जानिये आख़िर क्यों चर्चा में है इज़राइल का नागरिकता क़ानून?
Thursday - December 19, 2019 3:56 pm ,
Category : WTN HINDI
इज़राइल में सिर्फ़ यहूदियों को ही है नागरिकता पाने का अधिकार
काफ़ी ‘सख्त’ है इज़राइल का नागरिकता क़ानून
DEC 19 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि इस समय भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून यानी CAA (Citizenship Amendment Act) पर नामसझी के कारण विवाद जारी है। मोदी सरकार का कहना है कि बिना किसी कारण के कांग्रेस समेत विपक्षी दल नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे हैं और लोगों को भड़काने का काम कर रहे हैं। दरअसल, मोदी सरकार का कहना है कि CAA पर जारी विवाद नासमझी के कारण है। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी कड़े नागरिकता क़ानून हैं। इसी का एक उदाहरण है इज़राइल का नागरिकता क़ानून, जो कि इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल दुनियाभर के यहूदियों को ही अपने देश की नागरिकता देता है, लेकिन अन्य धर्म के लोगों को वहां शायद ही नागरिकता मिल पाती है। दरअसल, भारत के CAA की तुलना कई लोगों ने इज़राइल के नागरिकता कानून से की है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इज़राइल का नागरिकता क़ानून आमतौर पर एक ही धर्म यानी यहूदी धर्म को ही ज़्यादा महत्व देता है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये CAA में सिर्फ़ एक धर्म को महत्व नहीं दिया गया है। जहां तक इज़राइल के नागरिकता क़ानून की बात है तो दुनिया के एकमात्र यहूदी देश इज़राइल में नागरिकता सम्बन्धित क़ानून काफ़ी कड़े हैं और मुस्लिम और अरबों के लिए क़ानून काफ़ी सख्त हैं। हालांकि, इज़राइल में मुस्लिमों की आबादी भी है लेकिन उनकी संख्या सिर्फ़ 17 प्रतिशत ही है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक देश के रूप में इज़राइल की स्थापना साल 1948 में हुई थी, जब अरब-इज़राइल युद्ध के बाद इज़राइल के रूप में नये देश का जन्म हुआ। इससे पहले यह इलाक़ा मेण्डेटरी फिलीस्तीन कहलाता था। जब एक देश के रूप में इज़राइल पूरी दुनिया के सामने आया तो इज़राइल ने इसे पूरी दुनियाभर के यहूदियों का देश माना। जैसा कि आप जानते हैं कि इस देश के लिए यहूदियों ने काफ़ी संघर्ष किया था इसलिए जब साल 1950 में इज़राइल की संसद में नागरिकता क़ानून का प्रारूप पेश हुआ तो इस बात पर सबसे पहला ध्यान दिया गया कि इज़राइल यहूदियों का राष्ट्र है।
इज़राइल के नागरिकता क़ानून में स्पष्ट है कि इज़राइल में यहूदी धर्म के अलावा अन्य धर्म के लोगों के लिए नागरिकता हासिल करना और वहां पर रहना मुश्किल है। जानकारी के लिए बता दें कि इस समय इज़राइल में क़रीब 74.2 प्रतिशत जनसंख्या यहूदियों की है तो वहीं इज़राइल में 20.9 प्रतिशत अरब मूल के लोग रहते हैं वहीं 4.8 प्रतिशत अन्य धर्मों के लोग रहते हैं। साल 1948 में एक देश के रूप में इज़राइल के बनने के बाद से वहां बाहर से आए यहूदियों को छोड़कर किसी अन्य धर्म के लोगों को नागरिकता नहीं दी गई है। इतना ही नहीं, अरबों के सामने ये स्थिति पैदा की गई कि वो इज़राइल छोड़ चले जाएं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल में नागरिकता क़ानून चार आधार पर काम करता है। सबसे पहले दुनियाभर में जहां कहीं भी यहूदी रह रहे हों और वो इज़राइल आकर रहना चाहें तो उन्हें इजराइल की नागरिकता दी जाएगी। दूसरा आधार निवास है यानी इज़राइल के भौगोलिक इलाके में जो भी लोग साल 1949 से निवास कर रहे हैं, वो इज़राइल की नागरिकता के अधिकारी हैं। नागरिकता के लिए तीसरा आधार जन्म का है यानी जिसका जन्म इज़राइल की धरती पर होगा उसे इज़राइल का नागरिक मान लिया जाएगा। वहीं चौथा आधार न्यूट्रलाइजेशन है यानी अगर इज़राइल किसी को नागरिकता देना चाहे तो उसे नागरिकता दे सकता है। इज़राइल के नागरिकता क़ानून में सबसे ख़ास बात यह है कि दुनियाभर में कहीं भी कोई भी यहूदी बच्चा पैदा होता है, तो उसे इज़राइल की नागरिकता हासिल करने का अधिकार है।
