जानिए आख़िर क्यों भाजपा-शिवसेना मजबूर हैं साथ आने?
Wednesday - October 30, 2019 10:30 am ,
Category : WTN HINDI
महाराष्ट्र में जारी है भाजपा और शिवसेना के बीच 'दोस्ताना जंग'
जल्द ख़त्म होगी शिवसेना की मुख्यमंत्री पद के लिए प्रेशर पॉलिटिक्स!
OCT 30 (WTN) – राजनीति में कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता है। राजनीति लाभ और सम्भावनाओं पर टिकी रहती है। जहां जिसका लाभ होता है और भविष्य में लाभ की सम्भावना होती है, वहीं पर राजनीतिक दल इन्वेस्ट करना पसंद करते हैं। लेकिन इन दिनों राजनीति के जो उतार चढ़ाव महाराष्ट्र में देखने को मिल रहे हैं, उस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हो सका है।
वैसे हाल ही में सम्पन्न हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना गणबन्धन को पूर्ण बहुमत हासिल हो चुका है, लेकिन दोनों ही पार्टियों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान जारी है। जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा-शिवसेना गठबन्धन ने महाराष्ट्र में पांच साल सरकार चलाई और गठबन्धन सरकार के मुख्यमंत्री थे देवेन्द्र फडणवीस। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना दोनों ही पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए बाद में गठबन्धन किया था। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा और भाजपा-शिवसेना गठबन्धन को बहुमत हासिल हो गया।
लेकिन इस बार शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं। शिवसेना का कहना है कि इस बार गठबन्धन की सरकार में पांच साल तक अकेले भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं रहेगा, बल्कि दोनों ही पार्टी के मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल शासन करेंगे। शिवसेना के इसी मोलभाव के कारण विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के इतने दिनों के बाद भी अभी तक महाराष्ट्र में सरकार का गठन नहीं हो सका है। शिवसेना बार-बार भाजपा को 50-50 का फॉर्मूला याद दिला रही है।
दरअसल, शिवसेना का कहना है कि हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा कमज़ोर हुई है। शिवेसना के अनुसार पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा था और भाजपा ने 122 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना के साथ गठबन्धन कर चुनाव लड़ा लेकिन भाजपा सिर्फ़ 105 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी है।
शिवसेना का तर्क है कि गठबन्धन के साथ चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अपने सीटों में वृद्धि नहीं कर सकी है, इसका मतलब है कि भाजपा कमज़ोर हुई है। इसी बात को लेकर शिवसेना का कहना है कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबन्धन की सरकार बनती है तो दोनों ही पार्टियों का ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहना चाहिए।
शिवसेना जिस तरह के महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए मोलभाव कर रही है और भाजपा पर बयानों के ज़रिये हमला कर रही है, उससे भाजपा नेता हैरान तो हैं लेकिन परेशान नहीं हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि राजनीति में मोलभाव होता आया है। भारत की राजनीति में जिसे जब भी मौक़ा मिला है, उसने मोलभाव किया है। लेकिन जहा तक महाराष्ट्र में शिवसेना के मोलभाव की बात है तो कहा जा रहा है कि शिवेसना कितना भी मोलभाव कर ले या फ़िर बयानों से भाजपा पर हमला कर ले, आख़िर में भाजपा के साथ सरकार बनाना उसकी मजबूरी है।
महाराष्ट्र में शिवसेना की मोलभाव की राजनीति पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि एक राजनीति दल के तौर पर शिवसेना को अपना लाभ देखते हुए डिमाण्ड करना उसका हक़ है। लेकिन शिवसेना की मांग को मानना या नहीं मानना यह भाजपा पर निर्भर करता है और भाजपा बातचीत के ज़रिये इस मसले को सुलझा लेगी।
