जानिये डेटा प्रोटेक्शन बिल पर क्यों हो रहा है विवाद?
Monday - December 30, 2019 1:32 pm ,
Category : WTN HINDI
अब यूज़र्स का डेटा रहेगा पहले से और भी ज़्यादा सुरक्षित
डेटा का दुरुपयोग रोकने ‘सख़्त’ क़ानून ला रही मोदी सरकार
DEC 30 (WTN) – 2014 के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में लगातार बड़े फ़ैसले ले रही है। जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 का शिथिलिकरण हो या फ़िर नागरिकता संशोधन क़ानून, मोदी सरकार ने शुरुआती 6 महीनों में ही आभास करा दिया है कि इस बार सरकार द्वारा बहुत बड़े और कड़े फ़ैसले लिये जाएंगे। इसी कड़ी में मोदी सरकार इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन यूज़र्स की प्राइवेसी के लिए एक बड़ा क़ानून बनाने जा रही है, लेकिन इस क़ानून को लेकर अभी से ही विवाद और विरोध शुरू हो गया है। क्या है यह पूरा मामला, आइये आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में काम करने वाली तमाम तरह की सोशल मीडिया वेबसाट्स और अन्य वेबसाइट्स के लिए मोदी सरकार कुछ सख़्त नियम लागू करने जा रही है। इन नियमों को लागू करने के पीछे मोदी सरकार का तर्क है कि इससे यूज़र्स की प्राइवेसी को पहले की तुलना में और भी अधिक मज़बूत किया जा सके। दरअसल, मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे डेटा प्रोटेक्शन बिल पर कई अंतर्राष्ट्रीय वेबसाइट्स को आपत्ति है। जानकारी देने के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध वेबसाइट ‘विकीपीडिया’ ने मोदी सरकार के इन नियमों को लेकर चिन्ता ज़ाहिर की है और केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिखकर समझाने की कोशिश की है कि केन्द्र सरकार की नई नीति से उनका सिस्टम पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।
जानकारी के लिए बता दें कि विकीपीडिया को चलाने वाली ‘विकीमीडिया फाउण्डेशन’ की ओर से लिखे गये पत्र में कहा गया है, “भारत सरकार के द्वारा लाइबेलिटी रूल्स में जो बदलाव किये जा रहे हैं, वह चिन्ता का विषय हैं। इसके ज़रिये यूज़र्स बेस्ड वेबसाइट्स को कंट्रोल किया जाएगा और ऐसा करने से कंटेंट प्रभावित होगा।” दरअसल, मोदी सरकार के नये क़ानून से चिन्तित विकीपीडिया ने लिखा है, “नियमों में होने वाले सम्भावित बदलाव से विकीपीडिया पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि हमारा मॉडल पूरी तरह से खुला हुआ है। हम पूरी तरह से इंटरनेट पर फ्री एक्सप्रेशन के नियम का पालन करते हैं और यूज़र्स ही हमारा कंटेंट तैयार करते हैं। ऐसे में अगर यूज़र्स के कंटेंट पर रोक लगाई जाएगी, तो ये मॉडल पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।”
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विकीपीडिया समेत कई अन्य वेबसाइट्स ने भी मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे डेटा प्रोटेक्शन बिल पर सवाल खड़े किये हैं। इन वेबसाइट्स को डर है कि यदि यह बिल क़ानून बनता है तो इससे भारत में मुफ़्त जानकारी के मिशन को एक बड़ा धक्का लग सकता है। वहीं इन वेबसाइट्स का तर्क है कि सोशल मीडिया इंटरमीडियर्स की नई परिभाषा को स्थापित करना भी मुश्किल हो जाएगा, जिसका उल्लेख डेटा प्रोटेक्शन बिल 2019 (सेक्शन 26) में किया गया है।
अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर में डेटा प्रोटेक्शन बिल क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केन्द्र सरकार के द्वारा लाये जा रहे इस बिल का उद्देश्य डेटा चोरी को रोकना है। जैसा कि आप जानते हैं कि कुछ दिनों पहले भारत में कुछ प्रसिद्ध लोगों के व्हाट्सएप डेटा की जासूसी की घटना सामने आई थी, जिसके बाद विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर जमकर निशाना साधा था। इसी घटना के बाद सरकार डेटा प्रोटेक्शन बिल लाने जा रही है। सरकार का दावा है कि इस नये क़ानून से एक तो डेटा चोरी की घटनाओं पर रोक लगेगी वहीं सोशल मीडिया साइट्स समेत कई कम्पनियों/वेबसाइट पर कुछ पाबंदियां लगाई जाएंगी।
