क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव से सहमी दुनिया
Saturday - January 4, 2020 2:01 pm ,
Category : WTN HINDI
क़ासिम सुलेमानी की हत्या से मध्य-पूर्व में युद्ध की आशंका
सुलेमानी की हत्या का बदला लेने ईरान के पास हैं कई विकल्प
JAN 04 (WTN) – अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका ने ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी को मार गिराया है, जिसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच साल 1979 की तरह एक बार फ़िर से टकराव पैदा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के बड़े दुश्मनों में से एक सुलेमानी को मारकर ईरान को एक बहुत बड़ा झटका दिया है। हालांकि, अमेरिकी भले ही ईरान से युद्ध ना चाहता हो, लेकिन मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान की पकड़ मज़बूत करने वाले और इराक़ के प्रमुख सहयोगी सुलेमानी की हत्या कर अमेरिका ने एक नये खूनी संघर्ष को न्यौता दे दिया है।
बता दें कि सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने प्रण लिया है कि वह सुलेमानी की हत्या के कसूरवारों से जोरदार तरीक़े से बदला लेगा। इधर, ईरानी मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका को ईरान की इस धमकी को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क़ासिम सुलेमानी, ईरान की दूसरी सबसे ताक़तवर शख्सियत थे। अब जबकि अमेरिका ने ईरान की एक कद्दावर शख़्सियत को मार गिराया है, तो ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अमेरिका से बदला लेने के लिए ईरान क्या कुछ क़दम उठा सकता है?
जानकारों के मुताबिक़, ईरान अपनी ख़ासियत गुरिल्ला वॉर के ज़रिये अमेरिका से बदला ले सकता है। वहीं ईरान चाहे तो अमेरिका और उसके सहयोगियों पर सीधे तौर पर हमला भी कर दे, लेकिन यदि ईरान इन विकल्पों को आज़माता है तो यह दोनों ही विकल्प ईरान के लिए काफ़ी ख़तरनाक साबित होने वाले हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रान्ति हुई थी, जिसके बाद ईरान में अमेरिकी समर्थित रजा शाह को सत्ता से उखाड़ कर मौलवियों ने शासन पर अपना अधिकार जमा लिया था। ईरान में शासन चला रहे मौलवियों को डर है कि यदि ईरान पर अमेरिका ने बड़ा हमला कर दिया, तो हो सकता है कि मौलवी सत्ता से बाहर हो जाएं।
ईरान की कूटनीति के जानकारों का मानना है कि वैसे तो सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान बदला लेने के लिए कुछ भी कर सकता है, लेकिन इतना भी तय है कि ईरान बदला लेने के लिए जो भी क़दम उठाएगा वो काफ़ी सोच समझकर ही उठाएगा। कहा जा रहा है कि ईरान, सुलेमानी की हत्या का बदला अभी ना लेकर कुछ समय बाद ले। युद्ध नीति के जानकारों के मुताबिक़, गुरिल्ला युद्धनीति से ईरान, अमेरिका से बदला से सकता है। बता दें कि 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान ने गुरिल्ला युद्ध के ज़रिये ही इराक़ और उसकी समर्थित सेनाओं को मुश्किल में डाल दिया था। ऐसे में जबकि ईरान को इराक़, सीरिया, लेबनान और अन्य कुछ निकटवर्ती देशों के चरमपंथी गुटों का समर्थन हासिल है, तो ऐसे में मध्य-पूर्व की रणभूमि में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ सकता है।
दरअसल, ईरान के लिए क़ासिम सुलेमानी इसलिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि कुद्स फोर्स के मेजर जनरल के रूप में सुलेमानी ने मध्य-पूर्व में ईरान के वर्चस्व को कायम किया था। ऐसे में अपने भरोसेमंद सैन्य अधिकारी की हत्या के बाद ईरान, गुरिल्ला युद्ध के ज़रिये मध्य-पूर्व में अमेरिकी समर्थित देशों में तबाही मचा सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि ईरान को यमन में हूती विद्रोहियों का समर्थन हासिल है, तो वहीं लेबनान में हेजबुल्लाह और इराक़ में शिया मिलिशिया के साथ भी ईरान के काफ़ी मज़बूत सम्बन्ध हैं।
