जानिए क्या है एनआरसी और उससे जुड़ा विवाद?
Tuesday - December 17, 2019 3:54 pm ,
Category : WTN HINDI
सबसे पहले असम में लागू हुआ था एनआरसी
एनआरसी से नहीं है डरने की ज़रूरत
DEC 17 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि इन दिनों देश में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर चर्चा में हैं। लेकिन क्या आप एनआरसी के बारे में जानते हैं, यदि नहीं जानते हैं तो हम आपको बताते हैं कि आख़िर एनआरसी क्या है और इसका इतिहास क्या रहा है। दरअसल, NRC (National Register of Citizens) से पता चलता है कि भारत में रहने वाला कौन सा व्यक्ति भारतीय नागरिक है और कौन भारतीय नागरिक नहीं है। जिस व्यक्ति का नाम एनआरसी में शामिल नहीं है, उसे भारत में अवैध नागरिक माना जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनआरसी वास्तव में वह प्रक्रिया है, जिससे देश में ग़ैर-क़ानूनी तौर पर रह रहे विदेशी लोगों के बारे में पता लगाने की कोशिश की जाती है। भारत में एनआरसी की शुरूआत असम में आज़ादी के बाद साल 1951 में की गई थी, जब पहली बार NRC यानी National Register of Citizens बना था। सबसे पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को असम में अपडेट किया गया है, जिसमें लगभग 20 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता से वन्चित कर दिया गया है। इसके बाद भारत की नागरिकता से वन्चित किये गये असम के लोगों को अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए दस्तावेज़ों का सहारा लेना पड़ रहा है।
दरअसल, NRC का इतिहास काफ़ी पुराना है। जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया था। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर पूर्वी बंगाल और असम के रूप में एक नया प्रांत बनाया था। बंगाल के विभाजन के बाद असम को पूर्वी बंगाल से जोड़ा गया था। लेकिन जब देश का बंटवारा हुआ तो यह आशंका थी कि कहीं पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़कर असम को भारत से अलग न कर दिया जाए।
लेकिन देश के विभाजन के समय असम के जननेता गोपीनाथ बोर्डोली की अगुवाई में असम विद्रोह शुरू हुआ। इस अभियान के बाद असम तो भारत के साथ ही रहा, लेकिन सिलहट पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। साल 1950 में जब असम देश का राज्य बना तो नागरिकता रजिस्टर साल 1951 की जनगणना के बाद तैयार हुआ था और इसमें तब के असम के निवासियों को शामिल किया गया था।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अंग्रेजों के शासनकाल में चाय बागान में काम करने और खाली पड़ी ज़मीन पर खेती करने के लिए बिहार-बंगाल के लोग असम आते थे। इसी कारण से असम के लोग इन लोगों को बाहरी कहकर इन लोगों से द्वेष रखते थे। 1950 के दशक में ही बाहरी लोगों का असम आना धीरे-धीरे एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन आज़ादी के बाद भी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश के लोगों का अवैध तरीक़े से असम आने का सिलसिला जारी रहा।
बांग्लादेशियों के असम में आने की तादात धीरे-धीरे बढ़ने लगी, जिसके बाद बांग्लादेशियों की घुसपैठ का मामला तूल पकड़ने लगा। अब जबकि एनआरसी का मुद्दा असम में जारी है, ऐसे में 25 मार्च 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में जब भाषा विवाद को लेकर आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया, तब पूर्वी पाकिस्तान में परिस्थितियां इतनी हिंसक हो थीं गई कि वहां रहने वाले हिंदू-मुस्लिम की बड़ी आबादी ने भारत में आना शुरू कर दिया था।
कहा जाता है कि साल 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने दमनकारी कार्रवाई शुरू की तो क़रीब 10 लाख लोगों ने बांग्लादेश सीमा पारकर असम में शरण ले ली थी। हालांकि, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कहा था कि शरणार्थी चाहे किसी भी धर्म के हों, उन्हें वापस जाना होगा।
यदि अब पूरे देश में एनआरसी लागू होता है और अगर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में आपका नाम नहीं है या आप अनिवार्य दस्तावेज़ जमा नहीं करा पाए हैं तो सरकार आपको अपने दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के ज़रिए नागरिकता पाने का पूरा मौक़ा देगी। मोदी सरकार ने देश के लोगों को भरोसा दिया है कि दावे और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अन्तिम एनआरसी जारी की जाएगी। यहां तक कि इसके बाद भी हर व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण में अपील करने का मौक़ा मिलेगा।
