के महीने में पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 23.69 प्रतिशत गिर गई है तो वहीं कॉमर्शियल व्हीकल्स की बिक्री में 62.11 प्रतिशत की कमी दर्ज़ की गई है।
यानी कि आंकड़े साफ़ बयां कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक मंदी ने अच्छा ख़ासा प्रभावित किया है। वैसे मंदी से निपटने के लिए मोदी सरकार अपने स्तर पर काफ़ी क़दम उठा रही है, लेकिन चूंकि मंदी वैश्विक है इसलिए इसका प्रभाव कम होने और उसके बाद ख़त्म होने में समय लगना लाजिमी है। जानकारों के मुताबिक़, भारतीय अर्थव्यवस्था समय के साथ-साथ आर्थिक मंदी से उबर जाएगी, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि इसके लिए वक़्त कितना लगेगा और यह कितना नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था को पहुंचाकर जाएगी।