जानकारों के मुताबिक़, यदि ईरान प्रॉक्सी वॉर शुरू करता है, तो इराक़ में स्थित ईरान समर्थित शिया मिलिशिया इराक़ से अमेरिकी फौजों को खदेड़ने की कोशिश कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो इससे इराक में राजनीतिक संकट पैदा हो जाएगा, और अमेरिकी सेना को वहां पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं यदि किसी भी कारण से अमेरिकी सेना को इराक़ से हटना पड़ता है, तो इससे अमेरिका के लिए काफ़ी बड़ा रणनीतिक नुकसान होगा। बात करें लेबनान की, तो वहां पर चरमपंथी संगठन हेजबुल्लाह संघर्ष छेड़ सकता है। वहीं यमन में भी हूती विद्रोही अशान्ति फ़ैला सकते हैं, जिससे यहां पर शान्ति के प्रयासों को झटका लग सकता है।
वैसे हथियारों की जगह पर ईरान साइबर हमले से भी अमेरिका को निशाना बनाकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है। जानकारों के मुताबिक़, ईरान के पास अमेरिकी और उसके समर्थित देशों के साइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की ताक़त है, और ईरान ने कथित तौर पर एक 'साइबर आर्मी' का भी गठन कर लिया है, जो इस्लामिक गणराज्य ईरान के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। हो सकता है कि सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान अपने साइबर हमले में बांध और पावर स्टेशन्स को अपना निशाना बनाये। यदि ईरान ऐसा करता है तो इससे बिजली कटौती, गैस लीक, विस्फोट और यातायात में रुकावट जैसी कई तरह की परेशानियों का सामना अमेरिका और उसके समर्थित देशों को करना पड़ सकता है।
वहीं ईरान के पास एक अन्य हथियार है जिसके दम पर वो अमेरिका को दबाव में ला सकता है। दरअसल, ईरान दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक मार्ग होर्मूज स्ट्रेट को ब्लॉक करके पूरी दुनिया में तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, और यदि ऐसा होता है तो इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हो जाएंगी। अमेरिका से बदला लेने के लिए ईरान मध्य-पूर्व में पश्चिमी देशों समेत सऊदी के जहाजों को भी आसानी से निशाना बना सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि कुछ दिनों पहले सऊदी तेल संयंत्रों पर हमले के पीछे ईरान पर साजिश के आरोप लग चुके हैं।
इन सभी विकल्पों के अलावा ईरान के पास सबसे ख़तरनाक और विध्वंसक विकल्प है कि वो बैलेस्टिक मिसाइलों से अमेरिकी हितों पर हमला कर दे। हो सकता है कि ईरान मध्य-पूर्व में अपने क्षेत्रीय दुश्मनों और अमेरिका के सहयोगियों इज़रायल और सऊदी अरब को टारगेट कर सकता है, और यदि ऐसा होता है तो इससे अमेरिका-ईरान संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।
वैसे लगता नहीं है कि सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान सीधे युद्ध के विकल्प को अपनाएगा। ऐसा क्योंकि यदि ईरान युद्ध शुरू करता है, तो इस युद्ध को ख़त्म अमेरिका करेगा, और बुरी तरह से बर्बाद करने के बाद ही अमेरिका, ईरान के साथ युद्ध बंद करेगा। इसलिए सबसे बड़ी सम्भावना यही है कि दोनों ही देश युद्ध की बजाय एक दूसरे को झुकाने की कूटनीति पर काम करेंगे, और ज़्यादा से ज़्यादा हो सकता है कि ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा ले।
JAN 04 (WTN) – अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिका ने ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी को मार गिराया है, जिसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच साल 1979 की तरह एक बार फ़िर से टकराव पैदा हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के बड़े दुश्मनों में से एक सुलेमानी को मारकर ईरान को एक बहुत बड़ा झटका दिया है। हालांकि, अमेरिकी भले ही ईरान से युद्ध ना चाहता हो, लेकिन मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान की पकड़ मज़बूत करने वाले और इराक़ के प्रमुख सहयोगी सुलेमानी की हत्या कर अमेरिका ने एक नये खूनी संघर्ष को न्यौता दे दिया है।
बता दें कि सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने प्रण लिया है कि वह सुलेमानी की हत्या के कसूरवारों से जोरदार तरीक़े से बदला लेगा। इधर, ईरानी मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका को ईरान की इस धमकी को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क़ासिम सुलेमानी, ईरान की दूसरी सबसे ताक़तवर शख्सियत थे। अब जबकि अमेरिका ने ईरान की एक कद्दावर शख़्सियत को मार गिराया है, तो ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अमेरिका से बदला लेने के लिए ईरान क्या कुछ क़दम उठा सकता है?
