…तो आने वाले पांच साल तक पेट्रोल-डीज़ल पर देना पड़ सकता है नया चार्ज!
Monday - December 23, 2019 11:14 am ,
Category : WTN HINDI
80 पैसे से 1.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीज़ल के दाम
BS-VI स्टेज ईंधन के इन्फ्रास्ट्रक्चर का ख़र्च उपभोक्ताओं से वसूलने की तैयारी में तेल कम्पनियां
DEC 23 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम प्रतिदिन के हिसाब से तय होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों के आधार पर ही देश में पेट्रोल और डीज़ल के दामों में उतार चढ़ाव चलता रहता है। वर्तमान में किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पेट्रोल और डीज़ल पर लगभग पूरी तरह से आश्रित है। पेट्रोल और डीज़ल के दामों में वृद्धि होने से महंगाई बढ़ती है और इसका सीधा-सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कच्चे तेल की क़ीमत में होने वाली वृद्धि से अलग, पेट्रोल और डीज़ल के दाम 80 पैसे से लेकर 1.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। यह पढ़कर आप सोच में पढ़ गये होंगे कि आख़िर ऐसा क्यों? दरअसल, केन्द्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि तेल कम्पनियों को कम प्रदूषण वाला ईंधन तैयार करने के लिए ख़र्च हुई रक़म की वसूली के लिए प्रीमियम चार्ज लगाने की मन्ज़ूरी दे दी जाए। ऐसा इसलिए, क्योंकि इन कम्पनियों ने नए इन्फ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने पर हुए ख़र्च हुई रक़म की भरपाई करने के लिए सरकार से पेट्रोल-डीज़ल की दरें बढ़ाने की मांग की है।
मोदी सरकार यदि ऑयल मार्केटिंग कम्पनियां (OCM's) के इस प्रस्ताव को मान लेती है, तो पेट्रोल या डीज़ल के दाम प्रति लीटर 80 पैसे से 1.50 रुपये तक बढ़ सकते हैं। वहीं यदि आप सोच रहे हैं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में यह वृद्धि कुछ समय के लिए ही है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले से बेहतर ईंधन बनाने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर के ख़र्च की भरपाई आने वाले पांच सालों तक जारी रह सकती है। यानि इन्फ्रास्ट्रक्चर ख़र्च का बोझ उपभोक्ताओं को आने वाले पांच सालों तक चुकाना पड़ सकता है। दरअसल, केन्द्र सरकार तेल के खुदरा मल्य पर प्रीमियम यानी अधिमूल्य को लेकर तेल कम्पनियों की मांग पर विचार कर रही है।
बता दें कि तेल कम्पनियां बीएस-स्टेज-6 के ईंधन बनाने के लिए अपने रिफाइनरी को अपग्रेड करने में होने वाले निवेश का एक अंश हासिल करना चाहती हैं और यही कारण है कि यह कम्पनियां सरकार से मांग कर रही हैं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में 80 पैसे से 1.50 रुपये प्रति लीटर तक की वृद्धि की जाए। साफ़ ज़ाहिर है कि यदि तेल कम्पनियों को प्रीमियम चार्ज वसूलने की मन्ज़ूरी मिल जाती है तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ना स्वाभाविक है। और यदि पेट्रोल-डीज़ल महंगा होता है तो इससे महंगाई बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ तेल कम्पनियों का तर्क है कि BS-VI स्टेज के लिए उन्होंने हज़ारों करोड़ रुपयों का निवेश किया है और इस निवेश की पूर्ति के लिए तेल के दाम बढ़ाना ज़रूरी है।
दरअसल, सरकारी तेल कम्पनियां का दावा है कि उन्होंने BS-VI इंजन के लिए ईंधन तैयार करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर पर क़रीब 80 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च किये हैं, वहीं निजी तेल विपणन कम्पनियों ने भी बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ख़र्च किया है। ऐसे में सरकारी और निजी तेल कम्पनियों की मांग है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के ख़र्चे को पूरा करने के लिए पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि की मन्ज़ूरी दी जाए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पेट्रोल डीज़ल के दाम अब सरकार तय नहीं करती है। कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने ईंधन की क़ीमतों को डिरेग्युलेट किया था यानी पेट्रोल-डीज़ल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों के आधार पर तय होने लगे हैं।
यदि केन्द्र सरकार तेल कम्पनियों की मांग को मानते हुए पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि करती है तो इससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दरअसल, यदि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल के दाम बढ़ते रहेंगे तो उसी अनुपात में पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि होती रहेगी, जिसका सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ेगा और महंगाई बढ़ेगी। लेकिन इसे एक दूसरे नज़रिये से भी देखा जा सकता है कि BS-VI इंजन के ईंधन से प्रदूषण कम फैलेगा और इसका सीधा फ़ायदा जनता को ही होगा। लेकिन अब देखना होगा कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर ख़र्च के नाम पर वृद्धि होती है, तो क्या देश की आम जनता इस बात को आसानी से समझ और स्वीकार कर पाएगी कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में वृद्धि पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए किये गये ख़र्च की आपूर्ति के लिए की गई है।
