क्या हक़ीक़त बन पाएगा सिन्धुदेश?
Saturday - November 23, 2019 2:21 pm ,
Category : WTN HINDI
अत्याचार के ख़िलाफ़ अलग सिन्धुदेश की मांग
पाकिस्तान से अलग होने के लिए सिन्धियों ने खोला ‘मोर्चा’
NOV 23 (WTN) – सरकार और सेना द्वारा आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देने, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अत्याचार और बदहाल आर्थिक स्थिति यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि पाकिस्तान एक असफ़ल राष्ट्र है। पूरी दुनिया में दिखाने के लिए पाकिस्तान में लोकतंत्र है, लेकिन वास्तव में पाकिस्तान में वहां की सेना का वहां की चुनी हुई सरकार पर पूरी तरह से नियंत्रण रहता है। पाकिस्तान का इतिहास साक्षी रहा है कि पाकिस्तान में सेना ने कई बार चुनी हुई सरकारों का तख्तापलट किया है।
दरअसल, पाकिस्तानी सेना अपने ही देश के लोगों पर अत्याचार करने के लिए कुख्यात है। पीओके, बलुचिस्तान और सिन्ध जैसे इलाकों में रहने वालों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की सेना का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है, और अब इस इलाकों में रहने वाले लोग पाकिस्तान से आज़ाद होने की मांग जोर शोर से करने लगे हैं।
पाकिस्तान से आज़ादी की मांग पाकिस्तान की आर्थिक राजनीति कराची से उठी है, जहां हज़ारों लोगों ने अलग सिन्धुदेश की मांग को दोहराते हुए जोरदार तरीक़े से विरोध प्रदर्शन किया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब अलग सिन्धुदेश की मांग कराची से गई है। दरअसल, सिन्धियों के नेता गुलाम मुर्तजा सईद ने काफ़ी लम्बे समय तक अलग सिन्धुदेश की मांग के लिए लड़ाई लड़ी थी।
अलग सिन्धुदेश की मांग कर रहे लोगों पर पाकिस्तानी सरकार और सेना के अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। अलग सिन्धुदेश की मांग को दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने आन्दोलन कर रहे लोगों पर देश, सरकार, राज्य संस्थानों के ख़िलाफ़ नारेबाजी, विद्रोह, आतंकवाद और आपराधिक साजिश की कई धाराओं के तहत मामले दर्ज किये हैं।
लेकिन पाकिस्तान सरकार के इन अत्याचारों के ख़िलाफ़ सिन्धुदेश की मांग बढ़ती ही जा रही है।
पाकिस्तान सरकार और सेना के अत्याचार के ख़िलाफ़ दशकों से सिन्धी लोग एक अलग सिन्धुदेश की मांग करते आ रहे हैं। भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद साल 1972 से ही सिन्धियों की अलग सिन्धुदेश की मांग चलती आ रही है। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने बांग्लादेश की आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान से अलग होने के लिए आंदोलन की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे उन्होंने ही पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में सिन्धी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और अलग सिन्धुदेश के लिए आन्दोलन किये।
दरअसल, सिन्धी भाषा की पहचान और सिन्धियों के आत्मस्वाभिमान के लिए अलग सिन्धुदेश का आंदोलन पूर्वी पाकिस्तान में हुए बांग्ला आंदोलन से प्रेरित था। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने इसे पंजाबियों और मोहाजिरों के अत्याचार के ख़िलाफ़ मुक्ति आंदोलन की तरह इस्तेमाल किया। पाकिस्तान में उठे इस बड़े आन्दोलन को विदेशों में रह रहे सिन्धियों का पूरा समर्थन हासिल रहा है, जिसमें भारतीय सिन्धी भी शामिल हैं। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने सिन्धुदेश आन्दोलन को लेकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कई किताबें भी लिखीं थी। साल 1995 में अपनी मृत्यु तक वे अलग सिन्धुदेश आन्दोलन से जुड़े रहे।
