जानिये क्या है अमेरिका और ईरान के बीच 52 की प्रतीकात्मक लड़ाई?
Tuesday - January 7, 2020 3:58 pm ,
Category : WTN HINDI
अमेरिकी राष्ट्रपति ने दी ईरान के 52 ठिकानों पर हमले की धमकी
ईरान ने लाल झण्डा फहराकर किया अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान, ट्रम्प ने दी तबाही की धमकी
JAN 07 (WTN) – तो क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद आख़िरकार ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर ही दिया है। बता दें कि ईरान की राजधानी तेहरान में मस्जिद-ए-कुम पर लाल झण्डा फहराया दिया गया है, और इस लाल झण्डे को खुद ईरान सरकार ने फहराया है। ईरान सरकार द्वारा लाल झण्डा फहराये जाने का मतलब है कि ईरान सरकार ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है। ईरान सरकार ने मस्जिद-ए-कुम पर झण्डा फहराकर ईरान की सेना और जनता को सन्देश दे दिया है कि मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है।
इधर, अमेरिका भी ईरान को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा है। क़ासिम सुलेमानी को ड्रोन हमले में मार गिराये जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा है, “हमने ईरान में 52 ठिकानों को चिन्हित कर लिया है। अगर अब ईरान ने अमेरिकी नागरिकों या ठिकानों को निशाना बनाया, तो हम ईरान में 52 जगहों पर हमला करेंगे।” दरअसल, ट्रम्प ने अपने ट्वीट में ईरान के 52 जगहों को प्रतीकात्मक बताया है। बता दें कि यह 52 का अंक उन 52 अमेरिकी नागरिकों और राजनयिकों का प्रतीक है, जिन्हें 1979 में ईरान में हुई एक क्रान्ति के दौरान बंधक बना लिया गया था।
आख़िर क्या है यह पूरा मामला, इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 1953 में ईरान में लोकतांत्रिक सरकार हटाकर पहलवी राजवंश सत्ता पर काबिज़ हो गया था। आरोप था कि ईरान की लोकतांत्रिक सरकार गिराने में अमेरिका का षड़यंत्र था। बता दें कि इस तख्तापलट को ईरान के इतिहास में ऑपरेशन अजाक्स के नाम से याद किया जाता है। इस तख्तापलट में ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेह की सरकार हटाई गई, और सरकार की बागडोर मुहम्मद रज़ा पहलवी के हाथों में आई।
मुहम्मद रज़ा पहलवी के बारे में धीरे-धीरे ईरानी जनता यह सोचने लगी थी कि पहलवी अमेरिकी एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। दरअसल, अमेरिका और रूस के बीच जारी कोल्ड वॉर के दौरान शाह ने अमेरिका का पूरा साथ दिया था। अमेरिका के प्रभाव के कारण ही मुहम्मद रज़ा पहलवी के शासन के दौरान ईरान में काफ़ी खुलापन आया, और इस दौरान महिलाओं को काफ़ी आज़ादी मिली थी।
लेकिन धीरे-धीरे ईरान के लोगों का गुस्सा शाह के ख़िलाफ़ बढ़ता ही चला गया। 70 के दशक में ईरान के लोग शाह से तंग आने लगे थे, और वे लोग किसी एक ऐसे नेता की तलाश में थे जिसके नेतृत्व में शाह के ख़िलाफ़ आन्दोलन चलाया जा सके। शाह के ख़िलाफ़ लोगों के गुस्से के नेता के रूप में उभरे इस्लामिक नेता आयतुल्लाह खामनेई। बता दें कि खामनेई के दादा भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, और साल 1830 में वे ईरान चले गये थे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शाह के ख़िलाफ़ आयतुल्लाह खामनेई जब जनता के नेता बनकर उभरे, तो उन्हें शाह ने देश से बाहर निकाल दिया था। आयतुल्लाह खामनेई फ्रांस में रह कर ही शाह के ख़िलाफ़ आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे थे। लेकिन आख़िरकार साल 1979 में शाह को गद्दी छोड़कर देश से भागना पड़ा और मिस्र में शरण लेनी पड़ी। इधर, क्रान्ति के बाद आयतुल्लाह खामनेई ईरान वापस लौटे आये थे। इसी पूरी क्रान्ति को ईरान के इतिहास में इस्लामिक क्रान्ति कहा जाता है।
लेकिन इस पूरी क्रान्ति के दौरान आयतुल्लाह खामनेई के समर्थक छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास के 52 कर्मचारियों और नागरिकों को बंधक बना लिया था। अमेरिकी नागरिकों को क़ैद किये जाने पर पश्चिमी मीडिया ने इसे बदले की कार्रवाई तक क़रार दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे ब्लैकमेल बताते हुए अपने 52 नागरिकों और राजनयिकों को बचाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। अमेरिका ने अपने लोगों को छुड़ाने के लिए सिर्फ राजनीतिक प्रयास ही नहीं किए बल्कि मिलिट्री ऑपरेशन भी किया, लेकिन वो भी असफ़ल रहा।
