नई नहीं है शिवसेना और कांग्रेस की नज़दीकियां!
Tuesday - November 12, 2019 3:18 pm ,
Category : WTN HINDI
धुर विरोधी पार्टियों के साथ शिवसेना की सरकार बनाने की कोशिशें
कभी बालासाहेब ठाकरे ने भी किया था कांग्रेस का समर्थन, अब उनके बेटे और पोते मांग रहे कांग्रेस से समर्थन!
NOV 12 (WTN) – महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक उठापटक के बीच शिवसेना और कांग्रेस की नज़दीकियों से एक बार फ़िर से साबित होता है कि भारतीय राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं है। सालों तक एकसाथ रहने और एकसाथ चुनाव लड़ने के बाद भाजपा और शिवसेना की राहें अलग हो चुकी हैं, तो वहीं एक दूसरे की कट्टर राजनीतिक विरोधी रहीं शिवसेना और कांग्रेस के बीच बढ़ती नज़दीकियों ने महाराष्ट्र की सालों पुरानी राजनीति को एक बार फ़िर से ताजा कर दिया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा और शिवसेना वैचारिक रूप से एक दूसरे के काफ़ी क़रीबी रही हैं, लेकिन वहीं कांग्रेस और शिवसेना के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं। लेकिन इतना होने के बाद भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना की जिद के कारण शिवसेना ने सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन देने से साफ़ इन्कार कर दिया। इतना ही नहीं शिवसेना ने ख़ुद को एनडीए से अलग करते हुए कांग्रेस से वैचारिक मतभेद होने के बाद भी उसके साथ सरकार बनाने के लिए चर्चा कर रही है।
वैसे यदि आपको लगता है कि वैचारिक रूप से एक दूसरे की धुर विरोधी पार्टियां शिवसेना और कांग्रेस का नज़दीक आना भारतीय राजनीति के लिए कोई ऐतिहासिक घटना है तो आपका सोचना ग़लत है। यदि आप इतिहास में जाएं तो पता चल जाएगा कि समय-समय पर शिवसेना और कांग्रेस के बीच नज़दीकियां रही हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शिवसेना की स्थापना साल 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने की थी। कहा जाता है कि इन्दिरा गांधी ने ही कम्युनिस्टों के मज़दूर आन्दोलनों को कमज़ोर करने के लिए ही शिवसेना को खड़ा करने में मदद की थी। शिवसेना पर कांग्रेस का इतना प्रभाव था कि शिवसेना को शुरुआती समय में महाराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक के नाम पर 'वसंत सेना' के नाम से पुकारा जाता था।
जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को कांग्रेस के पुराने नेताओं ने पार्टी से निकाल दिया था और अपनी पार्टी को कांग्रेस (O) नाम दिया था, जबकि इन्दिरा गांधी ने अलग कांग्रेस पार्टी बनाई जिसका नाम कांग्रेस (I) था। इन्दिरा गांधी के ख़िलाफ़ खड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ बालासाहेब ठाकरे की नज़दीकी थी और इसी कारण से साल 1971 के चुनाव में बालासाहेब ने कांग्रेस(O) का साथ दिया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में बालासाहेब ने कांग्रेस (O) के साथ गठबन्धन कर तीन प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा किया था, लेकिन चुनाव में इन तीनों ही प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था।
जैसा कि हमने आपको बताया कि शिवसेना को खड़ा करने में ख़ुद इन्दिरा गांधी ने मदद की थी, लेकिन शुरुआत में शिवसेना की छवि एक कट्टर कांग्रेस विरोधी पार्टी की थी। इन्दिरा गांधी से भी कथित नज़दीकियों के बावजूद बालासाहेब ठाकरे अपने कार्टूनों में इन्दिरा गांधी पर जमकर निशाना साधा करते थे। लेकिन आपातकाल के समय अपनी गिरफ़्तारी से बचने के लिए बालासाहेब ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन कर सबको चौंका दिया था।
जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1975 में इन्दिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया था, जिसके बाद चुन चुनकर विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जा रहा था। कहा ये जाता है कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने बालासाहेब ठाकरे के सामने दो ही विकल्प रखे थे, या तो वे दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह गिरफ़्तार होकर जेल चले जाएं या फ़िर आपातकाल के समर्थन का ऐलान कर दें। समय की नज़ाक़त को समझते हुए बालासाहेब ठाकरे ने जेल जाने के बजाय आपातकाल का समर्थन करना ज़्यादा उचित समझा।
