वैश्विक आर्थिक सुस्ती पर IMF ने दी भारत को ‘बड़ी’ सलाह
Tuesday - December 24, 2019 3:21 pm ,
Category : WTN HINDI
वैश्विक आर्थिक सुस्ती से निपटने ठोस उपाय ज़रूरी - IMF
IMF को उम्मीद, अगले वित्त वर्ष में आर्थिक सुस्ती के असर से उबर जाएगी भारतीय अर्थव्यवस्था
DEC 24 (WTN) – भारतीय अर्थव्यवस्था जीडीपी आधारित दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जहां तक एशिया की बात है तो 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर वाली भारतीय अर्थव्यवस्था चीन और जापान के बाद एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। विश्व के कई देशों के साथ भारत के आर्थिक सम्बन्ध हैं और इसी कारण से भारतीय अर्थव्यवस्था में होने वाले उतार चढ़ाव का पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। जैसा कि आप जानते हैं कि इस समय पूरी दुनिया को वैश्विक आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ रहा है। IMF (International Monetary Fund) यानी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने किसी ना किसी रूप से प्रभावित किया है।
लेकिन तेज़ी से बढ़ती भारत और ब्राजील की अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक सुस्ती का कुछ ज़्यादा ही असर पड़ा है। पूरे साल 2019 में भारतीय अर्थव्यवस्था को सुस्ती का सामना करना पड़ा है। ऑटो सेक्टर से लेकर टेक्सटाइल सेक्टर तक, लगभग हर सेक्टर पर आर्थिक सुस्ती हावी रही है जिसके कारण एक तरफ उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हुआ तो वहीं बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का सामना लोगों को करना पड़ा है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर जारी सुस्ती को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चिन्ता ज़ाहिर की है।
वैश्विक आर्थिक सुस्ती की चुनौतियों से निपट रही भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारत को जल्द से जल्द बड़े क़दम उठाने होंगे। IMF का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक बड़ी अर्थव्यवस्था है जो कि ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। IMF के मुताबिक़, ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ काफ़ी कुछ भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती के कारण प्रभावित हो सकती है, ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक ग्रोथ बढ़ाने के लिए तेज़ी से कुछ उपाय करने होंगे। IMF की वार्षिक समीक्षा के मुताबिक़, खपत और निवेश में गिरावट के साथ-साथ टैक्स राजस्व में कमी से भी भारत की आर्थिक ग्रोथ को झटका लगा है।
IMF का कहना है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में सराहनीय काम किये हैं, जिसके कारण भारत में लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर आने में कामयाबी हासिल हो सकी है, लेकिन इसके बाद भारत को आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक सुस्ती का एक लम्बा दौर गुजरने के बाद अब इसे दूर करने और देश की आर्थिक ग्रोथ को पटरी पर लाने के लिए भारत को तुरन्त ठोस नीतिगत मौद्रिक उपायों की सख़्त ज़रूरत है। हालांकि, सरकार के पास विकास पर ख़र्च के ज़रिए अर्थव्यवस्था को गति देने के सीमित विकल्प हैं।
IMF की चीफ इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2019-20 की दिसम्बर और मार्च तिमाही में भी आर्थिक ग्रोथ कमजोर बनी रहेगी। वहीं इस बारे में गोपीनाथ का कहना है, “हमें मौजूदा वित्त वर्ष की बाकी दो तिमाहियों में तेज़ी की उम्मीद थी, लेकिन अब रिकवरी मुश्किल नज़र आ रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए हमें अपने पुराने अनुमान बदलने पड़े हैं।” आपकी जानकारी के लिए बता दें कि IMF अगले साल 20 जनवरी को भारत के आर्थिक ग्रोथ के आउटलुक पर एक रिपोर्ट जारी करेगा, जिससे चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान लगाया जा सकेगा।
अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ का मानना है कि अर्थव्यवस्था की कुछ मुश्किलें आसानी से दूर नहीं हो सकती हैं और इनमें से एक समस्या बैंकिंग सेक्टर की भी है जो कि भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है। हालांकि, गोपीनाथ का मानना है कि भारत में बैंकिंग सेक्टर की समस्याओं के कुछ मामले ऐसे हैं जिन्हें इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) के ज़रिए ठीक किया जा सकता है। गोपीनाथ के अनुसार, “बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी कई तरह की अनिश्चितताएं हैं जिनकी वजह से बैंकों की रिस्क लेने की क्षमता कम हुई है और इसका असर क्रेडिट ग्रोथ पर भी दिख रहा है। ग्रामीण इलाकों में आमदनी और पैदावार घटने की वजह से उपभोग घटा है और इसी के कारण उद्योग धंधों को उत्पादन कम या बंद करना पड़ा है।”
भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी आर्थिक सुस्ती के कारण भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा उठाए गये क़दमों की आईएमएफ ने तारीफ़ की है। आईएमएफ के मुताबिक़, भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस साल रेपो रेट में 1.35 प्रतिशत की कटौती की है, जो कि आर्थिक सिस्टम की रफ़्तार बढ़ाने के लिए काफ़ी है। वैसे आईएमएफ को उम्मीद है कि यदि भारत द्वारा अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए कुछ ठोस धरातलीय उपाय किये जाते हैं, तो इससे इस वित्त वर्ष में तो नहीं लेकिन अगले वित्त वर्ष में आर्थिक सुस्ती से निजात मिल सकती है और भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट एक बार फ़िर से बढ़ सकती है।
