खाड़ी क्षेत्र में तनाव यानी भारत में महंगाई बढ़ने की आशंका
Friday - January 3, 2020 12:44 pm ,
Category : WTN HINDI
अमेरिका और ईरान के बीच फ़िर से बढ़ा तनाव
अमेरिकी एयर स्ट्राइक से महंगा हुआ कच्चा तेल, भारत में बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीज़ल के दाम
JAN 03 (WTN) – यदि आशंकाएं सही साबित हुईं, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है, और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में वृद्धि का ख़ामियाज़ा महंगाई के रूप में आम जनता को भुगतना पड़ सकता है। दरअसल, इराक़ की राजधानी बग़दाद में अमेरिका के हवाई हमले में ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत की ख़बर के बाद दुनियाभर में कच्चे तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा देखने को मिला है। इराक़ी मिलिशिया ने दावा किया है कि अमेरिकी एयर स्ट्राइक में इलाइट कुड्स फोर्स के हेड ईरानी मेजर जनरल कासिम सुलेमानी के अलावा 7 अन्य लोगों की मौत हो गई है। इस हवाई हमले और ईरान द्वारा बदला लिये जाने की आशंका के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम कुछ ही मिनटों में 3 डॉलर बढ़कर 68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं।
स्वाभाविक है कि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चा तेल महंगा होने के कारण कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, और कच्चा तेल महंगा होने से भारत में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा होगा। जानकारी के लिए बता दें कि पिछले एक सप्ताह में पेट्रोल के दाम क़रीब एक प्रतिशत तक बढ़ गये हैं। भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल के महंगा होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफ़ी प्रभाव पड़ने वाला है।
दरअसल, अमेरिकी एयर स्ट्राइक के बाद अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी क्षेत्र में तनाव और भी ज़्यादा बढ़ सकता है, और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की सप्लाई में कमी आ सकती है। अब चूंकि कच्चे तेल की सप्लाई में कमी आएगी, तो इससे तेल के दामों में वृद्धि होना लाजिमी है। तेल अर्थव्यवस्था के जानकारों के मुताबिक़, कच्चे तेल की क़ीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के राजकोषीय घाटे और करंट अकाउंट बैलेंस पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। यानी कच्चा तेल महंगा होने से भारत की जीडीपी पर 0.10 से 0.40 प्रतिशत का बोझ बढ़ जाता है। वहीं यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कच्चे तेल की क़ीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से जीडीपी ग्रोथ रेट 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक नीचे आ सकती है।
जानकारी के लिए बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चा तेल महंगा होने से इण्डियन बास्केट में भी कच्चा तेल महंगा हो जाता है। कच्चा तेल महंगा होने से भारतीय की बड़ी तेल कम्पनियों पर दबाव रहता है कि वो कच्चे तेल महंगा होने पर पेट्रोल-डीज़ल के दाम में वृद्धि करें। स्वाभाविक है कि डीज़ल महंगा होने से परिवहन महंगा होता है, और परिवहन महंगा होने से महंगाई बढ़ने का डर रहता है। जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारत में महंगाई एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में थोड़ी सी भी अशान्ति भारत में महंगाई के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है। बता दें कि कच्चा तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल उसी अनुपात में महंगा होगा, और इस स्थिति में करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बिगड़ेगी। अब जबकि ऐसा सब होने से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा, तो स्वाभाविक है कि इसका सीधा असर देश के आम व्यक्ति पर भी पड़ेगा। जानकारों के मुताबिक़, यदि आगे भी कच्चा तेल ऐसा ही महंगा होता रहा, तो इससे करंट अकाउंट डिफिसिट बढ़ने के साथ ही भारतीय करेंसी रुपये में डॉलर की तुलना में कमज़ोरी आ सकती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें यह ज़रूरी नहीं है कि करंट अकाउंट डेफिसिट हमेशा किसी देश के लिए नुकसानदेह ही होता है। दरअसल, भारत जैसे विकासशील देशों में लोकल उत्पादन और भविष्य में निर्यात बढ़ाने के लिए कम समय के लिए करंट अकाउंट डेफिसिट हो सकता है, लेकिन लम्बे समय के लिए यदि करंट अकाउंट डेफिसिट होता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।
साफ़ ज़ाहिर होता है कि भारत में महंगाई का नियंत्रण में रहना बहुत हद तक खाड़ी क्षेत्र की शान्ति पर निर्भर करता है। यदि इतिहास पर गौर किया जाये, तो 90 के शुरुआती दशक में खाड़ी युद्ध के बाद से लेकर अभी तक, जब कभी भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा है, इसका खामियाजा भारत की जनता को महंगाई के रूप में भुगतना पड़ा है। जैसा कि आप जानते हैं कि काफ़ी लम्बे से समय से ईरान और अमेरिका के बीच खाड़ी क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई जारी है, ऐसे में यदि कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने अमेरिका या इज़रायल के हितों पर खाड़ी क्षेत्र में हमला किया, तो इससे कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होगी और यदि कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो इससे भारत में महंगाई बढ़ना स्वाभाविक है।
