मोदी सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाती रिपोर्ट
Wednesday - October 16, 2019 10:29 am ,
Category : WTN HINDI
भारत में कुपोषण और भुखमरी पहुंची चिंताजनक स्तर पर
ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने बढ़ाई प्रधानमंत्री मोदी की ‘चिंता’
OCT 16 (WTN) – भारत जैसे धार्मिक देश में जहां पर अन्न को ईश्वर माना गया है, उस देश में यदि बच्चे कुपोषित और भूखे हों तो चिन्ता होना और सवाल उठने स्वाभाविक हैं। भारत में अन्नदान की प्राचीन परम्परा रही है, लेकिन उसी भारत के लिए ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 की रिपोर्ट सोचने के लिए मजबूर कर रही है। एक सभ्य इंसान की ईश्वर से यही प्रार्थना होती है कि कोई भी भूखा और प्यासा ना रहे। ख़ैर आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देने वाले पाकिस्तान की ग़रीबी की भारतीय बहुत हंसी उड़ाते हैं। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बच्चे पाकिस्तान के बच्चों से भी ज़्यादा भूखे और कुपोषित हैं!
यह पढ़कर आपको आश्चर्य ज़रूर हुआ होगा, लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 के मुताबिक़, भारत 117 देशों की रैंकिंग में 102 पायदान पर है। और भारत से कहीं बेहतर स्थिति में कई अन्य एशियाई देश हैं। जैसे चीन 25वें, पाकिस्तान 94वें, बांग्लादेश 88वें, नेपाल 73वें, म्यांमार 69वें और श्रीलंका 66 वें पायदान पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग में 100 अंकों के आधार पर किसी भी देश की रैंकिंग की जाती है। इस रिपोर्ट में भारत का स्कोर 30.3 है, जो इसे सीरियस हंगर कैटेगरी में लाता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 रिपोर्ट को Welthungerhilfe और Concern Worldwide नाम की संस्था ने तैयार किया है। रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल है, जहां भूख को लेकर स्थिति गम्भीर चिंताजनक है।
साल 2014 से लेकर अभी तक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग गिरती ही आई है। यह सही बात है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई क्षेत्रों में उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स में लगातार गिरती भारत की रैंकिंग से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मोदी सरकार को इस क्षेत्र में असफ़लता ही हाथ लगी है। मोदी सरकार मानवीय विकास के कितने भी दावे कर ले, लेकिन सच्चाई है कि साल 2015 से 2019 तक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है, जो कि मोदी सरकार के लिए चिंता का एक बहुत कारण होना चाहिए।
साल 2014 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 77 देशों की रैंकिंग में 55 वी पायदान पर था। लेकिन साल 2015 में भारत की रैंकिंग 93 हो गई। तो वहीं साल 2016 में भारत की रैंकिंग गिरकर 97 पहुंच गई। वहीं साल 2017 में भारत 100वें पायदान पर पहुंच गया तो साल 2018 में भारत की रैंकिंग और भी गिर गई और भारत 103वें स्थान पर पहुंच गया। आंकड़े साफ़ बताते हैं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में बच्चों में कुपोषण और भुखमरी को कम करने के काम में असफ़लता ही हाथ लगी है।
ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है। देश में 20.8 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास नहीं हो पाता है और इसकी बड़ी वजह कुपोषण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 6 से 23 महीनों के बच्चों में मात्र 9.6% बच्चों को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार खिलाया जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हंगर इंडेक्स वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भूख को मापने का एक पैमाना है। यह इंडेक्स दुनिया भर में कुपोषण और भूख को चार पैमानों पर रिकॉर्ड करता है। ये आंकड़े हैं कुपोषण, बाल मृत्युदर, उम्र के अनुपात में कम विकास और लम्बाई के अनुपात में कम वजन।
तो आंकड़े बता रहे हैं कि भुखमरी और कुपोषण को लेकर भारत में संकट बरकरार है। लेकिन सवाल उठता है कि जब मोदी सरकार डायरेक्ट बेनिफिट योजना से ग़रीबों के पास सीधा पैसा पहुंच रही है, तो फ़िर भुखमरी को लेकर यह हालात कैसे पैदा हुए? वैसे विचार करने वाली बात है कि जिस देश में अन्न को भगवान माना जाता है उसी देश में भुखमरी है? माना कि भुखमरी के लिए सरकार ज़िम्मेदार है, लेकिन कुपोषण के लिए हम भारतीय भी कुछ कम ज़िम्मेदार नहीं हैं।
दरअसल, बच्चों को किस तरह का पोषण देना चाहिए इसके बारे में अधिकांश भारतीय माता-पिता को जानकारी ही नहीं होती है। जानकारी के अभाव में टीवी पर दिखाए गये विज्ञापनों की बातों को सच मानकर भारतीय माता-पिता उसी हिसाब से अपने बच्चों को पोषण देते हैं। आपके बच्चों की बेहतरी इसी में है कि आप विज्ञापनों के भ्रम में ना आएं, और किसी न्यूट्रिशयन से सलाह लेकर अपने बच्चों को उचित पोषण दें।
OCT 16 (WTN) – भारत जैसे धार्मिक देश में जहां पर अन्न को ईश्वर माना गया है, उस देश में यदि बच्चे कुपोषित और भूखे हों तो चिन्ता होना और सवाल उठने स्वाभाविक हैं। भारत में अन्नदान की प्राचीन परम्परा रही है, लेकिन उसी भारत के लिए ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 की रिपोर्ट सोचने के लिए मजबूर कर रही है। एक सभ्य इंसान की ईश्वर से यही प्रार्थना होती है कि कोई भी भूखा और प्यासा ना रहे। ख़ैर आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देने वाले पाकिस्तान की ग़रीबी की भारतीय बहुत हंसी उड़ाते हैं। लेकिन आपको जानकार आश्चर्य होगा कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बच्चे पाकिस्तान के बच्चों से भी ज़्यादा भूखे और कुपोषित हैं!
