मेगा प्रोजेक्ट्स के ज़रिये नेपाल में ‘सेंधमारी’ की कोशिश करता चीन
Monday - October 21, 2019 2:13 pm ,
Category : WTN HINDI
भारत को ‘घेरने’ चीन बढ़ा रहा नेपाल से दोस्ती
चीन की ‘शिकार नीति’ का अगला निशाना बनता नेपाल!
OCT 21 (WTN) – पूरी दुनिया यह जान चुकी है कि चीन एक विस्तारवादी मानसिकता वाला महत्वाकांक्षी देश है। आर्थिक और सामरिक रूप से कमज़ोर देशों पर चीन अब अपनी आर्थिक शक्ति के ज़रिये उन पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका समते कई अफ्रीकी देश चीन की इसी नीति का शिकार हो चुके हैं, या फ़िर हो रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि चीन का रुख़ हमेशा से ही भारत विरोधी रही है, इसी कड़ी में भारत के पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने की चीन लगातार हरसम्भव कोशिशें करता रहता है। चीन की इसी शिकार नीति का अगला निशाना बन रहा है नेपाल।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाक़ात के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेपाल का दौरा किया था। जिनपिंग का नेपाल दौरा चीन के लिए कूटनीतिक रूप से काफ़ी अहम था। चीन अब नेपाल में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए उसे अपने झांसे में ले रहा है। कूटनीतिक रूप से शी जिनपिंग के लिए नेपाल इतना महत्वपूर्ण है कि 1996 के बाद नेपाल की यात्रा करने वाले जिनपिंग पहले चीनी राष्ट्रपति हैं।
वैसे फ़िलहाल नेपाल में चीन ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव की तुलना में बहुत कम निवेश किया है, लेकिन जल्द ही नेपाल में चीन बहुत बड़ा निवेश करने वाला है। नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) ने चीन के सहयोग में 11 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का ड्राफ्ट रिलीज़ किया था, जिसमें ज़्यादातर परियोजनाएं सड़कों और बिजली से जुड़ी हुई हैं।
वैसे तो नेपाल आधिकारिक तौर पर चीन की महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एण्ड रोड में शामिल होने की घोषणा बहुत पहले कर चुका है, लेकिन फण्डिंग को लेकर चीन और नेपाल के बीच मतभेद होने से परियोजनाएं शुरू होने में देरी हो रही थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जहां नेपाल ज़्यादा से ज़्यादा अनुदान राशि चाहता था, तो वहीं नेपाल में चीन ज़्यादातर क़र्ज़ के ज़रिए निवेश करना चाहता है।
वैसे चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एण्ड रोड परियोजना के बारे में पुरी दुनिया जानती है कि चीन इस परियोजना के ज़रिये ख़ुद का आर्थिक स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। लेकिन इतना सब जानने के बाद भी नेपाल इस परियोजना में शामिल होने का इच्छुक है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन ने अपनी बेल्ट एण्ड रोड परियोजना के तहत कई देशों को क़र्ज़ के जाल में फंसाना चाहता है।
लेकिन नेपाल की जनता का मानना है कि चीन की बेल्ट एण्ड रोड परियोजना से नेपाल में रेल, रोड और अन्य परियोजनाओं का विस्तार होगा, जिससे नेपाल की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा और वो आगे बढ़ेगी। दरअसल, भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच नेपाल की स्थिति एक बफर स्टेट की तरह है। वैसे सांस्कृतिक रूप से नेपाल, भारत के क़रीब रहा है लेकिन अब चीन, नेपाल में अपनी दखलंदाज़ी करने लगा है।
