क्या आने वाले समय में डॉक्टर्स से बेहतर साबित होंगी मशीनें?
Friday - January 3, 2020 10:26 am ,
Category : WTN HINDI
कैंसर के इलाज के लिए Artificial Intelligence का सहारा
गूगल का दावा; Artificial Intelligence करेगी कैंसर के मरीजों की सही तरीक़े से पहचान
JAN 03 (WTN) – विज्ञान की सीमाएं और क्षमताएं इतनी विशाल हैं कि वे अपरिभाषित और अनन्त हैं। आज से 300 साल पहले के मानव जीवन और आज के दौर के मानव जीवन के बीच सब कुछ बदल गया है। सदियों तक जिस चन्द्रमा को मनुष्य पृथ्वी पर बैठे निहारता रहता था, विज्ञान के दम पर मनुष्य ने उसी चन्द्रमा पर अपने क़दम रख दिये हैं। टेक्नोलॉजी के इस दौर में मानव ने वो मुकाम हासिल कर लिये हैं, जिनके बारे में सदियों पहले कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। विज्ञान के दम पर मनुष्य कितनी भी प्रगति कर ले, लेकिन मृत्यु के सामने मनुष्य हार ही जाता है। हालांकि, विज्ञान का सहारा लेकर मृत्यु को रोका तो नहीं जा सकता है, लेकिन हां मृत्यु को कुछ समय के लिए टाला ज़रूर जा सकता है।
जैसा कि आप जानते हैं कि आधुनिक समय की अस्तव्यस्त जीवन पद्धति के कारण कैंसर जैसी बीमारी फ़ैलती ही जा रही है। वैसे अमेरिका जैसे विकसित देशों में कैंसर का इलाज सम्भव है, लेकिन कैंसर के इलाज के लिए ज़रूरी है कि कैंसर रोग की पहचान सही समय पर हो सके। हालांकि, मेडिकल साइंस ने इतनी प्रगति कर ली है कि काफ़ी सटीक तरीक़े से कैंसर बीमारी के बारे में जानकारी हासिल हो जाती है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि विज्ञान के दम पर मनुष्य दिनों दिन प्रगति कर रहा है, और इस समय AI (Artificial Intelligence) यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से कई मुश्किल और जटिल कामों को सरल तरीक़े से किया जा रहा है।
इसी कड़ी में गूगल का दावा है कि किसी ह्यूमन रेडियोलॉजिस्ट की तुलना में AI (Artificial Intelligence) तकनीक की मदद से और भी ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कैंसर मरीजों की पहचान की जा सकती है। जानकारी के लिए बता दें कि साइंटिफिक जरनल नेचर में छपे एक पेपर के मुताबिक़, गूगल कम्पनी का दावा है कि उसने एक ऐसे एआई मॉडल (AI Model) को विकसित किया है, जो ह्यूमन रेडियोलॉजिस्ट (Human Radiologists) से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कैंसर मरीजों की पहचान कर सकता है। दरअसल, 6 रेडियोलॉजिस्ट को लेकर एक स्टडी की गई, जिसमें एआई सिस्टम ने इन सबसे ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। बता दें कि गूगल इस प्रोजेक्ट पर US और UK में स्थित क्लिनिकल रिसर्च पार्टनर्स के साथ मिलकर दो साल से काम कर रहा है।
वैसे इस बारे में गूगल का कहना है कि गूगल मॉडल किसी रेडियोलॉजिस्ट को रिप्लेस नहीं करेगा, लेकिन इसका एल्गोरिथ्म किसी एक सिंगल रेडियोलॉजिस्ट की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर है। वैसे आमतौर पर स्तन कैंसर के मामले में मेमोग्राम को कई रेडियोलॉजिस्ट द्वारा चेक किया जाता है। हालांकि, अमेरिका में एक रेडियोलॉजिस्ट और यूके में दो रेडियोलॉजिस्ट स्तन कैंसर का डिटेक्शन करते हैं, लेकिन वहीं भारत में इसके लिए कोई ऐसा निश्चित नहीं है कि कितने रेडियोलॉजिस्ट डिटेक्शन करेंगे।
अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, छोटे से छोटे स्तन कैंसर के बारे में मेमोग्राम से पता लग जाता है, लेकिन इसका इलाज हो पाना आसान नहीं है। वहीं यदि गूगल के एल्गोरिथ्म की बात करें, तो यह ज़रूरी नहीं है कि यह रेडियोलॉजिस्ट को रिप्लेस कर पाएगा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में रेडियोलॉजिस्ट की काफ़ी कमी है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति दो लाख अठारह हज़ार की जनसंख्या पर सिर्फ़ एक रेडियोलॉजिस्ट है। तो कहा जा सकता है कि इन स्थितियों में गूगल की तकनीक से कैंसर मरीजों की पहचान आसानी से हो जाएगी।
हालांकि, डॉक्टर्स का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कभी भी मनुष्य की जगह नहीं ले पाएगा, ख़ासकर कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों के इलाज में। हां इतना ज़रूर हो सकता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से संचालित उपकरणों की मदद इलाज में ली जा सकती है, लेकिन पूर्ण रूप से उन पर ही निर्भर रहना कहीं से भी समझदारी नहीं है। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि गूगल का कैंसर के मरीजों के बारे में जो दावा दिया जा रहा है, वो कितना सही साबित हो पाता है। वैसे यह सही है कि मानव और मशीन की क्षमता की तुलना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है। मानव और मशीन दोनों की ही अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग क्षमताएं हैं, लेकिन यदि मशीन, मानव की सहायक बनकर किसी काम को आसानी से करने में सहायता प्रदान करती है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
