जानिए आख़िर क्यों कश्मीर मुद्दे पर तुर्की दे रहा है पाकिस्तान का साथ?
Saturday - November 2, 2019 10:42 am ,
Category : WTN HINDI
तुर्की को पाकिस्तान का साथ देना पड़ सकता है 'महंगा'
कूटनीति के तहत तुर्की की 'कमज़ोरी' पर वार करती मोदी सरकार!
NOV 02 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले प्रावधान अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कूटनीति के चलते कश्मीर मामले में दखलंदाज़ी कर रहे पाकिस्तान को पूरी दुनिया में 'अकेला' कर दिया है। दुनिया के लगभग हर मंच से पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर किसी भी तरह का समर्थन हासिल नहीं हो सका है। हां, लेकिन चीन ने अपनी 'भारत विरोधी नीति' के चलते अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर भारत को 'घेरने' की कोशिश की थी, लेकिन मोदी सरकार की 'सफ़ल कूटनीति' के चलते चीन अपनी चालाकी में सफ़ल नहीं हो सका है।
कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का चीन के अलावा तुर्की और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों ने ज़रूर खुलकर साथ दिया है। तुर्की और मलेशिया ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में कश्मीर मुद्दे का ज़िक्र करते हुए खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था और भारत की 'आलोचना' की थी। इतना ही नहीं, तुर्की और मलेशिया ने टेरर फण्डिंग के आरोप में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की सम्भावित कार्रवाई से भी पाकिस्तान को बचाया था, जिसके कारण पाकिस्तान FATF द्वारा ब्लैकलिस्टेड होने से बच गया था।
लेकिन बड़ा सवाल है कि भारत जैसे बड़े देश से दुश्मनी मोल लेकर तुर्की, पाकिस्तान का खुलकर साथ क्यों दे रहा है? दरअसल, तुर्की बिना किसी वजह के पाकिस्तान को खुश करने के लिए पाकिस्तान का साथ नहीं दे रहा है। तुर्की अपने 'राजनीतिक स्वार्थ' के कारण ही पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आ रहा है। आख़िर किन कारणों से तुर्की खुलकर पाकिस्तान का साथ दे रहा है, आईये आपको विस्तार से बताते हैं।
तुर्की और पाकिस्तान के बीच काफ़ी पहले से ही सम्बन्ध अच्छे रहे हैं। लेकिन सम्बन्ध अच्छे होने के बाद भी तुर्की ने पहले कभी भी पाकिस्तान का किसी भी मुद्दे पर 'खुलकर' समर्थन नहीं किया था। लेकिन बदलते वैश्विक राजनीतिक समीकरणों के बीच तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान अपनी अलग ही कूटनीति पर काम कर रहे हैं।
दरअसल, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान मुस्लिमों और मुस्लिम देशों के एक 'नेता' के रूप में ख़ुद को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इरदुगान जानते हैं कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन कर वे इस्लामी दुनिया का ध्यान ख़ुद की तरफ़ आकर्षित कर सकते हैं। तुर्की की मंशा है कि वो पूरी दुनिया के मुस्लिमों का एक बार फ़िर से 'ख़लीफ़ा' बने और इसी कारण से तुर्की पूरी दुनिया में मुस्लिमों से सम्बन्धित मामलों पर खुलकर बोलने लगा है। इतना ही नहीं, तुर्की अब मुस्लिमों के मामलों पर खुलकर सभी का 'विरोध' भी करने लगा है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तुर्की ने चीन के उइगर मुस्लमानों का मुद्दा भी काफ़ी जोर शोर से उठाया है, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर मुस्लिमों की तरफदारी का 'ढोंग' करने वाला पाकिस्तान चीन में उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर 'चुप्पी' साधे हुए है, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान को मुस्लिमों से हमदर्दी होती तो वो चीन के ख़िलाफ़ भी कुछ बोलता।
ख़ैर कश्मीर मुद्दे पर तुर्की का साथ मिलने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और तुर्की के राष्ट्रपति इरदुगान एक दूसरे क़रीब आ गये हैं। मुस्लिम देश पाकिस्तान को खुश करने और मुस्लिमों के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कश्मीर मुद्दे पर तुर्की खुलकर भारत का 'विरोध' कर रहा है। हालांकि, मोदी सरकार ने अपनी कूटनीति के चलते तुर्की को उसी की भाषा में जवाब दिया है।