राजनीति के जानकारों का कहना है कि शिवसेना द्वारा दिये जा रहे बयान मीडिया के लिए मायने रख सकते हैं, लेकिन भाजपा को इस तरह के बयानों की आदत है। पिछली सरकार में पांच साल के दौरान शिवसेना, भाजपा पर जमकर निशाना साधती रही, लेकिन इतना होने के बाद भी दोनों पार्टियों ने पूरी पांच साल सरकार चलाई और लोकसभा और विधानसभा चुनाव में गठबन्धन कर चुनाव लड़ा।
वैसे सूत्रों के मुताबिक़, भाजपा ने शिवसेना को सन्देश दे दिया है कि उसे मुख्यमंत्री का पद नहीं मिलने वाला है और शिवसेना को उप मुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ेगा। हालांकि, यह बात शिवसेना भी जानती है कि भाजपा बड़ी पार्टी है और वो उसे मुख्यमंत्री का पद नहीं देने वाली है। लेकिन फ़िर भी मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना दबाव की राजनीति कर रही है। कहा जा रहा है कि शिवसेना की रणनीति मुख्यमंत्री पद पर दबाव के बदले गठबन्धन सरकार में गृह और वित्त जैसे अहम विभाग हासिल करने की है।
अब इसे शिवसेना की मजबूरी कहिये या फ़िर उसकी समझदारी, शिवेसना सरकार बनाने के लिए भाजपा के अलावा किसी अन्य पार्टी के साथ जाने का ख़तरा मोल भी नहीं ले सकती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं कि हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में शरद पवार एक बार फ़िर से एक बड़ी चुनौती के रूप में भाजपा और शिवसेना के सामने उभरे हैं। ऐसे में शिवसेना, शरद पवार की पार्टी एनसीपी के साथ जाकर उसे और भी मजबूत करने का जोखिम नहीं ले सकती है।
दरअसल, भाजपा के लिए तो महाराष्ट्र के अलावा कई अन्य राज्य राजनीति के लिए हैं और कई राज्यों में उसकी सरकार भी है। लेकिन यदि महाराष्ट्र में शिवसेना ने एनसीपी को मजबूत होने का मौक़ा दे दिया तो सिर्फ़ महाराष्ट्र तक सीमित शिवसेना के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। वैसे भी शिवेसना को भाजपा के साथ आना ही होगा, क्योंकि दोनों ही पार्टियों की विचारधारा एक ही है। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए यदि एनसीपी, शिवसेना को समर्थन दे भी देती है तो शिवसेना के साथ सरकार बनाने पर एनसीपी के वोटबैंक पर असर पड़ेगा।
जैसा कि आप जानते हैं कि शिवसेना की छवि भाजपा से कहीं ज़्यादा उग्र हिन्दुत्व की रही है। ऐसे में यदि किसी भी कारण से शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाती है तो इससे शिवसेना की हिन्दुत्ववादी छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वैसे राजनीति में कुछ भी सम्भव है। हो सकता है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एनसीपी-कांग्रेस मिलकर शिवसेना को समर्थन दे और आदित्य ठाकरे मुख्यमंत्री बन भी जाएं, लेकिन इससे तीनों ही पार्टियों की छवि तो ख़राब होगी ही साथ ही उनके वोटबैंक पर भी असर पड़ेगा।
जहां एक तरह शिवसेना के पास विकल्प नहीं है कि वो भाजपा के अलावा किसी और के साथ मिलकर सरकार बनाए, वहीं भाजपा के पास भी विकल्प नहीं है कि वो शिवसेना के अलावा किसी और के साथ सरकार बनाए। साफ़ ज़ाहिर है कि भाजपा, कांग्रेस के साथ मिलकर तो सरकार बनाने से रही। वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार भाजपा को बाहर से समर्थन दे दें, जैसा कि पिछले विधानसभा चुनाव के बाद हुआ था। लेकिन हाल फ़िलहाल में ईडी के चलते भाजपा और शरद पवार के बीच जो सम्बन्ध ख़राब हुए हैं, उससे इस बात की सम्भावना कम ही लगती है कि भाजपा और एनसीपी साथ आएंगे।
साफ़ ज़ाहिर है कि महाराष्ट्र की राजनीति का गणित इस समय कुछ ऐसा है कि भाजपा और शिवसेना को साथ आकर सरकार बनाना ही होगा। ना तो भाजपा और ना ही शिवेसना, एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना की प्रेशर पॉलिटिक्स और कितने दिनों तक जारी रहती है? बाक़ी यदि महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ बड़ा उलटफेर ना हो तो एक बार फ़िर से देवेन्द्र फडणवीस का मुख्यमंत्री बनना तय है।
