आर्थिक सुस्ती मोदी सरकार के सामने लाई एक और कठिन चुनौती!
Thursday - November 7, 2019 1:46 pm ,
Category : WTN HINDI
कई कारणों से बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा
तमाम वित्तीय परेशानियों के बीच राजकोषीय घाटा नियंत्रित करना मोदी सरकार की बड़ी परीक्षा
NOV 07 (WTN) – वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, विश्व की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक सुस्ती ने किसी ना किसी तरह से अपनी चपेट में ले लिया है। आर्थिक सुस्ती का असर भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकास कर रहीं अर्थव्यवस्थाओं पर ज़्यादा पड़ा है। ऑटो सेक्टर से लेकर टैक्सटाइल सेक्टर तक लगभग हर सेक्टर पर आर्थिक सुस्ती का असर देखा जा सकता है। इसी कारण से कई वैश्विक वित्तीय संस्थाओं समेत भारत की कई वित्तीय संस्थाओं और भारत के केन्द्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने चालू वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को कम कर दिया है।
इस सबके बीच आशंका ज़ाहिर की जा रही है कि आर्थिक सुस्ती का असर भारत के राजकोषीय घाटे पर भी पड़ सकता है और यह अनुमान से ज़्यादा रह सकता है। वित्तीय जोखिम से बचाव समेत विभिन्न मुद्दों पर परामर्श देने वाली कम्पनी फिच सॉल्यूशंस ने भारत के राजकोषीय घाटे को लेकर एक अहम बात कही है जो कि मोदी सरकार के लिए चिन्ता का एक कारण बन सकती है।
सबसे पहले तो आप सोच रहे होंगे कि आख़िर राजकोषीय घाटा होता क्या है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राजकोषीय घाटा होता क्या है, दरअसल किसी भी देश की सरकार टैक्स के ज़रिये ही राजस्व जुटाती है। राजस्व जुटाने के साथ ही सरकार ख़र्च भी करती हैं। लेकिन लोक कल्याणकारी अवधारणा के चलते भारत जैसे विकासशील देशों की सरकारों का कुल ख़र्च अपने कुल राजस्व प्राप्ति से ज़्यादा हो जाता है। ऐसी स्थिति में सरकारों को बाज़ार से अतिरिक्त राशि को उधार लेना पड़ता है। यह राशि जो कि सरकारें उधार लेती है वह राजकोषीय घाटे के बराबर होती है। यानी कि किसी सरकार की कुल कमाई और ख़र्च के बीच के अन्तर को ही राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
भारत के राजकोषीय घाटे पर दिये गये अपने अनुमान में फिच ने इस चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के पहले से ज़्यादा होने की बात कही है। फिच सॉल्यूशंस का कहना है कि चालू वित्त वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी का 3.6 प्रतिशत रह सकता है। इससे पहले फिच ने राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। फिच ने अपने अनुमान में भारत के राजकोषीय घाटे को 0.2 प्रतिशत बढ़ाया है यानी कि इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि यदि अनुमान सही साबित होते हैं तो इससे भारत सरकार के खजाने पर बोझ बढ़ेगा।
यह तो था फिच का राजकोषीय घाटे पर अनुमान। वहीं केन्द्र की मोदी सरकार ने 5 जुलाई को पेश किये अपने दूसरे कार्यकाल के पहले पूर्ण बजट में चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को 3.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का अनुमान लगाया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्त वर्ष 2018-19 में भारत सरकार का राजकोषीय घाटा 6.45 लाख करोड़ रुपये रहा था।
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर क्या कारण है कि चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के अनुमान को बढ़ाया गया है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राजकोषीय घाटे के अनुमान को बढ़ाने के पीछे की कई वजहें हैं, जैसे आर्थिक सुस्ती के कारण प्रभावित जीडीपी, जीएसटी कलेक्शन में लगातार जारी गिरावट और कॉरपोरेट टैक्स की दरों में कटौती से राजस्व संग्रह को होने वाला नुकसान। इस सभी कारणों से माना जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे में वृद्धि हो सकती है।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण उद्योगों और सेवा क्षेत्र के काम पर काफ़ी नकारात्मक असर पड़ा है, जिसके कारण चालू वित्त वर्ष में विकास दर प्रभावित होने की बात कही जा रही है। वहीं जीएसटी कलेक्शन भी सरकार की उम्मीद से कम ही हो रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्टूबर महीने का जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से नीचे ही रह गया है। जारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर महीने में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया है। यह लगातार तीसरा महीना है जब जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से कम रहा है।
वहीं आर्थिक सुस्ती से घरेलू कम्पनियों को राहत देने के लिए सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 प्रतिशत से कम करके 22 प्रतिशत कर दिया है। अनुमान है कि केन्द्र सरकार के इस फ़ैसले से क़रीब 1.45 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हो सकती है। फिच ने राजस्व वृद्धि के अपने अनुमान को भी संशोधित करके 13.1 प्रतिशत से घटाकर 8.3 प्रतिशत कर दिया है, जो कि सरकार के 13.2 प्रतिशत बजट अनुमान से काफ़ी कम है।
साफ़ ज़ाहिर है कि इन्हीं सब कारणों के परिणामस्वरूप ही चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। यानी कि सरकार को चालू वित्त वर्ष में राजस्व की प्राप्ति अनुमान से कम हो सकती है और बढ़ते ख़र्च के कारण सरकार को अनुमान से ज़्यादा उधार लेना पड़ सकता है, जिसके कारण राजस्व प्राप्ति की तुलना में ख़र्च ज़्यादा होने से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। अब देखना होगा कि आर्थिक सुस्ती, कम जीएसटी कलेक्शन और अन्य वित्तीय परेशानियों के बीच मोदी सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में सफ़ल रह पाती है कि नहीं?