DEC 24 (WTN) – भारतीय अर्थव्यवस्था जीडीपी आधारित दुनिया की 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जहां तक एशिया की बात है तो 2.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर वाली भारतीय अर्थव्यवस्था चीन और जापान के बाद एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। विश्व के कई देशों के साथ भारत के आर्थिक सम्बन्ध हैं और इसी कारण से भारतीय अर्थव्यवस्था में होने वाले उतार चढ़ाव का पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है। जैसा कि आप जानते हैं कि इस समय पूरी दुनिया को वैश्विक आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ रहा है। IMF (International Monetary Fund) यानी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़, भारत समेत दुनिया की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक आर्थिक सुस्ती ने किसी ना किसी रूप से प्रभावित किया है।
लेकिन तेज़ी से बढ़ती भारत और ब्राजील की अर्थव्यवस्थाओं पर आर्थिक सुस्ती का कुछ ज़्यादा ही असर पड़ा है। पूरे साल 2019 में भारतीय अर्थव्यवस्था को सुस्ती का सामना करना पड़ा है। ऑटो सेक्टर से लेकर टेक्सटाइल सेक्टर तक, लगभग हर सेक्टर पर आर्थिक सुस्ती हावी रही है जिसके कारण एक तरफ उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हुआ तो वहीं बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का सामना लोगों को करना पड़ा है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर जारी सुस्ती को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चिन्ता ज़ाहिर की है।
वैश्विक आर्थिक सुस्ती की चुनौतियों से निपट रही भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारत को जल्द से जल्द बड़े क़दम उठाने होंगे। IMF का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक बड़ी अर्थव्यवस्था है जो कि ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ को बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। IMF के मुताबिक़, ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ काफ़ी कुछ भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती के कारण प्रभावित हो सकती है, ऐसे में भारत को अपनी आर्थिक ग्रोथ बढ़ाने के लिए तेज़ी से कुछ उपाय करने होंगे। IMF की वार्षिक समीक्षा के मुताबिक़, खपत और निवेश में गिरावट के साथ-साथ टैक्स राजस्व में कमी से भी भारत की आर्थिक ग्रोथ को झटका लगा है।
IMF का कहना है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में सराहनीय काम किये हैं, जिसके कारण भारत में लाखों लोगों को ग़रीबी से बाहर आने में कामयाबी हासिल हो सकी है, लेकिन इसके बाद भारत को आर्थिक सुस्ती का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक सुस्ती का एक लम्बा दौर गुजरने के बाद अब इसे दूर करने और देश की आर्थिक ग्रोथ को पटरी पर लाने के लिए भारत को तुरन्त ठोस नीतिगत मौद्रिक उपायों की सख़्त ज़रूरत है। हालांकि, सरकार के पास विकास पर ख़र्च के ज़रिए अर्थव्यवस्था को गति देने के सीमित विकल्प हैं।
IMF की चीफ इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ के मुताबिक़ वित्त वर्ष 2019-20 की दिसम्बर और मार्च तिमाही में भी आर्थिक ग्रोथ कमजोर बनी रहेगी। वहीं इस बारे में गोपीनाथ का कहना है, “हमें मौजूदा वित्त वर्ष की बाकी दो तिमाहियों में तेज़ी की उम्मीद थी, लेकिन अब रिकवरी मुश्किल नज़र आ रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए हमें अपने पुराने अनुमान बदलने पड़े हैं।” आपकी जानकारी के लिए बता दें कि IMF अगले साल 20 जनवरी को भारत के आर्थिक ग्रोथ के आउटलुक पर एक रिपोर्ट जारी करेगा, जिससे चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान लगाया जा सकेगा।
अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ का मानना है कि अर्थव्यवस्था की कुछ मुश्किलें आसानी से दूर नहीं हो सकती हैं और इनमें से एक समस्या बैंकिंग सेक्टर की भी है जो कि भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है। हालांकि, गोपीनाथ का मानना है कि भारत में बैंकिंग सेक्टर की समस्याओं के कुछ मामले ऐसे हैं जिन्हें इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) के ज़रिए ठीक किया जा सकता है। गोपीनाथ के अनुसार, “बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी कई तरह की अनिश्चितताएं हैं जिनकी वजह से बैंकों की रिस्क लेने की क्षमता कम हुई है और इसका असर क्रेडिट ग्रोथ पर भी दिख रहा है। ग्रामीण इलाकों में आमदनी और पैदावार घटने की वजह से उपभोग घटा है और इसी के कारण उद्योग धंधों को उत्पादन कम या बंद करना पड़ा है।”
भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी आर्थिक सुस्ती के कारण भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा उठाए गये क़दमों की आईएमएफ ने तारीफ़ की है। आईएमएफ के मुताबिक़, भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस साल रेपो रेट में 1.35 प्रतिशत की कटौती की है, जो कि आर्थिक सिस्टम की रफ़्तार बढ़ाने के लिए काफ़ी है। वैसे आईएमएफ को उम्मीद है कि यदि भारत द्वारा अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए कुछ ठोस धरातलीय उपाय किये जाते हैं, तो इससे इस वित्त वर्ष में तो नहीं लेकिन अगले वित्त वर्ष में आर्थिक सुस्ती से निजात मिल सकती है और भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट एक बार फ़िर से बढ़ सकती है।