अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने से भारत के व्यापार पर पड़ सकता है प्रतिकूल असर
Monday - January 6, 2020 11:32 am ,
Category : WTN HINDI
ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्धों पर लगा सवालिया निशान
ईरान संकट से फारस की खाड़ी के देशों से होने वाले व्यापार पर संकट के बादल
JAN 06 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फ़िर से बढ़ गया है। अमेरिका ड्रोन हमले में ईरान के शीर्ष जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका गहरा गई है। क़ासिम सुलेमानी की हत्या के पीछे अमेरिका का तर्क है कि सुलेमानी की हत्या इसलिए की गई, क्योंकि सुलेमानी अमेरिकी नागरिकों की हत्या की साजिश में शामिल था। वहीं सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान का कहना है कि वो सुलेमानी की हत्या का अमेरिका से बदला ज़रूर लेगा।
जानकारों के मुताबिक़, ईरान के पास कई विकल्प हैं जिनके सहारे वो अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं हो सकता है कि ईरान, अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दे। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के जानकारों के अनुसार, यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया, तो इस युद्ध को ख़त्म अमेरिका ही करेगा। वैसे कहा जा रहा है कि युद्ध के बजाय ईरान अन्य विकल्पों के ज़रिये अमेरिका से सुलेमानी की हत्या का बदला ले सकता है।
युद्ध हो या नहीं हो, या फ़िर ईरान किसी अन्य तरीक़े से अमेरिका से बदला ले, लेकिन इन सबके बीच फारस की खाड़ी से होने वाले व्यापार पर काफ़ी नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इसी तरह से जारी रहा, तो फारस की खाड़ी के देशों को भारत से होने वाला निर्यात प्रभावित हो सकता है। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण भारतीय निर्यात के प्रभावित होने की आशंका निर्यातकों के प्रमुख संगठन फेडरेशन ऑफ़ इण्डियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (FIEO) ने व्यक्त की है।
FIEO के मुताबिक़, निर्यातकों ने अभी ईरान को होने वाले निर्यात को लेकर वैसे कोई चिन्ता ज़ाहिर नहीं की है, लेकिन यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी रहता है, तो इससे ईरान को भारत से होने वाले निर्यात पर असर पड़ सकता है। इतना ही नहीं, ईरान से भारत को निर्यात होने वाली वस्तुओं पर भी तनाव का असर पड़ सकता है। FIEO के अनुसार ईरान ही नहीं, बल्कि तनाव बढ़ने या युद्ध होने से फारस के खाड़ी में स्थित देशों के साथ व्यापार ठप पड़ सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत और ईरान के बीच सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। बता दें कि ईरान द्वारा भारत को कच्चे तेल, उर्वरक और रसायन का निर्यात किया जाता है। वहीं भारत द्वारा ईरान को मोटे अनाज, चाय, कॉफी, बासमती चावल, मसाले और ऑर्गेनिक केमिकल्स का निर्यात किया जाता है। बता दें कि वित्त वर्ष 2018-19 में ईरान को भारत का निर्यात 3.51 अरब डॉलर था। वहीं इस दौरान भारत का ईरान से आयात 13.52 अरब डॉलर था। दरअसल, इस व्यापार असंतुलन का ख़ास कारण भारत द्वारा ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात है।
दोनों ही देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़े, इसलिए दोनों ही देश द्विपक्षीय तरजीही व्यापार करार (पीटीए) को लेकर वार्ताएं कर रहे हैं। वैसे ईरान काफ़ी समय से भारत से मांग कर रहा है कि भारत को फ़िर से ईरान से तेल आयात शुरू करना चाहिए, क्योंकि ईरान ने भारत से कुछ वस्तुओं के आयात को बढ़ाया है। ईरान का कहना है कि भारत और ईरान के बीच सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं, ऐसे में भारत को अमेरिकी द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों की चिन्ता नहीं करना चाहिए, क्योंकि अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबन्ध एकतरफ़ा हैं, और इन प्रतिबन्धों को संयुक्त राष्ट्र ने नहीं लगाया है।
अमेरिकी प्रतिबन्धों के बावजूद व्यापार चालू रखने के लिए ईरान लगातार भारत से गुजारिश कर रहा है। अमेरिकी डॉलर में व्यापार की जगह पर ईरान भारतीय करेंसी रुपया लेने के लिए भी तैयार है। वहीं ईरान का कहना है कि भारत और ईरान कुछ चुनिंदा बैंकों के ज़रिये व्यापार कर सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिकी प्रतिबन्धों के कारण भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया था। ऐसे में ईरान ने भारत को चेतावनी दी थी कि यदि भारत व्यापारिक सम्बन्धों को फ़िर से शुरू नहीं करता है, तो भारत से होने वाले निर्यात को वो कम सकता है, और यह वस्तुएं किसी अन्य देश से निर्यात कर सकता है।
अब देखना होगा कि सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान किस तरह से अमेरिका से बदला लेता है, और यदि इस कारण अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, तो इससे फारस की खाड़ी में स्थित ईरान समेत अन्य देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्धों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जानकारी के लिए बता दें कि फारस की खाड़ी के देशों के साथ भारत के काफ़ी बेहतर व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता जाता है, और भारत का व्यापार फारस की खाड़ी के देशों से साथ प्रभावित होता है, तो इससे भारत को आर्थिक रूप से काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
