भाजपा की ‘यह’ ग़लती दे गई महाराष्ट्र और हरियाणा में बड़ा झटका!
Friday - October 25, 2019 2:05 pm ,
Category : WTN HINDI
चुनाव प्रचार में भूल कर बैठे मोदी और शाह
क्या महाराष्ट्र और हरियाणा में जनता को समझने में असफ़ल रही भाजपा?
OCT 25 (WTN) – महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा परिणाम भाजपा के लिए बहुत बड़ा और कड़ा सन्देश लेकर आए हैं। लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार और हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार के लिए विधानसभा चुनाव बहुत बड़ी चुनौती थे।
चुनाव परिणामों के आधार पर कहा जाए तो भाजपा इन दोनों ही राज्यों में किसी ना किसी तरह से सरकार बनाने में सफ़ल रहेगी, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दे गये हैं औऱ सोचने के लिए मजबूर कर गये हैं।
महाराष्ट्र की बात करें तो इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन को राज्य की 288 सीटों में से 161 सीटों पर जीत हासिल हुई है, और यदि दोनों ही पार्टियों के बीच किसी भी तरह की उठापटक नहीं हुई तो एक बार फ़िर से देवेन्द्र फडणनवीस का मुख्यमंत्री बनना तय है।
वहीं हरियाणा में 40 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और उसे कुछ निर्दलीय विधायकों ने समर्थन का ऐलान कर दिया है। लेख लिखे जाने तक हरियाणा में एक बार फ़िर से मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री बनते दिख रहे हैं।
यानी कि किसी ना किसी तरह महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा अपनी सरकार बचाने और बनाने में सफ़ल साबित होती दिख रही है। लेकिन दोनों ही राज्यों के मतदाताओं ने भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव से कम सीटें देकर साबित कर दिया है कि भाजपा, मतदाताओं के मन की बात समझने में थोड़ी नाकामयाब साबित हुई है।
जहां तक महाराष्ट्र की बात है तो 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा ने राज्य की 288 सीटों में से 122 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के साथ गठबन्धन करने के बाद भी भाजपा सिर्फ़ 105 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी।
वहीं हरियाणा में तो भाजपा को और भी बड़ा झटका लगा है। 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 90 में से 47 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार राज्य के मतदाताओं ने भाजपा को सिर्फ़ 40 सीटों पर ही समेटकर रख दिया। पिछले चुनाव की तुलना में 7 सीटों के नुकसान से भाजपा को हरियाणा में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनानी पड़ रही है।
लेकिन कुछ ही महीनों पहले हुए लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने भाजपा को दिल खोलकर सीटें जिताई थीं। लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन ने महाराष्ट्र की 48 में से 41 सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं हरियाणा की सभी 10 सीटों पर भाजपा का परचम लहराया था।
तो आख़िर क्या कारण रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड जीत के कुछ ही महीनों बाद महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा को मतदाताओं ने पूरी तरह से ना तो स्वीकार किया और ना ही पूरी तरह से अस्वीकार किया?
दरअसल, सबसे पहले तो भाजपा को इन दोनों ही राज्यों में सत्ताविरोधी लहर का सामना करना पड़ा है। स्वाभाविक है कि पांच साल की सत्ता के दौरान सरकार की नीतियों और काम करने के तरीक़ों से जनता नाराज़ होती है। लेकिन सत्ता विरोध के साथ-साथ भाजपा इन दोनों ही राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बहुत बड़ी ग़लतियां कर गई, जो कि उसके लिए इन चुनावों में झटका दे गईं।
जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव पूरी तरह से राष्ट्रवाद के आधार पर लड़ा था। पीओके में आतंकियों के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक और एअर स्ट्राइक का फ़ैसला लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को एक बड़ा सन्देश दिया था कि उनकी सरकार पाकिस्तान और आतंकियों के ख़िलाफ़ कड़े से कड़े क़दम उठाएगी। प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रवादी छवि और उनकी कई योजनाओं से लाभान्वित जनता ने लोकसभा चुनाव में दिल खोलकर भाजपा का साथ दिया और भाजपा ने 303 सीटों पर जीत हासिल की।
लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड जीत के बाद भाजपा ने अपने सालों पुराने संकल्प को पूरा किया और जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को शिथिल कर दिया। मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फ़ैसला का पूरे देश ने समर्थन किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान सिर्फ़ और सिर्फ़ पाकिस्तान और अनुच्छेद 370 पर ही फोकस किया, और अन्य मुद्दों समेत स्थानीय मुद्दों को लगभग पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया।
महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता जानती है कि पाकिस्तान और आतंकियों को सबक सिखाना ज़रूरी है, वहीं इन दोनों ही राज्यों की बहुसंख्यक जनता अनुच्छेद 370 के फ़ैसले पर भी मोदी सरकार के साथ है। लेकिन इन दोनों ही राज्यों की जनता जानती है कि इन कामों के लिए केन्द्र में भाजपा सरकार है और प्रधानमंत्री हैं, और रक्षा और विदेश नीति के फ़ैसले लेने की ज़िम्मेदारी केन्द्र सरकार की होती है ना कि राज्य सरकारों की। महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता के सामने यदि महंगाई, रोज़गार, आर्थिक मंदी समेत स्थानीय मुद्दों की बात भाजपा करती तो वो मतदाताओं के और भी क़रीब जाकर उन्हें अपने पक्ष में कर सकती थी।
