‘इस कारण’ से राज्य सरकारें बाध्य हैं नागरिकता क़ानून को अपने राज्य में लागू करने
Saturday - December 14, 2019 1:10 pm ,
Category : WTN HINDI
नागरिकता क़ानून लागू करने से कोई भी राज्य नहीं कर सकता है ‘इनकार’
केन्द्रीय सूची के विषय पर बने क़ानून को लागू करना है राज्य सरकारों की ‘बाध्यता’
DEC 14 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) क़ानून बन चुका है। बिल के क़ानून बनने के बाद अब इस क़ानून का गजट नोटिफिकेशन किया जाएगा और इसके बाद यह क़ानून पूरे देश में लागू हो जाएगा। जहां एक तरफ़ बड़ी तादात में लोग इस क़ानून का समर्थन कर रहे हैं कि इससे पड़ोसी देशों से होने वाली घुसपैठ पर रोक लगेगी, तो वहीं विपक्षी पार्टियों द्वारा CAB का विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल CAB का विरोध इस आधार पर कर रहे हैं कि यह क़ानून संविधान विरोधी है। वहीं CAB के समर्थन में भाजपा और अकाली दल समेत कुछ अन्य पार्टियां हैं।
लेकिन ग़ैरभाजपा शासित राज्यों की सरकारें नये नागरिकता क़ानून का वोटबैंक की राजनीति करते हुए ज़ोरदार तरीक़े से विरोध कर रही हैं ताक़ी उनके वोट बैंक को ख़ुश किया जा सके। प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में इन राज्य सरकारों का कहना है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें उस क़ानून को लागू करने से मना कर सकती हैं, जिसे केन्द्र सरकार ने बनाया है?
दरअसल, अपने वोटबैंक को ख़ुश करने के लिए कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियां नागरिकता क़ानून का विरोध कर रही हैं। पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने भी अपने यहां नया नागरिकता क़ानून लागू नहीं करने की बात कही है। हो सकता है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार का भी यही रवैया हो।
हालांकि, इन राज्य सरकारों ने आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा नहीं है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि पार्टी स्टैण्ड के अनुसार वे नागरिकता क़ानून का विरोध करेंगे।
इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार के विरोध की अपनी परम्परा का अनुसरण करते हुए इस बिल के पास होने से पहले ही इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। ममता बनर्जी का कहना है कि वे इस क़ानून को अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगी। ममता बनर्जी इस नये क़ानून के ख़िलाफ़ 16 दिसम्बर को कोलकाता में एक रैली करने वाली हैं। वहीं एक अन्य ग़ैरभाजपा शासित राज्य केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का कहना है कि नया क़ानून असंवैधानिक है और यह धर्म के आधार पर भेदभाव फैलाने वाला है। वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह का कहना है कि पंजाब विधानसभा नये क़ानून को राज्य में लागू करने से रोक देगी क्योंकि यह नया क़ानून संविधान के ख़िलाफ़ है।
वहीं बात करें महाराष्ट्र की तो शिवसेना नेता संजय राउत का इस बारे में कहना है कि नागरिकता क़ानून संविधान का उल्लंघन करता है। संजय राउत का कहना है कि नये एक्ट को महाराष्ट्र में लागू करना है या नहीं करना है, इसका फ़ैसला मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे करेंगे। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में शिवेसना, एनसीपी और कांग्रेस की साझा सरकार है। ऐसे में राज्य में कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने साफ़ कह दिया है कि वे इस क़ानून को राज्य में लागू नहीं होने देंगे।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ग़ैरभाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपने बयानों में तो नये नागरिकता क़ानून का विरोध कर सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास अधिकार नहीं हैं कि वे केन्द्र द्वारा लागू किये जा रहे किसी क़ानून को अपने राज्य में लागू करने से रोक सकें। इस बारे में गृह मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि केन्द्रीय सूची से सम्बन्धित किसी भी विषय पर बने किसी भी क़ानून को लागू करने से कोई भी राज्य सरकार इनकार नहीं कर सकती है।
