10 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता हो सकता है पेट्रोल!
Tuesday - December 24, 2019 10:19 am ,
Category : WTN HINDI
मेथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल कराएगा आपके पैसों की बचत
मोदी सरकार के ‘इस प्रयास’ से काफ़ी सस्ता हो सकता है पेट्रोल
DEC 24 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि भारत अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल के आयात में ही भारत को काफ़ी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करना पड़ती है। भारत में कच्चे तेल की क़ीमत दो कारणों पर निर्भर करती है। एक तो कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमत और दूसरा अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रूपये की स्थिति। इन्हीं दो कारणों से भारत में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव चलता रहता है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें भारतीय राजनीति पर भी काफ़ी असर डालती हैं, और इनकी क़ीमतें बढ़ने पर सरकारों को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है।
वैसे जब भी कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय क़ीमत में कमी आती है या फ़िर अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये में मज़बूती आती है, तो पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत में कमी आती है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत तेल आयात करता है, और इसी कारण से देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा इसमें ख़र्च होती है। ऐसे में मोदी सरकार कोशिश कर रही है कि लोग ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाएं। वहीं मोदी सरकार लगातार इस कोशिश में है कि जल्द से जल्द मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन को बाज़ार में लाया जाए। यदि मोदी सरकार ऐसा करने में सफ़ल हो जाती है तो इससे पेट्रोल के दाम में ऐतिहासिक रूप से कमी आ जाएगी।
जानकारों का मानना है कि यदि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन बाज़ार में आता है, तो इससे एक लीटर पेट्रोल की क़ीमत सीधे तौर पर 10 रुपये प्रति लीटर तक कम हो सकती है। वहीं वैज्ञानिकों का मत है कि इस ईंधन के इस्तेमाल से प्रदूषण के स्तर में भी क़रीब 30 प्रतिशत की कमी हो सकेगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन के बाज़ार में आ जाने से भारत को कच्चे तेल का आयात भी कम करना पड़ेगा और ऐसा करने से विदेशी मुद्रा की बड़ी मात्रा में बचत होगी।
जानकारी के मुताबिक़ इस समय देश में क़रीब 10 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, इस समय एथेनॉल की लागत क़रीब 42 रूपये प्रति लीटर है, जो कि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन से काफ़ी ज़्यादा महंगा है, क्योंकि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन की क़ीमत इस समय क़रीब 20 रुपये प्रति लीटर है। वैसे इण्डियन ऑयल पहले ही मेथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल बना रही है, जिसमें 15 प्रतिशत मेथेनॉल और 85 प्रतिशत पेट्रोल होता है। लेकिन, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय इसका कम उत्पादन हो रहा है और जो उत्पादन हो रहा है उसका व्यवसायिक इस्तेमाल ही हो रहा है। जानकारों के मुताबिक़, यदि ईंधन में 15 प्रतिशत मेथेन ब्लेंड किया जाता है तो इससे साल 2030 तक देश को क़रीब 100 अरब डॉलर की बचत हो सकती है।
दरअसल, भारत दुनिया तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। जानकारी के लिए बता दें कि भारत हर साल क़रीब 114.5 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल आयात करता है। भारत में हर साल 2,900 करोड़ लीटर पेट्रोल और 9,000 करोड़ लीटर डीज़ल की खपत होती है। वर्तमान में असम पेट्रोकेेमिकल्स में मेथेनॉल तैयार किया जा रहा है, जिसकी वर्तमान उत्पादन क्षमता 100 टन प्रतिदिन है। उम्मीद की जा रही है कि अगले साल अप्रैल 2020 तक यह उत्पादन 6 गुना बढ़कर 600 टन प्रतिदिन तक हो जाएगा। यदि जल्द से जल्द देश में मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन की उपलब्धता होती है, तो इससे पेट्रोल की क़ीमत में कम से कम 10 रूपये प्रति लीटर की कमी होगी और पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा, वहीं भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी जिसका इस्तेमाल विकास कार्यों में किया जा सकेगा।