साल 1952 में जब इज़राइल में नागरिकता क़ानून लागू हो गया तो इसके बाद इज़राइल पर आरोप लगने लगे थे कि वो जानबूझकर अपनी पश्चिमी इलाके की बाहरी बस्तियों पर बसे फिलिस्तिनियों को इज़राइल से बाहर कर रहा है। यही स्थिति इज़राइल के अंदर रहने वाले मुस्लिम अरबों की भी हुई। अरब और मुस्लिम देश इज़राइल पर लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि जो अरब मूल के मुस्लिम, इज़राइल के अन्दर लम्बे समय से रह रहे थे, उन्हें इज़राइल की सरकार ने प्रताड़ित करके भागने पर मजबूर कर दिया।
इज़राइल में आज भी यहूदी और अरबों के बीच विवाद की स्थिति बनी रहती है। संसद से लेकर नौकरी तक और व्यापार में यहूदी लोगों का ही पूरा वर्चस्व है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल में अरब जनसंख्या को सेना और प्रशासन में शामिल होने का अधिकार नहीं है। हालांकि साल 1999 में इज़राइल की सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक बड़े फ़ैसला में कहा था कि अगर किसी यहूदी की संतानें किसी और धर्म का पालन कर रही हैं, तो वे इज़राइल में अप्रवास के अधिकारी नहीं होंगे और उन्हें यहूदी नहीं माना जाएगा। जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल अपने नागरिकता संशोधन क़ानून में 13 बार बदलाव कर चुका है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इज़राइल में बाहर के देशों से आए अन्य धर्मों के लोग नागरिकता नहीं पा सकते हैं।
DEC 19 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि इस समय भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून यानी CAA (Citizenship Amendment Act) पर नामसझी के कारण विवाद जारी है। मोदी सरकार का कहना है कि बिना किसी कारण के कांग्रेस समेत विपक्षी दल नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर रहे हैं और लोगों को भड़काने का काम कर रहे हैं। दरअसल, मोदी सरकार का कहना है कि CAA पर जारी विवाद नासमझी के कारण है। लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में भी कड़े नागरिकता क़ानून हैं। इसी का एक उदाहरण है इज़राइल का नागरिकता क़ानून, जो कि इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल दुनियाभर के यहूदियों को ही अपने देश की नागरिकता देता है, लेकिन अन्य धर्म के लोगों को वहां शायद ही नागरिकता मिल पाती है। दरअसल, भारत के CAA की तुलना कई लोगों ने इज़राइल के नागरिकता कानून से की है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इज़राइल का नागरिकता क़ानून आमतौर पर एक ही धर्म यानी यहूदी धर्म को ही ज़्यादा महत्व देता है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा लागू किये गये CAA में सिर्फ़ एक धर्म को महत्व नहीं दिया गया है। जहां तक इज़राइल के नागरिकता क़ानून की बात है तो दुनिया के एकमात्र यहूदी देश इज़राइल में नागरिकता सम्बन्धित क़ानून काफ़ी कड़े हैं और मुस्लिम और अरबों के लिए क़ानून काफ़ी सख्त हैं। हालांकि, इज़राइल में मुस्लिमों की आबादी भी है लेकिन उनकी संख्या सिर्फ़ 17 प्रतिशत ही है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि