...तो अब इंटरनेट का इस्तेमाल है मौलिक अधिकार
Saturday - January 11, 2020 2:30 pm ,
Category : WTN HINDI
सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट के इस्तेमाल को माना मौलिक अधिकार
फ्रांस और स्पेन समेत दुनिया के कई देशों में इंटरनेट एक्सेस है मूल अधिकार
JAN 11 (WTN) – जैसा कि आपने ख़ुद अनुभव किया होगा कि इंटरनेट आजकल इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरतों में से एक बन गया है। बैंक से लेकर बिलिंग तक और टिकिट बुकिंग से लेकर अन्य ऑनलाइन काम आजकल इंटरनेट के ज़रिये ही हो रहे हैं। लेकिन यदि मोबाइल फ़ोन में इंटरनेट कनेक्शन नहीं होगा, तो आप अपने मोबाइल फ़ोन से ऑनलाइन काम नहीं कर सकेंगे। वहीं यदि ब्रॉडबैंड कनेक्शन भी ना होने से आप इंटरनेट से सम्बन्धित काम नहीं कर पाएंगे। सोशल मीडिया के इस्तेमाल से लेकर मनोरंजन तक के लिए इंटनरेट आज के टेक्नोलॉजी वाले युग में इंसान की ख़ास ज़रूर बन गया है।
लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि CAA और NRC के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण पिछले दिनों केन्द्र और कई राज्य सरकारों ने कई जगहों पर इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी थी। दरअसल, सरकारों को डर था कि इंटरनेट का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया के ज़रिये फ़र्जी और भ्रामक ख़बरें फैल सकती हैं, और इसके कारण हिंसा बढ़ सकती है। वहीं बात करें कश्मीर की, तो यहां पर अनुच्छेद 370 के शिथिलिकरण के बाद से लगातार इंटरनेट कनेक्शन बंद है, लेकिन ऐसा भारत सरकार ने सुरक्षा के मद्देनज़र किया है।
हालांकि, केन्द्र और राज्य सरकारों का तर्क है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और हिंसा को फ़ैलने से रोकने के लिए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना उनकी मजबूरी है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवाओं के पक्ष में एक ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए इंटरनेट सेवाओं को अभिव्यक्ति का बड़ा साधन बताया है, और इंटरनेट का उपयोग करने को अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत एक मौलिक अधिकार माना है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में साफ़ किया है कि किन्ही ख़ास परिस्थितियों में ही सरकार इंटरनेट पर पाबंदी लगा सकती है।
तो भारत की सर्वोच्च अदालत ने इंटरनेट के इस्तेमाल को एक मौलिक अधिकार माना है। वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया के कई देशों में इंटरनेट को मूल मानवाधिकारों में शामिल कर लिया गया है। यूरोप के विकसित देश फिनलैण्ड की सरकार ने इंटरनेट को लेकर काफ़ी बड़ा फ़ैसला लिया है। जानकारी के लिए बता दें कि फिनलैण्ड में हर व्यक्ति को एक मेगाबाइट प्रति सेकेण्ड का ब्राडबैण्ड कनेक्शन दिया जाना सुनिश्चित है। बता दें कि इस पर साल 2010 से ही फिनलैण्ड में अमल हो रहा है। वहीं लोगों की डिमाण्ड पर साल 2015 में ब्राडबैण्ड क्षमता को बढ़ा भी दिया गया है।
बात करें मध्य अमेरिकी देश कोस्टारिका की, तो यहां की सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद इंफार्मेशन तकनीक और कम्युनिकेशन समाज में रहने वाले किसी भी व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है। कोस्टारिका की सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इंटरनेट इस्तेमाल करने से लोगों को रोका नहीं जा सकता है। कोस्टारिका के सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह नई तकनीक और इसके आधार पर चलने वाली प्रक्रियाएं किसी भी नागरिक का मूलभूत अधिकार है, और इससे उन्हें वन्चित नहीं किया जा सकता है। कोस्टारिका के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वहां की सरकार को हर हाल में सभी को इंटरनेट इस्तेमाल करने का अधिकार देना पड़ रहा है।
वहीं यूरोप के देश एस्तोनिया ने साल 2000 में एक प्रोग्राम शुरू किया था, जिसके तहत पूरे देश में इंटरनेट को मूल मानवाधिकार मानते हुए इसे हर किसी को उपलब्ध कराया गया है। बता दें कि एस्तोनिया में इंटरनेट वहां के हर नागरिक के मूल अधिकारों में शामिल हो चुका है। एस्तोनिया की सरकार भी इस बात पर सहमत है कि 21वीं सदी में हर किसी के लिए इंटरनेट ज़रूरी है।
वहीं यूरोप के विकसित देश और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अहम देश फ्रांस में भी वहां की सर्वोच्च अदालत ने इंटरनेट एक्सेस को मूलभूत अधिकार माना है। फ्रांस की सरकार किसी भी हाल में अपने नागरिकों को इंटरनेट सेवा से वन्चित नहीं कर सकती है। वहीं फुटबाल और साण्डों की लड़ाई के लिए प्रसिद्ध देश स्पेन में भी यह तय किया गया है कि राष्ट्रीय एजेंसी टेलेफोनिया हर किसी को उचित मूल्य पर ब्राडबैण्ड सेवा देने की गारण्टी दे, और कम से कम देश के हर व्यक्ति को प्रति सेकेण्ड एक मेगाबाइट की स्पीड वाली इंटरनेट सेवा मिले।
