...तो क्या अमेरिका से डर गया ईरान?
Thursday - January 9, 2020 11:18 am ,
Category : WTN HINDI
ईरान के मिसाइल हमलों को राष्ट्रपति ट्रम्प ने बताया ‘फ्लॉप’
ईरान ने अमेरिकी एयर बेस पर शायद किये बस प्रतीकात्मक हमले, देश की जनता का गुस्सा शान्त करने की कोशिश!
JAN 09 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका द्वारा ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने अमेरिका से बदला लेने की बात कही थी। ईरान की धमकी के बाद अमेरिका ने भी कहा था कि यदि ईरान ने कोई भी ऐसी कार्रवाई की जिससे उसके सैनिकों, नागरिकों और हितों को नुकसान पहुंचाता है, तो इसके काफ़ी गम्भीर परिणाम ईरान को भुगतने पड़ेंगे।
लेकिन क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने जैसे अमेरिका के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की ठान ही ली थी, और इसके बाद ईरान ने इराक़ स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर क़रीब दो दर्ज़न मिसाइलों से हमला किया और दावा किया कि इसमें क़रीब 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है। ईरान के इस दावे के बाद पूरी दुनिया आशंकित हो गई थी कि यदि सही में ईरान के मिसाइल हमलों में 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है, तो अमेरिका इसका बदला ज़रूर लेगा, और यदि अमेरिका ऐसा करता है तो इससे दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ सकता है जो कि विश्व युद्ध तक में बदल सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ईरान के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के उन दावों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है जिसमें ईरान ने दावा किया था कि उसके मिसाइल हमलों में अमेरिका के क़रीब 80 सैनिक मारे गये हैं। ट्रम्प ने अपने बयान में कहा कि ईरान के मिसाइल हमले में कोई भी अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हुआ है। अब जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने काफ़ी ज़िम्मेदारी और सबूतों के साथ अपना यह बयान दिया है, तो क्या मान लिया जाये कि ईरान ने अपने देश के लोगों से झूठ बोला कि मिसाइल हमले में क़रीब 80 अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं।
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के इस दावे के साथ कि ईरान के मिसाइल हमले में कोई भी अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हुआ है, साफ़ ज़ाहिर होता है कि ईरान में इतनी इच्छाशक्ति और ताक़त नहीं आई है कि वो सीधे तौर पर अमेरिका सैनिकों और हितों पर हमला कर दे। जानकारों के मुताबिक़, अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान ने हमला ज़रूर किया था, लेकिन इन मिसाइलों के ज़रिये ईरान सिर्फ़ अमेरिका को डराना चाहता था, और ईरान की कई मिसाइलें टारगेट से काफ़ी दूर गिरीं। दरअसल, ईरान अच्छी तरह से अमेरिका की सैन्य शक्ति को जानता है, और ईरान भी नहीं चाहता था कि इस हमले में किसी भी अमेरिकी सैनिक की मौत हो, क्योंकि यदि ईरान के हमले में किसी भी अमेरिकी सैनिक की मौत हो जाती, तो इसके जवाब में अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई ज़रूर करता।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान ने अपनी मिसाइलों से इराक़ स्थित अमेरिका के दो एयरबेस अल-अशद और इरबिल को निशाना बनाने की कोशिश की थी। ईरान की तसनीम न्यूज़ एजेसी के अनुसार, फतेह-313 और क़ियम मिसाइल से इन ठिकानों पर निशाना साधा गया था, लेकिन इन हमलों से अमेरिकी सेना को कोई नुकसान नहीं हुआ है। इधर अमेरिकी आर्मी के जनरल मार्क मिले के अनुसार, ईरान के मिसाइल हमले का मुख्य मक़सद अमेरिकी सेना की गाड़ियों और अन्य सामानों को नुकसान पहुंचा था।