आखिरकार अल्जीरिया की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों अमेरिका और ईरान के बीच संधि पर हस्ताक्षर हुए, और इसके बाद अमेरिका के 52 लोगों को ईरान की गिरफ्त से 444 दिन बाद आज़ादी मिली। लेकिन ईरान में अमेरिकी नागरिकों के साथ घटी इस घटना को आज भी अमेरिका भूल नहीं पाया है। इन्हीं 52 लोगों की याद में अमेरिका ने ईरान को धमकी दी है कि यदि ईरान ने उसके नागरिकों को निशाना बनाया, तो अमेरिका, ईरान के 52 महत्वपूर्ण जगहों पर हमला कर उन्हें तबाह कर देगा। बताया जा रहा है कि ईरान के यह 52 महत्वपूर्ण स्थान सामरिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के हैं।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंशा के उलट, अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का कहना है कि यदि ईरान से जंग होती है, तो जंग को क़ानून के तहत ही लड़ा जाएगा। साफ़ है कि अमेरिकी रक्षा मंत्री एस्पर की यही सोच है कि जंग के दौरान सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि यह वॉर क्राइम है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो का भी कहना है कि यदि ईरान से युद्ध होता है, तो यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय वॉर क़ानून के तहत ही होगा।
बता दें कि ट्रम्प की 52 ठिकानों पर हमले वाली धमकी की संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने आलोचना की है। इधर, यूनेस्को का कहना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ने ही साल 1954 और 1972 के कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत दोनों ही देशों को युद्ध की स्थिति में प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करनी है। हालांकि, ट्रम्प ने 2018 में यूनेस्को पर इज़राइल के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर ख़ुद को इन समझौतों से बाहर कर लिया था। ख़ैर अब देखना होगा कि यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा, तो क्या अमेरिका ईरान के 52 महत्वपूर्ण ठिकानों पर हवाई हमला कर उन्हें नेस्तानाबूद कर देगा?
JAN 07 (WTN) – तो क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद आख़िरकार ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर ही दिया है। बता दें कि ईरान की राजधानी तेहरान में मस्जिद-ए-कुम पर लाल झण्डा फहराया दिया गया है, और इस लाल झण्डे को खुद ईरान सरकार ने फहराया है। ईरान सरकार द्वारा लाल झण्डा फहराये जाने का मतलब है कि ईरान सरकार ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है। ईरान सरकार ने मस्जिद-ए-कुम पर झण्डा फहराकर ईरान की सेना और जनता को सन्देश दे दिया है कि मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है।
इधर, अमेरिका भी ईरान को सबक सिखाने के लिए तैयार बैठा है। क़ासिम सुलेमानी को ड्रोन हमले में मार गिराये जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा है, “हमने ईरान में 52 ठिकानों को चिन्हित कर लिया है। अगर अब ईरान ने अमेरिकी नागरिकों या ठिकानों को निशाना बनाया, तो हम ईरान में 52 जगहों पर हमला करेंगे।” दरअसल, ट्रम्प ने अपने ट्वीट में ईरान के 52 जगहों को प्रतीकात्मक बताया है। बता दें कि यह 52 का अंक उन 52 अमेरिकी नागरिकों और राजनयिकों का प्रतीक है, जिन्हें 1979 में ईरान में हुई एक क्रान्ति के दौरान बंधक बना लिया गया था।
आख़िर क्या है यह पूरा मामला, इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि साल 1953 में ईरान में लोकतांत्रिक सरकार हटाकर पहलवी राजवंश सत्ता पर काबिज़ हो गया था। आरोप था कि ईरान की लोकतांत्रिक सरकार गिराने में अमेरिका का षड़यंत्र था। बता दें कि इस तख्तापलट को ईरान के इतिहास में ऑपरेशन अजाक्स के नाम से याद किया जाता है। इस तख्तापलट में ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेह की सरकार हटाई गई, और सरकार की बागडोर मुहम्मद रज़ा पहलवी के हाथों में आई।