JAN 06 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फ़िर से बढ़ गया है। अमेरिका ड्रोन हमले में ईरान के शीर्ष जनरल क़ासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका गहरा गई है। क़ासिम सुलेमानी की हत्या के पीछे अमेरिका का तर्क है कि सुलेमानी की हत्या इसलिए की गई, क्योंकि सुलेमानी अमेरिकी नागरिकों की हत्या की साजिश में शामिल था। वहीं सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान का कहना है कि वो सुलेमानी की हत्या का अमेरिका से बदला ज़रूर लेगा।
जानकारों के मुताबिक़, ईरान के पास कई विकल्प हैं जिनके सहारे वो अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं हो सकता है कि ईरान, अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दे। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के जानकारों के अनुसार, यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया, तो इस युद्ध को ख़त्म अमेरिका ही करेगा। वैसे कहा जा रहा है कि युद्ध के बजाय ईरान अन्य विकल्पों के ज़रिये अमेरिका से सुलेमानी की हत्या का बदला ले सकता है।
युद्ध हो या नहीं हो, या फ़िर ईरान किसी अन्य तरीक़े से अमेरिका से बदला ले, लेकिन इन सबके बीच फारस की खाड़ी से होने वाले व्यापार पर काफ़ी नकारात्मक असर पड़ सकता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इसी तरह से जारी रहा, तो फारस की खाड़ी के देशों को भारत से होने वाला निर्यात प्रभावित हो सकता है। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण भारतीय निर्यात के प्रभावित होने की आशंका निर्यातकों के प्रमुख संगठन फेडरेशन ऑफ़ इण्डियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (FIEO) ने व्यक्त की है।
FIEO के मुताबिक़, निर्यातकों ने अभी ईरान को होने वाले निर्यात को लेकर वैसे कोई चिन्ता ज़ाहिर नहीं की है, लेकिन यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी रहता है, तो इससे ईरान को भारत से होने वाले निर्यात पर असर पड़ सकता है। इतना ही नहीं, ईरान से भारत को निर्यात होने वाली वस्तुओं पर भी तनाव का असर पड़ सकता है। FIEO के अनुसार ईरान ही नहीं, बल्कि तनाव बढ़ने या युद्ध होने से फारस के खाड़ी में स्थित देशों के साथ व्यापार ठप पड़ सकता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत और ईरान के बीच सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। बता दें कि ईरान द्वारा भारत को कच्चे तेल, उर्वरक और रसायन का निर्यात किया जाता है। वहीं भारत द्वारा ईरान को मोटे अनाज, चाय, कॉफी, बासमती चावल, मसाले और ऑर्गेनिक केमिकल्स का निर्यात किया जाता है। बता दें कि वित्त वर्ष 2018-19 में ईरान को भारत का निर्यात 3.51 अरब डॉलर था। वहीं इस दौरान भारत का ईरान से आयात 13.52 अरब डॉलर था। दरअसल, इस व्यापार असंतुलन का ख़ास कारण भारत द्वारा ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात है।
दोनों ही देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़े, इसलिए दोनों ही देश द्विपक्षीय तरजीही व्यापार करार (पीटीए) को लेकर वार्ताएं कर रहे हैं। वैसे ईरान काफ़ी समय से भारत से मांग कर रहा है कि भारत को फ़िर से ईरान से तेल आयात शुरू करना चाहिए, क्योंकि ईरान ने भारत से कुछ वस्तुओं के आयात को बढ़ाया है। ईरान का कहना है कि भारत और ईरान के बीच सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं, ऐसे में भारत को अमेरिकी द्वारा लगाये गये प्रतिबन्धों की चिन्ता नहीं करना चाहिए, क्योंकि अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबन्ध एकतरफ़ा हैं, और इन प्रतिबन्धों को संयुक्त राष्ट्र ने नहीं लगाया है।
अमेरिकी प्रतिबन्धों के बावजूद व्यापार चालू रखने के लिए ईरान लगातार भारत से गुजारिश कर रहा है। अमेरिकी डॉलर में व्यापार की जगह पर ईरान भारतीय करेंसी रुपया लेने के लिए भी तैयार है। वहीं ईरान का कहना है कि भारत और ईरान कुछ चुनिंदा बैंकों के ज़रिये व्यापार कर सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि अमेरिकी प्रतिबन्धों के कारण भारत ने ईरान से तेल आयात बंद कर दिया था। ऐसे में ईरान ने भारत को चेतावनी दी थी कि यदि भारत व्यापारिक सम्बन्धों को फ़िर से शुरू नहीं करता है, तो भारत से होने वाले निर्यात को वो कम सकता है, और यह वस्तुएं किसी अन्य देश से निर्यात कर सकता है।
अब देखना होगा कि सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान किस तरह से अमेरिका से बदला लेता है, और यदि इस कारण अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता है, तो इससे फारस की खाड़ी में स्थित ईरान समेत अन्य देशों के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्धों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जानकारी के लिए बता दें कि फारस की खाड़ी के देशों के साथ भारत के काफ़ी बेहतर व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। ऐसे में यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता जाता है, और भारत का व्यापार फारस की खाड़ी के देशों से साथ प्रभावित होता है, तो इससे भारत को आर्थिक रूप से काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता है।