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...तो अब भूल जाइये मोबाइल में मुफ़्त में कॉलिंग और सस्ते डेटा टैरिफ को!

Wednesday - November 20, 2019 12:56 pm , Category : WTN HINDI
टेलीकॉम कम्पनियां बढ़ाने जा रही हैं टैरिफ प्लान
टेलीकॉम कम्पनियां बढ़ाने जा रही हैं टैरिफ प्लान

घाटे के चलते टेलीकॉम कम्पनियां ने मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा से की तौबा

NOV 20 (WTN) – एक समय था जब भारत में मोबाइल फ़ोन पर बातें करना और मोबाइल का इंटरनेट डेटा काफ़ी महंगा हुआ करता था। लेकिन साल 2016 में रिलांयस जियो के बाज़ार में आने के बाद भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गये। जियो की मुफ़्त में कॉलिंग और सबसे सस्ते मोबाइल डेटा के कारण भारत में स्मार्टफ़ोन की बिक्री में रिकॉर्ड इज़ाफ़ा हुआ। देखते ही देखते रिलांयस जियो की सिम हर मोबाइल फ़ोन में पाई जाने लगी। जियो के इस धमाके के बाद से अन्य टेलीकॉम कम्पनियों के व्यापार पर काफ़ी विपरित असर पड़ा, और जियो से टक्कर लेने और अपना अस्तित्व बचाने के लिए इन कम्पनियों को भी कॉलिंग और डेटा के दामों में ऐतिहासिक गिरावट करनी पड़ी।
 
लेकिन जियो अपनी फ्री कॉलिंग और सबसे सस्ते डेटा वाले टैरिफ के साथ टेलीकॉम सेक्टर में धीरे-धीरे अपनी बढ़त बनाने में कामयाब रहा, और आज कि तारीख़ में भारत में सबसे ज़्यादा उपभोक्ता जियो टेलीकॉम के ही हैं। जियो से मिली ऐतिहासिक चुनौती और जियो के मास्टर स्ट्रोक से देश की बाक़ी टेलीकॉम कम्पनियों को बहुत बड़ा घाटा उठाना पड़ा है, और ये कम्पनियां पूरी कोशिश के बाद भी ना तो जियो का मुक़ाबला कर सकीं और ना ही अपने घाटे को पूरा कर सकी हैं।
 
मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा के आदी बन चुके भारतीय टेलीकॉम उपभोक्ताओं को अब शायद यह जानकर झटका लगे कि जल्द ही उन्हें कॉलिंग के लिए पैसा चुकाना होगा और डेटा भी पहले की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत महंगा होना जा रहा है यानी कि अब टैरिफ महंगा होने जा रहा है। जीहां जियो द्वारा जियो से अन्य नेटवर्क पर मुफ़्त कॉलिंग बंद किये जाने के बाद अब वोडाफ़ोन आइडिया और एयरटेल जैसी टेलीकॉम कम्पनियां 1 दिसम्बर से अपना टैरिफ बढ़ाने जा रहे हैं। जैसा कि आप जानते ही हैं कि हाल ही में रिलायंस जियो ने इंटरकनेक्ट यूजर चार्ज (IUC) का हवाला देते हुए नॉन जियो कॉलिंग के लिए पैसे लेने शुरू किए हैं। वहीं अब एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) जैसी समस्याओं के कारण सभी टेलीकॉम कम्पनियों को भारी नुकसान हो रहा है, और इसी कारण अब मोबाइल पर बातें करना और डेटा का इस्तेमाल महंगा होने जा रहा है।
 
जियो के साथ मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा की प्रतिस्पर्धा में वोडाफ़ोन आइडिया को तो भारतीय कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा घाटा हुआ है। इसलिए फ़िलहाल टेलीकॉम कम्पनियां टैरिफ बढ़ाकर अपनी आय कुछ हद तक बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। हालांकि, वैसे रिलायंस जियो का टैरिफ अब भी बाक़ी कम्पनियों की तुलना में काफ़ी कम है, ऐसे में अन्य टेलीकॉम कम्पनियों को हर रोज़ करोड़ों का घाटा रोज़ उठाना पड़ रहा है।
 
लेकिन यदि अन्य टेलीकॉम कम्पनियां कुछ हद तक घाटा पूरा करने के लिए अपना टैरिफ बढ़ाती हैं तो स्वाभाविक है कि उनके ग्राहक जियो की ओर आकर्षित हो सकते हैं। दरअसल, जियो की लॉन्चिंग के बाद से ही एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी बड़ी टेलीकॉम कम्पनियों की आर्थिक हालत काफ़ी ख़राब हो गई है, क्योंकि यह कम्पनियां जियो की मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा की रणनीति का मुक़ाबला नहीं कर सकीं।
 
