जानिये क्या है सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी और वर्चस्व की लड़ाई के कारण?
Thursday - January 9, 2020 4:02 pm ,
Category : WTN HINDI
सऊदी अरब और ईरान के बीच जारी है क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई
ईरान-अमेरिका युद्ध में सऊदी अरब की भी हो सकती है मह्त्वपूर्ण भूमिका
JAN 09 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इस समय चरम पर है। जिस तरह की गतिविधियां इस समय अमेरिका और ईरान के बीच चल रही हैं, उससे आशंका जताई जा रही है कि कभी भी इन दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ सकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि इज़राइल को छोड़कर खाड़ी के सभी देश मुस्लिम हैं। वहीं यदि आप यह सोच रहे हैं कि अमेरिका के साथ जारी तनाव में और सम्भावित युद्ध में खाड़ी के मुस्लिम देश ईरान का साथ देंगे, तो आपका सोचना काफ़ी हद तक ग़लत है।
दरअसल, इस्लाम के दो पवित्र तीर्थ स्थलों वाला देश सऊदी अरब ही इन दिनों ईरान का कट्टर दुश्मन बना हुआ है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दोनों ही इस्लामिक देशों, ईरान और सऊदी अरब के बीच काफ़ी समय से टकराव जारी है। इन दोनों ही देशों के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर वर्चस्व की लड़ाई जारी है। वैसे कहने को तो दोनों ही इस्लामिक देश हैं, लेकिन इन दोनों के बीच टकराव और वर्चस्व की लड़ाई के पीछे का मुख्य कारण धर्म ही है।
बता दें कि दोनों ही देशों के बीच टकराव का मुख्य कारण इस्लाम के शिया-सुन्नी पंथ हैं। दरअसल, ईरान जहां शिया मान्यता वाला देश है वहीं सऊदी अरब सुन्नी प्रभुत्व वाला देश है। इसी कारण से दोनों देशों के बीच सालों से टकराव जारी है। लेकिन हाल के वर्षों में इन दोनों ही देशों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के कारण खाड़ी क्षेत्र में हालात काफ़ी गम्भीर हो गये हैं। कहने को तो ईरान और सऊदी अरब पड़ोसी देश हैं, लेकिन लम्बे समय से यह दोनों ही देश क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए आपस में लड़ रहे हैं।
इस्लाम के अलग-अलग पंथ शिया और सुन्नी मानने के कारण इन दोनों ही देशों के बीच तक़रार सालों से जारी है। ईरान शिया मुस्लिम बाहुल्य देश है जबकि सऊदी अरब में सुन्नी मुस्लिमों की संख्या ज़्यादा है। ईरान और सऊदी अरब के बीच जारी वर्चस्व की इस लड़ाई में बाक़ी मुस्लिम देश भी कूद पड़े हैं। इन दोनों देशों के बीच शिया-सुन्नी टकराव के कारण कुछ मुस्लिम देश ईरान का समर्थन करते हैं, तो कुछ मुस्लिम देश सऊदी अरब के समर्थन में रहते हैं।
दरअसल, सऊदी अरब में ही इस्लाम का जन्म हुआ है, और इसलिए सऊदी अरब ख़ुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता है। लेकिन साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रान्ति के बाद समीकरण बदल गये, और ईरान ने सऊदी अरब को चुनौती देना शुरू कर दिया। बता दें कि ईरान में इस्लामिक क्रान्ति के बाद वहां यह एक नये तरह का राज्य बना, जो एक तरह की क्रान्तिकारी धर्मतंत्र वाली शासन प्रणाली है। ईरान के धार्मिक नेता इसी मॉडल को पूरी दुनिया में फ़ैलाना चाहते हैं, लेकिन सऊदी अरब चुंकि ख़ुद को मुस्लिम दुनिया का नेता मानता है, इसलिए उसे ईरान की यह नेतागिरी पसंद नहीं है।
साल 2003 के बाद से ईरान का प्रभाव खाड़ी देशों में बढ़ने लगा। दरअसल, साल 2003 में अमेरिका ने इराक़ से सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया था जो कि ईरान विरोधी था। ईरान की पूरी शक्ति इराक़ और सद्दाम हुसैन पर ही बर्बाद हो जाती थी, लेकिन सद्दाम हुसैन के सत्ता से हटने के बाद ईरान ने अपनी शक्ति का प्रयोग खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये किया। साल 2011 में जब अरब जगत के कई हिस्सों में आंदोलन हुए, तो इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो गई। इसी अस्थिरता का फ़ायदा ईरान और सऊदी अरब ने उठाया, और इन दोनों ही देशों ने बहरीन, सीरिया और यमन जैसे देशों में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की।
