बीसीसीआई में चल पाएगी ‘दादा’ की ‘दादागीरी’?
Tuesday - October 15, 2019 1:31 pm ,
Category : WTN HINDI
सौरव गांगुली का बीसीसीआई अध्यक्ष बनना तय
क्या भारतीय क्रिकेट में ऐतिहासिक परिवर्तन कर पाएंगे सौरव गांगुली?
OCT 15 (WTN) – 90 के आख़िरी दशक में भारतीय क्रिकेट टीम संकट के दौर से गुजर रही थी। सालों से मोहम्मद अज़हरूद्दीन टीम के कप्तान थे, लेकिन क्रिकेट को धर्म मानने वाले भारत देश की क्रिकेट टीम वो स्तरीय प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी, जिसकी उम्मीद भारतीय प्रशंसक लगाए बैठे थे। भारतीय क्रिकेट टीम में सचिन तेन्दुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, जवागल श्रीनाथ और अनिल कुम्बले जैसे विश्वस्तरीय खिलाड़ी मौजूद थे। लेकिन जहां तक कप्तानी की बात थी तो इन खिलाड़ियों की अपने खेल में तो महारत थी, लेकिन टीम के कप्तानी के लिए नेतृत्व क्षमता का इनमें अभाव था।
लेकिन इन सबके बीच, सौरव गांगुली के रूप में भारतीय क्रिकेट टीम को एक नया कप्तान मिला, जिसने भारतीय क्रिकेट टीम की पहचान को बदल कर ही रख दिया। क्रिकेट के जानकारों का मानना है कि सौरव गांगुली ने ही भारतीय टीम में जीत के जज्बे को भरा है। सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट टीम में ‘टीम इण्डिया’ के रूप में जीत के लिए एक विनिंग कॉन्सेप्ट तैयार किया। गांगुली ने नये ख़िलाड़ियों को मौक़ा देकर उन्हें भविष्य के लिए तैयार किया। भारतीय क्रिकेट टीम के लिए गांगुली का सबसे बड़ा योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने टीम इण्डिया को जीत के लिए आख़िरी गेंद तक संघर्ष करना सिखाया।
समय के साथ गांगुली ने सक्रिय क्रिकेट से सन्यास ले लिया और इसके बाद वे आईपीएल और कॉमेन्ट्री आदि में नज़र आते रहे। लेकिन अब सौरव गांगुली एक बार फ़िर से क्रिकेट में अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय होने वाले हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि टीम इण्डिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली का भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का नया अध्यक्ष बनना अब तय हो गया है। वैसे तो गांगुली के ख़िलाफ़ अध्यक्ष पद के लिए कोई और नामांकन नहीं है, और इसलिए तकनीकी लिहाज से गांगुली का बोर्ड का अध्यक्ष बनना तय है।
बीसीसीआई अध्यक्ष पद की रेस में पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने बृजेश पटेल को पछाड़ा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बृजेश को बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन.श्रीनिवासन के समर्थन की वजह से अध्यक्ष पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन गांगुली के नाम पर सहमति के बाद उनकी दावेदारी ख़त्म हो गई है। गांगुली, बीसीसीआई के ऐसे दूसरे पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने जा रहे हैं, जो कि क्रिकेटर रहे हैं। यानी कि यह तय है कि सौरव गांगुली ही अब बीसीसीआई के अध्यक्ष होंगे, लेकिन बीसीसीआई का अध्यक्ष बनना गांगुली के लिए जितना आसान है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन है इस पद पर अपनी मर्जी से काम करना।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में क्रिकेट में शुरू से ही राजनीति का दबदबा रहा है और बीसीसीआई का अध्यक्ष पद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बीसीसीआई के 91 सालों के इतिहास में यह सिर्फ़ दूसरा मौक़ा है, जब कोई क्रिकेट खिलाड़ी इसका अध्यक्ष बन रहा है। बीसीसीआई में सालों से राजनीति और कॉरपोरेटर सेक्टर का बोलबाला रहा है। और इसी कारण से सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधार के लिए जस्टिस लोढ़ा कमेटी का गठन भी किया था।
जस्टिस लोढ़ा कमेटी की कई सिफ़ारिशों के बाद बीसीसीआई में पदों की राजनीतिक बंदरबांट पर रोक लगी है, और खिलाड़ियों के लिए बीसीसीआई में प्रशासनिक पदों को पाने का रास्ता भी साफ़ हुआ है। लेकिन इसके बाद भी अभी भी देश में बीसीसीआई समेत अन्य क्रिकेट संघों में भाई-भतीतावाद देखने को मिल रहा है। जैसा कि हमने आपको बताया कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में सुधार के लिए जस्टिस लोढ़ा कमिटी ने कुछ सिफारिशें की थीं। इन सिफारिशों को बोर्ड में लागू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में प्रशासनिक समिति का गठन किया था।
