चीन की शिक्षा प्रणाली ही उसे बनाती है भारत से अलग और विकसित
Friday - October 25, 2019 10:47 am ,
Category : WTN HINDI
काफ़ी व्यवस्थित है चीन की शिक्षा व्यवस्था
अपनी शिक्षा व्यवस्था के दम पर ही चीन कर रहा है प्रगति
OCT 25 (WTN) – आज से क़रीब 40 साल पहले चीन की जीडीपी अफ्रीकन देश जाम्बिया के बराबर थी। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश चीन ग़रीबी और अशिक्षा के कारण विकसित देशों से काफ़ी पीछे था। एकदलीय साम्यवादी व्यवस्था के कारण चीनी लोग दुनिया के अन्य लोगों से ज़्यादा सम्पर्क में नहीं थे, जिसके कारण चीन के लोग पिछड़े और ग़रीब थे। लेकिन समय के साथ चीन ने ख़ुद को बदला और आज चीन 11 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
कभी जाम्बिया के बराबर जीडीपी वाला देश चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ऐसे ही नहीं बन गया है। चीन की आर्थिक प्रगति में वहां की शिक्षा प्रणाली का काफ़ी बड़ा योगदान रहा है। यदि भारत से चीन की शिक्षा प्रणाली की तुलना की जाए, तो चीन की शिक्षा प्रणाली भारतीय शिक्षा प्रणाली से काफ़ी अलग, व्यवस्थित और विकसित है। स्कूली शिक्षा से लेकर तकनीकी शिक्षा तक, हर मामले में चीन की शिक्षा प्रणाली भारतीय शिक्षा प्रणाली से बेहतर ही साबित होती है।
विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर कर रहा है, जिसका ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा चीन के लोगों को मिल सके। चीन की शिक्षा प्रणाली को चार स्टेप्स में बांटा जा सकता है। सबसे पहले बेसिक शिक्षा फ़िर पेशेवर शिक्षा उसके बाद उच्च शिक्षा और फ़िर वयस्क शिक्षा। चीन में 6 से 15 साल की उम्र के चीनी नागरिकों के लिए शिक्षा ज़रूरी और मुफ़्त है। हालांकि, सक्षम माता-पिता किताबों और यूनीफॉर्म के लिए फीस देते हैं। चीन में हर क्लास में औसतन 35 विद्यार्थी होते हैं। चीन की शिक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह का कोई आरक्षण नहीं है।
बात करें चीन में स्कूली शिक्षा की तो चीन में बच्चे 6 साल की उम्र में स्कूल में दाखिल होते हैं। चीन में प्राइमरी एजुकेशन को ग्रेड्स में बाटा गया है, जिसमें एक से लेकर छह तक ग्रेड होती है। भारत में जहां सिर्फ़ तीन साल की उम्र से बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया जाता है, वहीं चीन में बच्चों का 6 साल की उम्र में दाखिला कराया जाता है, जिससे छोटी उम्र के बच्चों पर बोझ ना पड़े।
प्राइमरी एजुकेशन के बाद चीन में बच्चों का जूनियर सेकेण्डरी में दाखिला होता है। जूनियर सेकेण्डरी में ग्रेड 7 से ग्रेड 9 तक की पढ़ाई कराई जाती है। आमतौर पर 15 साल तक के बच्चे जूनियर सेकेण्डरी की शिक्षा को पूरा कर लेते हैं। जूनियर सेकेण्डरी के बाद बच्चों को सेकेण्डरी की पढ़ाई कराई जाती है। सेकेण्डरी की पढ़ाई में बच्चों को कक्षा 10 की पढ़ाई कराई जाती है। वहीं इसके बाद बच्चों को पोस्ट सेकेण्डरी की पढ़ाई करना होती है, जो कि 14वीं ग्रेड तक की होती है।
भारत में जहां स्कूल की पढ़ाई 12 वीं कक्षा तक होती है, वहीं चीन में स्कूल की पढ़ाई 14वीं ग्रेड तक होती है। स्कूल की 14वीं ग्रेड की पढ़ाई के बाद बैचलर और मास्टर डिग्री की पढ़ाई करना होती है। चीन में बैचलर डिग्री को xueshi xuemei और मास्टर डिग्री को shuoshi xuewei कहा जाता है।
चीन में बच्चों के स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है, इसलिए वहां पर स्कूलों में विद्यार्थियों को दो बार वॉर्मअप कराया जाता है। स्कूल में एक बार सुबह वॉर्मअप कराने के बाद विद्यार्थियों से दोपहर में भी वॉर्मअप कराया जाता है। बच्चों को पढ़ाई बोझ ना लगे, इसलिए स्कूलों में लंच करने के बाद विद्यार्थियों को एक घण्टे का समय दिया जाता है। थकान मिटाने के लिए चीन के कुछ स्कूलों में बच्चों को स्कूल टाइम में कुछ समय सोने की इजाज़त भी दी जाती है।