NOV 07 (WTN) – वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, विश्व की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक सुस्ती ने किसी ना किसी तरह से अपनी चपेट में ले लिया है। आर्थिक सुस्ती का असर भारत और ब्राजील जैसी तेज़ी से विकास कर रहीं अर्थव्यवस्थाओं पर ज़्यादा पड़ा है। ऑटो सेक्टर से लेकर टैक्सटाइल सेक्टर तक लगभग हर सेक्टर पर आर्थिक सुस्ती का असर देखा जा सकता है। इसी कारण से कई वैश्विक वित्तीय संस्थाओं समेत भारत की कई वित्तीय संस्थाओं और भारत के केन्द्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने चालू वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ रेट के अनुमान को कम कर दिया है।
इस सबके बीच आशंका ज़ाहिर की जा रही है कि आर्थिक सुस्ती का असर भारत के राजकोषीय घाटे पर भी पड़ सकता है और यह अनुमान से ज़्यादा रह सकता है। वित्तीय जोखिम से बचाव समेत विभिन्न मुद्दों पर परामर्श देने वाली कम्पनी फिच सॉल्यूशंस ने भारत के राजकोषीय घाटे को लेकर एक अहम बात कही है जो कि मोदी सरकार के लिए चिन्ता का एक कारण बन सकती है।
सबसे पहले तो आप सोच रहे होंगे कि आख़िर राजकोषीय घाटा होता क्या है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राजकोषीय घाटा होता क्या है, दरअसल किसी भी देश की सरकार टैक्स के ज़रिये ही राजस्व जुटाती है। राजस्व जुटाने के साथ ही सरकार ख़र्च भी करती हैं। लेकिन लोक कल्याणकारी अवधारणा के चलते भारत जैसे विकासशील देशों की सरकारों का कुल ख़र्च अपने कुल राजस्व प्राप्ति से ज़्यादा हो जाता है। ऐसी स्थिति में सरकारों को बाज़ार से अतिरिक्त राशि को उधार लेना पड़ता है। यह राशि जो कि सरकारें उधार लेती है वह राजकोषीय घाटे के बराबर होती है। यानी कि किसी सरकार की कुल कमाई और ख़र्च के बीच के अन्तर को ही राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
भारत के राजकोषीय घाटे पर दिये गये अपने अनुमान में फिच ने इस चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के पहले से ज़्यादा होने की बात कही है। फिच सॉल्यूशंस का कहना है कि चालू वित्त वर्ष 2019-20 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी का 3.6 प्रतिशत रह सकता है। इससे पहले फिच ने राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। फिच ने अपने अनुमान में भारत के राजकोषीय घाटे को 0.2 प्रतिशत बढ़ाया है यानी कि इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि यदि अनुमान सही साबित होते हैं तो इससे भारत सरकार के खजाने पर बोझ बढ़ेगा।
यह तो था फिच का राजकोषीय घाटे पर अनुमान। वहीं केन्द्र की मोदी सरकार ने 5 जुलाई को पेश किये अपने दूसरे कार्यकाल के पहले पूर्ण बजट में चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को 3.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का अनुमान लगाया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वित्त वर्ष 2018-19 में भारत सरकार का राजकोषीय घाटा 6.45 लाख करोड़ रुपये रहा था।
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर क्या कारण है कि चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे के अनुमान को बढ़ाया गया है? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राजकोषीय घाटे के अनुमान को बढ़ाने के पीछे की कई वजहें हैं, जैसे आर्थिक सुस्ती के कारण प्रभावित जीडीपी, जीएसटी कलेक्शन में लगातार जारी गिरावट और कॉरपोरेट टैक्स की दरों में कटौती से राजस्व संग्रह को होने वाला नुकसान। इस सभी कारणों से माना जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे में वृद्धि हो सकती है।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण उद्योगों और सेवा क्षेत्र के काम पर काफ़ी नकारात्मक असर पड़ा है, जिसके कारण चालू वित्त वर्ष में विकास दर प्रभावित होने की बात कही जा रही है। वहीं जीएसटी कलेक्शन भी सरकार की उम्मीद से कम ही हो रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अक्टूबर महीने का जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से नीचे ही रह गया है। जारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर महीने में जीएसटी कलेक्शन गिरकर 95,380 करोड़ पर पहुंच गया है। यह लगातार तीसरा महीना है जब जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से कम रहा है।
वहीं आर्थिक सुस्ती से घरेलू कम्पनियों को राहत देने के लिए सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 प्रतिशत से कम करके 22 प्रतिशत कर दिया है। अनुमान है कि केन्द्र सरकार के इस फ़ैसले से क़रीब 1.45 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हो सकती है। फिच ने राजस्व वृद्धि के अपने अनुमान को भी संशोधित करके 13.1 प्रतिशत से घटाकर 8.3 प्रतिशत कर दिया है, जो कि सरकार के 13.2 प्रतिशत बजट अनुमान से काफ़ी कम है।
साफ़ ज़ाहिर है कि इन्हीं सब कारणों के परिणामस्वरूप ही चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। यानी कि सरकार को चालू वित्त वर्ष में राजस्व की प्राप्ति अनुमान से कम हो सकती है और बढ़ते ख़र्च के कारण सरकार को अनुमान से ज़्यादा उधार लेना पड़ सकता है, जिसके कारण राजस्व प्राप्ति की तुलना में ख़र्च ज़्यादा होने से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। अब देखना होगा कि आर्थिक सुस्ती, कम जीएसटी कलेक्शन और अन्य वित्तीय परेशानियों के बीच मोदी सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में सफ़ल रह पाती है कि नहीं?