OCT 30 (WTN) – राजनीति में कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता है। राजनीति लाभ और सम्भावनाओं पर टिकी रहती है। जहां जिसका लाभ होता है और भविष्य में लाभ की सम्भावना होती है, वहीं पर राजनीतिक दल इन्वेस्ट करना पसंद करते हैं। लेकिन इन दिनों राजनीति के जो उतार चढ़ाव महाराष्ट्र में देखने को मिल रहे हैं, उस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हो सका है।
वैसे हाल ही में सम्पन्न हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना गणबन्धन को पूर्ण बहुमत हासिल हो चुका है, लेकिन दोनों ही पार्टियों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान जारी है। जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा-शिवसेना गठबन्धन ने महाराष्ट्र में पांच साल सरकार चलाई और गठबन्धन सरकार के मुख्यमंत्री थे देवेन्द्र फडणवीस। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना दोनों ही पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था और चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए बाद में गठबन्धन किया था। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा और भाजपा-शिवसेना गठबन्धन को बहुमत हासिल हो गया।
लेकिन इस बार शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं। शिवसेना का कहना है कि इस बार गठबन्धन की सरकार में पांच साल तक अकेले भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं रहेगा, बल्कि दोनों ही पार्टी के मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल शासन करेंगे। शिवसेना के इसी मोलभाव के कारण विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के इतने दिनों के बाद भी अभी तक महाराष्ट्र में सरकार का गठन नहीं हो सका है। शिवसेना बार-बार भाजपा को 50-50 का फॉर्मूला याद दिला रही है।
दरअसल, शिवसेना का कहना है कि हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा कमज़ोर हुई है। शिवेसना के अनुसार पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ा था और भाजपा ने 122 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना के साथ गठबन्धन कर चुनाव लड़ा लेकिन भाजपा सिर्फ़ 105 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी है।
शिवसेना का तर्क है कि गठबन्धन के साथ चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अपने सीटों में वृद्धि नहीं कर सकी है, इसका मतलब है कि भाजपा कमज़ोर हुई है। इसी बात को लेकर शिवसेना का कहना है कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबन्धन की सरकार बनती है तो दोनों ही पार्टियों का ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहना चाहिए।
शिवसेना जिस तरह के महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए मोलभाव कर रही है और भाजपा पर बयानों के ज़रिये हमला कर रही है, उससे भाजपा नेता हैरान तो हैं लेकिन परेशान नहीं हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि राजनीति में मोलभाव होता आया है। भारत की राजनीति में जिसे जब भी मौक़ा मिला है, उसने मोलभाव किया है। लेकिन जहा तक महाराष्ट्र में शिवसेना के मोलभाव की बात है तो कहा जा रहा है कि शिवेसना कितना भी मोलभाव कर ले या फ़िर बयानों से भाजपा पर हमला कर ले, आख़िर में भाजपा के साथ सरकार बनाना उसकी मजबूरी है।
महाराष्ट्र में शिवसेना की मोलभाव की राजनीति पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि एक राजनीति दल के तौर पर शिवसेना को अपना लाभ देखते हुए डिमाण्ड करना उसका हक़ है। लेकिन शिवसेना की मांग को मानना या नहीं मानना यह भाजपा पर निर्भर करता है और भाजपा बातचीत के ज़रिये इस मसले को सुलझा लेगी।