इसी समिति की देखरेख में बीसीसीआई में नया संविधान लागू हुआ और उसी के आधार पर बोर्ड के कामकाज का जिम्मा सम्भालने के लिए नए चेहरों को कमान सम्भालने का मौक़ा दिया गया, लेकिन इस नए बदलाव के बाद भी बोर्ड के कामकाज में कुछ बदलता नज़र नहीं दिख रहा है। पूर्व अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों को बोर्ड में प्रशासनिक पदों पर खड़ा कर दिया है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि अभी भी पूर्व अधिकारियों का वर्चस्व कम होता नहीं दिख रहा है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के लगभग सभी राज्य संघ क्रिकेट इकाइयों का यही हाल है कि जहां पुराने अधिकारियों की जगह जो नए अधिकारी चुने गए हैं, उनमें ज़्यादातर पुराने अधिकारियों के नाते-रिश्तेदार ही हैं। वैसे तो जस्टिस लोढ़ा पैनल की सुझाई गईं सिफारिशों को मान लिया गया है, और जो नाम यहां सालों से बोर्ड का संचालन करने में लगे हुए थे उन्हें अब आराम दिया गया है। वैसे बोर्ड में अपनी अगली पारी के लिए उन्हें अब इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से बोर्ड में उनकी ताक़त कम होती नहीं दिख रही।
साफ़ ज़ाहिर है कि सौरव गांगुली के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे सालों से बीसीसीआई में जारी भाई भतीजावाद पर अंकुश लगाएं। वहीं गांगुली के सामने टीम इण्डिया में कथित रूप से चल रही लॉबिंग पर लगाम लगाने की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। आरोप है कि टीम चयन में विराट कोहली अपने चहेते खिलाड़ियों के सलेक्शन के लिए दबाव बनाते हैं। ऐसे में देखना होगा कि टीम इण्डिया में क्या अब योग्यता के आधार पर चयन होगा या फ़िर सिफ़ारिश के आधार पर?
जैसा कि आप जानते हैं कि गांगुली ख़ुद एक सफ़ल कप्तान रह चुके हैं, ऐसे में गांगुली पर दबाव रहेगा कि वे भारतीय क्रिकेट टीम को देश और विदेश में जीत के लिए समय-समय पर सुझाव देते रहें। वहीं मैच फिक्सिंग से भारतीय क्रिकेट को दूर रखना और आईपीएल को बिना किसी विवाद के सम्पन्न करना भी सौरव गांगुली की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी रहेगी। अब देखना होगा कि सौरव गांगुली अपनी नई ज़िम्मेदारी में कितना खरा उतर पाते हैं?
OCT 15 (WTN) – 90 के आख़िरी दशक में भारतीय क्रिकेट टीम संकट के दौर से गुजर रही थी। सालों से मोहम्मद अज़हरूद्दीन टीम के कप्तान थे, लेकिन क्रिकेट को धर्म मानने वाले भारत देश की क्रिकेट टीम वो स्तरीय प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी, जिसकी उम्मीद भारतीय प्रशंसक लगाए बैठे थे। भारतीय क्रिकेट टीम में सचिन तेन्दुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, जवागल श्रीनाथ और अनिल कुम्बले जैसे विश्वस्तरीय खिलाड़ी मौजूद थे। लेकिन जहां तक कप्तानी की बात थी तो इन खिलाड़ियों की अपने खेल में तो महारत थी, लेकिन टीम के कप्तानी के लिए नेतृत्व क्षमता का इनमें अभाव था।
लेकिन इन सबके बीच, सौरव गांगुली के रूप में भारतीय क्रिकेट टीम को एक नया कप्तान मिला, जिसने भारतीय क्रिकेट टीम की पहचान को बदल कर ही रख दिया। क्रिकेट के जानकारों का मानना है कि सौरव गांगुली ने ही भारतीय टीम में जीत के जज्बे को भरा है। सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट टीम में ‘टीम इण्डिया’ के रूप में जीत के लिए एक विनिंग कॉन्सेप्ट तैयार किया। गांगुली ने नये ख़िलाड़ियों को मौक़ा देकर उन्हें भविष्य के लिए तैयार किया। भारतीय क्रिकेट टीम के लिए गांगुली का सबसे बड़ा योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने टीम इण्डिया को जीत के लिए आख़िरी गेंद तक संघर्ष करना सिखाया।
समय के साथ गांगुली ने सक्रिय क्रिकेट से सन्यास ले लिया और इसके बाद वे आईपीएल और कॉमेन्ट्री आदि में नज़र आते रहे। लेकिन अब सौरव गांगुली एक बार फ़िर से क्रिकेट में अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय होने वाले हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि टीम इण्डिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली का भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का नया अध्यक्ष बनना अब तय हो गया है। वैसे तो गांगुली के ख़िलाफ़ अध्यक्ष पद के लिए कोई और नामांकन नहीं है, और इसलिए तकनीकी लिहाज से गांगुली का बोर्ड का अध्यक्ष बनना तय है।