जानकारों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तान के बीच उभरते नये सम्बन्धों के पीछे का प्रमुख कारण वैश्विक-इस्लामवाद की विचारधारा है। इस कारण को समझने के लिए जरा पीछे चलें तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आधुनिक तुर्की के निर्माता अता तुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था। पाशा और उनके बाद के तुर्की के नेताओं के प्रयासों से ही तुर्की आज विकसित राष्ट्र बन सका है।
इन्ही सब कारणों से तुर्की के राष्ट्रपति इरदुगान ने पूरी कोशिश की थी कि तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल किया जाए, लेकिन वे अपने इन प्रयासों में सफ़ल ना हो सके। यूरोपीय संघ से 'अपेक्षित' सहयोग ना मिलने और पश्चिम देशों की 'बेरूखी' के चलते तुर्की ने अब ख़ुद को मुस्लिम देशों का सर्वेसर्वा बनने का 'सपना' पाल लिया है। वहीं तुर्की इस समय अपने पड़ोसी देशों के साथ कुछ मुद्दों पर उलझा हुआ है, ऐसे में उसे कोई 'विश्वस्त सहयोगी' की ज़रूरत है, जो कि उसे पाकिस्तान के रूप में मिल गया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तुर्की की दक्षिणी सीमा से लगे सीरिया के उत्तरी इलाकों में कुर्दों की समस्या है। तो वहीं तुर्की के अपने पड़ोसी देशों बुल्गारिया और अजरबैजान के साथ सीमा विवाद हैं। जानकारी के लिए बता दें कि अजरबैजान के साथ तुर्की के सीमा विवाद में पाकिस्तान ने तुर्की का साथ दिया है। वहीं भूमध्य सागर के छोटे से द्वीप साइप्रस के साथ भी तुर्की का विवाद है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के कार्यकाव के दौरान पाकिस्तान और तुर्की के बीच सम्बन्ध कुछ ख़ास नहीं थे। लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान ने तुर्की के साथ अपने रिश्तों को 'मज़बूत' किया है। तुर्की से सहयोग से पाकिस्तान में कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। वहीं दोनों देशों के बीच रक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में भी काफ़ी सहयोग हुआ है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान और तुर्की के बीच सैन्य सम्बन्धों में भी निकटता आई है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि मुस्लिम देशों के बीच अपने पैठ बढ़ाने और उनका ख़लीफ़ा बनने का सपने देख रहे तुर्की ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया है।
लेकिन भारत की मोदी सरकार ने तुर्की को उसी की भाषा में जवाब देते हुए ज़बरदस्त कूटनीतिक चालें चली हैं। भारत ने तुर्की पर जवाबी कार्रवाई करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुर्की की प्रस्तावित यात्रा को ही रद्द कर दिया। इतना ही नहीं, भारत ने तुर्की की रक्षा कम्पनी अनादोलू शिपयार्ड को भारतीय नौसेना के लिए जहाजों के निर्माण का जो कांटेक्ट दिया था, तुर्की पर जवाबी कार्रवाई करते हुए भारत सरकार ने 2.3 अरब डॉलर के इस रक्षा सौदे को होल्ड पर रख दिया है। वहीं तुर्की के पाकिस्तान का पक्ष लेने की वज़ह से इण्डियन नेवी अब 45,000 टन के बेड़े के 5 बड़े जहाजों के फ्लीट के लिए तुर्की की कम्पनी के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट को भी 'अनिश्चितकाल' तक के लिए होल्ड पर रख सकती है।
मोदी सरकार अपनी एक और कूटनीतिक चाल के तहत साइप्रस में तुर्की के ख़िलाफ़ वहां की आज़ादी को समर्थन देने का भी फैसला ले सकती है। इतना ही नहीं, भारत ने तुर्की द्वारा उत्तरी सीरिया में किए गए आक्रमण की भी कड़ी आलोचना की थी। भारत का कहना है कि कुर्दों के ख़िलाफ़ तुर्की के आक्रमण से आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई कमज़ोर हुई है।
मोदी सरकार के फ़ैसलों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि भारत ने तुर्की को सबक सिखाने का फ़ैसला ले लिया है। तुर्की ने जिस तरह से कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दिया है और कश्मीर मामले पर 'अनर्गल बयानबाज़ी' की है, इसका ख़ामियाज़ा तुर्की को कूटनीतिक और आर्थिक रूप से भुगतना ही पड़ेगा। तुर्की की मुस्लिम देशों का ख़लीफ़ा बनने की मंशा पर मोदी सरकार ने पानी फेरना शुरू कर दिया है, और सऊदी अरब के साथ भारत ने सम्बन्धों को मज़बूत करने के लिए उसके साथ कई समझौते किये हैं। लगता है कि मोदी सरकार की कूटनीति से एक ना एक दिन तुर्की को 'अहसास' हो ही जाएगा कि उसने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर बहुत 'बड़ी ग़लती' कर दी है।