राजनीति के जानकारों का कहना है कि शिवसेना द्वारा दिये जा रहे बयान मीडिया के लिए मायने रख सकते हैं, लेकिन भाजपा को इस तरह के बयानों की आदत है। पिछली सरकार में पांच साल के दौरान शिवसेना, भाजपा पर जमकर निशाना साधती रही, लेकिन इतना होने के बाद भी दोनों पार्टियों ने पूरी पांच साल सरकार चलाई और लोकसभा और विधानसभा चुनाव में गठबन्धन कर चुनाव लड़ा।
वैसे सूत्रों के मुताबिक़, भाजपा ने शिवसेना को सन्देश दे दिया है कि उसे मुख्यमंत्री का पद नहीं मिलने वाला है और शिवसेना को उप मुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ेगा। हालांकि, यह बात शिवसेना भी जानती है कि भाजपा बड़ी पार्टी है और वो उसे मुख्यमंत्री का पद नहीं देने वाली है। लेकिन फ़िर भी मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना दबाव की राजनीति कर रही है। कहा जा रहा है कि शिवसेना की रणनीति मुख्यमंत्री पद पर दबाव के बदले गठबन्धन सरकार में गृह और वित्त जैसे अहम विभाग हासिल करने की है।
अब इसे शिवसेना की मजबूरी कहिये या फ़िर उसकी समझदारी, शिवेसना सरकार बनाने के लिए भाजपा के अलावा किसी अन्य पार्टी के साथ जाने का ख़तरा मोल भी नहीं ले सकती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं कि हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में शरद पवार एक बार फ़िर से एक बड़ी चुनौती के रूप में भाजपा और शिवसेना के सामने उभरे हैं। ऐसे में शिवसेना, शरद पवार की पार्टी एनसीपी के साथ जाकर उसे और भी मजबूत करने का जोखिम नहीं ले सकती है।
दरअसल, भाजपा के लिए तो महाराष्ट्र के अलावा कई अन्य राज्य राजनीति के लिए हैं और कई राज्यों में उसकी सरकार भी है। लेकिन यदि महाराष्ट्र में शिवसेना ने एनसीपी को मजबूत होने का मौक़ा दे दिया तो सिर्फ़ महाराष्ट्र तक सीमित शिवसेना के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। वैसे भी शिवेसना को भाजपा के साथ आना ही होगा, क्योंकि दोनों ही पार्टियों की विचारधारा एक ही है। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए यदि एनसीपी, शिवसेना को समर्थन दे भी देती है तो शिवसेना के साथ सरकार बनाने पर एनसीपी के वोटबैंक पर असर पड़ेगा।
जैसा कि आप जानते हैं कि शिवसेना की छवि भाजपा से कहीं ज़्यादा उग्र हिन्दुत्व की रही है। ऐसे में यदि किसी भी कारण से शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाती है तो इससे शिवसेना की हिन्दुत्ववादी छवि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वैसे राजनीति में कुछ भी सम्भव है। हो सकता है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एनसीपी-कांग्रेस मिलकर शिवसेना को समर्थन दे और आदित्य ठाकरे मुख्यमंत्री बन भी जाएं, लेकिन इससे तीनों ही पार्टियों की छवि तो ख़राब होगी ही साथ ही उनके वोटबैंक पर भी असर पड़ेगा।
जहां एक तरह शिवसेना के पास विकल्प नहीं है कि वो भाजपा के अलावा किसी और के साथ मिलकर सरकार बनाए, वहीं भाजपा के पास भी विकल्प नहीं है कि वो शिवसेना के अलावा किसी और के साथ सरकार बनाए। साफ़ ज़ाहिर है कि भाजपा, कांग्रेस के साथ मिलकर तो सरकार बनाने से रही। वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार भाजपा को बाहर से समर्थन दे दें, जैसा कि पिछले विधानसभा चुनाव के बाद हुआ था। लेकिन हाल फ़िलहाल में ईडी के चलते भाजपा और शरद पवार के बीच जो सम्बन्ध ख़राब हुए हैं, उससे इस बात की सम्भावना कम ही लगती है कि भाजपा और एनसीपी साथ आएंगे।
साफ़ ज़ाहिर है कि महाराष्ट्र की राजनीति का गणित इस समय कुछ ऐसा है कि भाजपा और शिवसेना को साथ आकर सरकार बनाना ही होगा। ना तो भाजपा और ना ही शिवेसना, एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना की प्रेशर पॉलिटिक्स और कितने दिनों तक जारी रहती है? बाक़ी यदि महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ बड़ा उलटफेर ना हो तो एक बार फ़िर से देवेन्द्र फडणवीस का मुख्यमंत्री बनना तय है।