लेकिन सईद के निधन के बाद अलग सिन्धुदेश का आन्दोलन क़रीब एक दशक तक शान्त रहा, लेकिन साल 2007 में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टो की हत्या के बाद इस आन्दोलन में फ़िर से तेज़ी देखने को मिली और अलग सिन्धुदेश के लिए सिन्धियों ने एक बार फ़िर से आन्दोलन शुरू कर किया। धीरे-धीरे अलग सिन्धुदेश आन्दोलन के लिए अलग-अलग संगठनों जिये सिन्धु कौमी महाज (JSQM) और वर्ल्ड सिन्धी कांग्रेस का समर्थन मिलना शुरू हो गया।
साल 2012 में कराची में जिये सिन्धु कौमी महाज (JSQM) ने सिन्धुदेश के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली थी। इस रैली में JSQM के नेता बशीर खान कुरैशी ने उर्दू भाषी लोगों से भी सिन्धुदेश आन्दोलन के लिए मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तानी सरकार और वहां की सेना के कारण अलग सिन्धुदेश के आन्दोलन को पूरी तरह दबाने की कोशिश कामयाब ना हो सके।
दरअसल, पाकिस्तान में रहने वाले सिन्धियों की मांग है कि पाकिस्तान में सिन्धी भाषा और संस्कृति पर ख़तरा मण्डरा रहा है। पाकिस्तान की सरकार जबरदस्ती उन पर उर्दू थोपना चाहती है। वहीं पाकिस्तान के सिन्धी समुदाय का कहना है कि सिन्ध अपने आप में एक अलग राष्ट्र है, लेकिन पाकिस्तान ने उस पर जबरन कब्जा कर रखा है। सिन्धियों को डर है कि जैसे कि पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला भाषा और संस्कृति को ख़त्म करने की कोशिश की थी वैसे ही कोशिश पाकिस्तान की सेना सिन्धी भाषा और संस्कृति के साथ कर रही है।
पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति के जानकारों के मुताबिक़, पीओके और बलुचिस्तान के साथ मिलकर यदि सिन्धियों ने अलग देश की मांग एक साथ कर दी तो पाकिस्तानी सरकार और सेना के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। दरअसल, सालों से सिन्धी और बलूच समुदाय के लोग पाकिस्तानी सेना के अत्याचार को सहते आ रहे हैं, ऐसे में सिन्धियों और बलुचियों ने यदि एक साथ मिलकर अलग देश के लिए आन्दोलन कर दिया, तो इसे सम्भालना पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए काफ़ी कठिन होगा, क्योंकि महंगाई और बदतर आर्थिक हालत के कारण पाकिस्तानी जनता में अन्दर ही अन्दर असंतोष पनप रहा है।
NOV 23 (WTN) – सरकार और सेना द्वारा आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देने, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अत्याचार और बदहाल आर्थिक स्थिति यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि पाकिस्तान एक असफ़ल राष्ट्र है। पूरी दुनिया में दिखाने के लिए पाकिस्तान में लोकतंत्र है, लेकिन वास्तव में पाकिस्तान में वहां की सेना का वहां की चुनी हुई सरकार पर पूरी तरह से नियंत्रण रहता है। पाकिस्तान का इतिहास साक्षी रहा है कि पाकिस्तान में सेना ने कई बार चुनी हुई सरकारों का तख्तापलट किया है।
दरअसल, पाकिस्तानी सेना अपने ही देश के लोगों पर अत्याचार करने के लिए कुख्यात है। पीओके, बलुचिस्तान और सिन्ध जैसे इलाकों में रहने वालों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की सेना का अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है, और अब इस इलाकों में रहने वाले लोग पाकिस्तान से आज़ाद होने की मांग जोर शोर से करने लगे हैं।
पाकिस्तान से आज़ादी की मांग पाकिस्तान की आर्थिक राजनीति कराची से उठी है, जहां हज़ारों लोगों ने अलग सिन्धुदेश की मांग को दोहराते हुए जोरदार तरीक़े से विरोध प्रदर्शन किया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब अलग सिन्धुदेश की मांग कराची से गई है। दरअसल, सिन्धियों के नेता गुलाम मुर्तजा सईद ने काफ़ी लम्बे समय तक अलग सिन्धुदेश की मांग के लिए लड़ाई लड़ी थी।
अलग सिन्धुदेश की मांग कर रहे लोगों पर पाकिस्तानी सरकार और सेना के अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं। अलग सिन्धुदेश की मांग को दबाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने आन्दोलन कर रहे लोगों पर देश, सरकार, राज्य संस्थानों के ख़िलाफ़ नारेबाजी, विद्रोह, आतंकवाद और आपराधिक साजिश की कई धाराओं के तहत मामले दर्ज किये हैं।