DEC 17 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि इन दिनों देश में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर चर्चा में हैं। लेकिन क्या आप एनआरसी के बारे में जानते हैं, यदि नहीं जानते हैं तो हम आपको बताते हैं कि आख़िर एनआरसी क्या है और इसका इतिहास क्या रहा है। दरअसल, NRC (National Register of Citizens) से पता चलता है कि भारत में रहने वाला कौन सा व्यक्ति भारतीय नागरिक है और कौन भारतीय नागरिक नहीं है। जिस व्यक्ति का नाम एनआरसी में शामिल नहीं है, उसे भारत में अवैध नागरिक माना जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एनआरसी वास्तव में वह प्रक्रिया है, जिससे देश में ग़ैर-क़ानूनी तौर पर रह रहे विदेशी लोगों के बारे में पता लगाने की कोशिश की जाती है। भारत में एनआरसी की शुरूआत असम में आज़ादी के बाद साल 1951 में की गई थी, जब पहली बार NRC यानी National Register of Citizens बना था। सबसे पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को असम में अपडेट किया गया है, जिसमें लगभग 20 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता से वन्चित कर दिया गया है। इसके बाद भारत की नागरिकता से वन्चित किये गये असम के लोगों को अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए दस्तावेज़ों का सहारा लेना पड़ रहा है।
दरअसल, NRC का इतिहास काफ़ी पुराना है। जैसा कि आप जानते हैं कि साल 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया था। अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर पूर्वी बंगाल और असम के रूप में एक नया प्रांत बनाया था। बंगाल के विभाजन के बाद असम को पूर्वी बंगाल से जोड़ा गया था। लेकिन जब देश का बंटवारा हुआ तो यह आशंका थी कि कहीं पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़कर असम को भारत से अलग न कर दिया जाए।
लेकिन देश के विभाजन के समय असम के जननेता गोपीनाथ बोर्डोली की अगुवाई में असम विद्रोह शुरू हुआ। इस अभियान के बाद असम तो भारत के साथ ही रहा, लेकिन सिलहट पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। साल 1950 में जब असम देश का राज्य बना तो नागरिकता रजिस्टर साल 1951 की जनगणना के बाद तैयार हुआ था और इसमें तब के असम के निवासियों को शामिल किया गया था।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अंग्रेजों के शासनकाल में चाय बागान में काम करने और खाली पड़ी ज़मीन पर खेती करने के लिए बिहार-बंगाल के लोग असम आते थे। इसी कारण से असम के लोग इन लोगों को बाहरी कहकर इन लोगों से द्वेष रखते थे। 1950 के दशक में ही बाहरी लोगों का असम आना धीरे-धीरे एक राजनीतिक मुद्दा बनने लगा था, लेकिन आज़ादी के बाद भी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश के लोगों का अवैध तरीक़े से असम आने का सिलसिला जारी रहा।
बांग्लादेशियों के असम में आने की तादात धीरे-धीरे बढ़ने लगी, जिसके बाद बांग्लादेशियों की घुसपैठ का मामला तूल पकड़ने लगा। अब जबकि एनआरसी का मुद्दा असम में जारी है, ऐसे में 25 मार्च 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में जब भाषा विवाद को लेकर आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया, तब पूर्वी पाकिस्तान में परिस्थितियां इतनी हिंसक हो थीं गई कि वहां रहने वाले हिंदू-मुस्लिम की बड़ी आबादी ने भारत में आना शुरू कर दिया था।
कहा जाता है कि साल 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने दमनकारी कार्रवाई शुरू की तो क़रीब 10 लाख लोगों ने बांग्लादेश सीमा पारकर असम में शरण ले ली थी। हालांकि, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने कहा था कि शरणार्थी चाहे किसी भी धर्म के हों, उन्हें वापस जाना होगा।
यदि अब पूरे देश में एनआरसी लागू होता है और अगर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में आपका नाम नहीं है या आप अनिवार्य दस्तावेज़ जमा नहीं करा पाए हैं तो सरकार आपको अपने दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के ज़रिए नागरिकता पाने का पूरा मौक़ा देगी। मोदी सरकार ने देश के लोगों को भरोसा दिया है कि दावे और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अन्तिम एनआरसी जारी की जाएगी। यहां तक कि इसके बाद भी हर व्यक्ति को विदेशी न्यायाधिकरण में अपील करने का मौक़ा मिलेगा।