धार्मिक के साथ-साथ दोनों ही देशों के बीच अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी लगातार जारी है। दरअसल, अपनी कूटनीति के दम पर ईरान कई तरह से खाड़ी और आसपास के इलाक़ों में धीरे-धीरे अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफ़ल रहा है। दरअसल, ईरान इस पूरे क्षेत्र में या तो ख़ुद या अपने क़रीबियों का प्रभुत्व देखना चाहता है, जिससे ईरान से लेकर भूमध्य सागर तक फैले इस भूभाग पर उसका अपना नियंत्रण स्थापित हो सके।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को ईरान और रूस का समर्थन हासिल है, और इसी कारण से बशर की सेना सऊदी अरब के समर्थन वाले विद्रोही समूह को पछाड़ने में सक्षम हो गई है। लेकिन अब सऊदी अरब कोशिश कर रहा है कि ईरान के प्रभाव को रोका जा सके। इसी कूटनीति के चलते सऊदी अरब के युवराज क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने यमन में जंग छेड़ दी थी, जिससे यहां पर ईरान का प्रभाव कम हो सके, लेकिन बाद में सऊदी अरब को इस बात एहसास हुआ कि यमन में दखल देना उनकी बड़ी ग़लती थी।
अब जबकि ईरान और अमेरिका के बीच जंग के आसार हैं। ऐसे में सऊदी अरब की भूमिका भी काफ़ी महत्वपूर्ण होने वाली है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ दिनों पहले दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी सऊदी अरब की आरामको के एक संयंत्र पर रॉकेट से हमला हुआ था, और इस हमले के षड़यंत्र का आरोप ईरान पर लगा था। वहीं सऊदी अरब हमेशा से ही अमेरिका का मित्र देश रहा है, और सऊदी अरब में अमेरिका के एयरबेस और सैन्य ठिकाने हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच जंग होती है, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच भी क्या जंग छिड़ सकती है?
JAN 09 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इस समय चरम पर है। जिस तरह की गतिविधियां इस समय अमेरिका और ईरान के बीच चल रही हैं, उससे आशंका जताई जा रही है कि कभी भी इन दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ सकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि इज़राइल को छोड़कर खाड़ी के सभी देश मुस्लिम हैं। वहीं यदि आप यह सोच रहे हैं कि अमेरिका के साथ जारी तनाव में और सम्भावित युद्ध में खाड़ी के मुस्लिम देश ईरान का साथ देंगे, तो आपका सोचना काफ़ी हद तक ग़लत है।
दरअसल, इस्लाम के दो पवित्र तीर्थ स्थलों वाला देश सऊदी अरब ही इन दिनों ईरान का कट्टर दुश्मन बना हुआ है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दोनों ही इस्लामिक देशों, ईरान और सऊदी अरब के बीच काफ़ी समय से टकराव जारी है। इन दोनों ही देशों के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर वर्चस्व की लड़ाई जारी है। वैसे कहने को तो दोनों ही इस्लामिक देश हैं, लेकिन इन दोनों के बीच टकराव और वर्चस्व की लड़ाई के पीछे का मुख्य कारण धर्म ही है।
बता दें कि दोनों ही देशों के बीच टकराव का मुख्य कारण इस्लाम के शिया-सुन्नी पंथ हैं। दरअसल, ईरान जहां शिया मान्यता वाला देश है वहीं सऊदी अरब सुन्नी प्रभुत्व वाला देश है। इसी कारण से दोनों देशों के बीच सालों से टकराव जारी है। लेकिन हाल के वर्षों में इन दोनों ही देशों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई के कारण खाड़ी क्षेत्र में हालात काफ़ी गम्भीर हो गये हैं। कहने को तो ईरान और सऊदी अरब पड़ोसी देश हैं, लेकिन लम्बे समय से यह दोनों ही देश क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए आपस में लड़ रहे हैं।