अमेरिकी सेना के जनरल मार्क मिले के मुताबिक, “मेरा ख़ुद का मानना है कि मैंने जो देखा और जो मुझे पता है, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि इस हमले का मक़सद स्ट्रक्चर डैमेज, वाहनों, उपकरणों और विमानों को नष्ट करने के साथ कर्मियों को मारना था। हालांकि, यह मेरा अपना व्यक्तिगत मूल्यांकन है।”
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, मंगलवार-बुधवार की देर रात 1:45 से 2:15 के बीच ईरान की तरफ़ से 22 मिसाइलें दागी गईं। इसमें से 17 मिसाइलें अल असद एयरबेस की तरफ दागी गई थीं। ईरान द्वारा किये गये मिसाइल हमले की सेटेलाइट तस्वीरें भी आ गई है। इस तस्वीरों के विश्लेषण करने के बाद कहा जा रहा है कि अल असद एयरबेस के पास पांच स्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया था, जबकि कई ऐसे निशाने साधे गए थे जो बेकार थे, और इससे कोई भी नुकसान नहीं हुआ। इतना ही नहीं, एक मिसाइल तो अल असद एयरबेस से 40 किलोमीटर दूर हितान के गांव में गिरी। वहीं एक मिसाइल इरबिल से 47 किलोमीटर दूर बराह में गिरी।
ईरान के मिसाइल हमलों के विश्लेषण के बाद साफ़ ज़ाहिर होता है कि ईरान ने जानबूझ कर मिसाइलों को अमेरिकी एयरबेस से दूर या सिर्फ़ स्ट्रक्चर पर टारगेट किया। दरअसल, ईरान सीधे तौर पर अमेरिका से युद्ध नहीं चाहता है। ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का कहना है कि ऑल इज वेल। यानी साफ़ है कि ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी के किसी भी सैनिक की मौत नहीं हुई है। इधर अमेरिका के कई वरिष्ठ पत्रकार भी यह दावा कर रहे हैं कि ईरान ने जान बूझकर ऐसी जगहों पर मिसाइलों को दागा है जहां अमेरिका को कम के कम नुकसान हो।
दरअसल, टेक्नोलॉजी के मामले में अमेरिका खाड़ी के देश ईरान से काफ़ी आगे है। अमेरिकी सैन्य शक्ति के जानकारों के मुताबिक़, कई घण्टे पहले ही अमेरिका को ईरान के मिसाइल अटैक की सैटेलाइट्स से जानकारी मिल गई थी। यह वहीं सैटेलाइट्स हैं जिनकी सहायता से अमेरिका की उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों पर नज़र रहती है। सैटेलाइट्स से ईरानी हमले की जानकारी मिलते ही अमेरिकी सैनिक बंकर में सुरक्षित छिप गये थे। इस बात की पुष्टि ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने की है कि ईरान के मिसाइल हमले से काफ़ी पहले ही अलार्म बज गये जिससे किसी की भी मौत नहीं हुई।
ईरान के मिसाइल हमलों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि अमेरिकी एयरबेस पर ईरान के हमले प्रतीकात्मक थे। दरअसल, ईरान सीधे तौर पर अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर युद्ध की शुरूआत नहीं करना चाहता है। क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद देश में अमेरिका के ख़िलाफ़ फैले गुस्से को शान्त करने के लिए ईरान की सरकार ने इराक़ स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले तो किये, लेकिन ईरान ने यह हमले जान बूझकर ग़लत किये या फ़िर सैन्य सामानों को निशाना बनाकर किये। इधर अमेरिका ने टेक्नोलॉजी के दम पर हमलों के बारे में पहले ही जानकारी हासिल कर थी, तो ईरानी हमले में अमेरिका को किसी भी तरह की कोई भी सैन्य क्षति नहीं हुई।
यानी ईरान की सरकार का वह दावा कि ईरान के मिसाइल हमले में क़रीब 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है, ग़लत साबित होता है। साफ़ है कि ईरान को अपनी शक्ति पता है, और ईरान ख़ुद अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करने की ग़लती नहीं करना चाहेगा। क्योंकि यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किया, तो यह तय है कि इस युद्ध को अमेरिका ही ख़त्म करेगा वो भी अपनी शर्तों पर। ईरान जानता है कि अमेरिकी की मिसाइलें और लड़ाकू विमान ईरान में विध्वंस मचा सकते हैं, ऐसे में ईरानी सरकार ने प्रतीकात्मक मिसाइल हमला कर अपने देश के लोगों का गुस्सा शान्त करने की कोशिश भर की है।
