BrahMos WORLD INDIA MADHYA PRADESH BHOPAL WTN SPECIAL GOSSIP CORNER RELIGION SPORTS BUSINESS FUN FACTS ENTERTAINMENT LIFESTYLE TRAVEL ART & LITERATURE SCIENCE & TECHNOLOGY HEALTH EDUCATION DIASPORA OPINION & INTERVIEW RECIPES DRINKS BIG MEMSAAB 2017 BUDGET 2017 FUNNY VIDEOS VIRAL ON WEB PICTURE STORIES Mahakal Ke Darshan
WTN HINDI ABOUT US PRIVACY POLICY SITEMAP CONTACT US
logo
Breaking News

दलबदल विरोधी क़ानून में ‘फंस’ सकता है महाराष्ट्र का वर्तमान ‘राजनीतिक ड्रामा’!

Saturday - November 23, 2019 11:46 am , Category : WTN HINDI
अजित पवार समेत अपने कुछ विधायकों के ख़िलाफ़ कोर्ट जा सकती है एनसीपी
अजित पवार समेत अपने कुछ विधायकों के ख़िलाफ़ कोर्ट जा सकती है एनसीपी

दलबदल विरोधी क़ानून के तहत 'संकट' में है देवेन्द्र फडणवीस की सरकार!
 
NOV 23 (WTN) – भारत की राजनीति में कुछ भी कभी भी असम्भव नहीं है, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है महाराष्ट्र का वर्तमान घटनाक्रम जिसने सभी भी चौका दिया है। जैसा कि आप जानते हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हुआ है, जिसमें महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक धड़े के साथ मिलकर सरकार बना ली है। अचानक बदले राजनीतिक घटनाक्रम में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भाजपा के देवेन्द्र फडणनीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। वहीं देवेन्द्र फडणवीस के साथ शपथ लेने वाले एनसीपी नेता अजित पवार को इस गठबंधन सरकार का उप मुख्यमंत्री बनाया गया है।
 
जानकारी के मुताबिक़, शरद पवार के भतीजे अजित पवार के पास एनसीपी के कुल 20 से 25 विधायकों का समर्थन है। अजित पवार के उप मुख्यमंत्री बनने पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम से वे अनजान हैं और अजित पवार ने जो भी फ़ैसला लिया है वो उनकी मर्जी से लिया गया है। हालांकि, इस बारे में अजित पवार का कहना है कि वो अपने इस सम्भावित राजनीतिक क़दम के बारे में शरद पवार को पहले ही बता चुके थे।

वैसे यह सभी जानते हैं कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार ही सर्वेसर्वा हैं और उनकी मर्जी से ही एनसीपी द्वारा कोई भी राजनीतिक फ़ैसला लिया जाता है। ऐसे में जबकि अजित पवार एनसीपी के कुछ विधायकों को साथ लेकर भाजपा के साथ सरकार बना चुके हैं, तो सवाल उठता है कि क्या इस पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी विरोध दर्ज कराएगी?
 
अब सवाल उठता है कि यदि एनसीपी विधायकों के टूटने की आशंका के बाद कोर्ट में जाती है, तो क्या यह मामला भी कर्नाटक की तरह दलबदल विरोधी क़ानून में बदल सकता है? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि वर्तमान दलबदल क़ानून के अनुसार, अगर एक पार्टी के सदस्य अगर दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहते हैं तो पहली पार्टी के कम से दो-तिहाई सदस्यों की सहमति ज़रूरी है। हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने 54 सीटों पर जीत हासिल की है।

मौजूदा दलबदल विरोधी क़ानून के मुताबिक़, यदि अजित पवार को भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनानी है तो एनसीपी के दो तिहाई यानी कि 41 विधायकों के समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन कहा जा रहा है कि एनसीपी के क़रीब 20 से 25 विधायकों ने ही भाजपा सरकार को समर्थन का दावा किया है, ऐसे में हो सकता है कि महाराष्ट्र में सरकार गठन को कोर्ट में चुनौती मिले।
 
वर्तमान दलबदल क़ानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में है। दल-बदल विरोधी क़ानून को साल 1985 में 52 वें संविधान संशोधन के बाद संविधान में शामिल किया गया था। दरअसल, दलबदल विरोधी क़ानून की ज़रूरत तब महसूस हुई, जब सांसद और विधायक राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी लाइन से अलग जाकर किसी भी सरकार या पक्ष का समर्थन कर देते थे, और ऐसा होने से राजनीति में असवरवादिता और अस्थिरता बढ़ती जा रही थी।

इन्हीं सब कारणों से संविधान में संशोधन कर दल-बदल विरोधी क़ानून को लाया गया। इस क़ानून के मुताबिक, यदि कोई सदस्य सदन में पार्टी व्हिप के ख़िलाफ़ मतदान करे ; यदि कोई सदस्य अपनी इच्छा से इस्तीफ़ा दे दे;  चुनाव जीतने के बाद यदि कोई निर्दलीय किसी दल में चला जाए या यदि कोई मनोनीत सदस्य कोई पार्टी की सदस्यता ले लेता है तो सदन से उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।
 
हालांकि, साल 1985 में क़ानून बनने के बाद भी सालों तक सांसदों और विधायकों की अदला-बदली पर कोई ख़ास लगाम नहीं पाई। इसके बाद साल साल 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ़ एक व्यक्ति ही नहीं, यदि सांसद या विधायक सामूहिक रूप से भी दल बदल लेते हैं तो इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाएगा। इसी के साथ इसी संशोधन में इस क़ानून की धारा 3 को भी ख़त्म कर दिया गया। इसी धारा के तहत किसी भी पार्टी के एक तिहाई सदस्य दल बदल सकते थे। लेकिन अब दल बदलने के लिए पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति ज़रूरी है।
 
महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीतिक स्थिति से स्पष्ट है कि अजित पवार ने यदि एनसीपी के 20 से 25 विधायकों के साथ मिलकर भाजपा सरकार को समर्थन दिया है, तो दलबदल विरोधी क़ानून के मुताबिक़ यह असंवैधानिक है। अब देखना होगा कि अजित पवार और उनके एनसीपी समर्थित विधायकों के रूख पर क्या कुछ क़दम शरद पवार की पार्टी एनसीपी उठाती है? वैसे अजित पवार का दावा है कि उन्होंने जो भी राजनीतिक क़दम उठाया है इसकी जानकारी वे शरद पवार को दे चुके हैं, ऐसे में अब देखना होगा कि महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े खिलाड़ी शरद पवार क्या कुछ कहते हैं और क्या कुछ करते हैं?