‘इस कारण’ से जल्द ही बढ़ने वाली है महंगाई!
Monday - November 25, 2019 1:36 pm ,
Category : WTN HINDI
डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर रुपये से बढ़ेंगे वस्तुओं के दाम
आर्थिक मंदी और ट्रेड वॉर के कारण भारतीय अर्थव्यस्था को लगेगा एक और ‘बड़ा झटका’
NOV 25 (WTN) – अब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सिर्फ़ उस देश की परिस्थितियां ही प्रभावित नहीं करती हैं, बल्कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में विश्व की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से इस तरह से सम्बन्धित हैं कि लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था अब वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर का असर दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाएं पर सीधे-सीधे पड़ा है। वहीं वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण भी पूरी दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं किसी ना किसी कारण से प्रभावित हुई हैं।
इन सबसे बीच, आशंका व्यक्त की जा रही है कि एशिया की ताक़तवर करेंसियों में से एक भारतीय रुपये में इस तिमाही में कमज़ोरी आ सकती है, और यदि ऐसा होता है तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। दरअसल, तमाम तरह के आर्थिक घटनाक्रमों को देखते हुए एक रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6 साल के सबसे निचले स्तर पर जा सकती है।
भारतीय करेंसी रुपये के उतार चढ़ाव का विश्लेषण करने वालों के मुताबिक़, रुपया इस साल जुलाई के अपने उच्चतम स्तर से क़रीब 5 प्रतिशत टूट चुका है। वहीं सार्वजनिक क़र्ज़ के बढ़ते स्तर और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कम्पनियों में क़र्ज़ संकट के कारण इस पर बिकवाली का दबाव है। रुपये के डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होने से देश की आम जनता को बढ़ा झटका लग सकता है।
दरअसल, यदि डॉलर की तुलना में रुपया कमज़ोर होता है तो इससे आयात महंगा, और स्वाभाविक है कि आयात महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी जिससे आम आदमी को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इधर, रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने इस महीने भारत की क्रेडिट रेटिंग आउटलुक (नज़रिये) को घटाकर निगेटिव कर दिया है। मूडीज ने यह कहते हुए आउटलुक (नज़रिये) में कटौती की है कि भारत में वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर काफ़ी गहरा और अनुमान से काफ़ी लम्बा था।
अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक़, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा उभरता जोखिम जीडीपी ग्रोथ रेट में कमज़ोरी है। जैसा कि हमने आपको बताया कि आर्थिक मंदी के कारण जीडीपी ग्रोथ रेट पर नकारात्मक असर पड़ा है, ऐसे में खराब ग्रोथ रेट के कारण कम पूंजी प्रवाह हो सकता है और यह भारतीय करेंसी के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है। वहीं आर्थिक मंदी से कॉरपोरेट सेक्टर को राहत देने के लिए सरकार द्वारा दिये गये सुधार पैकेज से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है, जिसके कारण भी रुपये में कमज़ोरी आ सकती है।
जानकारों के मुताबिक़, चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई है और यह इस चालू वित्त वर्ष में 4 से 4.5 प्रतिशत तक सिमट सकती है। ग्रोथ रेट में कमी के कई कारण हैं, जैसे ऑटोमोबाइल बिक्री में भारी गिरावट, कोर सेक्टर ग्रोथ में कमी और कंस्ट्रक्शन व इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश घटना। अन्य और इन्हीं सब कारणों से देश की जीडीपी ग्रोथ में कमी देखने को मिल रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट पहले ही घटकर 6 साल के निचले स्तर 5 प्रतिशत पर आ गई थी।
वहीं यदि डॉलर की तुलना मे रुपया महंगा होती है तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत पेट्रोल और डीज़ल आयात करता है। लेकिन डॉलर के मुक़ाबले रुपया कमज़ोर होने से पेट्रोल-डीज़ल का आयात महंगा हो जाएगा, और डीज़ल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट महंगी होने से रोजमर्रा की ज़रूरत का सामान महंगा हो जाएगा। ईंधन ही नहीं, रुपया कमज़ोर होने से विदेश से अन्य सामाना आयात करना भी महंगा हो जाएगा जिससे महंगाई बढ़ेगी और इसका सीधा बोझ आम जनता पर पड़ेगा।