जैसा कि हमने बताया कि इस बिल का तेज़ी से विरोध हो रहा है, लेकिन इन विरोधों को दरकिनार करते हुए केन्द्र सरकार का तर्क है कि देश में व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही इस बिल को तैयार किया गया है। इस विधेयक के तहत किसी भी तरह के पर्सनल डेटा के इस्तेमाल से पहले यूज़र्स की मंजूरी लेना ज़रूरी होगा। वहीं बायोमेट्रिक डेटा के लिए सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी। इतना ही नहीं बच्चों की निजता की सुरक्षा के लिए भी इस कानून में सख़्ती बरती गई है। इस क़ानून के तहत सभी कम्पनियों को अपने डेटा की तमाम जानकारियां सरकार के साथ शेयर करनी होंगी।
इतना ही नहीं, इस क़ानून में डेटा के स्थानीय भण्डारण पर बल दिया गया है। सरकार ने इस क़ानून में नियम बनाया है कि भारतीयों का संवेदनशील डेटा भारत में ही स्टोर करना होगा और कुछ सीमित डेटा ही विदेश में स्टोर किया जा सकेगा। वहीं इस क़ानून में सरकार को फेसबुक और गूगल समेत तमाम विदेशी कम्पनियों से गोपनीय निजी डेटा और गैर-निजी डेटा के बारे में पूछने का अधिकार दिया गया है। वहीं नये क़ानून में सोशल मीडिया कम्पनियों को एक वेरिफिकेशन प्रक्रिया विकसित करनी होगी जो यूज़र्स के लिए स्वैच्छिक होगी, लेकिन इससे यूज़र की पहचान छुपाकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की आशंका घटेगी।
वहीं यदि किसी भी कम्पनी से किसी यूज़र का निजी डेटा चोरी होता है तो निजी कम्पनियों पर सख़्ती की बात इस क़ानून में कही गई है। लेकिन इन क़ानून में सरकारी एजेंसियों को क्रेडिट स्कोर, क़र्ज़ वसूली और सुरक्षा से जुड़े मामलों में डेटा मालिक की सहमति के बिना भी उसकी डेटा प्रॉसेसिंग करने की छूट दिए जाने का प्रावधान है। नये क़ानून में सरकार को यह अधिकार होगा कि वह किसी भी सरकारी एजेंसी को प्रस्तावित क़ानून के प्रावधानों के दायरे से छूट दे सके।
DEC 30 (WTN) – 2014 के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में लगातार बड़े फ़ैसले ले रही है। जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 का शिथिलिकरण हो या फ़िर नागरिकता संशोधन क़ानून, मोदी सरकार ने शुरुआती 6 महीनों में ही आभास करा दिया है कि इस बार सरकार द्वारा बहुत बड़े और कड़े फ़ैसले लिये जाएंगे। इसी कड़ी में मोदी सरकार इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन यूज़र्स की प्राइवेसी के लिए एक बड़ा क़ानून बनाने जा रही है, लेकिन इस क़ानून को लेकर अभी से ही विवाद और विरोध शुरू हो गया है। क्या है यह पूरा मामला, आइये आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में काम करने वाली तमाम तरह की सोशल मीडिया वेबसाट्स और अन्य वेबसाइट्स के लिए मोदी सरकार कुछ सख़्त नियम लागू करने जा रही है। इन नियमों को लागू करने के पीछे मोदी सरकार का तर्क है कि इससे यूज़र्स की प्राइवेसी को पहले की तुलना में और भी अधिक मज़बूत किया जा सके। दरअसल, मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे डेटा प्रोटेक्शन बिल पर कई अंतर्राष्ट्रीय वेबसाइट्स को आपत्ति है। जानकारी देने के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध वेबसाइट ‘विकीपीडिया’ ने मोदी सरकार के इन नियमों को लेकर चिन्ता ज़ाहिर की है और केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिखकर समझाने की कोशिश की है कि केन्द्र सरकार की नई नीति से उनका सिस्टम पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।
