तो क्या ‘इन कारणों’ से 22 जनवरी को नहीं हो पाएगी निर्भया गैंगरेप के दोषियों को फांसी?
Wednesday - January 8, 2020 12:40 pm ,
Category : WTN HINDI
निर्भया गैंगरेप के दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वारंट जारी
हो सकता है कि टल जाये निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी की तारीख़!
JAN 08 (WTN) – पूरे देश को झकझोर कर रखने वाले निर्भया गैंगरेप केस में आख़िरकार पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वारंट जारी कर दिया है। यानी कि फ़िलहाल निर्भया गैंगरेप केस में चारों दोषियों की फांसी की सजा और समय निश्चित हो गया है। डेथ वारंट के अनुसार चारों दोषियों को 22 जनवरी, 2020 को सुबह 7 बजे फांसी पर लटका दिया जाएगा। वैसे पूरे देश को ही काफ़ी समय से इंतज़ार था कि आख़िर कब निर्भया गैंगरेप के दोषियों के लिए डेथ वारंट जारी होता है।
लेकिन यदि हम आपसे कहें कि ज़रूरी नहीं है कि 22 जनवरी को ही चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ा दिया जाये, तो यह पढ़कर आपको आश्चर्य ज़रूर हुआ होगा। दरअसल, कई तरह की क़ानूनी प्रक्रियाओं के कारण हो सकता है कि दोषियों की फांसी की तारीख़ आगे बढ़ जाये। वैसे इस समय तो चारों दोषियों की मौत की सजा के लिए डेथ वारंट जारी हो गया है। आख़िर सज़ा-ए-मौत यानी फांसी के लिए डेथ वारंट क्या होता, आइये पहले इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर-1973, यानी दण्ड प्रक्रिया संहिता- 1973 (CrPC) के तहत 56 फॉर्म्स होते हैं। फॉर्म नम्बर- 42 को डेथ वारंट कहा जाता है। इस फॉर्म नम्बर 42 के ऊपर लिखा होता है, “वारंट ऑफ़ एक्जेक्यूशन ऑफ़ अ सेंटेंस ऑफ़ डेथ.” क़ानूनी भाषा में इसे ही डेथ वारंट या ब्लैक वारंट भी कहते हैं। बता दें कि डेथ वारंट जारी होने के बाद ही किसी व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है।
फांसी की सजा पाये किसी दोषी के लिए जारी किये गये डेथ वारंट के फॉर्म में जेल का नम्बर, केस नम्बर, फांसी पर चढ़ाए जाने वाले क़ैदी या क़ैदियों के नाम, डेथ वारंट जारी होने की तारीख़, फांसी देने की तारीख के साथ-साथ फांसी दिये जाने का समय और जगह सभी कुछ लिखा होता है। बता दें कि डेथ वारंट में साफ़-साफ़ लिखा होता है कि क़ैदी को फांसी पर तब तक लटकाया जाये, जब तक कि उसकी मौत ना हो जाये।
अदालत द्वारा जारी किया गया डेथ वारंट सीधे जेल प्रशासन के पास पहुंचता है। फांसी दिये जाने के बाद क़ैदी की मौत से जुड़े सर्टिफिकेट कोर्ट में दिए जाते हैं, जिसके बाद डेथ वारंट को वापस किया जाता है। बता दें कि जैसे ही डेथ वारंट जेल में पहुंचता है, जेल प्रशासन दोषी को फांसी देने के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर देता है। डेथ वारंट मिलने के बाद जेल प्रशासन फांसी पर चढ़ने वाले दोषियों के परिजनों को सूचना देता है। दोषी के परिजनों को सूचना इसलिए दी जाती है, जिससे उसके परिजन फांसी से पहले उससे मुलाक़ात कर सकें।
वहीं यदि जेल प्रशासन चाहे तो दोषियों की फांसी के बाद परिजनों को फांसी के बाद शव सौप सकता है। बता दें कि अदालत डेथ वारंट यानी ब्लैक वारंट जेल प्रभारी को सम्बोधित करते हुए भेजता है जहां पर दोषी को क़ैद करके रखा गया है। बता दें कि ब्लैक वारंट में ट्रायल कोर्ट के उस जज के हस्ताक्षर भी होते हैं, जिसने अपराधी को दोषी मानते हुए उसे मौत की सज़ा सुनाई थी।
यानी अभी तक तो लगभग तय है कि निर्भया गैंगरेप के दोषियों की 22 जनवरी को सुबह 7 बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा, लेकिन डेथ वारंट जारी होने के बाद भी इन दोषियों के पास 14 दिनों का समय है। इन 14 दिनों में इनके पास कई अधिकार भी हैं, जिनके ज़रिये ये फांसी की तारीख़ को आगे टाल सकते हैं, या फ़िर इनकी फांसी की सज़ा माफ़ भी हो सकती है। बता दें कि यदि ये दोषी सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल करते हैं, और कोर्ट 14 दिनों में फैसला नहीं सुनाता है, तो भी फांसी की तारीख़ आगे बढ़ सकती है। इसके अलावा राष्ट्रपति के पास यदि यह एक बार फ़िर से दया याचिका लगाते हैं, और उस पर फ़ैसला नहीं आने के कारण भी 22 जनवरी को इन दोषियों को फांसी देना मुमकिन नहीं है।