JAN 09 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका द्वारा ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने अमेरिका से बदला लेने की बात कही थी। ईरान की धमकी के बाद अमेरिका ने भी कहा था कि यदि ईरान ने कोई भी ऐसी कार्रवाई की जिससे उसके सैनिकों, नागरिकों और हितों को नुकसान पहुंचाता है, तो इसके काफ़ी गम्भीर परिणाम ईरान को भुगतने पड़ेंगे।
लेकिन क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने जैसे अमेरिका के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की ठान ही ली थी, और इसके बाद ईरान ने इराक़ स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर क़रीब दो दर्ज़न मिसाइलों से हमला किया और दावा किया कि इसमें क़रीब 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है। ईरान के इस दावे के बाद पूरी दुनिया आशंकित हो गई थी कि यदि सही में ईरान के मिसाइल हमलों में 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है, तो अमेरिका इसका बदला ज़रूर लेगा, और यदि अमेरिका ऐसा करता है तो इससे दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ सकता है जो कि विश्व युद्ध तक में बदल सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ईरान के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान के उन दावों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है जिसमें ईरान ने दावा किया था कि उसके मिसाइल हमलों में अमेरिका के क़रीब 80 सैनिक मारे गये हैं। ट्रम्प ने अपने बयान में कहा कि ईरान के मिसाइल हमले में कोई भी अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हुआ है। अब जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने काफ़ी ज़िम्मेदारी और सबूतों के साथ अपना यह बयान दिया है, तो क्या मान लिया जाये कि ईरान ने अपने देश के लोगों से झूठ बोला कि मिसाइल हमले में क़रीब 80 अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं।
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के इस दावे के साथ कि ईरान के मिसाइल हमले में कोई भी अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हुआ है, साफ़ ज़ाहिर होता है कि ईरान में इतनी इच्छाशक्ति और ताक़त नहीं आई है कि वो सीधे तौर पर अमेरिका सैनिकों और हितों पर हमला कर दे। जानकारों के मुताबिक़, अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान ने हमला ज़रूर किया था, लेकिन इन मिसाइलों के ज़रिये ईरान सिर्फ़ अमेरिका को डराना चाहता था, और ईरान की कई मिसाइलें टारगेट से काफ़ी दूर गिरीं। दरअसल, ईरान अच्छी तरह से अमेरिका की सैन्य शक्ति को जानता है, और ईरान भी नहीं चाहता था कि इस हमले में किसी भी अमेरिकी सैनिक की मौत हो, क्योंकि यदि ईरान के हमले में किसी भी अमेरिकी सैनिक की मौत हो जाती, तो इसके जवाब में अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई ज़रूर करता।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान ने अपनी मिसाइलों से इराक़ स्थित अमेरिका के दो एयरबेस अल-अशद और इरबिल को निशाना बनाने की कोशिश की थी। ईरान की तसनीम न्यूज़ एजेसी के अनुसार, फतेह-313 और क़ियम मिसाइल से इन ठिकानों पर निशाना साधा गया था, लेकिन इन हमलों से अमेरिकी सेना को कोई नुकसान नहीं हुआ है। इधर अमेरिकी आर्मी के जनरल मार्क मिले के अनुसार, ईरान के मिसाइल हमले का मुख्य मक़सद अमेरिकी सेना की गाड़ियों और अन्य सामानों को नुकसान पहुंचा था।