DEC 23 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारत में पेट्रोल और डीज़ल के दाम प्रतिदिन के हिसाब से तय होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों के आधार पर ही देश में पेट्रोल और डीज़ल के दामों में उतार चढ़ाव चलता रहता है। वर्तमान में किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पेट्रोल और डीज़ल पर लगभग पूरी तरह से आश्रित है। पेट्रोल और डीज़ल के दामों में वृद्धि होने से महंगाई बढ़ती है और इसका सीधा-सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।
लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कच्चे तेल की क़ीमत में होने वाली वृद्धि से अलग, पेट्रोल और डीज़ल के दाम 80 पैसे से लेकर 1.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। यह पढ़कर आप सोच में पढ़ गये होंगे कि आख़िर ऐसा क्यों? दरअसल, केन्द्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि तेल कम्पनियों को कम प्रदूषण वाला ईंधन तैयार करने के लिए ख़र्च हुई रक़म की वसूली के लिए प्रीमियम चार्ज लगाने की मन्ज़ूरी दे दी जाए। ऐसा इसलिए, क्योंकि इन कम्पनियों ने नए इन्फ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने पर हुए ख़र्च हुई रक़म की भरपाई करने के लिए सरकार से पेट्रोल-डीज़ल की दरें बढ़ाने की मांग की है।
मोदी सरकार यदि ऑयल मार्केटिंग कम्पनियां (OCM's) के इस प्रस्ताव को मान लेती है, तो पेट्रोल या डीज़ल के दाम प्रति लीटर 80 पैसे से 1.50 रुपये तक बढ़ सकते हैं। वहीं यदि आप सोच रहे हैं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में यह वृद्धि कुछ समय के लिए ही है, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले से बेहतर ईंधन बनाने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर के ख़र्च की भरपाई आने वाले पांच सालों तक जारी रह सकती है। यानि इन्फ्रास्ट्रक्चर ख़र्च का बोझ उपभोक्ताओं को आने वाले पांच सालों तक चुकाना पड़ सकता है। दरअसल, केन्द्र सरकार तेल के खुदरा मल्य पर प्रीमियम यानी अधिमूल्य को लेकर तेल कम्पनियों की मांग पर विचार कर रही है।
बता दें कि तेल कम्पनियां बीएस-स्टेज-6 के ईंधन बनाने के लिए अपने रिफाइनरी को अपग्रेड करने में होने वाले निवेश का एक अंश हासिल करना चाहती हैं और यही कारण है कि यह कम्पनियां सरकार से मांग कर रही हैं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में 80 पैसे से 1.50 रुपये प्रति लीटर तक की वृद्धि की जाए। साफ़ ज़ाहिर है कि यदि तेल कम्पनियों को प्रीमियम चार्ज वसूलने की मन्ज़ूरी मिल जाती है तो पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ना स्वाभाविक है। और यदि पेट्रोल-डीज़ल महंगा होता है तो इससे महंगाई बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ तेल कम्पनियों का तर्क है कि BS-VI स्टेज के लिए उन्होंने हज़ारों करोड़ रुपयों का निवेश किया है और इस निवेश की पूर्ति के लिए तेल के दाम बढ़ाना ज़रूरी है।
दरअसल, सरकारी तेल कम्पनियां का दावा है कि उन्होंने BS-VI इंजन के लिए ईंधन तैयार करने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर पर क़रीब 80 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च किये हैं, वहीं निजी तेल विपणन कम्पनियों ने भी बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ख़र्च किया है। ऐसे में सरकारी और निजी तेल कम्पनियों की मांग है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के ख़र्चे को पूरा करने के लिए पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि की मन्ज़ूरी दी जाए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पेट्रोल डीज़ल के दाम अब सरकार तय नहीं करती है। कुछ साल पहले केन्द्र सरकार ने ईंधन की क़ीमतों को डिरेग्युलेट किया था यानी पेट्रोल-डीज़ल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों के आधार पर तय होने लगे हैं।
यदि केन्द्र सरकार तेल कम्पनियों की मांग को मानते हुए पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि करती है तो इससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दरअसल, यदि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल के दाम बढ़ते रहेंगे तो उसी अनुपात में पेट्रोल-डीज़ल के दामों में वृद्धि होती रहेगी, जिसका सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ेगा और महंगाई बढ़ेगी। लेकिन इसे एक दूसरे नज़रिये से भी देखा जा सकता है कि BS-VI इंजन के ईंधन से प्रदूषण कम फैलेगा और इसका सीधा फ़ायदा जनता को ही होगा। लेकिन अब देखना होगा कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर ख़र्च के नाम पर वृद्धि होती है, तो क्या देश की आम जनता इस बात को आसानी से समझ और स्वीकार कर पाएगी कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम में वृद्धि पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए किये गये ख़र्च की आपूर्ति के लिए की गई है।