एक देश के रूप में इज़राइल की स्थापना साल 1948 में हुई थी, जब अरब-इज़राइल युद्ध के बाद इज़राइल के रूप में नये देश का जन्म हुआ। इससे पहले यह इलाक़ा मेण्डेटरी फिलीस्तीन कहलाता था। जब एक देश के रूप में इज़राइल पूरी दुनिया के सामने आया तो इज़राइल ने इसे पूरी दुनियाभर के यहूदियों का देश माना। जैसा कि आप जानते हैं कि इस देश के लिए यहूदियों ने काफ़ी संघर्ष किया था इसलिए जब साल 1950 में इज़राइल की संसद में नागरिकता क़ानून का प्रारूप पेश हुआ तो इस बात पर सबसे पहला ध्यान दिया गया कि इज़राइल यहूदियों का राष्ट्र है।
इज़राइल के नागरिकता क़ानून में स्पष्ट है कि इज़राइल में यहूदी धर्म के अलावा अन्य धर्म के लोगों के लिए नागरिकता हासिल करना और वहां पर रहना मुश्किल है। जानकारी के लिए बता दें कि इस समय इज़राइल में क़रीब 74.2 प्रतिशत जनसंख्या यहूदियों की है तो वहीं इज़राइल में 20.9 प्रतिशत अरब मूल के लोग रहते हैं वहीं 4.8 प्रतिशत अन्य धर्मों के लोग रहते हैं। साल 1948 में एक देश के रूप में इज़राइल के बनने के बाद से वहां बाहर से आए यहूदियों को छोड़कर किसी अन्य धर्म के लोगों को नागरिकता नहीं दी गई है। इतना ही नहीं, अरबों के सामने ये स्थिति पैदा की गई कि वो इज़राइल छोड़ चले जाएं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल में नागरिकता क़ानून चार आधार पर काम करता है। सबसे पहले दुनियाभर में जहां कहीं भी यहूदी रह रहे हों और वो इज़राइल आकर रहना चाहें तो उन्हें इजराइल की नागरिकता दी जाएगी। दूसरा आधार निवास है यानी इज़राइल के भौगोलिक इलाके में जो भी लोग साल 1949 से निवास कर रहे हैं, वो इज़राइल की नागरिकता के अधिकारी हैं। नागरिकता के लिए तीसरा आधार जन्म का है यानी जिसका जन्म इज़राइल की धरती पर होगा उसे इज़राइल का नागरिक मान लिया जाएगा। वहीं चौथा आधार न्यूट्रलाइजेशन है यानी अगर इज़राइल किसी को नागरिकता देना चाहे तो उसे नागरिकता दे सकता है। इज़राइल के नागरिकता क़ानून में सबसे ख़ास बात यह है कि दुनियाभर में कहीं भी कोई भी यहूदी बच्चा पैदा होता है, तो उसे इज़राइल की नागरिकता हासिल करने का अधिकार है।
साल 1952 में जब इज़राइल में नागरिकता क़ानून लागू हो गया तो इसके बाद इज़राइल पर आरोप लगने लगे थे कि वो जानबूझकर अपनी पश्चिमी इलाके की बाहरी बस्तियों पर बसे फिलिस्तिनियों को इज़राइल से बाहर कर रहा है। यही स्थिति इज़राइल के अंदर रहने वाले मुस्लिम अरबों की भी हुई। अरब और मुस्लिम देश इज़राइल पर लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि जो अरब मूल के मुस्लिम, इज़राइल के अन्दर लम्बे समय से रह रहे थे, उन्हें इज़राइल की सरकार ने प्रताड़ित करके भागने पर मजबूर कर दिया।
इज़राइल में आज भी यहूदी और अरबों के बीच विवाद की स्थिति बनी रहती है। संसद से लेकर नौकरी तक और व्यापार में यहूदी लोगों का ही पूरा वर्चस्व है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल में अरब जनसंख्या को सेना और प्रशासन में शामिल होने का अधिकार नहीं है। हालांकि साल 1999 में इज़राइल की सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक बड़े फ़ैसला में कहा था कि अगर किसी यहूदी की संतानें किसी और धर्म का पालन कर रही हैं, तो वे इज़राइल में अप्रवास के अधिकारी नहीं होंगे और उन्हें यहूदी नहीं माना जाएगा। जानकारी के लिए बता दें कि इज़राइल अपने नागरिकता संशोधन क़ानून में 13 बार बदलाव कर चुका है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इज़राइल में बाहर के देशों से आए अन्य धर्मों के लोग नागरिकता नहीं पा सकते हैं।