अमेरिकी सेना के जनरल मार्क मिले के मुताबिक, “मेरा ख़ुद का मानना है कि मैंने जो देखा और जो मुझे पता है, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि इस हमले का मक़सद स्ट्रक्चर डैमेज, वाहनों, उपकरणों और विमानों को नष्ट करने के साथ कर्मियों को मारना था। हालांकि, यह मेरा अपना व्यक्तिगत मूल्यांकन है।”
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, मंगलवार-बुधवार की देर रात 1:45 से 2:15 के बीच ईरान की तरफ़ से 22 मिसाइलें दागी गईं। इसमें से 17 मिसाइलें अल असद एयरबेस की तरफ दागी गई थीं। ईरान द्वारा किये गये मिसाइल हमले की सेटेलाइट तस्वीरें भी आ गई है। इस तस्वीरों के विश्लेषण करने के बाद कहा जा रहा है कि अल असद एयरबेस के पास पांच स्ट्रक्चर को निशाना बनाया गया था, जबकि कई ऐसे निशाने साधे गए थे जो बेकार थे, और इससे कोई भी नुकसान नहीं हुआ। इतना ही नहीं, एक मिसाइल तो अल असद एयरबेस से 40 किलोमीटर दूर हितान के गांव में गिरी। वहीं एक मिसाइल इरबिल से 47 किलोमीटर दूर बराह में गिरी।
ईरान के मिसाइल हमलों के विश्लेषण के बाद साफ़ ज़ाहिर होता है कि ईरान ने जानबूझ कर मिसाइलों को अमेरिकी एयरबेस से दूर या सिर्फ़ स्ट्रक्चर पर टारगेट किया। दरअसल, ईरान सीधे तौर पर अमेरिका से युद्ध नहीं चाहता है। ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का कहना है कि ऑल इज वेल। यानी साफ़ है कि ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी के किसी भी सैनिक की मौत नहीं हुई है। इधर अमेरिका के कई वरिष्ठ पत्रकार भी यह दावा कर रहे हैं कि ईरान ने जान बूझकर ऐसी जगहों पर मिसाइलों को दागा है जहां अमेरिका को कम के कम नुकसान हो।
दरअसल, टेक्नोलॉजी के मामले में अमेरिका खाड़ी के देश ईरान से काफ़ी आगे है। अमेरिकी सैन्य शक्ति के जानकारों के मुताबिक़, कई घण्टे पहले ही अमेरिका को ईरान के मिसाइल अटैक की सैटेलाइट्स से जानकारी मिल गई थी। यह वहीं सैटेलाइट्स हैं जिनकी सहायता से अमेरिका की उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों पर नज़र रहती है। सैटेलाइट्स से ईरानी हमले की जानकारी मिलते ही अमेरिकी सैनिक बंकर में सुरक्षित छिप गये थे। इस बात की पुष्टि ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने की है कि ईरान के मिसाइल हमले से काफ़ी पहले ही अलार्म बज गये जिससे किसी की भी मौत नहीं हुई।
ईरान के मिसाइल हमलों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि अमेरिकी एयरबेस पर ईरान के हमले प्रतीकात्मक थे। दरअसल, ईरान सीधे तौर पर अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर युद्ध की शुरूआत नहीं करना चाहता है। क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद देश में अमेरिका के ख़िलाफ़ फैले गुस्से को शान्त करने के लिए ईरान की सरकार ने इराक़ स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले तो किये, लेकिन ईरान ने यह हमले जान बूझकर ग़लत किये या फ़िर सैन्य सामानों को निशाना बनाकर किये। इधर अमेरिका ने टेक्नोलॉजी के दम पर हमलों के बारे में पहले ही जानकारी हासिल कर थी, तो ईरानी हमले में अमेरिका को किसी भी तरह की कोई भी सैन्य क्षति नहीं हुई।
यानी ईरान की सरकार का वह दावा कि ईरान के मिसाइल हमले में क़रीब 80 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई है, ग़लत साबित होता है। साफ़ है कि ईरान को अपनी शक्ति पता है, और ईरान ख़ुद अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करने की ग़लती नहीं करना चाहेगा। क्योंकि यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किया, तो यह तय है कि इस युद्ध को अमेरिका ही ख़त्म करेगा वो भी अपनी शर्तों पर। ईरान जानता है कि अमेरिकी की मिसाइलें और लड़ाकू विमान ईरान में विध्वंस मचा सकते हैं, ऐसे में ईरानी सरकार ने प्रतीकात्मक मिसाइल हमला कर अपने देश के लोगों का गुस्सा शान्त करने की कोशिश भर की है।