लेकिन चीन में स्कूल की टाइमिंग भारतीय स्कूलों की टाइमिंग से ज़्यादा रहती है। चीन में ज़्यादातर स्कूलों की टाइमिंग सुबह 8 बजे से शाम 4 तक की होती है। स्कूलों की ज़्यादा टाइमिंग का कारण है कि चीन के स्कूलों में विद्यार्थियों से पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियां भी कराई जाती हैं, जिससे वे अन्य क्षेत्रों में भी स्मार्ट बनें। भारत की तरह ही चीन में भी स्कूल सरकारी और प्राइवेट होते हैं। चीन में भी प्राइवेट स्कूल भारतीय स्कूलों की तरह ही महंगे होते हैं।
भारत और चीन की शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि भारत में जहां एकेडमिक एजुकेशन पर पूरा ध्यान दिया जाता है, वहीं चीन में व्यवसायिक शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। चीन में शिक्षा प्रणाली इस तरह की है कि वहां पर विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के समय ही किसी ना किसी व्यवसायिक कौशल में प्रवीण हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि कॉलेज आते-आते विद्यार्थी मशीन और टेक्नोलॉजी के बारे में जानने समझने लगते हैं और उनकी सोच व्यवसायिक हो जाती है।
चीन में सेकेण्डरी स्कूल वाले विद्यार्थी अपने स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ Gaokao नाम के एक एग्ज़ाम की तैयारी भी करते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Gaokao चीन की नेशनल हायर एजूकेशन के लिए एक प्रवेश परीक्षा है। इसी परीक्षा के नम्बरों के आधार पर ही विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए संस्थानों में प्रवेश मिलता है।
Gaokao प्रवेश परीक्षा चीन में काफ़ी महत्वपूर्ण है। नौ घण्टे की इस प्रवेश परीक्षा को पहले बार में सिर्फ़ 40 प्रतिशत बच्चे ही पास कर पाते हैं। Gaokao प्रवेश परीक्षा में विद्यार्थियों की कौशलता को देखा जाता है। इस परीक्षा में चीनी भाषा की नॉलेज, गणित, एक विदेशी भाषा और कई वैकल्पिक विषयों का सिलेबस होता है। Gaokao प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलता है।
OCT 25 (WTN) – आज से क़रीब 40 साल पहले चीन की जीडीपी अफ्रीकन देश जाम्बिया के बराबर थी। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश चीन ग़रीबी और अशिक्षा के कारण विकसित देशों से काफ़ी पीछे था। एकदलीय साम्यवादी व्यवस्था के कारण चीनी लोग दुनिया के अन्य लोगों से ज़्यादा सम्पर्क में नहीं थे, जिसके कारण चीन के लोग पिछड़े और ग़रीब थे। लेकिन समय के साथ चीन ने ख़ुद को बदला और आज चीन 11 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
कभी जाम्बिया के बराबर जीडीपी वाला देश चीन आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ऐसे ही नहीं बन गया है। चीन की आर्थिक प्रगति में वहां की शिक्षा प्रणाली का काफ़ी बड़ा योगदान रहा है। यदि भारत से चीन की शिक्षा प्रणाली की तुलना की जाए, तो चीन की शिक्षा प्रणाली भारतीय शिक्षा प्रणाली से काफ़ी अलग, व्यवस्थित और विकसित है। स्कूली शिक्षा से लेकर तकनीकी शिक्षा तक, हर मामले में चीन की शिक्षा प्रणाली भारतीय शिक्षा प्रणाली से बेहतर ही साबित होती है।
विस्तारवादी मानसिकता वाला देश चीन एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर कर रहा है, जिसका ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा चीन के लोगों को मिल सके। चीन की शिक्षा प्रणाली को चार स्टेप्स में बांटा जा सकता है। सबसे पहले बेसिक शिक्षा फ़िर पेशेवर शिक्षा उसके बाद उच्च शिक्षा और फ़िर वयस्क शिक्षा। चीन में 6 से 15 साल की उम्र के चीनी नागरिकों के लिए शिक्षा ज़रूरी और मुफ़्त है। हालांकि, सक्षम माता-पिता किताबों और यूनीफॉर्म के लिए फीस देते हैं। चीन में हर क्लास में औसतन 35 विद्यार्थी होते हैं। चीन की शिक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह का कोई आरक्षण नहीं है।