बीसीसीआई अध्यक्ष पद की रेस में पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने बृजेश पटेल को पछाड़ा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बृजेश को बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन.श्रीनिवासन के समर्थन की वजह से अध्यक्ष पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन गांगुली के नाम पर सहमति के बाद उनकी दावेदारी ख़त्म हो गई है। गांगुली, बीसीसीआई के ऐसे दूसरे पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने जा रहे हैं, जो कि क्रिकेटर रहे हैं। यानी कि यह तय है कि सौरव गांगुली ही अब बीसीसीआई के अध्यक्ष होंगे, लेकिन बीसीसीआई का अध्यक्ष बनना गांगुली के लिए जितना आसान है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन है इस पद पर अपनी मर्जी से काम करना।
जैसा कि आप जानते हैं कि भारत में क्रिकेट में शुरू से ही राजनीति का दबदबा रहा है और बीसीसीआई का अध्यक्ष पद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बीसीसीआई के 91 सालों के इतिहास में यह सिर्फ़ दूसरा मौक़ा है, जब कोई क्रिकेट खिलाड़ी इसका अध्यक्ष बन रहा है। बीसीसीआई में सालों से राजनीति और कॉरपोरेटर सेक्टर का बोलबाला रहा है। और इसी कारण से सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई में सुधार के लिए जस्टिस लोढ़ा कमेटी का गठन भी किया था।
जस्टिस लोढ़ा कमेटी की कई सिफ़ारिशों के बाद बीसीसीआई में पदों की राजनीतिक बंदरबांट पर रोक लगी है, और खिलाड़ियों के लिए बीसीसीआई में प्रशासनिक पदों को पाने का रास्ता भी साफ़ हुआ है। लेकिन इसके बाद भी अभी भी देश में बीसीसीआई समेत अन्य क्रिकेट संघों में भाई-भतीतावाद देखने को मिल रहा है। जैसा कि हमने आपको बताया कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में सुधार के लिए जस्टिस लोढ़ा कमिटी ने कुछ सिफारिशें की थीं। इन सिफारिशों को बोर्ड में लागू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में प्रशासनिक समिति का गठन किया था।
इसी समिति की देखरेख में बीसीसीआई में नया संविधान लागू हुआ और उसी के आधार पर बोर्ड के कामकाज का जिम्मा सम्भालने के लिए नए चेहरों को कमान सम्भालने का मौक़ा दिया गया, लेकिन इस नए बदलाव के बाद भी बोर्ड के कामकाज में कुछ बदलता नज़र नहीं दिख रहा है। पूर्व अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों को बोर्ड में प्रशासनिक पदों पर खड़ा कर दिया है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि अभी भी पूर्व अधिकारियों का वर्चस्व कम होता नहीं दिख रहा है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक़, देश के लगभग सभी राज्य संघ क्रिकेट इकाइयों का यही हाल है कि जहां पुराने अधिकारियों की जगह जो नए अधिकारी चुने गए हैं, उनमें ज़्यादातर पुराने अधिकारियों के नाते-रिश्तेदार ही हैं। वैसे तो जस्टिस लोढ़ा पैनल की सुझाई गईं सिफारिशों को मान लिया गया है, और जो नाम यहां सालों से बोर्ड का संचालन करने में लगे हुए थे उन्हें अब आराम दिया गया है। वैसे बोर्ड में अपनी अगली पारी के लिए उन्हें अब इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से बोर्ड में उनकी ताक़त कम होती नहीं दिख रही।
साफ़ ज़ाहिर है कि सौरव गांगुली के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे सालों से बीसीसीआई में जारी भाई भतीजावाद पर अंकुश लगाएं। वहीं गांगुली के सामने टीम इण्डिया में कथित रूप से चल रही लॉबिंग पर लगाम लगाने की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। आरोप है कि टीम चयन में विराट कोहली अपने चहेते खिलाड़ियों के सलेक्शन के लिए दबाव बनाते हैं। ऐसे में देखना होगा कि टीम इण्डिया में क्या अब योग्यता के आधार पर चयन होगा या फ़िर सिफ़ारिश के आधार पर?
जैसा कि आप जानते हैं कि गांगुली ख़ुद एक सफ़ल कप्तान रह चुके हैं, ऐसे में गांगुली पर दबाव रहेगा कि वे भारतीय क्रिकेट टीम को देश और विदेश में जीत के लिए समय-समय पर सुझाव देते रहें। वहीं मैच फिक्सिंग से भारतीय क्रिकेट को दूर रखना और आईपीएल को बिना किसी विवाद के सम्पन्न करना भी सौरव गांगुली की बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी रहेगी। अब देखना होगा कि सौरव गांगुली अपनी नई ज़िम्मेदारी में कितना खरा उतर पाते हैं?