बता दें कि डेथ वारंट जारी करते हुए पटियाला हाउस कोर्ट ने इस फ़ैसले को चुनौती देने के लिए चारों दोषियों को 7 दिन का वक़्त दिया है। यानी चारों दोषी इस डेथ वारंट को ऊपरी अदालत में भी चुनौती दे सकते हैं। वहीं यदि यह चारों डेथ वारंट को चुनौती ना भी दें, तो भी क्यूरेटिव पिटीशन की लाइफ लाइन लेकर वो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं, और इसके लिए भी उनके पास 7 दिन का समय है।
वहीं क्यूरेटिव पिटीशन दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट चाहे तो अगले ही दिन इस पर सुनवाई कर सकती है, या फिर आगे की कोई तारीख़ दे सकती है। यानी कि कहा नहीं जा सकता है कि 22 जनवरी को ही निर्भया गैंगरेप के आरोपियों को फांसी पर चढ़ाया जाएगा। वहीं अब यदि सुप्रीम कोर्ट से क्यूरेटिव पिटीशन ख़ारिज हो जाती है, तो उसके बाद ये चारों दोषी एक बार फ़िर से राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा सकते हैं।
राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने के लिए ये चारों दोषी पहले दया याचिका पर ख़ुद हस्ताक्षर करेंगे, जिसके बाद यह दया याचिका तिहाड़ जेल प्रशासन दिल्ली सरकार को भेजेगा। दया याचिका मिलने के बाद दिल्ली सरकार अपनी राय के साथ इसे गृह मंत्रालय को भेजेगी। वहीं गृह मंत्रालय भी अपनी राय के साथ इसे राष्ट्रपति भवन भेजेगा। इस दया याचिका पर राष्ट्रपति जो भी फ़ैसला लें, उनके हस्ताक्षर के बाद ये आदेश वापस तिहाड़ जेल पहुंचेगा।
यानी कि क्यूरेटिव पिटीशन और राष्ट्रपति को दया याचिका भेजने और उसके मन्जूर या नामन्जूर होने की हालत में कम से कम 10 से ज़्यादा दिन लग सकते हैं, तो ऐसे में लगता नहीं है कि 22 जनवरी को सुबह 7 बजे निर्भया गैंगरेप के आरोपियों को फांसी हो पाएगी।
JAN 08 (WTN) – पूरे देश को झकझोर कर रखने वाले निर्भया गैंगरेप केस में आख़िरकार पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों के ख़िलाफ़ डेथ वारंट जारी कर दिया है। यानी कि फ़िलहाल निर्भया गैंगरेप केस में चारों दोषियों की फांसी की सजा और समय निश्चित हो गया है। डेथ वारंट के अनुसार चारों दोषियों को 22 जनवरी, 2020 को सुबह 7 बजे फांसी पर लटका दिया जाएगा। वैसे पूरे देश को ही काफ़ी समय से इंतज़ार था कि आख़िर कब निर्भया गैंगरेप के दोषियों के लिए डेथ वारंट जारी होता है।
लेकिन यदि हम आपसे कहें कि ज़रूरी नहीं है कि 22 जनवरी को ही चारों दोषियों को फांसी पर चढ़ा दिया जाये, तो यह पढ़कर आपको आश्चर्य ज़रूर हुआ होगा। दरअसल, कई तरह की क़ानूनी प्रक्रियाओं के कारण हो सकता है कि दोषियों की फांसी की तारीख़ आगे बढ़ जाये। वैसे इस समय तो चारों दोषियों की मौत की सजा के लिए डेथ वारंट जारी हो गया है। आख़िर सज़ा-ए-मौत यानी फांसी के लिए डेथ वारंट क्या होता, आइये पहले इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर-1973, यानी दण्ड प्रक्रिया संहिता- 1973 (CrPC) के तहत 56 फॉर्म्स होते हैं। फॉर्म नम्बर- 42 को डेथ वारंट कहा जाता है। इस फॉर्म नम्बर 42 के ऊपर लिखा होता है, “वारंट ऑफ़ एक्जेक्यूशन ऑफ़ अ सेंटेंस ऑफ़ डेथ.” क़ानूनी भाषा में इसे ही डेथ वारंट या ब्लैक वारंट भी कहते हैं। बता दें कि डेथ वारंट जारी होने के बाद ही किसी व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है।