NOV 25 (WTN) – अब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सिर्फ़ उस देश की परिस्थितियां ही प्रभावित नहीं करती हैं, बल्कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में विश्व की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से इस तरह से सम्बन्धित हैं कि लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था अब वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित होती है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर का असर दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाएं पर सीधे-सीधे पड़ा है। वहीं वैश्विक आर्थिक सुस्ती के कारण भी पूरी दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाएं किसी ना किसी कारण से प्रभावित हुई हैं।
इन सबसे बीच, आशंका व्यक्त की जा रही है कि एशिया की ताक़तवर करेंसियों में से एक भारतीय रुपये में इस तिमाही में कमज़ोरी आ सकती है, और यदि ऐसा होता है तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। दरअसल, तमाम तरह के आर्थिक घटनाक्रमों को देखते हुए एक रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6 साल के सबसे निचले स्तर पर जा सकती है।
भारतीय करेंसी रुपये के उतार चढ़ाव का विश्लेषण करने वालों के मुताबिक़, रुपया इस साल जुलाई के अपने उच्चतम स्तर से क़रीब 5 प्रतिशत टूट चुका है। वहीं सार्वजनिक क़र्ज़ के बढ़ते स्तर और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कम्पनियों में क़र्ज़ संकट के कारण इस पर बिकवाली का दबाव है। रुपये के डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होने से देश की आम जनता को बढ़ा झटका लग सकता है।
दरअसल, यदि डॉलर की तुलना में रुपया कमज़ोर होता है तो इससे आयात महंगा, और स्वाभाविक है कि आयात महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी जिससे आम आदमी को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इधर, रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने इस महीने भारत की क्रेडिट रेटिंग आउटलुक (नज़रिये) को घटाकर निगेटिव कर दिया है। मूडीज ने यह कहते हुए आउटलुक (नज़रिये) में कटौती की है कि भारत में वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर काफ़ी गहरा और अनुमान से काफ़ी लम्बा था।
अर्थशास्त्र के जानकारों के मुताबिक़, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा उभरता जोखिम जीडीपी ग्रोथ रेट में कमज़ोरी है। जैसा कि हमने आपको बताया कि आर्थिक मंदी के कारण जीडीपी ग्रोथ रेट पर नकारात्मक असर पड़ा है, ऐसे में खराब ग्रोथ रेट के कारण कम पूंजी प्रवाह हो सकता है और यह भारतीय करेंसी के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है। वहीं आर्थिक मंदी से कॉरपोरेट सेक्टर को राहत देने के लिए सरकार द्वारा दिये गये सुधार पैकेज से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है, जिसके कारण भी रुपये में कमज़ोरी आ सकती है।
जानकारों के मुताबिक़, चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट वैश्विक आर्थिक मंदी से प्रभावित हुई है और यह इस चालू वित्त वर्ष में 4 से 4.5 प्रतिशत तक सिमट सकती है। ग्रोथ रेट में कमी के कई कारण हैं, जैसे ऑटोमोबाइल बिक्री में भारी गिरावट, कोर सेक्टर ग्रोथ में कमी और कंस्ट्रक्शन व इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश घटना। अन्य और इन्हीं सब कारणों से देश की जीडीपी ग्रोथ में कमी देखने को मिल रही है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चालू वित्त वर्ष की जून तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट पहले ही घटकर 6 साल के निचले स्तर 5 प्रतिशत पर आ गई थी।
वहीं यदि डॉलर की तुलना मे रुपया महंगा होती है तो इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत पेट्रोल और डीज़ल आयात करता है। लेकिन डॉलर के मुक़ाबले रुपया कमज़ोर होने से पेट्रोल-डीज़ल का आयात महंगा हो जाएगा, और डीज़ल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट महंगी होने से रोजमर्रा की ज़रूरत का सामान महंगा हो जाएगा। ईंधन ही नहीं, रुपया कमज़ोर होने से विदेश से अन्य सामाना आयात करना भी महंगा हो जाएगा जिससे महंगाई बढ़ेगी और इसका सीधा बोझ आम जनता पर पड़ेगा।