सऊदी अरब ने दिखाई पाकिस्तान को उसकी ‘औकात’
Wednesday - December 18, 2019 1:14 pm ,
Category : WTN HINDI
सऊदी अरब की नाराज़गी के कारण कुआलालम्पुर समिट में शिरकत नहीं करेंगे इमरान ख़ान
पाकिस्तान के मुस्लिम देशों का चौधरी बनने के मंसूबों को सऊदी अरब ने दिया ‘बड़ा झटका’
DEC 18 (WTN) – भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान इन दिनों मुस्लिम देशों का चौधरी बनने की कोशिश कर रहा है। मोदी सरकार की कूटनीति के कारण पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान अब मुस्लिम देशों के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने की जुगाड़ में है, दरअसल पाकिस्तान का यह सोचना है कि एकमात्र परमाणु शक्ति सम्पन्न मुस्लिम देश है, ऐसे में उसे पूरी दुनिया के मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिलना चाहिए। लेकिन आर्थिक रूप से बदहाल हो चुके और आतंकियों के गढ़ देश पाकिस्तान के इन मंसूबों पर सऊदी अरब पानी फेर रहा है।
जैसा कि आप जानते हैं कि मुस्लिम देशों में सऊदी अरब की एक अलग ही हैसियत है। सबसे पहले तो सऊदी अरब में मुस्लिमों के पवित्र तीर्थ स्थान हैं, वहीं सऊदी अरब पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा सम्पन्न और धनी मुस्लिम देश है। इन्हीं सब परिस्थितियों के कारण सऊदी अरब की हमेशा से ही मुस्लिम देशों के बीच एक ख़ास अहमियत रही है। लेकिन मुस्लिम देशों के चौधरी बनने की बात पर पाकिस्तान इन दिनों सऊदी अरब को सीधे तौर पर चुनौती दे रहा है, जिसके कारण सऊदी अरब अब पाकिस्तान से नाराज़ है और अब इसी कारण से पाकिस्तान को सऊदी अरब ने एक बड़ा झटका दिया है।
जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद ही ख़राब है, ऐसे में सऊदी अरब से पाकिस्तान को काफ़ी वित्तीय सहायता और क़र्ज़ समय-समय पर मिलता रहता है। साफ़ ज़ाहिर है कि सऊदी अरब के इस अहसान के कारण पाकिस्तान को अपने क़दम पीछे हटाने पड़े हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सऊदी अरब के विरोध के बाद पाकिस्तान ने अपने मित्र देश मलेशिया के नेतृत्व में होने वाली कुआलालम्पुर समिट से दूरी बना ली है। आप सोच रहे होंगे कि हमने पाकिस्तान के मित्र देश मलेशिया क्यों कहा, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर मलेशिया और तुर्की जैसे देशों ने ही पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था।
इसी कारण से पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की की दोस्ती सुर्खियों में रही है। कहा जाता है कि यह तीनों देश मिलकर मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने की मंशा रखे हुए हैं, लेकिन सऊदी अरब इन तीनों ही देशों की मंशा पर पानी फेरने की तैयारी में है। बात करें कुआलालम्पुर समिट की तो इस समिट में 52 देशों के 400 से ज़्यादा मुस्लिम नेता, बुद्धिजीवी और स्कॉलर्स शिरकत कर रहे हैं। इसके बाद इस समिट में शामिल देशों के नेता मुस्लिम दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए एक मुलाक़ात करेंगे।
कहा जा रहा था कि इस समिट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी शिरकत करने वाले हैं। लेकिन सऊदी अरब की नाराज़गी के बाद इमरान ख़ान इस समिट में शिरकत नहीं करने वाले हैं। इस समिट में इमरान ख़ान के शामिल होने की बात पर पाकिस्तान का कहना था कि जहां पर भी प्राथमिकताएं देश के हितों से जुड़ी हुई हैं वहां पर पाकिस्तान की उपस्थिति होगी, लेकिन अब इमरान ख़ान इस समिट में शिरकत नहीं करने जा रहे हैं। हालांकि, इमरान ख़ान ने 29 नवम्बर को ख़ुद इस बात की पुष्टि की थी कि वे इस समिट में शिरकत करेंगे। कहा यह भी जा रहा है कि इमरान ख़ान ने ही न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान मलेशिया, तुर्की के साथ मिलकर समिट की रूपरेखा तैयार की थी।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक़, इमरान ख़ान की सरकार के अन्दर मलेशिया के कुआलालम्पुर समिट में शिरकत करने पर पुनर्विचार चल रहा था और इसकी सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब था। ऐसा इसलिए, क्योंकि सऊदी अरब, पाकिस्तान के तुर्की और मलेशिया के साथ बने रहे इस्लामिक गठजोड़ की कोशिशों से नाराज़ है। दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान के साथ मुस्लिम दुनिया की समस्याओं और इस्लामोफोबिया को लेकर चर्चा की थी। कहा जा रहा है कि उसी दौरान इन तीनों देशों के पारस्परिक मित्रता से सऊदी अरब ने नाराज़गी जताई थी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इमरान ख़ान के इस समिट में हिस्सेदारी को लेकर विचार की ज़रूरत इसलिए पड़ रही थी, क्योंकि सऊदी अरब ने इसे लेकर अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई थी। सूत्रों के मुताबिक़, इमरान खान ने पिछले दिनों सऊदी अरब की राजधानी रियाद की यात्रा की थी और इसी दौरान उन्होंने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को आश्वासन दिया था कि सऊदी अरब के हितों के ख़िलाफ़ वह किसी भी बैठक में शिरकत नहीं करेंगे।
जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान किसी भी क़ीमत पर सऊदी अरब को नाराज़ नहीं करना चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान ने सऊदी अरब से काफ़ी क़र्ज़ ले रखा है। जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान में इमरान ख़ान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब से 6 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता हासिल की है। वहीं लाखों की तादात में पाकिस्तान नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं, जो कि बड़ी तादात में पैसा अपने घर भेजते हैं।
अब आपको बताते हैं कि आख़िर क्यों सऊदी अरब पाकिस्तान-तुर्की-मलेशिया गठजोड़ से नाराज़ है। दरअसल, सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों के बीच समिट को लेकर नाराज़गी इसलिए भी है, क्योंकि इस समिट या फ़िर कहें कि सम्भावित संगठन को सऊदी अरब के नेतृत्व में चल रहे इस्लामिक सहयोग संगठन के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, तुर्की और मलेशिया जैसे देशों के साथ सऊदी अरब के कूटनीतिक सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान की ही तरह तुर्की भी सऊदी अरब की बादशाहत को चुनौती देता आया है, ऐसे में सऊदी अरब नहीं चाहता है कि पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया के साथ मिलकर कोई ऐसा गठजोड़ बने जो कि उसे चुनौती दे।
यह सही है कि सऊदी अरब की ओर से पाकिस्तान को काफ़ी वित्तीय सहायता मिल रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक रूप से मलेशिया और तुर्की जैसे देश ही पाकिस्तान का ख़ुलकर मज़बूती से समर्थन कर रहे हैं। लेकिन सऊदी अरब के क़र्ज़ तले दबा पाकिस्तान किसी भी क़ीमत पर सऊदी अऱब की नाराज़गी को नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस समिट से दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझा। लेकिन जिस तरह से इमरान ख़ान को समिट में शिरकत नही करने का फ़ैसला ऐन मौक़े पर लेना पड़ा है, उससे पूरी दुनिया में पाकिस्तान की किरकिरी हुई है।
DEC 18 (WTN) – भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान इन दिनों मुस्लिम देशों का चौधरी बनने की कोशिश कर रहा है। मोदी सरकार की कूटनीति के कारण पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान अब मुस्लिम देशों के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने की जुगाड़ में है, दरअसल पाकिस्तान का यह सोचना है कि एकमात्र परमाणु शक्ति सम्पन्न मुस्लिम देश है, ऐसे में उसे पूरी दुनिया के मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिलना चाहिए। लेकिन आर्थिक रूप से बदहाल हो चुके और आतंकियों के गढ़ देश पाकिस्तान के इन मंसूबों पर सऊदी अरब पानी फेर रहा है।
जैसा कि आप जानते हैं कि मुस्लिम देशों में सऊदी अरब की एक अलग ही हैसियत है। सबसे पहले तो सऊदी अरब में मुस्लिमों के पवित्र तीर्थ स्थान हैं, वहीं सऊदी अरब पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा सम्पन्न और धनी मुस्लिम देश है। इन्हीं सब परिस्थितियों के कारण सऊदी अरब की हमेशा से ही मुस्लिम देशों के बीच एक ख़ास अहमियत रही है। लेकिन मुस्लिम देशों के चौधरी बनने की बात पर पाकिस्तान इन दिनों सऊदी अरब को सीधे तौर पर चुनौती दे रहा है, जिसके कारण सऊदी अरब अब पाकिस्तान से नाराज़ है और अब इसी कारण से पाकिस्तान को सऊदी अरब ने एक बड़ा झटका दिया है।
जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद ही ख़राब है, ऐसे में सऊदी अरब से पाकिस्तान को काफ़ी वित्तीय सहायता और क़र्ज़ समय-समय पर मिलता रहता है। साफ़ ज़ाहिर है कि सऊदी अरब के इस अहसान के कारण पाकिस्तान को अपने क़दम पीछे हटाने पड़े हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सऊदी अरब के विरोध के बाद पाकिस्तान ने अपने मित्र देश मलेशिया के नेतृत्व में होने वाली कुआलालम्पुर समिट से दूरी बना ली है। आप सोच रहे होंगे कि हमने पाकिस्तान के मित्र देश मलेशिया क्यों कहा, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर मलेशिया और तुर्की जैसे देशों ने ही पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था।