जानकारों के मुताबिक़, ईरान अपनी ख़ासियत गुरिल्ला वॉर के ज़रिये अमेरिका से बदला ले सकता है। वहीं ईरान चाहे तो अमेरिका और उसके सहयोगियों पर सीधे तौर पर हमला भी कर दे, लेकिन यदि ईरान इन विकल्पों को आज़माता है तो यह दोनों ही विकल्प ईरान के लिए काफ़ी ख़तरनाक साबित होने वाले हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रान्ति हुई थी, जिसके बाद ईरान में अमेरिकी समर्थित रजा शाह को सत्ता से उखाड़ कर मौलवियों ने शासन पर अपना अधिकार जमा लिया था। ईरान में शासन चला रहे मौलवियों को डर है कि यदि ईरान पर अमेरिका ने बड़ा हमला कर दिया, तो हो सकता है कि मौलवी सत्ता से बाहर हो जाएं।
ईरान की कूटनीति के जानकारों का मानना है कि वैसे तो सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान बदला लेने के लिए कुछ भी कर सकता है, लेकिन इतना भी तय है कि ईरान बदला लेने के लिए जो भी क़दम उठाएगा वो काफ़ी सोच समझकर ही उठाएगा। कहा जा रहा है कि ईरान, सुलेमानी की हत्या का बदला अभी ना लेकर कुछ समय बाद ले। युद्ध नीति के जानकारों के मुताबिक़, गुरिल्ला युद्धनीति से ईरान, अमेरिका से बदला से सकता है। बता दें कि 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान ईरान ने गुरिल्ला युद्ध के ज़रिये ही इराक़ और उसकी समर्थित सेनाओं को मुश्किल में डाल दिया था। ऐसे में जबकि ईरान को इराक़, सीरिया, लेबनान और अन्य कुछ निकटवर्ती देशों के चरमपंथी गुटों का समर्थन हासिल है, तो ऐसे में मध्य-पूर्व की रणभूमि में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ सकता है।
दरअसल, ईरान के लिए क़ासिम सुलेमानी इसलिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि कुद्स फोर्स के मेजर जनरल के रूप में सुलेमानी ने मध्य-पूर्व में ईरान के वर्चस्व को कायम किया था। ऐसे में अपने भरोसेमंद सैन्य अधिकारी की हत्या के बाद ईरान, गुरिल्ला युद्ध के ज़रिये मध्य-पूर्व में अमेरिकी समर्थित देशों में तबाही मचा सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि ईरान को यमन में हूती विद्रोहियों का समर्थन हासिल है, तो वहीं लेबनान में हेजबुल्लाह और इराक़ में शिया मिलिशिया के साथ भी ईरान के काफ़ी मज़बूत सम्बन्ध हैं।
जानकारों के मुताबिक़, यदि ईरान प्रॉक्सी वॉर शुरू करता है, तो इराक़ में स्थित ईरान समर्थित शिया मिलिशिया इराक़ से अमेरिकी फौजों को खदेड़ने की कोशिश कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो इससे इराक में राजनीतिक संकट पैदा हो जाएगा, और अमेरिकी सेना को वहां पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं यदि किसी भी कारण से अमेरिकी सेना को इराक़ से हटना पड़ता है, तो इससे अमेरिका के लिए काफ़ी बड़ा रणनीतिक नुकसान होगा। बात करें लेबनान की, तो वहां पर चरमपंथी संगठन हेजबुल्लाह संघर्ष छेड़ सकता है। वहीं यमन में भी हूती विद्रोही अशान्ति फ़ैला सकते हैं, जिससे यहां पर शान्ति के प्रयासों को झटका लग सकता है।
वैसे हथियारों की जगह पर ईरान साइबर हमले से भी अमेरिका को निशाना बनाकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है। जानकारों के मुताबिक़, ईरान के पास अमेरिकी और उसके समर्थित देशों के साइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की ताक़त है, और ईरान ने कथित तौर पर एक 'साइबर आर्मी' का भी गठन कर लिया है, जो इस्लामिक गणराज्य ईरान के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। हो सकता है कि सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान अपने साइबर हमले में बांध और पावर स्टेशन्स को अपना निशाना बनाये। यदि ईरान ऐसा करता है तो इससे बिजली कटौती, गैस लीक, विस्फोट और यातायात में रुकावट जैसी कई तरह की परेशानियों का सामना अमेरिका और उसके समर्थित देशों को करना पड़ सकता है।
वहीं ईरान के पास एक अन्य हथियार है जिसके दम पर वो अमेरिका को दबाव में ला सकता है। दरअसल, ईरान दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक मार्ग होर्मूज स्ट्रेट को ब्लॉक करके पूरी दुनिया में तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, और यदि ऐसा होता है तो इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हो जाएंगी। अमेरिका से बदला लेने के लिए ईरान मध्य-पूर्व में पश्चिमी देशों समेत सऊदी के जहाजों को भी आसानी से निशाना बना सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि कुछ दिनों पहले सऊदी तेल संयंत्रों पर हमले के पीछे ईरान पर साजिश के आरोप लग चुके हैं।
इन सभी विकल्पों के अलावा ईरान के पास सबसे ख़तरनाक और विध्वंसक विकल्प है कि वो बैलेस्टिक मिसाइलों से अमेरिकी हितों पर हमला कर दे। हो सकता है कि ईरान मध्य-पूर्व में अपने क्षेत्रीय दुश्मनों और अमेरिका के सहयोगियों इज़रायल और सऊदी अरब को टारगेट कर सकता है, और यदि ऐसा होता है तो इससे अमेरिका-ईरान संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।
वैसे लगता नहीं है कि सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान सीधे युद्ध के विकल्प को अपनाएगा। ऐसा क्योंकि यदि ईरान युद्ध शुरू करता है, तो इस युद्ध को ख़त्म अमेरिका करेगा, और बुरी तरह से बर्बाद करने के बाद ही अमेरिका, ईरान के साथ युद्ध बंद करेगा। इसलिए सबसे बड़ी सम्भावना यही है कि दोनों ही देश युद्ध की बजाय एक दूसरे को झुकाने की कूटनीति पर काम करेंगे, और ज़्यादा से ज़्यादा हो सकता है कि ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा ले।