लेकिन पाकिस्तान सरकार के इन अत्याचारों के ख़िलाफ़ सिन्धुदेश की मांग बढ़ती ही जा रही है।
पाकिस्तान सरकार और सेना के अत्याचार के ख़िलाफ़ दशकों से सिन्धी लोग एक अलग सिन्धुदेश की मांग करते आ रहे हैं। भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद साल 1972 से ही सिन्धियों की अलग सिन्धुदेश की मांग चलती आ रही है। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने बांग्लादेश की आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान से अलग होने के लिए आंदोलन की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे उन्होंने ही पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में सिन्धी राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और अलग सिन्धुदेश के लिए आन्दोलन किये।
दरअसल, सिन्धी भाषा की पहचान और सिन्धियों के आत्मस्वाभिमान के लिए अलग सिन्धुदेश का आंदोलन पूर्वी पाकिस्तान में हुए बांग्ला आंदोलन से प्रेरित था। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने इसे पंजाबियों और मोहाजिरों के अत्याचार के ख़िलाफ़ मुक्ति आंदोलन की तरह इस्तेमाल किया। पाकिस्तान में उठे इस बड़े आन्दोलन को विदेशों में रह रहे सिन्धियों का पूरा समर्थन हासिल रहा है, जिसमें भारतीय सिन्धी भी शामिल हैं। सिन्धियों के नेता जीएम सईद ने सिन्धुदेश आन्दोलन को लेकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कई किताबें भी लिखीं थी। साल 1995 में अपनी मृत्यु तक वे अलग सिन्धुदेश आन्दोलन से जुड़े रहे।
लेकिन सईद के निधन के बाद अलग सिन्धुदेश का आन्दोलन क़रीब एक दशक तक शान्त रहा, लेकिन साल 2007 में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टो की हत्या के बाद इस आन्दोलन में फ़िर से तेज़ी देखने को मिली और अलग सिन्धुदेश के लिए सिन्धियों ने एक बार फ़िर से आन्दोलन शुरू कर किया। धीरे-धीरे अलग सिन्धुदेश आन्दोलन के लिए अलग-अलग संगठनों जिये सिन्धु कौमी महाज (JSQM) और वर्ल्ड सिन्धी कांग्रेस का समर्थन मिलना शुरू हो गया।
साल 2012 में कराची में जिये सिन्धु कौमी महाज (JSQM) ने सिन्धुदेश के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली थी। इस रैली में JSQM के नेता बशीर खान कुरैशी ने उर्दू भाषी लोगों से भी सिन्धुदेश आन्दोलन के लिए मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तानी सरकार और वहां की सेना के कारण अलग सिन्धुदेश के आन्दोलन को पूरी तरह दबाने की कोशिश कामयाब ना हो सके।
दरअसल, पाकिस्तान में रहने वाले सिन्धियों की मांग है कि पाकिस्तान में सिन्धी भाषा और संस्कृति पर ख़तरा मण्डरा रहा है। पाकिस्तान की सरकार जबरदस्ती उन पर उर्दू थोपना चाहती है। वहीं पाकिस्तान के सिन्धी समुदाय का कहना है कि सिन्ध अपने आप में एक अलग राष्ट्र है, लेकिन पाकिस्तान ने उस पर जबरन कब्जा कर रखा है। सिन्धियों को डर है कि जैसे कि पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला भाषा और संस्कृति को ख़त्म करने की कोशिश की थी वैसे ही कोशिश पाकिस्तान की सेना सिन्धी भाषा और संस्कृति के साथ कर रही है।
पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति के जानकारों के मुताबिक़, पीओके और बलुचिस्तान के साथ मिलकर यदि सिन्धियों ने अलग देश की मांग एक साथ कर दी तो पाकिस्तानी सरकार और सेना के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। दरअसल, सालों से सिन्धी और बलूच समुदाय के लोग पाकिस्तानी सेना के अत्याचार को सहते आ रहे हैं, ऐसे में सिन्धियों और बलुचियों ने यदि एक साथ मिलकर अलग देश के लिए आन्दोलन कर दिया, तो इसे सम्भालना पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए काफ़ी कठिन होगा, क्योंकि महंगाई और बदतर आर्थिक हालत के कारण पाकिस्तानी जनता में अन्दर ही अन्दर असंतोष पनप रहा है।