बालासाहेब ठाकरे आपातकाल में खुलकर इन्दिरा गांधी के समर्थन में आ गये थे और 1977 के चुनाव में बालासाहेब ठाकरे ने कांग्रेस का समर्थन तक किया था। लेकिन कट्टर हिन्दूवादी छवि वाली शिवेसना को कांग्रेस का साथ देना भारी पड़ गया और 1978 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और बीएमसी चुनाव में शिवसेना की बुरी तरह से हार हुई। इस हार के बाद अपनी ज़मीन खोते देख बालासाहेब ने मुम्बई के शिवाजी पार्क की एक रैली में अपना इस्तीफ़ा तक देने की घोषणा कर दी थी, लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में शिवसैनिकों के विरोध के बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया।
1977 की ही तरह 1980 के लोकसभा चुनाव में भी शिवसेना ने कांग्रेस को समर्थन दिया था। 1980 के लोकसभा चुनाव के समय शिवसेना ने कांग्रेस प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने प्रत्याशी नहीं उतारे थे। कहा जाता है कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर.अन्तुले के साथ बालासाहेब के निजी रिश्ते काफ़ी अच्छे थे, इसी कारण से बालासाहेब ने कांग्रेसी प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे। इतना ही नहीं, बालासाहेब ठाकरे ने प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी का राष्ट्रपति चुनाव के लिए समर्थन तक किया था, जबकि यह दोनों ही कांग्रेस पार्टी से सम्बन्धित थे।
इतिहास साक्षी है कि शिवसेना की कांग्रेस के साथ राजनीतिक नज़दीकी कोई नई बात नहीं है, अब इस नज़ीदीकी को मजबूरी कहा जा सकता है या फ़िर रणनीति। बालासाहेब ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और समय की ज़रूरत के मुताबिक़ वे कांग्रेस के साथ भी रहे और उसका विरोध भी करते रहे। लेकिन एक हिन्दू समर्थक पार्टी के रूप में भाजपा के मजबूत होने से शिवसेना ने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा के साथ सालों तक गठबन्धन किया और राज्य और केन्द्र में सरकार बनाई। लेकिन इस समय शिवसेना की कमान बालासाहेब ठाकरे के हाथ में नहीं बल्कि उनके बेटे उद्धव ठाकरे के हाथों में है, और अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की चाहत में उद्धव ठाकरे, भाजपा से किनारा कर चुके हैं।
एक बार फ़िर से शिवसेना और कांग्रेस की नज़दीकियों से साबित होता है कि सत्ता के लिए भारतीय राजनीति में राजनीतिक पार्टियां के लिए सिद्धांत कोई मायने नहीं रखते हैं। सत्ता हासिल करने के लिए शिवसेना जैसी कट्टर हिन्दूवादी पार्टी कांग्रेस के साथ खड़ी हो सकती है। ऐसे में अब देखना होगा कि क्या शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी जैसी धुर विरोधी पार्टियों के साथ पोस्ट इलेक्शन गठबंधन कर सरकार बनाने में कामयाब हो पाती है कि नहीं?
NOV 12 (WTN) – महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक उठापटक के बीच शिवसेना और कांग्रेस की नज़दीकियों से एक बार फ़िर से साबित होता है कि भारतीय राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं है। सालों तक एकसाथ रहने और एकसाथ चुनाव लड़ने के बाद भाजपा और शिवसेना की राहें अलग हो चुकी हैं, तो वहीं एक दूसरे की कट्टर राजनीतिक विरोधी रहीं शिवसेना और कांग्रेस के बीच बढ़ती नज़दीकियों ने महाराष्ट्र की सालों पुरानी राजनीति को एक बार फ़िर से ताजा कर दिया है।
जैसा कि आप जानते हैं कि भाजपा और शिवसेना वैचारिक रूप से एक दूसरे के काफ़ी क़रीबी रही हैं, लेकिन वहीं कांग्रेस और शिवसेना के बीच वैचारिक मतभेद रहे हैं। लेकिन इतना होने के बाद भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत ना मिलने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना की जिद के कारण शिवसेना ने सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन देने से साफ़ इन्कार कर दिया। इतना ही नहीं शिवसेना ने ख़ुद को एनडीए से अलग करते हुए कांग्रेस से वैचारिक मतभेद होने के बाद भी उसके साथ सरकार बनाने के लिए चर्चा कर रही है।
वैसे यदि आपको लगता है कि वैचारिक रूप से एक दूसरे की धुर विरोधी पार्टियां शिवसेना और कांग्रेस का नज़दीक आना भारतीय राजनीति के लिए कोई ऐतिहासिक घटना है तो आपका सोचना ग़लत है। यदि आप इतिहास में जाएं तो पता चल जाएगा कि समय-समय पर शिवसेना और कांग्रेस के बीच नज़दीकियां रही हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शिवसेना की स्थापना साल 1966 में बालासाहेब ठाकरे ने की थी। कहा जाता है कि इन्दिरा गांधी ने ही कम्युनिस्टों के मज़दूर आन्दोलनों को कमज़ोर करने के लिए ही शिवसेना को खड़ा करने में मदद की थी। शिवसेना पर कांग्रेस का इतना प्रभाव था कि शिवसेना को शुरुआती समय में महाराष्ट्र के उस समय के मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक के नाम पर 'वसंत सेना' के नाम से पुकारा जाता था।
जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को कांग्रेस के पुराने नेताओं ने पार्टी से निकाल दिया था और अपनी पार्टी को कांग्रेस (O) नाम दिया था, जबकि इन्दिरा गांधी ने अलग कांग्रेस पार्टी बनाई जिसका नाम कांग्रेस (I) था। इन्दिरा गांधी के ख़िलाफ़ खड़े कांग्रेसी नेताओं के साथ बालासाहेब ठाकरे की नज़दीकी थी और इसी कारण से साल 1971 के चुनाव में बालासाहेब ने कांग्रेस(O) का साथ दिया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में बालासाहेब ने कांग्रेस (O) के साथ गठबन्धन कर तीन प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा किया था, लेकिन चुनाव में इन तीनों ही प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था।
जैसा कि हमने आपको बताया कि शिवसेना को खड़ा करने में ख़ुद इन्दिरा गांधी ने मदद की थी, लेकिन शुरुआत में शिवसेना की छवि एक कट्टर कांग्रेस विरोधी पार्टी की थी। इन्दिरा गांधी से भी कथित नज़दीकियों के बावजूद बालासाहेब ठाकरे अपने कार्टूनों में इन्दिरा गांधी पर जमकर निशाना साधा करते थे। लेकिन आपातकाल के समय अपनी गिरफ़्तारी से बचने के लिए बालासाहेब ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन कर सबको चौंका दिया था।
जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1975 में इन्दिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया था, जिसके बाद चुन चुनकर विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जा रहा था। कहा ये जाता है कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने बालासाहेब ठाकरे के सामने दो ही विकल्प रखे थे, या तो वे दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह गिरफ़्तार होकर जेल चले जाएं या फ़िर आपातकाल के समर्थन का ऐलान कर दें। समय की नज़ाक़त को समझते हुए बालासाहेब ठाकरे ने जेल जाने के बजाय आपातकाल का समर्थन करना ज़्यादा उचित समझा।
बालासाहेब ठाकरे आपातकाल में खुलकर इन्दिरा गांधी के समर्थन में आ गये थे और 1977 के चुनाव में बालासाहेब ठाकरे ने कांग्रेस का समर्थन तक किया था। लेकिन कट्टर हिन्दूवादी छवि वाली शिवेसना को कांग्रेस का साथ देना भारी पड़ गया और 1978 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और बीएमसी चुनाव में शिवसेना की बुरी तरह से हार हुई। इस हार के बाद अपनी ज़मीन खोते देख बालासाहेब ने मुम्बई के शिवाजी पार्क की एक रैली में अपना इस्तीफ़ा तक देने की घोषणा कर दी थी, लेकिन नाटकीय घटनाक्रम में शिवसैनिकों के विरोध के बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया।
1977 की ही तरह 1980 के लोकसभा चुनाव में भी शिवसेना ने कांग्रेस को समर्थन दिया था। 1980 के लोकसभा चुनाव के समय शिवसेना ने कांग्रेस प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने प्रत्याशी नहीं उतारे थे। कहा जाता है कि महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर.अन्तुले के साथ बालासाहेब के निजी रिश्ते काफ़ी अच्छे थे, इसी कारण से बालासाहेब ने कांग्रेसी प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये थे। इतना ही नहीं, बालासाहेब ठाकरे ने प्रतिभा पाटिल और प्रणव मुखर्जी का राष्ट्रपति चुनाव के लिए समर्थन तक किया था, जबकि यह दोनों ही कांग्रेस पार्टी से सम्बन्धित थे।
इतिहास साक्षी है कि शिवसेना की कांग्रेस के साथ राजनीतिक नज़दीकी कोई नई बात नहीं है, अब इस नज़ीदीकी को मजबूरी कहा जा सकता है या फ़िर रणनीति। बालासाहेब ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और समय की ज़रूरत के मुताबिक़ वे कांग्रेस के साथ भी रहे और उसका विरोध भी करते रहे। लेकिन एक हिन्दू समर्थक पार्टी के रूप में भाजपा के मजबूत होने से शिवसेना ने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा के साथ सालों तक गठबन्धन किया और राज्य और केन्द्र में सरकार बनाई। लेकिन इस समय शिवसेना की कमान बालासाहेब ठाकरे के हाथ में नहीं बल्कि उनके बेटे उद्धव ठाकरे के हाथों में है, और अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की चाहत में उद्धव ठाकरे, भाजपा से किनारा कर चुके हैं।
एक बार फ़िर से शिवसेना और कांग्रेस की नज़दीकियों से साबित होता है कि सत्ता के लिए भारतीय राजनीति में राजनीतिक पार्टियां के लिए सिद्धांत कोई मायने नहीं रखते हैं। सत्ता हासिल करने के लिए शिवसेना जैसी कट्टर हिन्दूवादी पार्टी कांग्रेस के साथ खड़ी हो सकती है। ऐसे में अब देखना होगा कि क्या शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी जैसी धुर विरोधी पार्टियों के साथ पोस्ट इलेक्शन गठबंधन कर सरकार बनाने में कामयाब हो पाती है कि नहीं?