NOV 02 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले प्रावधान अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का ऐतिहासिक फ़ैसला लिया है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कूटनीति के चलते कश्मीर मामले में दखलंदाज़ी कर रहे पाकिस्तान को पूरी दुनिया में 'अकेला' कर दिया है। दुनिया के लगभग हर मंच से पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर किसी भी तरह का समर्थन हासिल नहीं हो सका है। हां, लेकिन चीन ने अपनी 'भारत विरोधी नीति' के चलते अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर भारत को 'घेरने' की कोशिश की थी, लेकिन मोदी सरकार की 'सफ़ल कूटनीति' के चलते चीन अपनी चालाकी में सफ़ल नहीं हो सका है।
कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का चीन के अलावा तुर्की और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों ने ज़रूर खुलकर साथ दिया है। तुर्की और मलेशिया ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में कश्मीर मुद्दे का ज़िक्र करते हुए खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था और भारत की 'आलोचना' की थी। इतना ही नहीं, तुर्की और मलेशिया ने टेरर फण्डिंग के आरोप में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की सम्भावित कार्रवाई से भी पाकिस्तान को बचाया था, जिसके कारण पाकिस्तान FATF द्वारा ब्लैकलिस्टेड होने से बच गया था।
लेकिन बड़ा सवाल है कि भारत जैसे बड़े देश से दुश्मनी मोल लेकर तुर्की, पाकिस्तान का खुलकर साथ क्यों दे रहा है? दरअसल, तुर्की बिना किसी वजह के पाकिस्तान को खुश करने के लिए पाकिस्तान का साथ नहीं दे रहा है। तुर्की अपने 'राजनीतिक स्वार्थ' के कारण ही पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आ रहा है। आख़िर किन कारणों से तुर्की खुलकर पाकिस्तान का साथ दे रहा है, आईये आपको विस्तार से बताते हैं।
तुर्की और पाकिस्तान के बीच काफ़ी पहले से ही सम्बन्ध अच्छे रहे हैं। लेकिन सम्बन्ध अच्छे होने के बाद भी तुर्की ने पहले कभी भी पाकिस्तान का किसी भी मुद्दे पर 'खुलकर' समर्थन नहीं किया था। लेकिन बदलते वैश्विक राजनीतिक समीकरणों के बीच तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान अपनी अलग ही कूटनीति पर काम कर रहे हैं।
दरअसल, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान मुस्लिमों और मुस्लिम देशों के एक 'नेता' के रूप में ख़ुद को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इरदुगान जानते हैं कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन कर वे इस्लामी दुनिया का ध्यान ख़ुद की तरफ़ आकर्षित कर सकते हैं। तुर्की की मंशा है कि वो पूरी दुनिया के मुस्लिमों का एक बार फ़िर से 'ख़लीफ़ा' बने और इसी कारण से तुर्की पूरी दुनिया में मुस्लिमों से सम्बन्धित मामलों पर खुलकर बोलने लगा है। इतना ही नहीं, तुर्की अब मुस्लिमों के मामलों पर खुलकर सभी का 'विरोध' भी करने लगा है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तुर्की ने चीन के उइगर मुस्लमानों का मुद्दा भी काफ़ी जोर शोर से उठाया है, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर मुस्लिमों की तरफदारी का 'ढोंग' करने वाला पाकिस्तान चीन में उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर 'चुप्पी' साधे हुए है, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान को मुस्लिमों से हमदर्दी होती तो वो चीन के ख़िलाफ़ भी कुछ बोलता।
ख़ैर कश्मीर मुद्दे पर तुर्की का साथ मिलने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और तुर्की के राष्ट्रपति इरदुगान एक दूसरे क़रीब आ गये हैं। मुस्लिम देश पाकिस्तान को खुश करने और मुस्लिमों के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कश्मीर मुद्दे पर तुर्की खुलकर भारत का 'विरोध' कर रहा है। हालांकि, मोदी सरकार ने अपनी कूटनीति के चलते तुर्की को उसी की भाषा में जवाब दिया है।