JAN 03 (WTN) – यदि आशंकाएं सही साबित हुईं, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है, और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में वृद्धि का ख़ामियाज़ा महंगाई के रूप में आम जनता को भुगतना पड़ सकता है। दरअसल, इराक़ की राजधानी बग़दाद में अमेरिका के हवाई हमले में ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत की ख़बर के बाद दुनियाभर में कच्चे तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा देखने को मिला है। इराक़ी मिलिशिया ने दावा किया है कि अमेरिकी एयर स्ट्राइक में इलाइट कुड्स फोर्स के हेड ईरानी मेजर जनरल कासिम सुलेमानी के अलावा 7 अन्य लोगों की मौत हो गई है। इस हवाई हमले और ईरान द्वारा बदला लिये जाने की आशंका के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम कुछ ही मिनटों में 3 डॉलर बढ़कर 68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए हैं।
स्वाभाविक है कि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चा तेल महंगा होने के कारण कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, और कच्चा तेल महंगा होने से भारत में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में इज़ाफ़ा होगा। जानकारी के लिए बता दें कि पिछले एक सप्ताह में पेट्रोल के दाम क़रीब एक प्रतिशत तक बढ़ गये हैं। भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल के महंगा होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर काफ़ी प्रभाव पड़ने वाला है।
दरअसल, अमेरिकी एयर स्ट्राइक के बाद अमेरिका और ईरान के बीच खाड़ी क्षेत्र में तनाव और भी ज़्यादा बढ़ सकता है, और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की सप्लाई में कमी आ सकती है। अब चूंकि कच्चे तेल की सप्लाई में कमी आएगी, तो इससे तेल के दामों में वृद्धि होना लाजिमी है। तेल अर्थव्यवस्था के जानकारों के मुताबिक़, कच्चे तेल की क़ीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के राजकोषीय घाटे और करंट अकाउंट बैलेंस पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। यानी कच्चा तेल महंगा होने से भारत की जीडीपी पर 0.10 से 0.40 प्रतिशत का बोझ बढ़ जाता है। वहीं यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कच्चे तेल की क़ीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से जीडीपी ग्रोथ रेट 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक नीचे आ सकती है।
जानकारी के लिए बता दें कि अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चा तेल महंगा होने से इण्डियन बास्केट में भी कच्चा तेल महंगा हो जाता है। कच्चा तेल महंगा होने से भारतीय की बड़ी तेल कम्पनियों पर दबाव रहता है कि वो कच्चे तेल महंगा होने पर पेट्रोल-डीज़ल के दाम में वृद्धि करें। स्वाभाविक है कि डीज़ल महंगा होने से परिवहन महंगा होता है, और परिवहन महंगा होने से महंगाई बढ़ने का डर रहता है। जैसा कि आप जानते ही हैं कि भारत में महंगाई एक बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा है, ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में थोड़ी सी भी अशान्ति भारत में महंगाई के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है।
जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है। बता दें कि कच्चा तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल उसी अनुपात में महंगा होगा, और इस स्थिति में करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बिगड़ेगी। अब जबकि ऐसा सब होने से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा, तो स्वाभाविक है कि इसका सीधा असर देश के आम व्यक्ति पर भी पड़ेगा। जानकारों के मुताबिक़, यदि आगे भी कच्चा तेल ऐसा ही महंगा होता रहा, तो इससे करंट अकाउंट डिफिसिट बढ़ने के साथ ही भारतीय करेंसी रुपये में डॉलर की तुलना में कमज़ोरी आ सकती है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें यह ज़रूरी नहीं है कि करंट अकाउंट डेफिसिट हमेशा किसी देश के लिए नुकसानदेह ही होता है। दरअसल, भारत जैसे विकासशील देशों में लोकल उत्पादन और भविष्य में निर्यात बढ़ाने के लिए कम समय के लिए करंट अकाउंट डेफिसिट हो सकता है, लेकिन लम्बे समय के लिए यदि करंट अकाउंट डेफिसिट होता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।
साफ़ ज़ाहिर होता है कि भारत में महंगाई का नियंत्रण में रहना बहुत हद तक खाड़ी क्षेत्र की शान्ति पर निर्भर करता है। यदि इतिहास पर गौर किया जाये, तो 90 के शुरुआती दशक में खाड़ी युद्ध के बाद से लेकर अभी तक, जब कभी भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा है, इसका खामियाजा भारत की जनता को महंगाई के रूप में भुगतना पड़ा है। जैसा कि आप जानते हैं कि काफ़ी लम्बे से समय से ईरान और अमेरिका के बीच खाड़ी क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई जारी है, ऐसे में यदि कासिम सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने अमेरिका या इज़रायल के हितों पर खाड़ी क्षेत्र में हमला किया, तो इससे कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होगी और यदि कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो इससे भारत में महंगाई बढ़ना स्वाभाविक है।