लेकिन भाजपा ने सिर्फ़ और सिर्फ़ राष्ट्रवाद के मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ने की जो रणनीति बनाई थी, वो रणनीति पूरी तरह से सफ़ल नहीं हो सकी। महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता राष्ट्रवादी है और वो भी पाकिस्तान और आतंकियों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई चाहती है। लेकिन जनता को पता है कि इन कामों के लिए केन्द्र सरकार होती है, और राज्य सरकार के चुनाव के समय पाकिस्तान, आतंकवाद और अनुच्छेद 370 के मुद्दों पर चर्चा से ज़्यादा ज़रूरी है महंगाई, मंदी और रोज़गार समेत स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करना और उनके समाधान के लिए अपनी प्राथमिकताएं बताना।
महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से महंगाई, मंदी, रोज़गार और स्थानीय मुद्दों पर उनकी राय और इन समस्याओं के समाधान के बारे में सुनना चाहती थी, लेकिन भाजपा के नेता चुनाव प्रचार के इन मुद्दों का उल्लेख करना लगभग भूल ही गये। और इसी आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा चुनाव प्रचार में यही सबसे बड़ी ग़लती कर गई।
ख़ैर यदि सब कुछ भाजपा के हिसाब से सही रहता है तो भाजपा, महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबन्धन करके सरकार बनाने में सफ़ल हो जाएगी। वहीं हरियाणा में भी भाजपा, निर्दलियों से समर्थन हासिल कर सरकार बना ही लेगी। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के परिणाम भाजपा के लिए एक सीख लेकर आएं हैं कि विधानसभा चुनाव के समय किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाना चाहिए और किन मुद्दों का जिक्र चुनाव प्रचार के दौरान किया जाना चाहिए।
राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लोकसभा के होते हैं और जिसमें देश की जनता ने भाजपा का खुलकर समर्थन किया है। लेकिन यदि अब भाजपा को झारखण्ड, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना है तो उसे अपनी प्रचार की रणनीति में बदलाव करना ही होगा। राष्ट्रवाद के मुद्दे के साथ यदि महंगाई, मंदी और रोज़गार के बातें नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करेंगे तो वे जनता के और भी ज़्यादा क़रीब जा सकेंगे।
OCT 25 (WTN) – महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा परिणाम भाजपा के लिए बहुत बड़ा और कड़ा सन्देश लेकर आए हैं। लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद केन्द्र की मोदी सरकार के साथ-साथ महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार और हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार के लिए विधानसभा चुनाव बहुत बड़ी चुनौती थे।
चुनाव परिणामों के आधार पर कहा जाए तो भाजपा इन दोनों ही राज्यों में किसी ना किसी तरह से सरकार बनाने में सफ़ल रहेगी, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दे गये हैं औऱ सोचने के लिए मजबूर कर गये हैं।
महाराष्ट्र की बात करें तो इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन को राज्य की 288 सीटों में से 161 सीटों पर जीत हासिल हुई है, और यदि दोनों ही पार्टियों के बीच किसी भी तरह की उठापटक नहीं हुई तो एक बार फ़िर से देवेन्द्र फडणनवीस का मुख्यमंत्री बनना तय है।
वहीं हरियाणा में 40 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और उसे कुछ निर्दलीय विधायकों ने समर्थन का ऐलान कर दिया है। लेख लिखे जाने तक हरियाणा में एक बार फ़िर से मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री बनते दिख रहे हैं।
यानी कि किसी ना किसी तरह महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा अपनी सरकार बचाने और बनाने में सफ़ल साबित होती दिख रही है। लेकिन दोनों ही राज्यों के मतदाताओं ने भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव से कम सीटें देकर साबित कर दिया है कि भाजपा, मतदाताओं के मन की बात समझने में थोड़ी नाकामयाब साबित हुई है।
जहां तक महाराष्ट्र की बात है तो 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और भाजपा ने राज्य की 288 सीटों में से 122 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के साथ गठबन्धन करने के बाद भी भाजपा सिर्फ़ 105 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी।
वहीं हरियाणा में तो भाजपा को और भी बड़ा झटका लगा है। 2014 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य की 90 में से 47 सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन इस बार राज्य के मतदाताओं ने भाजपा को सिर्फ़ 40 सीटों पर ही समेटकर रख दिया। पिछले चुनाव की तुलना में 7 सीटों के नुकसान से भाजपा को हरियाणा में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनानी पड़ रही है।
लेकिन कुछ ही महीनों पहले हुए लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने भाजपा को दिल खोलकर सीटें जिताई थीं। लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबन्धन ने महाराष्ट्र की 48 में से 41 सीटों पर जीत हासिल की थी, वहीं हरियाणा की सभी 10 सीटों पर भाजपा का परचम लहराया था।
तो आख़िर क्या कारण रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड जीत के कुछ ही महीनों बाद महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा को मतदाताओं ने पूरी तरह से ना तो स्वीकार किया और ना ही पूरी तरह से अस्वीकार किया?