बात करें चीन में स्कूली शिक्षा की तो चीन में बच्चे 6 साल की उम्र में स्कूल में दाखिल होते हैं। चीन में प्राइमरी एजुकेशन को ग्रेड्स में बाटा गया है, जिसमें एक से लेकर छह तक ग्रेड होती है। भारत में जहां सिर्फ़ तीन साल की उम्र से बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया जाता है, वहीं चीन में बच्चों का 6 साल की उम्र में दाखिला कराया जाता है, जिससे छोटी उम्र के बच्चों पर बोझ ना पड़े।
प्राइमरी एजुकेशन के बाद चीन में बच्चों का जूनियर सेकेण्डरी में दाखिला होता है। जूनियर सेकेण्डरी में ग्रेड 7 से ग्रेड 9 तक की पढ़ाई कराई जाती है। आमतौर पर 15 साल तक के बच्चे जूनियर सेकेण्डरी की शिक्षा को पूरा कर लेते हैं। जूनियर सेकेण्डरी के बाद बच्चों को सेकेण्डरी की पढ़ाई कराई जाती है। सेकेण्डरी की पढ़ाई में बच्चों को कक्षा 10 की पढ़ाई कराई जाती है। वहीं इसके बाद बच्चों को पोस्ट सेकेण्डरी की पढ़ाई करना होती है, जो कि 14वीं ग्रेड तक की होती है।
भारत में जहां स्कूल की पढ़ाई 12 वीं कक्षा तक होती है, वहीं चीन में स्कूल की पढ़ाई 14वीं ग्रेड तक होती है। स्कूल की 14वीं ग्रेड की पढ़ाई के बाद बैचलर और मास्टर डिग्री की पढ़ाई करना होती है। चीन में बैचलर डिग्री को xueshi xuemei और मास्टर डिग्री को shuoshi xuewei कहा जाता है।
चीन में बच्चों के स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है, इसलिए वहां पर स्कूलों में विद्यार्थियों को दो बार वॉर्मअप कराया जाता है। स्कूल में एक बार सुबह वॉर्मअप कराने के बाद विद्यार्थियों से दोपहर में भी वॉर्मअप कराया जाता है। बच्चों को पढ़ाई बोझ ना लगे, इसलिए स्कूलों में लंच करने के बाद विद्यार्थियों को एक घण्टे का समय दिया जाता है। थकान मिटाने के लिए चीन के कुछ स्कूलों में बच्चों को स्कूल टाइम में कुछ समय सोने की इजाज़त भी दी जाती है।
लेकिन चीन में स्कूल की टाइमिंग भारतीय स्कूलों की टाइमिंग से ज़्यादा रहती है। चीन में ज़्यादातर स्कूलों की टाइमिंग सुबह 8 बजे से शाम 4 तक की होती है। स्कूलों की ज़्यादा टाइमिंग का कारण है कि चीन के स्कूलों में विद्यार्थियों से पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियां भी कराई जाती हैं, जिससे वे अन्य क्षेत्रों में भी स्मार्ट बनें। भारत की तरह ही चीन में भी स्कूल सरकारी और प्राइवेट होते हैं। चीन में भी प्राइवेट स्कूल भारतीय स्कूलों की तरह ही महंगे होते हैं।
भारत और चीन की शिक्षा प्रणाली में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि भारत में जहां एकेडमिक एजुकेशन पर पूरा ध्यान दिया जाता है, वहीं चीन में व्यवसायिक शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। चीन में शिक्षा प्रणाली इस तरह की है कि वहां पर विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के समय ही किसी ना किसी व्यवसायिक कौशल में प्रवीण हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि कॉलेज आते-आते विद्यार्थी मशीन और टेक्नोलॉजी के बारे में जानने समझने लगते हैं और उनकी सोच व्यवसायिक हो जाती है।
चीन में सेकेण्डरी स्कूल वाले विद्यार्थी अपने स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ Gaokao नाम के एक एग्ज़ाम की तैयारी भी करते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि Gaokao चीन की नेशनल हायर एजूकेशन के लिए एक प्रवेश परीक्षा है। इसी परीक्षा के नम्बरों के आधार पर ही विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए संस्थानों में प्रवेश मिलता है।
Gaokao प्रवेश परीक्षा चीन में काफ़ी महत्वपूर्ण है। नौ घण्टे की इस प्रवेश परीक्षा को पहले बार में सिर्फ़ 40 प्रतिशत बच्चे ही पास कर पाते हैं। Gaokao प्रवेश परीक्षा में विद्यार्थियों की कौशलता को देखा जाता है। इस परीक्षा में चीनी भाषा की नॉलेज, गणित, एक विदेशी भाषा और कई वैकल्पिक विषयों का सिलेबस होता है। Gaokao प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलता है।