मुहम्मद रज़ा पहलवी के बारे में धीरे-धीरे ईरानी जनता यह सोचने लगी थी कि पहलवी अमेरिकी एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। दरअसल, अमेरिका और रूस के बीच जारी कोल्ड वॉर के दौरान शाह ने अमेरिका का पूरा साथ दिया था। अमेरिका के प्रभाव के कारण ही मुहम्मद रज़ा पहलवी के शासन के दौरान ईरान में काफ़ी खुलापन आया, और इस दौरान महिलाओं को काफ़ी आज़ादी मिली थी।
लेकिन धीरे-धीरे ईरान के लोगों का गुस्सा शाह के ख़िलाफ़ बढ़ता ही चला गया। 70 के दशक में ईरान के लोग शाह से तंग आने लगे थे, और वे लोग किसी एक ऐसे नेता की तलाश में थे जिसके नेतृत्व में शाह के ख़िलाफ़ आन्दोलन चलाया जा सके। शाह के ख़िलाफ़ लोगों के गुस्से के नेता के रूप में उभरे इस्लामिक नेता आयतुल्लाह खामनेई। बता दें कि खामनेई के दादा भारत के उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, और साल 1830 में वे ईरान चले गये थे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शाह के ख़िलाफ़ आयतुल्लाह खामनेई जब जनता के नेता बनकर उभरे, तो उन्हें शाह ने देश से बाहर निकाल दिया था। आयतुल्लाह खामनेई फ्रांस में रह कर ही शाह के ख़िलाफ़ आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे थे। लेकिन आख़िरकार साल 1979 में शाह को गद्दी छोड़कर देश से भागना पड़ा और मिस्र में शरण लेनी पड़ी। इधर, क्रान्ति के बाद आयतुल्लाह खामनेई ईरान वापस लौटे आये थे। इसी पूरी क्रान्ति को ईरान के इतिहास में इस्लामिक क्रान्ति कहा जाता है।
लेकिन इस पूरी क्रान्ति के दौरान आयतुल्लाह खामनेई के समर्थक छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास के 52 कर्मचारियों और नागरिकों को बंधक बना लिया था। अमेरिकी नागरिकों को क़ैद किये जाने पर पश्चिमी मीडिया ने इसे बदले की कार्रवाई तक क़रार दिया था। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे ब्लैकमेल बताते हुए अपने 52 नागरिकों और राजनयिकों को बचाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। अमेरिका ने अपने लोगों को छुड़ाने के लिए सिर्फ राजनीतिक प्रयास ही नहीं किए बल्कि मिलिट्री ऑपरेशन भी किया, लेकिन वो भी असफ़ल रहा।
आखिरकार अल्जीरिया की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों अमेरिका और ईरान के बीच संधि पर हस्ताक्षर हुए, और इसके बाद अमेरिका के 52 लोगों को ईरान की गिरफ्त से 444 दिन बाद आज़ादी मिली। लेकिन ईरान में अमेरिकी नागरिकों के साथ घटी इस घटना को आज भी अमेरिका भूल नहीं पाया है। इन्हीं 52 लोगों की याद में अमेरिका ने ईरान को धमकी दी है कि यदि ईरान ने उसके नागरिकों को निशाना बनाया, तो अमेरिका, ईरान के 52 महत्वपूर्ण जगहों पर हमला कर उन्हें तबाह कर देगा। बताया जा रहा है कि ईरान के यह 52 महत्वपूर्ण स्थान सामरिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के हैं।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंशा के उलट, अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का कहना है कि यदि ईरान से जंग होती है, तो जंग को क़ानून के तहत ही लड़ा जाएगा। साफ़ है कि अमेरिकी रक्षा मंत्री एस्पर की यही सोच है कि जंग के दौरान सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि यह वॉर क्राइम है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो का भी कहना है कि यदि ईरान से युद्ध होता है, तो यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय वॉर क़ानून के तहत ही होगा।
बता दें कि ट्रम्प की 52 ठिकानों पर हमले वाली धमकी की संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने आलोचना की है। इधर, यूनेस्को का कहना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ने ही साल 1954 और 1972 के कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत दोनों ही देशों को युद्ध की स्थिति में प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करनी है। हालांकि, ट्रम्प ने 2018 में यूनेस्को पर इज़राइल के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर ख़ुद को इन समझौतों से बाहर कर लिया था। ख़ैर अब देखना होगा कि यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा, तो क्या अमेरिका ईरान के 52 महत्वपूर्ण ठिकानों पर हवाई हमला कर उन्हें नेस्तानाबूद कर देगा?