इसी कारण से पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की की दोस्ती सुर्खियों में रही है। कहा जाता है कि यह तीनों देश मिलकर मुस्लिम दुनिया का नेतृत्व करने की मंशा रखे हुए हैं, लेकिन सऊदी अरब इन तीनों ही देशों की मंशा पर पानी फेरने की तैयारी में है। बात करें कुआलालम्पुर समिट की तो इस समिट में 52 देशों के 400 से ज़्यादा मुस्लिम नेता, बुद्धिजीवी और स्कॉलर्स शिरकत कर रहे हैं। इसके बाद इस समिट में शामिल देशों के नेता मुस्लिम दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए एक मुलाक़ात करेंगे।
कहा जा रहा था कि इस समिट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी शिरकत करने वाले हैं। लेकिन सऊदी अरब की नाराज़गी के बाद इमरान ख़ान इस समिट में शिरकत नहीं करने वाले हैं। इस समिट में इमरान ख़ान के शामिल होने की बात पर पाकिस्तान का कहना था कि जहां पर भी प्राथमिकताएं देश के हितों से जुड़ी हुई हैं वहां पर पाकिस्तान की उपस्थिति होगी, लेकिन अब इमरान ख़ान इस समिट में शिरकत नहीं करने जा रहे हैं। हालांकि, इमरान ख़ान ने 29 नवम्बर को ख़ुद इस बात की पुष्टि की थी कि वे इस समिट में शिरकत करेंगे। कहा यह भी जा रहा है कि इमरान ख़ान ने ही न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान मलेशिया, तुर्की के साथ मिलकर समिट की रूपरेखा तैयार की थी।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक़, इमरान ख़ान की सरकार के अन्दर मलेशिया के कुआलालम्पुर समिट में शिरकत करने पर पुनर्विचार चल रहा था और इसकी सबसे बड़ी वजह सऊदी अरब था। ऐसा इसलिए, क्योंकि सऊदी अरब, पाकिस्तान के तुर्की और मलेशिया के साथ बने रहे इस्लामिक गठजोड़ की कोशिशों से नाराज़ है। दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान के साथ मुस्लिम दुनिया की समस्याओं और इस्लामोफोबिया को लेकर चर्चा की थी। कहा जा रहा है कि उसी दौरान इन तीनों देशों के पारस्परिक मित्रता से सऊदी अरब ने नाराज़गी जताई थी।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इमरान ख़ान के इस समिट में हिस्सेदारी को लेकर विचार की ज़रूरत इसलिए पड़ रही थी, क्योंकि सऊदी अरब ने इसे लेकर अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई थी। सूत्रों के मुताबिक़, इमरान खान ने पिछले दिनों सऊदी अरब की राजधानी रियाद की यात्रा की थी और इसी दौरान उन्होंने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को आश्वासन दिया था कि सऊदी अरब के हितों के ख़िलाफ़ वह किसी भी बैठक में शिरकत नहीं करेंगे।
जैसा कि हमने आपको बताया कि पाकिस्तान किसी भी क़ीमत पर सऊदी अरब को नाराज़ नहीं करना चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान ने सऊदी अरब से काफ़ी क़र्ज़ ले रखा है। जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान में इमरान ख़ान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब से 6 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता हासिल की है। वहीं लाखों की तादात में पाकिस्तान नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं, जो कि बड़ी तादात में पैसा अपने घर भेजते हैं।
अब आपको बताते हैं कि आख़िर क्यों सऊदी अरब पाकिस्तान-तुर्की-मलेशिया गठजोड़ से नाराज़ है। दरअसल, सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों के बीच समिट को लेकर नाराज़गी इसलिए भी है, क्योंकि इस समिट या फ़िर कहें कि सम्भावित संगठन को सऊदी अरब के नेतृत्व में चल रहे इस्लामिक सहयोग संगठन के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, तुर्की और मलेशिया जैसे देशों के साथ सऊदी अरब के कूटनीतिक सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान की ही तरह तुर्की भी सऊदी अरब की बादशाहत को चुनौती देता आया है, ऐसे में सऊदी अरब नहीं चाहता है कि पाकिस्तान, तुर्की और मलेशिया के साथ मिलकर कोई ऐसा गठजोड़ बने जो कि उसे चुनौती दे।
यह सही है कि सऊदी अरब की ओर से पाकिस्तान को काफ़ी वित्तीय सहायता मिल रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक रूप से मलेशिया और तुर्की जैसे देश ही पाकिस्तान का ख़ुलकर मज़बूती से समर्थन कर रहे हैं। लेकिन सऊदी अरब के क़र्ज़ तले दबा पाकिस्तान किसी भी क़ीमत पर सऊदी अऱब की नाराज़गी को नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता है। ऐसे में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस समिट से दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझा। लेकिन जिस तरह से इमरान ख़ान को समिट में शिरकत नही करने का फ़ैसला ऐन मौक़े पर लेना पड़ा है, उससे पूरी दुनिया में पाकिस्तान की किरकिरी हुई है।