अब आप सोच रहे हों कि आख़िर यह केन्द्रीय सूची होती क्या है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सूचियों की व्यवस्था और अवधारणा संविधान की सातवीं अनुसूची में दी गई है। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों की व्यवस्था की गई है। इन सूचियों के द्वारा केन्द्र और राज्यों के बीच कामकाज सम्बन्धित विषयों और शक्तियों का बंटवारा किया गया है। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियां हैं, पहले केन्दीय सूची, दूसरी राज्य सूची और तीसरी समवर्ती सूची।
इसमें केन्द्रीय सूची में 100 ऐसे विषय हैं, जिन पर क़ानून बनाने का अधिकार सिर्फ़ केन्द्र सरकार को है। इन विषयों पर केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये क़ानून को कोई भी राज्य सरकार अपने राज्य में लागू करने से इनकार नहीं कर सकती है। वहीं केन्द्रीय सूची की तरह ही राज्य सूची भी है,जिसमें 52 विषय हैं। राज्य सूची के विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है और इस सूची के विषयों पर केन्द्र सरकार आमतौर कोई भी हस्तक्षेप नहीं करता है।
केन्द्रीय सूची और राज्य सूची के अलावा तीसरी सूची का नाम है समवर्ती सूची। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि समवर्ती सूची में ऐसे विषय हैं जिन पर ज़रूरत के मुताबिक़ केन्द्र और राज्य सरकारें दोनों ही क़ानून बना सकती हैं।
साफ़ है कि संविधान में स्पष्ट किया गया है कि किस विषय पर कौन सी सरकार क़ानून बना सकती है। अब चूंकि नागरिकता का विषय केन्दीय सूची के अंतर्गत आता है, इसलिए इस पर क़ानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास है। संविधान में स्पष्ट है कि नागरिकता पर बनाए केन्द्र सरकार के क़ानून को राज्य सरकारें अपने यहां लागू करने से मना नहीं कर सकती हैं और नागरिकता से सम्बन्धित क़ानून देश के सभी हिस्सों में एकसमान रूप से लागू होंगे।
नागरिकता के अलावा रक्षा नीति, विदेश नीति, संचार नीति और रेलवे जैसे विषय भी केन्द्रीय सूची में आते हैं और इन विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार सिर्फ़ केन्द्र सरकार के पास होता है। इन विषयों पर बनाये गये क़ानून को राज्यों सरकारों को उसी तरह से लागू करना होगा जिस तरह से यह केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये हैं।
यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि केन्द्र सरकार द्वारा नागरिकता पर जो क़ानून बनाया गया है उसे कोई भी राज्य सरकार अपने यहां लागू होने से नहीं रोक सकती है। ग़ैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपनी-अपनी पार्टी के स्टैण्ड के मुताबिक़ बयानों में ज़रूर इस क़ानून का विरोध कर सकते हैं, लेकिन हक़ीक़त है कि इस क़ानून को लागू करने से रोकने का अधिकार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास नहीं है। यदि कोई भी राज्य सरकार नागरिकता क़ानून को अपने राज्य में लागू करने से इनकार करती है, तो ऐसे में उस राज्य में संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा और राज्यपाल की सिफ़ारिश पर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन तक लग सकता है।
DEC 14 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही नागरिकता संशोधन बिल (Citizenship Amendment Bill) क़ानून बन चुका है। बिल के क़ानून बनने के बाद अब इस क़ानून का गजट नोटिफिकेशन किया जाएगा और इसके बाद यह क़ानून पूरे देश में लागू हो जाएगा। जहां एक तरफ़ बड़ी तादात में लोग इस क़ानून का समर्थन कर रहे हैं कि इससे पड़ोसी देशों से होने वाली घुसपैठ पर रोक लगेगी, तो वहीं विपक्षी पार्टियों द्वारा CAB का विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल CAB का विरोध इस आधार पर कर रहे हैं कि यह क़ानून संविधान विरोधी है। वहीं CAB के समर्थन में भाजपा और अकाली दल समेत कुछ अन्य पार्टियां हैं।
लेकिन ग़ैरभाजपा शासित राज्यों की सरकारें नये नागरिकता क़ानून का वोटबैंक की राजनीति करते हुए ज़ोरदार तरीक़े से विरोध कर रही हैं ताक़ी उनके वोट बैंक को ख़ुश किया जा सके। प्रधानमंत्री मोदी के विरोध में इन राज्य सरकारों का कहना है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारें उस क़ानून को लागू करने से मना कर सकती हैं, जिसे केन्द्र सरकार ने बनाया है?