नेपाल के बाज़ार अब चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं। नेपाली लोगों की ज़रूरत का जो भी सामान है वो सब कुछ चीन बनाता है। इसलिए नेपाल अब चीन के क़रीब होता जा रहा है। हालांकि, नेपाल पेट्रोल-डीज़ल के लिए अभी भी भारत पर ही निर्भर है। लेकिन चीन अब धीरे-धीरे नेपालियों को यह बात समझने में सफ़ल हो गया है कि नेपाल का विकास चीन अच्छी तरह से कर सकता है। नेपाल की सरकार भी अब कूटनीति के तहत भारत पर निर्भर रहने के बजाय चीन के साथ भी सम्बन्धों को बढ़ाने में लगी हुई है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सांस्कृतिक रूप से प्राचीन सम्बन्ध होने के बाद भी भारत और नेपाल के बीच भारत की आज़ादी के बाद से ही विवाद होते रहे हैं। नेपाल का आरोप है कि साल 1947 के बाद से नेपाल की घरेलू राजनीति और विदेश नीति में भारत हस्तक्षेप करता रहा है। साल 1962 और 1989 में ब्लॉकेड और साल 2015 के मवेशियों के मुद्दे को लेकर नेपाल और भारत के बीच हुए विवाद के बाद से दोनों देशों के बीच दूरियां पैदा हो गई हैं।
कहा जाता है कि 2015 में अनाधिकारिक तौर पर भारत द्वारा किये गये ब्लॉकेड के बाद से नेपाल ने चीन के साथ सम्बन्ध मज़बूत करने की नीति पर काम करना शुरू किया है। नेपाल की सरकार का सोचना है कि भविष्य में भारत द्वारा ब्लॉकेड की स्थिति में काठमाण्डू और चीन के बीच की ट्रेन परियोजनाएं नेपाल को संकट की हर स्थिति से उबारेंगी। इसी कारण से साल 2015 के बाद से नेपाल में चीन का सहयोग और निवेश दोनों ही बढ़ा है।
साल 2015 में नेपाल में आए भूकम्प के बाद से चीन ने नेपाल में कई क्षेत्रों में काम किया है। दरअसल, चीन की कूटिल कूटनीति से अंजान नेपाली लोगों का मानना है कि चीन, भारत की तुलना में एक बेहतर दोस्त साबित होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि नेपाल की जनता को यह बात समझाने में चीन सफ़ल हो गया है कि भारत, नेपाल के आंतरिक और विदेशी मामलों में हस्तक्षेप करता है।
वैसे नेपाल के लोगों को अभी भ्रम है कि चीन अपनी संस्कृति किसी देश पर थोपता नहीं है, वहीं नेपाल के लोगों को यह भी भ्रम है कि चीन आने वाले समय में नेपाल पर हावी नहीं होगा। चीन धीरे-धीरे नेपाली लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि भारत कुछ पाने की ख़्वाहिश में नेपाल की मदद करता है, जबकि चीन एक उदार देश है और उसकी मंशा भारत की तरह नहीं है।
दरअसल, चीन रणनीतिक तरीक़े से किसी भी देश को अपने क़र्ज़ के जाल में फंसाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वर्ल्ड बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थाएं और पश्चिमी देश जब किसी देश को क़र्ज़ देते हैं, तो यह क़र्ज़ देने के साथ पारदर्शिता रखने और संरचनात्मक सुधार की शर्तें रखते हैं। वहीं चीन क़र्ज़ देते समय इसी तरह की शर्तों के बजाय ख़ुद का व्यापार बढ़ाने और उस देश की विदेश नीति में दखल देने में ज़्यादा दिलचल्पी रखता है। लेकिन नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार चीन की चालाकी को चीन की भलाई समझ रही है।
चीन की नेपाल को दी जा रही सहायता के पीछे एक बड़ा कारण है तिब्बती शरणार्थी भी हैं। दरअसल, मौक़ा और समय देखकर तिब्बती शरणार्थी चीन का विरोध करते आए हैं। इस समय नेपाल में क़रीब 15 से 20 हज़ार तिब्बली शरणार्थी रहते हैं। अपने ख़िलाफ़ उठी हर आवाज़ को दबाने की मंशा रखने वाला चीन नहीं चाहता है कि नेपाल की ज़मीन से तिब्बती शरणार्थी किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन चीन के ख़िलाफ़ करें। इसलिए नेपाल को मदद देकर चीन तिब्बती शरणार्थियों की आवाज़ दबाना चाहता है।
अब देखना होगा कि चीन की चालाकी से नेपाल कब तक वाक़िफ़ होता है? अपने पुराने दोस्त पाकिस्तान को चीन ने सीपीईसी प्रोजेक्ट के तहत भारी क़र्ज़ में डूबो दिया है। लेकिन अब पाकिस्तान की सेना और वहां के अधिकारी चीन की आर्थिक चालाकी को समझ गये हैं, और चीन के महत्वाकांक्षी सीपीईसी प्रोजेक्ट को पूरा करने में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि चीन के क़र्ज़ के जाल में फंसने के बाद नेपाल को चीन की चालाकी का पता चलेगा, या फ़िर पाकिस्तान समेत अन्य देशों के उदाहरण से नेपाल कुछ सबक लेगा?