इस्लाम के अलग-अलग पंथ शिया और सुन्नी मानने के कारण इन दोनों ही देशों के बीच तक़रार सालों से जारी है। ईरान शिया मुस्लिम बाहुल्य देश है जबकि सऊदी अरब में सुन्नी मुस्लिमों की संख्या ज़्यादा है। ईरान और सऊदी अरब के बीच जारी वर्चस्व की इस लड़ाई में बाक़ी मुस्लिम देश भी कूद पड़े हैं। इन दोनों देशों के बीच शिया-सुन्नी टकराव के कारण कुछ मुस्लिम देश ईरान का समर्थन करते हैं, तो कुछ मुस्लिम देश सऊदी अरब के समर्थन में रहते हैं।
दरअसल, सऊदी अरब में ही इस्लाम का जन्म हुआ है, और इसलिए सऊदी अरब ख़ुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता है। लेकिन साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रान्ति के बाद समीकरण बदल गये, और ईरान ने सऊदी अरब को चुनौती देना शुरू कर दिया। बता दें कि ईरान में इस्लामिक क्रान्ति के बाद वहां यह एक नये तरह का राज्य बना, जो एक तरह की क्रान्तिकारी धर्मतंत्र वाली शासन प्रणाली है। ईरान के धार्मिक नेता इसी मॉडल को पूरी दुनिया में फ़ैलाना चाहते हैं, लेकिन सऊदी अरब चुंकि ख़ुद को मुस्लिम दुनिया का नेता मानता है, इसलिए उसे ईरान की यह नेतागिरी पसंद नहीं है।
साल 2003 के बाद से ईरान का प्रभाव खाड़ी देशों में बढ़ने लगा। दरअसल, साल 2003 में अमेरिका ने इराक़ से सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया था जो कि ईरान विरोधी था। ईरान की पूरी शक्ति इराक़ और सद्दाम हुसैन पर ही बर्बाद हो जाती थी, लेकिन सद्दाम हुसैन के सत्ता से हटने के बाद ईरान ने अपनी शक्ति का प्रयोग खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये किया। साल 2011 में जब अरब जगत के कई हिस्सों में आंदोलन हुए, तो इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो गई। इसी अस्थिरता का फ़ायदा ईरान और सऊदी अरब ने उठाया, और इन दोनों ही देशों ने बहरीन, सीरिया और यमन जैसे देशों में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की।
धार्मिक के साथ-साथ दोनों ही देशों के बीच अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी लगातार जारी है। दरअसल, अपनी कूटनीति के दम पर ईरान कई तरह से खाड़ी और आसपास के इलाक़ों में धीरे-धीरे अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफ़ल रहा है। दरअसल, ईरान इस पूरे क्षेत्र में या तो ख़ुद या अपने क़रीबियों का प्रभुत्व देखना चाहता है, जिससे ईरान से लेकर भूमध्य सागर तक फैले इस भूभाग पर उसका अपना नियंत्रण स्थापित हो सके।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को ईरान और रूस का समर्थन हासिल है, और इसी कारण से बशर की सेना सऊदी अरब के समर्थन वाले विद्रोही समूह को पछाड़ने में सक्षम हो गई है। लेकिन अब सऊदी अरब कोशिश कर रहा है कि ईरान के प्रभाव को रोका जा सके। इसी कूटनीति के चलते सऊदी अरब के युवराज क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने यमन में जंग छेड़ दी थी, जिससे यहां पर ईरान का प्रभाव कम हो सके, लेकिन बाद में सऊदी अरब को इस बात एहसास हुआ कि यमन में दखल देना उनकी बड़ी ग़लती थी।
अब जबकि ईरान और अमेरिका के बीच जंग के आसार हैं। ऐसे में सऊदी अरब की भूमिका भी काफ़ी महत्वपूर्ण होने वाली है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कुछ दिनों पहले दुनिया की सबसे बड़ी तेल कम्पनी सऊदी अरब की आरामको के एक संयंत्र पर रॉकेट से हमला हुआ था, और इस हमले के षड़यंत्र का आरोप ईरान पर लगा था। वहीं सऊदी अरब हमेशा से ही अमेरिका का मित्र देश रहा है, और सऊदी अरब में अमेरिका के एयरबेस और सैन्य ठिकाने हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच जंग होती है, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच भी क्या जंग छिड़ सकती है?