दरअसल, अपने वोटबैंक को ख़ुश करने के लिए कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियां नागरिकता क़ानून का विरोध कर रही हैं। पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने भी अपने यहां नया नागरिकता क़ानून लागू नहीं करने की बात कही है। हो सकता है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार का भी यही रवैया हो।
हालांकि, इन राज्य सरकारों ने आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा नहीं है कि वे अपने-अपने राज्यों में नागरिकता क़ानून को लागू नहीं होने देंगे। लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि पार्टी स्टैण्ड के अनुसार वे नागरिकता क़ानून का विरोध करेंगे।
इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार के विरोध की अपनी परम्परा का अनुसरण करते हुए इस बिल के पास होने से पहले ही इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। ममता बनर्जी का कहना है कि वे इस क़ानून को अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगी। ममता बनर्जी इस नये क़ानून के ख़िलाफ़ 16 दिसम्बर को कोलकाता में एक रैली करने वाली हैं। वहीं एक अन्य ग़ैरभाजपा शासित राज्य केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का कहना है कि नया क़ानून असंवैधानिक है और यह धर्म के आधार पर भेदभाव फैलाने वाला है। वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह का कहना है कि पंजाब विधानसभा नये क़ानून को राज्य में लागू करने से रोक देगी क्योंकि यह नया क़ानून संविधान के ख़िलाफ़ है।
वहीं बात करें महाराष्ट्र की तो शिवसेना नेता संजय राउत का इस बारे में कहना है कि नागरिकता क़ानून संविधान का उल्लंघन करता है। संजय राउत का कहना है कि नये एक्ट को महाराष्ट्र में लागू करना है या नहीं करना है, इसका फ़ैसला मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे करेंगे। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में शिवेसना, एनसीपी और कांग्रेस की साझा सरकार है। ऐसे में राज्य में कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने साफ़ कह दिया है कि वे इस क़ानून को राज्य में लागू नहीं होने देंगे।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ग़ैरभाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपने बयानों में तो नये नागरिकता क़ानून का विरोध कर सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास अधिकार नहीं हैं कि वे केन्द्र द्वारा लागू किये जा रहे किसी क़ानून को अपने राज्य में लागू करने से रोक सकें। इस बारे में गृह मंत्रालय ने भी स्पष्ट कर दिया है कि केन्द्रीय सूची से सम्बन्धित किसी भी विषय पर बने किसी भी क़ानून को लागू करने से कोई भी राज्य सरकार इनकार नहीं कर सकती है।
अब आप सोच रहे हों कि आख़िर यह केन्द्रीय सूची होती क्या है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सूचियों की व्यवस्था और अवधारणा संविधान की सातवीं अनुसूची में दी गई है। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों की व्यवस्था की गई है। इन सूचियों के द्वारा केन्द्र और राज्यों के बीच कामकाज सम्बन्धित विषयों और शक्तियों का बंटवारा किया गया है। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियां हैं, पहले केन्दीय सूची, दूसरी राज्य सूची और तीसरी समवर्ती सूची।
इसमें केन्द्रीय सूची में 100 ऐसे विषय हैं, जिन पर क़ानून बनाने का अधिकार सिर्फ़ केन्द्र सरकार को है। इन विषयों पर केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये क़ानून को कोई भी राज्य सरकार अपने राज्य में लागू करने से इनकार नहीं कर सकती है। वहीं केन्द्रीय सूची की तरह ही राज्य सूची भी है,जिसमें 52 विषय हैं। राज्य सूची के विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार राज्यों को दिया गया है और इस सूची के विषयों पर केन्द्र सरकार आमतौर कोई भी हस्तक्षेप नहीं करता है।
केन्द्रीय सूची और राज्य सूची के अलावा तीसरी सूची का नाम है समवर्ती सूची। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि समवर्ती सूची में ऐसे विषय हैं जिन पर ज़रूरत के मुताबिक़ केन्द्र और राज्य सरकारें दोनों ही क़ानून बना सकती हैं।
साफ़ है कि संविधान में स्पष्ट किया गया है कि किस विषय पर कौन सी सरकार क़ानून बना सकती है। अब चूंकि नागरिकता का विषय केन्दीय सूची के अंतर्गत आता है, इसलिए इस पर क़ानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार के पास है। संविधान में स्पष्ट है कि नागरिकता पर बनाए केन्द्र सरकार के क़ानून को राज्य सरकारें अपने यहां लागू करने से मना नहीं कर सकती हैं और नागरिकता से सम्बन्धित क़ानून देश के सभी हिस्सों में एकसमान रूप से लागू होंगे।
नागरिकता के अलावा रक्षा नीति, विदेश नीति, संचार नीति और रेलवे जैसे विषय भी केन्द्रीय सूची में आते हैं और इन विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार सिर्फ़ केन्द्र सरकार के पास होता है। इन विषयों पर बनाये गये क़ानून को राज्यों सरकारों को उसी तरह से लागू करना होगा जिस तरह से यह केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये हैं।
यानी कि साफ़ ज़ाहिर है कि केन्द्र सरकार द्वारा नागरिकता पर जो क़ानून बनाया गया है उसे कोई भी राज्य सरकार अपने यहां लागू होने से नहीं रोक सकती है। ग़ैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपनी-अपनी पार्टी के स्टैण्ड के मुताबिक़ बयानों में ज़रूर इस क़ानून का विरोध कर सकते हैं, लेकिन हक़ीक़त है कि इस क़ानून को लागू करने से रोकने का अधिकार राज्यों के मुख्यमंत्रियों के पास नहीं है। यदि कोई भी राज्य सरकार नागरिकता क़ानून को अपने राज्य में लागू करने से इनकार करती है, तो ऐसे में उस राज्य में संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा और राज्यपाल की सिफ़ारिश पर उस राज्य में राष्ट्रपति शासन तक लग सकता है।