दरअसल, सबसे पहले तो भाजपा को इन दोनों ही राज्यों में सत्ताविरोधी लहर का सामना करना पड़ा है। स्वाभाविक है कि पांच साल की सत्ता के दौरान सरकार की नीतियों और काम करने के तरीक़ों से जनता नाराज़ होती है। लेकिन सत्ता विरोध के साथ-साथ भाजपा इन दोनों ही राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बहुत बड़ी ग़लतियां कर गई, जो कि उसके लिए इन चुनावों में झटका दे गईं।
जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव पूरी तरह से राष्ट्रवाद के आधार पर लड़ा था। पीओके में आतंकियों के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक और एअर स्ट्राइक का फ़ैसला लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को एक बड़ा सन्देश दिया था कि उनकी सरकार पाकिस्तान और आतंकियों के ख़िलाफ़ कड़े से कड़े क़दम उठाएगी। प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रवादी छवि और उनकी कई योजनाओं से लाभान्वित जनता ने लोकसभा चुनाव में दिल खोलकर भाजपा का साथ दिया और भाजपा ने 303 सीटों पर जीत हासिल की।
लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड जीत के बाद भाजपा ने अपने सालों पुराने संकल्प को पूरा किया और जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को शिथिल कर दिया। मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फ़ैसला का पूरे देश ने समर्थन किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान सिर्फ़ और सिर्फ़ पाकिस्तान और अनुच्छेद 370 पर ही फोकस किया, और अन्य मुद्दों समेत स्थानीय मुद्दों को लगभग पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर दिया।
महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता जानती है कि पाकिस्तान और आतंकियों को सबक सिखाना ज़रूरी है, वहीं इन दोनों ही राज्यों की बहुसंख्यक जनता अनुच्छेद 370 के फ़ैसले पर भी मोदी सरकार के साथ है। लेकिन इन दोनों ही राज्यों की जनता जानती है कि इन कामों के लिए केन्द्र में भाजपा सरकार है और प्रधानमंत्री हैं, और रक्षा और विदेश नीति के फ़ैसले लेने की ज़िम्मेदारी केन्द्र सरकार की होती है ना कि राज्य सरकारों की। महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता के सामने यदि महंगाई, रोज़गार, आर्थिक मंदी समेत स्थानीय मुद्दों की बात भाजपा करती तो वो मतदाताओं के और भी क़रीब जाकर उन्हें अपने पक्ष में कर सकती थी।
लेकिन भाजपा ने सिर्फ़ और सिर्फ़ राष्ट्रवाद के मुद्दे पर विधानसभा चुनाव लड़ने की जो रणनीति बनाई थी, वो रणनीति पूरी तरह से सफ़ल नहीं हो सकी। महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता राष्ट्रवादी है और वो भी पाकिस्तान और आतंकियों के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई चाहती है। लेकिन जनता को पता है कि इन कामों के लिए केन्द्र सरकार होती है, और राज्य सरकार के चुनाव के समय पाकिस्तान, आतंकवाद और अनुच्छेद 370 के मुद्दों पर चर्चा से ज़्यादा ज़रूरी है महंगाई, मंदी और रोज़गार समेत स्थानीय मुद्दों पर चर्चा करना और उनके समाधान के लिए अपनी प्राथमिकताएं बताना।
महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से महंगाई, मंदी, रोज़गार और स्थानीय मुद्दों पर उनकी राय और इन समस्याओं के समाधान के बारे में सुनना चाहती थी, लेकिन भाजपा के नेता चुनाव प्रचार के इन मुद्दों का उल्लेख करना लगभग भूल ही गये। और इसी आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा चुनाव प्रचार में यही सबसे बड़ी ग़लती कर गई।
ख़ैर यदि सब कुछ भाजपा के हिसाब से सही रहता है तो भाजपा, महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबन्धन करके सरकार बनाने में सफ़ल हो जाएगी। वहीं हरियाणा में भी भाजपा, निर्दलियों से समर्थन हासिल कर सरकार बना ही लेगी। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के परिणाम भाजपा के लिए एक सीख लेकर आएं हैं कि विधानसभा चुनाव के समय किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाना चाहिए और किन मुद्दों का जिक्र चुनाव प्रचार के दौरान किया जाना चाहिए।
राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लोकसभा के होते हैं और जिसमें देश की जनता ने भाजपा का खुलकर समर्थन किया है। लेकिन यदि अब भाजपा को झारखण्ड, दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना है तो उसे अपनी प्रचार की रणनीति में बदलाव करना ही होगा। राष्ट्रवाद के मुद्दे के साथ यदि महंगाई, मंदी और रोज़गार के बातें नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करेंगे तो वे जनता के और भी ज़्यादा क़रीब जा सकेंगे।