OCT 21 (WTN) – पूरी दुनिया यह जान चुकी है कि चीन एक विस्तारवादी मानसिकता वाला महत्वाकांक्षी देश है। आर्थिक और सामरिक रूप से कमज़ोर देशों पर चीन अब अपनी आर्थिक शक्ति के ज़रिये उन पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका समते कई अफ्रीकी देश चीन की इसी नीति का शिकार हो चुके हैं, या फ़िर हो रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि चीन का रुख़ हमेशा से ही भारत विरोधी रही है, इसी कड़ी में भारत के पड़ोसी देशों को अपने पक्ष में करने की चीन लगातार हरसम्भव कोशिशें करता रहता है। चीन की इसी शिकार नीति का अगला निशाना बन रहा है नेपाल।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाक़ात के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेपाल का दौरा किया था। जिनपिंग का नेपाल दौरा चीन के लिए कूटनीतिक रूप से काफ़ी अहम था। चीन अब नेपाल में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए उसे अपने झांसे में ले रहा है। कूटनीतिक रूप से शी जिनपिंग के लिए नेपाल इतना महत्वपूर्ण है कि 1996 के बाद नेपाल की यात्रा करने वाले जिनपिंग पहले चीनी राष्ट्रपति हैं।
वैसे फ़िलहाल नेपाल में चीन ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव की तुलना में बहुत कम निवेश किया है, लेकिन जल्द ही नेपाल में चीन बहुत बड़ा निवेश करने वाला है। नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) ने चीन के सहयोग में 11 इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का ड्राफ्ट रिलीज़ किया था, जिसमें ज़्यादातर परियोजनाएं सड़कों और बिजली से जुड़ी हुई हैं।
वैसे तो नेपाल आधिकारिक तौर पर चीन की महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एण्ड रोड में शामिल होने की घोषणा बहुत पहले कर चुका है, लेकिन फण्डिंग को लेकर चीन और नेपाल के बीच मतभेद होने से परियोजनाएं शुरू होने में देरी हो रही थी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जहां नेपाल ज़्यादा से ज़्यादा अनुदान राशि चाहता था, तो वहीं नेपाल में चीन ज़्यादातर क़र्ज़ के ज़रिए निवेश करना चाहता है।
वैसे चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एण्ड रोड परियोजना के बारे में पुरी दुनिया जानती है कि चीन इस परियोजना के ज़रिये ख़ुद का आर्थिक स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। लेकिन इतना सब जानने के बाद भी नेपाल इस परियोजना में शामिल होने का इच्छुक है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चीन ने अपनी बेल्ट एण्ड रोड परियोजना के तहत कई देशों को क़र्ज़ के जाल में फंसाना चाहता है।
लेकिन नेपाल की जनता का मानना है कि चीन की बेल्ट एण्ड रोड परियोजना से नेपाल में रेल, रोड और अन्य परियोजनाओं का विस्तार होगा, जिससे नेपाल की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा और वो आगे बढ़ेगी। दरअसल, भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच नेपाल की स्थिति एक बफर स्टेट की तरह है। वैसे सांस्कृतिक रूप से नेपाल, भारत के क़रीब रहा है लेकिन अब चीन, नेपाल में अपनी दखलंदाज़ी करने लगा है।
नेपाल के बाज़ार अब चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं। नेपाली लोगों की ज़रूरत का जो भी सामान है वो सब कुछ चीन बनाता है। इसलिए नेपाल अब चीन के क़रीब होता जा रहा है। हालांकि, नेपाल पेट्रोल-डीज़ल के लिए अभी भी भारत पर ही निर्भर है। लेकिन चीन अब धीरे-धीरे नेपालियों को यह बात समझने में सफ़ल हो गया है कि नेपाल का विकास चीन अच्छी तरह से कर सकता है। नेपाल की सरकार भी अब कूटनीति के तहत भारत पर निर्भर रहने के बजाय चीन के साथ भी सम्बन्धों को बढ़ाने में लगी हुई है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सांस्कृतिक रूप से प्राचीन सम्बन्ध होने के बाद भी भारत और नेपाल के बीच भारत की आज़ादी के बाद से ही विवाद होते रहे हैं। नेपाल का आरोप है कि साल 1947 के बाद से नेपाल की घरेलू राजनीति और विदेश नीति में भारत हस्तक्षेप करता रहा है। साल 1962 और 1989 में ब्लॉकेड और साल 2015 के मवेशियों के मुद्दे को लेकर नेपाल और भारत के बीच हुए विवाद के बाद से दोनों देशों के बीच दूरियां पैदा हो गई हैं।