DEC 24 (WTN) – जैसा कि आप जानते हैं कि भारत अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल के आयात में ही भारत को काफ़ी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा ख़र्च करना पड़ती है। भारत में कच्चे तेल की क़ीमत दो कारणों पर निर्भर करती है। एक तो कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमत और दूसरा अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रूपये की स्थिति। इन्हीं दो कारणों से भारत में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव चलता रहता है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें भारतीय राजनीति पर भी काफ़ी असर डालती हैं, और इनकी क़ीमतें बढ़ने पर सरकारों को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है।
वैसे जब भी कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय क़ीमत में कमी आती है या फ़िर अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये में मज़बूती आती है, तो पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत में कमी आती है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत तेल आयात करता है, और इसी कारण से देश की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा इसमें ख़र्च होती है। ऐसे में मोदी सरकार कोशिश कर रही है कि लोग ज़्यादा से ज़्यादा इलेक्ट्रिक व्हीकल अपनाएं। वहीं मोदी सरकार लगातार इस कोशिश में है कि जल्द से जल्द मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन को बाज़ार में लाया जाए। यदि मोदी सरकार ऐसा करने में सफ़ल हो जाती है तो इससे पेट्रोल के दाम में ऐतिहासिक रूप से कमी आ जाएगी।
जानकारों का मानना है कि यदि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन बाज़ार में आता है, तो इससे एक लीटर पेट्रोल की क़ीमत सीधे तौर पर 10 रुपये प्रति लीटर तक कम हो सकती है। वहीं वैज्ञानिकों का मत है कि इस ईंधन के इस्तेमाल से प्रदूषण के स्तर में भी क़रीब 30 प्रतिशत की कमी हो सकेगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन के बाज़ार में आ जाने से भारत को कच्चे तेल का आयात भी कम करना पड़ेगा और ऐसा करने से विदेशी मुद्रा की बड़ी मात्रा में बचत होगी।
जानकारी के मुताबिक़ इस समय देश में क़रीब 10 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, इस समय एथेनॉल की लागत क़रीब 42 रूपये प्रति लीटर है, जो कि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन से काफ़ी ज़्यादा महंगा है, क्योंकि मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन की क़ीमत इस समय क़रीब 20 रुपये प्रति लीटर है। वैसे इण्डियन ऑयल पहले ही मेथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल बना रही है, जिसमें 15 प्रतिशत मेथेनॉल और 85 प्रतिशत पेट्रोल होता है। लेकिन, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस समय इसका कम उत्पादन हो रहा है और जो उत्पादन हो रहा है उसका व्यवसायिक इस्तेमाल ही हो रहा है। जानकारों के मुताबिक़, यदि ईंधन में 15 प्रतिशत मेथेन ब्लेंड किया जाता है तो इससे साल 2030 तक देश को क़रीब 100 अरब डॉलर की बचत हो सकती है।
दरअसल, भारत दुनिया तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। जानकारी के लिए बता दें कि भारत हर साल क़रीब 114.5 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल आयात करता है। भारत में हर साल 2,900 करोड़ लीटर पेट्रोल और 9,000 करोड़ लीटर डीज़ल की खपत होती है। वर्तमान में असम पेट्रोकेेमिकल्स में मेथेनॉल तैयार किया जा रहा है, जिसकी वर्तमान उत्पादन क्षमता 100 टन प्रतिदिन है। उम्मीद की जा रही है कि अगले साल अप्रैल 2020 तक यह उत्पादन 6 गुना बढ़कर 600 टन प्रतिदिन तक हो जाएगा। यदि जल्द से जल्द देश में मेथेनॉल ब्लेंडेड ईंधन की उपलब्धता होती है, तो इससे पेट्रोल की क़ीमत में कम से कम 10 रूपये प्रति लीटर की कमी होगी और पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा, वहीं भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत होगी जिसका इस्तेमाल विकास कार्यों में किया जा सकेगा।