जियो से कॉरपोरेट प्रतिस्पर्धा तो अन्य टेलीकॉम कम्पनियों को नुकसान पहुंचा ही रही है, लेकिन टेलीकॉम कम्पनियों की असली बर्बादी का कारण है केन्द्र सरकार द्वारा वसूला जाने वाला एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR)। कहा जाता है कि इसी टैक्स के कारण टेलीकॉम कम्पनियां कंगाल होने के कगार पर आ गई हैं। यह घाटा इतना है कि टेलीकॉम कम्पनी वोडाफ़ोन आइडिया को चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अब तक का सबसे बड़ा 50,921 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है, जो कि भारतीय कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा घाटा है। वहीं एयरटेल को चालू वित्त वर्ष की जुलाई-सितम्बर की तिमाही में 23,045 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है।
 
अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर यह AGR यानी एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू क्या है और इसे सरकार टेलीकॉम कम्पनियों से क्यों वसूलती है, तो आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं। दरअसल, एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा टेलीकॉम कम्पनियों से लिया जाने वाली यूज़ेज और लाइसेंसिग फीस है। इसके दो हिस्से होते हैं, एक हिस्सा स्पेक्ट्रम यूज़ेज चार्ज होता है जो कि 3 से 5 प्रतिशत होता है वहीं दूसरा हिस्सा लाइसेंसिंग फीस, जो कि क़रीब 8 प्रतिशत होता है।
 
AGR के बारे में दूरसंचार विभाग का कहना है कि AGR की गणना किसी टेलीकॉम कम्पनी को होने वाली सम्पूर्ण आय या रेवेन्यू के आधार पर होनी चाहिए, जिसमें डिपॉजिट इंट्रेस्ट और एसेट बिक्री जैसे गैर टेलीकॉम स्रोत से हुई आय भी शामिल हो। लेकिन वहीं इस बारे में टेलीकॉम कम्पनियों का तर्क है कि AGR की गणना सिर्फ़ टेलीकॉम सेवाओं से होने वाली आय के आधार पर ही होनी चाहिए।
 
मामला बढ़ने के बाद जब यह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्टूबर, 2019 के अपने आदेश में दूरसंचार विभाग के रुख को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में दूरसंचार विभाग को टेलीकॉम कम्पनियों से क़रीब 94,000 करोड़ रुपये बतौर AGR वसूलने की इज़ाज़त दे दी है। एयरटेल को इसके तहत 43,000 करोड़ रुपये और वोडाफ़ोन आइडिया को 40,000 करोड़ रुपये देने होंगे और इसके लिए अन्तिम तिथि 24 जनवरी है। हालांकि, इसमें ब्याज और जुर्माना जोड़ दिया जाए तो यह राशि बढ़कर 1.3 लाख करोड़ रुपये होती है।
 
अब चूंकि सरकार टेलीकॉम कम्पनियों से AGR वसूलती है, जिसके कारण टेलीकॉम कम्पनियों का बोझ बढ़ जाता है और उन्हें घाटा उठाना पड़ रहा है। इस बारे में वोडाफोन आइडिया का कहना है कि टेलीकॉम सेक्टर की मुश्किल के कारण टैरिफ में बढ़ोतरी मज़बूरी हो गई है। यानी कि जियो से मिलने वाली चुनौती और अन्य कारणों से पहले से ही टेलीकॉम कम्पनियों की आर्थिक हालत ख़राब थी, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का AGR वसूलने का फ़ैसला उनके लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ है। अब लगातार हो रहे घाटे के कारण टेलीकॉम कम्पनियों को AGR के लिए प्रॉविजनिंग करनी पड़ रही है यानी कि इसके लिए एक तय राशि उन्हें अलग रखनी पड़ रही है।
 
यानी कि साफ़ है कि कई तरह की चुनौतियों और परेशानियों के कारण अब टेलीकॉम कम्पनियां मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा की नीति को आगे जारी नहीं रख सकती हैं। पहले से ही घाटे में चल रही टेलीकॉम कम्पनियों ने यदि टैरिफ में इज़ाफ़ा नहीं किया तो आने वाले दिनों में घाटे में चल रही यह कम्पनियां ख़ुद को दिवालिया घोषित कर सकती हैं। ऐसे में आने वाले समय में मुफ़्त कॉलिंग और सस्ते डेटा का लाभ अब शायद आपको ना मिले, क्योंकि घाटे में चल रही टेलीकॉम कम्पनियों की आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वे इसे अब आगे जारी रख सकें।