फांसी की सजा पाये किसी दोषी के लिए जारी किये गये डेथ वारंट के फॉर्म में जेल का नम्बर, केस नम्बर, फांसी पर चढ़ाए जाने वाले क़ैदी या क़ैदियों के नाम, डेथ वारंट जारी होने की तारीख़, फांसी देने की तारीख के साथ-साथ फांसी दिये जाने का समय और जगह सभी कुछ लिखा होता है। बता दें कि डेथ वारंट में साफ़-साफ़ लिखा होता है कि क़ैदी को फांसी पर तब तक लटकाया जाये, जब तक कि उसकी मौत ना हो जाये।
अदालत द्वारा जारी किया गया डेथ वारंट सीधे जेल प्रशासन के पास पहुंचता है। फांसी दिये जाने के बाद क़ैदी की मौत से जुड़े सर्टिफिकेट कोर्ट में दिए जाते हैं, जिसके बाद डेथ वारंट को वापस किया जाता है। बता दें कि जैसे ही डेथ वारंट जेल में पहुंचता है, जेल प्रशासन दोषी को फांसी देने के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर देता है। डेथ वारंट मिलने के बाद जेल प्रशासन फांसी पर चढ़ने वाले दोषियों के परिजनों को सूचना देता है। दोषी के परिजनों को सूचना इसलिए दी जाती है, जिससे उसके परिजन फांसी से पहले उससे मुलाक़ात कर सकें।
वहीं यदि जेल प्रशासन चाहे तो दोषियों की फांसी के बाद परिजनों को फांसी के बाद शव सौप सकता है। बता दें कि अदालत डेथ वारंट यानी ब्लैक वारंट जेल प्रभारी को सम्बोधित करते हुए भेजता है जहां पर दोषी को क़ैद करके रखा गया है। बता दें कि ब्लैक वारंट में ट्रायल कोर्ट के उस जज के हस्ताक्षर भी होते हैं, जिसने अपराधी को दोषी मानते हुए उसे मौत की सज़ा सुनाई थी।
यानी अभी तक तो लगभग तय है कि निर्भया गैंगरेप के दोषियों की 22 जनवरी को सुबह 7 बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा, लेकिन डेथ वारंट जारी होने के बाद भी इन दोषियों के पास 14 दिनों का समय है। इन 14 दिनों में इनके पास कई अधिकार भी हैं, जिनके ज़रिये ये फांसी की तारीख़ को आगे टाल सकते हैं, या फ़िर इनकी फांसी की सज़ा माफ़ भी हो सकती है। बता दें कि यदि ये दोषी सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल करते हैं, और कोर्ट 14 दिनों में फैसला नहीं सुनाता है, तो भी फांसी की तारीख़ आगे बढ़ सकती है। इसके अलावा राष्ट्रपति के पास यदि यह एक बार फ़िर से दया याचिका लगाते हैं, और उस पर फ़ैसला नहीं आने के कारण भी 22 जनवरी को इन दोषियों को फांसी देना मुमकिन नहीं है।
बता दें कि डेथ वारंट जारी करते हुए पटियाला हाउस कोर्ट ने इस फ़ैसले को चुनौती देने के लिए चारों दोषियों को 7 दिन का वक़्त दिया है। यानी चारों दोषी इस डेथ वारंट को ऊपरी अदालत में भी चुनौती दे सकते हैं। वहीं यदि यह चारों डेथ वारंट को चुनौती ना भी दें, तो भी क्यूरेटिव पिटीशन की लाइफ लाइन लेकर वो सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं, और इसके लिए भी उनके पास 7 दिन का समय है।
वहीं क्यूरेटिव पिटीशन दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट चाहे तो अगले ही दिन इस पर सुनवाई कर सकती है, या फिर आगे की कोई तारीख़ दे सकती है। यानी कि कहा नहीं जा सकता है कि 22 जनवरी को ही निर्भया गैंगरेप के आरोपियों को फांसी पर चढ़ाया जाएगा। वहीं अब यदि सुप्रीम कोर्ट से क्यूरेटिव पिटीशन ख़ारिज हो जाती है, तो उसके बाद ये चारों दोषी एक बार फ़िर से राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा सकते हैं।
राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने के लिए ये चारों दोषी पहले दया याचिका पर ख़ुद हस्ताक्षर करेंगे, जिसके बाद यह दया याचिका तिहाड़ जेल प्रशासन दिल्ली सरकार को भेजेगा। दया याचिका मिलने के बाद दिल्ली सरकार अपनी राय के साथ इसे गृह मंत्रालय को भेजेगी। वहीं गृह मंत्रालय भी अपनी राय के साथ इसे राष्ट्रपति भवन भेजेगा। इस दया याचिका पर राष्ट्रपति जो भी फ़ैसला लें, उनके हस्ताक्षर के बाद ये आदेश वापस तिहाड़ जेल पहुंचेगा।
यानी कि क्यूरेटिव पिटीशन और राष्ट्रपति को दया याचिका भेजने और उसके मन्जूर या नामन्जूर होने की हालत में कम से कम 10 से ज़्यादा दिन लग सकते हैं, तो ऐसे में लगता नहीं है कि 22 जनवरी को सुबह 7 बजे निर्भया गैंगरेप के आरोपियों को फांसी हो पाएगी।