JAN 03 (WTN) – विज्ञान की सीमाएं और क्षमताएं इतनी विशाल हैं कि वे अपरिभाषित और अनन्त हैं। आज से 300 साल पहले के मानव जीवन और आज के दौर के मानव जीवन के बीच सब कुछ बदल गया है। सदियों तक जिस चन्द्रमा को मनुष्य पृथ्वी पर बैठे निहारता रहता था, विज्ञान के दम पर मनुष्य ने उसी चन्द्रमा पर अपने क़दम रख दिये हैं। टेक्नोलॉजी के इस दौर में मानव ने वो मुकाम हासिल कर लिये हैं, जिनके बारे में सदियों पहले कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। विज्ञान के दम पर मनुष्य कितनी भी प्रगति कर ले, लेकिन मृत्यु के सामने मनुष्य हार ही जाता है। हालांकि, विज्ञान का सहारा लेकर मृत्यु को रोका तो नहीं जा सकता है, लेकिन हां मृत्यु को कुछ समय के लिए टाला ज़रूर जा सकता है।
जैसा कि आप जानते हैं कि आधुनिक समय की अस्तव्यस्त जीवन पद्धति के कारण कैंसर जैसी बीमारी फ़ैलती ही जा रही है। वैसे अमेरिका जैसे विकसित देशों में कैंसर का इलाज सम्भव है, लेकिन कैंसर के इलाज के लिए ज़रूरी है कि कैंसर रोग की पहचान सही समय पर हो सके। हालांकि, मेडिकल साइंस ने इतनी प्रगति कर ली है कि काफ़ी सटीक तरीक़े से कैंसर बीमारी के बारे में जानकारी हासिल हो जाती है। लेकिन जैसा कि हमने आपको बताया कि विज्ञान के दम पर मनुष्य दिनों दिन प्रगति कर रहा है, और इस समय AI (Artificial Intelligence) यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से कई मुश्किल और जटिल कामों को सरल तरीक़े से किया जा रहा है।
इसी कड़ी में गूगल का दावा है कि किसी ह्यूमन रेडियोलॉजिस्ट की तुलना में AI (Artificial Intelligence) तकनीक की मदद से और भी ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कैंसर मरीजों की पहचान की जा सकती है। जानकारी के लिए बता दें कि साइंटिफिक जरनल नेचर में छपे एक पेपर के मुताबिक़, गूगल कम्पनी का दावा है कि उसने एक ऐसे एआई मॉडल (AI Model) को विकसित किया है, जो ह्यूमन रेडियोलॉजिस्ट (Human Radiologists) से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कैंसर मरीजों की पहचान कर सकता है। दरअसल, 6 रेडियोलॉजिस्ट को लेकर एक स्टडी की गई, जिसमें एआई सिस्टम ने इन सबसे ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन किया। बता दें कि गूगल इस प्रोजेक्ट पर US और UK में स्थित क्लिनिकल रिसर्च पार्टनर्स के साथ मिलकर दो साल से काम कर रहा है।
वैसे इस बारे में गूगल का कहना है कि गूगल मॉडल किसी रेडियोलॉजिस्ट को रिप्लेस नहीं करेगा, लेकिन इसका एल्गोरिथ्म किसी एक सिंगल रेडियोलॉजिस्ट की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर है। वैसे आमतौर पर स्तन कैंसर के मामले में मेमोग्राम को कई रेडियोलॉजिस्ट द्वारा चेक किया जाता है। हालांकि, अमेरिका में एक रेडियोलॉजिस्ट और यूके में दो रेडियोलॉजिस्ट स्तन कैंसर का डिटेक्शन करते हैं, लेकिन वहीं भारत में इसके लिए कोई ऐसा निश्चित नहीं है कि कितने रेडियोलॉजिस्ट डिटेक्शन करेंगे।
अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार, छोटे से छोटे स्तन कैंसर के बारे में मेमोग्राम से पता लग जाता है, लेकिन इसका इलाज हो पाना आसान नहीं है। वहीं यदि गूगल के एल्गोरिथ्म की बात करें, तो यह ज़रूरी नहीं है कि यह रेडियोलॉजिस्ट को रिप्लेस कर पाएगा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में रेडियोलॉजिस्ट की काफ़ी कमी है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति दो लाख अठारह हज़ार की जनसंख्या पर सिर्फ़ एक रेडियोलॉजिस्ट है। तो कहा जा सकता है कि इन स्थितियों में गूगल की तकनीक से कैंसर मरीजों की पहचान आसानी से हो जाएगी।
हालांकि, डॉक्टर्स का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कभी भी मनुष्य की जगह नहीं ले पाएगा, ख़ासकर कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों के इलाज में। हां इतना ज़रूर हो सकता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से संचालित उपकरणों की मदद इलाज में ली जा सकती है, लेकिन पूर्ण रूप से उन पर ही निर्भर रहना कहीं से भी समझदारी नहीं है। अब यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि गूगल का कैंसर के मरीजों के बारे में जो दावा दिया जा रहा है, वो कितना सही साबित हो पाता है। वैसे यह सही है कि मानव और मशीन की क्षमता की तुलना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है। मानव और मशीन दोनों की ही अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग क्षमताएं हैं, लेकिन यदि मशीन, मानव की सहायक बनकर किसी काम को आसानी से करने में सहायता प्रदान करती है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।