यह पढ़कर आपको आश्चर्य ज़रूर हुआ होगा, लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 के मुताबिक़, भारत 117 देशों की रैंकिंग में 102 पायदान पर है। और भारत से कहीं बेहतर स्थिति में कई अन्य एशियाई देश हैं। जैसे चीन 25वें, पाकिस्तान 94वें, बांग्लादेश 88वें, नेपाल 73वें, म्यांमार 69वें और श्रीलंका 66 वें पायदान पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग में 100 अंकों के आधार पर किसी भी देश की रैंकिंग की जाती है। इस रिपोर्ट में भारत का स्कोर 30.3 है, जो इसे सीरियस हंगर कैटेगरी में लाता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2019 रिपोर्ट को Welthungerhilfe और Concern Worldwide नाम की संस्था ने तैयार किया है। रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया के उन 45 देशों में शामिल है, जहां भूख को लेकर स्थिति गम्भीर चिंताजनक है।
साल 2014 से लेकर अभी तक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग गिरती ही आई है। यह सही बात है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई क्षेत्रों में उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स में लगातार गिरती भारत की रैंकिंग से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मोदी सरकार को इस क्षेत्र में असफ़लता ही हाथ लगी है। मोदी सरकार मानवीय विकास के कितने भी दावे कर ले, लेकिन सच्चाई है कि साल 2015 से 2019 तक ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है, जो कि मोदी सरकार के लिए चिंता का एक बहुत कारण होना चाहिए।
साल 2014 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 77 देशों की रैंकिंग में 55 वी पायदान पर था। लेकिन साल 2015 में भारत की रैंकिंग 93 हो गई। तो वहीं साल 2016 में भारत की रैंकिंग गिरकर 97 पहुंच गई। वहीं साल 2017 में भारत 100वें पायदान पर पहुंच गया तो साल 2018 में भारत की रैंकिंग और भी गिर गई और भारत 103वें स्थान पर पहुंच गया। आंकड़े साफ़ बताते हैं कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में बच्चों में कुपोषण और भुखमरी को कम करने के काम में असफ़लता ही हाथ लगी है।
ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के बच्चों में कुपोषण की स्थिति भयावह है। देश में 20.8 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण शारीरिक विकास नहीं हो पाता है और इसकी बड़ी वजह कुपोषण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 6 से 23 महीनों के बच्चों में मात्र 9.6% बच्चों को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार खिलाया जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हंगर इंडेक्स वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भूख को मापने का एक पैमाना है। यह इंडेक्स दुनिया भर में कुपोषण और भूख को चार पैमानों पर रिकॉर्ड करता है। ये आंकड़े हैं कुपोषण, बाल मृत्युदर, उम्र के अनुपात में कम विकास और लम्बाई के अनुपात में कम वजन।
तो आंकड़े बता रहे हैं कि भुखमरी और कुपोषण को लेकर भारत में संकट बरकरार है। लेकिन सवाल उठता है कि जब मोदी सरकार डायरेक्ट बेनिफिट योजना से ग़रीबों के पास सीधा पैसा पहुंच रही है, तो फ़िर भुखमरी को लेकर यह हालात कैसे पैदा हुए? वैसे विचार करने वाली बात है कि जिस देश में अन्न को भगवान माना जाता है उसी देश में भुखमरी है? माना कि भुखमरी के लिए सरकार ज़िम्मेदार है, लेकिन कुपोषण के लिए हम भारतीय भी कुछ कम ज़िम्मेदार नहीं हैं।
दरअसल, बच्चों को किस तरह का पोषण देना चाहिए इसके बारे में अधिकांश भारतीय माता-पिता को जानकारी ही नहीं होती है। जानकारी के अभाव में टीवी पर दिखाए गये विज्ञापनों की बातों को सच मानकर भारतीय माता-पिता उसी हिसाब से अपने बच्चों को पोषण देते हैं। आपके बच्चों की बेहतरी इसी में है कि आप विज्ञापनों के भ्रम में ना आएं, और किसी न्यूट्रिशयन से सलाह लेकर अपने बच्चों को उचित पोषण दें।