कहा जाता है कि 2015 में अनाधिकारिक तौर पर भारत द्वारा किये गये ब्लॉकेड के बाद से नेपाल ने चीन के साथ सम्बन्ध मज़बूत करने की नीति पर काम करना शुरू किया है। नेपाल की सरकार का सोचना है कि भविष्य में भारत द्वारा ब्लॉकेड की स्थिति में काठमाण्डू और चीन के बीच की ट्रेन परियोजनाएं नेपाल को संकट की हर स्थिति से उबारेंगी। इसी कारण से साल 2015 के बाद से नेपाल में चीन का सहयोग और निवेश दोनों ही बढ़ा है।
साल 2015 में नेपाल में आए भूकम्प के बाद से चीन ने नेपाल में कई क्षेत्रों में काम किया है। दरअसल, चीन की कूटिल कूटनीति से अंजान नेपाली लोगों का मानना है कि चीन, भारत की तुलना में एक बेहतर दोस्त साबित होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि नेपाल की जनता को यह बात समझाने में चीन सफ़ल हो गया है कि भारत, नेपाल के आंतरिक और विदेशी मामलों में हस्तक्षेप करता है।
वैसे नेपाल के लोगों को अभी भ्रम है कि चीन अपनी संस्कृति किसी देश पर थोपता नहीं है, वहीं नेपाल के लोगों को यह भी भ्रम है कि चीन आने वाले समय में नेपाल पर हावी नहीं होगा। चीन धीरे-धीरे नेपाली लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि भारत कुछ पाने की ख़्वाहिश में नेपाल की मदद करता है, जबकि चीन एक उदार देश है और उसकी मंशा भारत की तरह नहीं है।
दरअसल, चीन रणनीतिक तरीक़े से किसी भी देश को अपने क़र्ज़ के जाल में फंसाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वर्ल्ड बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थाएं और पश्चिमी देश जब किसी देश को क़र्ज़ देते हैं, तो यह क़र्ज़ देने के साथ पारदर्शिता रखने और संरचनात्मक सुधार की शर्तें रखते हैं। वहीं चीन क़र्ज़ देते समय इसी तरह की शर्तों के बजाय ख़ुद का व्यापार बढ़ाने और उस देश की विदेश नीति में दखल देने में ज़्यादा दिलचल्पी रखता है। लेकिन नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार चीन की चालाकी को चीन की भलाई समझ रही है।
चीन की नेपाल को दी जा रही सहायता के पीछे एक बड़ा कारण है तिब्बती शरणार्थी भी हैं। दरअसल, मौक़ा और समय देखकर तिब्बती शरणार्थी चीन का विरोध करते आए हैं। इस समय नेपाल में क़रीब 15 से 20 हज़ार तिब्बली शरणार्थी रहते हैं। अपने ख़िलाफ़ उठी हर आवाज़ को दबाने की मंशा रखने वाला चीन नहीं चाहता है कि नेपाल की ज़मीन से तिब्बती शरणार्थी किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन चीन के ख़िलाफ़ करें। इसलिए नेपाल को मदद देकर चीन तिब्बती शरणार्थियों की आवाज़ दबाना चाहता है।
अब देखना होगा कि चीन की चालाकी से नेपाल कब तक वाक़िफ़ होता है? अपने पुराने दोस्त पाकिस्तान को चीन ने सीपीईसी प्रोजेक्ट के तहत भारी क़र्ज़ में डूबो दिया है। लेकिन अब पाकिस्तान की सेना और वहां के अधिकारी चीन की आर्थिक चालाकी को समझ गये हैं, और चीन के महत्वाकांक्षी सीपीईसी प्रोजेक्ट को पूरा करने में कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि चीन के क़र्ज़ के जाल में फंसने के बाद नेपाल को चीन की चालाकी का पता चलेगा, या फ़िर पाकिस्तान समेत अन्य देशों के उदाहरण से नेपाल कुछ सबक लेगा?