जानकारी के लिए बता दें कि विकीपीडिया को चलाने वाली ‘विकीमीडिया फाउण्डेशन’ की ओर से लिखे गये पत्र में कहा गया है, “भारत सरकार के द्वारा लाइबेलिटी रूल्स में जो बदलाव किये जा रहे हैं, वह चिन्ता का विषय हैं। इसके ज़रिये यूज़र्स बेस्ड वेबसाइट्स को कंट्रोल किया जाएगा और ऐसा करने से कंटेंट प्रभावित होगा।” दरअसल, मोदी सरकार के नये क़ानून से चिन्तित विकीपीडिया ने लिखा है, “नियमों में होने वाले सम्भावित बदलाव से विकीपीडिया पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि हमारा मॉडल पूरी तरह से खुला हुआ है। हम पूरी तरह से इंटरनेट पर फ्री एक्सप्रेशन के नियम का पालन करते हैं और यूज़र्स ही हमारा कंटेंट तैयार करते हैं। ऐसे में अगर यूज़र्स के कंटेंट पर रोक लगाई जाएगी, तो ये मॉडल पूरी तरह से तबाह हो जाएगा।”
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विकीपीडिया समेत कई अन्य वेबसाइट्स ने भी मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे डेटा प्रोटेक्शन बिल पर सवाल खड़े किये हैं। इन वेबसाइट्स को डर है कि यदि यह बिल क़ानून बनता है तो इससे भारत में मुफ़्त जानकारी के मिशन को एक बड़ा धक्का लग सकता है। वहीं इन वेबसाइट्स का तर्क है कि सोशल मीडिया इंटरमीडियर्स की नई परिभाषा को स्थापित करना भी मुश्किल हो जाएगा, जिसका उल्लेख डेटा प्रोटेक्शन बिल 2019 (सेक्शन 26) में किया गया है।
अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर में डेटा प्रोटेक्शन बिल क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केन्द्र सरकार के द्वारा लाये जा रहे इस बिल का उद्देश्य डेटा चोरी को रोकना है। जैसा कि आप जानते हैं कि कुछ दिनों पहले भारत में कुछ प्रसिद्ध लोगों के व्हाट्सएप डेटा की जासूसी की घटना सामने आई थी, जिसके बाद विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर जमकर निशाना साधा था। इसी घटना के बाद सरकार डेटा प्रोटेक्शन बिल लाने जा रही है। सरकार का दावा है कि इस नये क़ानून से एक तो डेटा चोरी की घटनाओं पर रोक लगेगी वहीं सोशल मीडिया साइट्स समेत कई कम्पनियों/वेबसाइट पर कुछ पाबंदियां लगाई जाएंगी।
जैसा कि हमने बताया कि इस बिल का तेज़ी से विरोध हो रहा है, लेकिन इन विरोधों को दरकिनार करते हुए केन्द्र सरकार का तर्क है कि देश में व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही इस बिल को तैयार किया गया है। इस विधेयक के तहत किसी भी तरह के पर्सनल डेटा के इस्तेमाल से पहले यूज़र्स की मंजूरी लेना ज़रूरी होगा। वहीं बायोमेट्रिक डेटा के लिए सरकार की मंजूरी आवश्यक होगी। इतना ही नहीं बच्चों की निजता की सुरक्षा के लिए भी इस कानून में सख़्ती बरती गई है। इस क़ानून के तहत सभी कम्पनियों को अपने डेटा की तमाम जानकारियां सरकार के साथ शेयर करनी होंगी।
इतना ही नहीं, इस क़ानून में डेटा के स्थानीय भण्डारण पर बल दिया गया है। सरकार ने इस क़ानून में नियम बनाया है कि भारतीयों का संवेदनशील डेटा भारत में ही स्टोर करना होगा और कुछ सीमित डेटा ही विदेश में स्टोर किया जा सकेगा। वहीं इस क़ानून में सरकार को फेसबुक और गूगल समेत तमाम विदेशी कम्पनियों से गोपनीय निजी डेटा और गैर-निजी डेटा के बारे में पूछने का अधिकार दिया गया है। वहीं नये क़ानून में सोशल मीडिया कम्पनियों को एक वेरिफिकेशन प्रक्रिया विकसित करनी होगी जो यूज़र्स के लिए स्वैच्छिक होगी, लेकिन इससे यूज़र की पहचान छुपाकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की आशंका घटेगी।
वहीं यदि किसी भी कम्पनी से किसी यूज़र का निजी डेटा चोरी होता है तो निजी कम्पनियों पर सख़्ती की बात इस क़ानून में कही गई है। लेकिन इन क़ानून में सरकारी एजेंसियों को क्रेडिट स्कोर, क़र्ज़ वसूली और सुरक्षा से जुड़े मामलों में डेटा मालिक की सहमति के बिना भी उसकी डेटा प्रॉसेसिंग करने की छूट दिए जाने का प्रावधान है। नये क़ानून में सरकार को यह अधिकार होगा कि वह किसी भी सरकारी एजेंसी को प्रस्तावित क़ानून के प्रावधानों के दायरे से छूट दे सके।