जानकारों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तान के बीच उभरते नये सम्बन्धों के पीछे का प्रमुख कारण वैश्विक-इस्लामवाद की विचारधारा है। इस कारण को समझने के लिए जरा पीछे चलें तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आधुनिक तुर्की के निर्माता अता तुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था। पाशा और उनके बाद के तुर्की के नेताओं के प्रयासों से ही तुर्की आज विकसित राष्ट्र बन सका है।
इन्ही सब कारणों से तुर्की के राष्ट्रपति इरदुगान ने पूरी कोशिश की थी कि तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल किया जाए, लेकिन वे अपने इन प्रयासों में सफ़ल ना हो सके। यूरोपीय संघ से 'अपेक्षित' सहयोग ना मिलने और पश्चिम देशों की 'बेरूखी' के चलते तुर्की ने अब ख़ुद को मुस्लिम देशों का सर्वेसर्वा बनने का 'सपना' पाल लिया है। वहीं तुर्की इस समय अपने पड़ोसी देशों के साथ कुछ मुद्दों पर उलझा हुआ है, ऐसे में उसे कोई 'विश्वस्त सहयोगी' की ज़रूरत है, जो कि उसे पाकिस्तान के रूप में मिल गया है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि तुर्की की दक्षिणी सीमा से लगे सीरिया के उत्तरी इलाकों में कुर्दों की समस्या है। तो वहीं तुर्की के अपने पड़ोसी देशों बुल्गारिया और अजरबैजान के साथ सीमा विवाद हैं। जानकारी के लिए बता दें कि अजरबैजान के साथ तुर्की के सीमा विवाद में पाकिस्तान ने तुर्की का साथ दिया है। वहीं भूमध्य सागर के छोटे से द्वीप साइप्रस के साथ भी तुर्की का विवाद है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के कार्यकाव के दौरान पाकिस्तान और तुर्की के बीच सम्बन्ध कुछ ख़ास नहीं थे। लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान ने तुर्की के साथ अपने रिश्तों को 'मज़बूत' किया है। तुर्की से सहयोग से पाकिस्तान में कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। वहीं दोनों देशों के बीच रक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में भी काफ़ी सहयोग हुआ है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान और तुर्की के बीच सैन्य सम्बन्धों में भी निकटता आई है। यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि मुस्लिम देशों के बीच अपने पैठ बढ़ाने और उनका ख़लीफ़ा बनने का सपने देख रहे तुर्की ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया है।
लेकिन भारत की मोदी सरकार ने तुर्की को उसी की भाषा में जवाब देते हुए ज़बरदस्त कूटनीतिक चालें चली हैं। भारत ने तुर्की पर जवाबी कार्रवाई करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुर्की की प्रस्तावित यात्रा को ही रद्द कर दिया। इतना ही नहीं, भारत ने तुर्की की रक्षा कम्पनी अनादोलू शिपयार्ड को भारतीय नौसेना के लिए जहाजों के निर्माण का जो कांटेक्ट दिया था, तुर्की पर जवाबी कार्रवाई करते हुए भारत सरकार ने 2.3 अरब डॉलर के इस रक्षा सौदे को होल्ड पर रख दिया है। वहीं तुर्की के पाकिस्तान का पक्ष लेने की वज़ह से इण्डियन नेवी अब 45,000 टन के बेड़े के 5 बड़े जहाजों के फ्लीट के लिए तुर्की की कम्पनी के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट को भी 'अनिश्चितकाल' तक के लिए होल्ड पर रख सकती है।
मोदी सरकार अपनी एक और कूटनीतिक चाल के तहत साइप्रस में तुर्की के ख़िलाफ़ वहां की आज़ादी को समर्थन देने का भी फैसला ले सकती है। इतना ही नहीं, भारत ने तुर्की द्वारा उत्तरी सीरिया में किए गए आक्रमण की भी कड़ी आलोचना की थी। भारत का कहना है कि कुर्दों के ख़िलाफ़ तुर्की के आक्रमण से आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई कमज़ोर हुई है।
मोदी सरकार के फ़ैसलों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि भारत ने तुर्की को सबक सिखाने का फ़ैसला ले लिया है। तुर्की ने जिस तरह से कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दिया है और कश्मीर मामले पर 'अनर्गल बयानबाज़ी' की है, इसका ख़ामियाज़ा तुर्की को कूटनीतिक और आर्थिक रूप से भुगतना ही पड़ेगा। तुर्की की मुस्लिम देशों का ख़लीफ़ा बनने की मंशा पर मोदी सरकार ने पानी फेरना शुरू कर दिया है, और सऊदी अरब के साथ भारत ने सम्बन्धों को मज़बूत करने के लिए उसके साथ कई समझौते किये हैं। लगता है कि मोदी सरकार की कूटनीति से एक ना एक दिन तुर्की को 'अहसास' हो ही जाएगा कि उसने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देकर बहुत 'बड़ी ग़लती' कर दी है।