अमेरिका के पड़ोसी देश कनाड़ा में कनाड़ा रेडियो टेलीविजन और टेलीकम्युनिकेशन भी हर किसी को इंटरनेट सेवा प्रदान करता है, और यह सेवा वह लोगों को मूलभूत अधिकार के अंतर्गत देता है। कनाड़ा में इंटरनेट सेवा को मानवाधिकार के तहत रखा गया है। तो साफ़ है कि भारत में सुप्रीम कोर्ट के अहम आदेश के बाद अब इंटरनेट नागरिकों के लिए एक मौलिक अधिकार बन गया है, और केन्द्र और राज्य सरकारें बिना किसी कारण के इंटरनेट को तब तक बंद नहीं कर सकती हैं, जब तक कि ऐसा करना देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी ना हो।
JAN 11 (WTN) – जैसा कि आपने ख़ुद अनुभव किया होगा कि इंटरनेट आजकल इंसान की सबसे बड़ी ज़रूरतों में से एक बन गया है। बैंक से लेकर बिलिंग तक और टिकिट बुकिंग से लेकर अन्य ऑनलाइन काम आजकल इंटरनेट के ज़रिये ही हो रहे हैं। लेकिन यदि मोबाइल फ़ोन में इंटरनेट कनेक्शन नहीं होगा, तो आप अपने मोबाइल फ़ोन से ऑनलाइन काम नहीं कर सकेंगे। वहीं यदि ब्रॉडबैंड कनेक्शन भी ना होने से आप इंटरनेट से सम्बन्धित काम नहीं कर पाएंगे। सोशल मीडिया के इस्तेमाल से लेकर मनोरंजन तक के लिए इंटनरेट आज के टेक्नोलॉजी वाले युग में इंसान की ख़ास ज़रूर बन गया है।
लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि CAA और NRC के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण पिछले दिनों केन्द्र और कई राज्य सरकारों ने कई जगहों पर इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी थी। दरअसल, सरकारों को डर था कि इंटरनेट का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया के ज़रिये फ़र्जी और भ्रामक ख़बरें फैल सकती हैं, और इसके कारण हिंसा बढ़ सकती है। वहीं बात करें कश्मीर की, तो यहां पर अनुच्छेद 370 के शिथिलिकरण के बाद से लगातार इंटरनेट कनेक्शन बंद है, लेकिन ऐसा भारत सरकार ने सुरक्षा के मद्देनज़र किया है।
हालांकि, केन्द्र और राज्य सरकारों का तर्क है कि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और हिंसा को फ़ैलने से रोकने के लिए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना उनकी मजबूरी है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवाओं के पक्ष में एक ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए इंटरनेट सेवाओं को अभिव्यक्ति का बड़ा साधन बताया है, और इंटरनेट का उपयोग करने को अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत एक मौलिक अधिकार माना है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में साफ़ किया है कि किन्ही ख़ास परिस्थितियों में ही सरकार इंटरनेट पर पाबंदी लगा सकती है।
तो भारत की सर्वोच्च अदालत ने इंटरनेट के इस्तेमाल को एक मौलिक अधिकार माना है। वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया के कई देशों में इंटरनेट को मूल मानवाधिकारों में शामिल कर लिया गया है। यूरोप के विकसित देश फिनलैण्ड की सरकार ने इंटरनेट को लेकर काफ़ी बड़ा फ़ैसला लिया है। जानकारी के लिए बता दें कि फिनलैण्ड में हर व्यक्ति को एक मेगाबाइट प्रति सेकेण्ड का ब्राडबैण्ड कनेक्शन दिया जाना सुनिश्चित है। बता दें कि इस पर साल 2010 से ही फिनलैण्ड में अमल हो रहा है। वहीं लोगों की डिमाण्ड पर साल 2015 में ब्राडबैण्ड क्षमता को बढ़ा भी दिया गया है।
बात करें मध्य अमेरिकी देश कोस्टारिका की, तो यहां की सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद इंफार्मेशन तकनीक और कम्युनिकेशन समाज में रहने वाले किसी भी व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है। कोस्टारिका की सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इंटरनेट इस्तेमाल करने से लोगों को रोका नहीं जा सकता है। कोस्टारिका के सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह नई तकनीक और इसके आधार पर चलने वाली प्रक्रियाएं किसी भी नागरिक का मूलभूत अधिकार है, और इससे उन्हें वन्चित नहीं किया जा सकता है। कोस्टारिका के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वहां की सरकार को हर हाल में सभी को इंटरनेट इस्तेमाल करने का अधिकार देना पड़ रहा है।
वहीं यूरोप के देश एस्तोनिया ने साल 2000 में एक प्रोग्राम शुरू किया था, जिसके तहत पूरे देश में इंटरनेट को मूल मानवाधिकार मानते हुए इसे हर किसी को उपलब्ध कराया गया है। बता दें कि एस्तोनिया में इंटरनेट वहां के हर नागरिक के मूल अधिकारों में शामिल हो चुका है। एस्तोनिया की सरकार भी इस बात पर सहमत है कि 21वीं सदी में हर किसी के लिए इंटरनेट ज़रूरी है।
वहीं यूरोप के विकसित देश और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अहम देश फ्रांस में भी वहां की सर्वोच्च अदालत ने इंटरनेट एक्सेस को मूलभूत अधिकार माना है। फ्रांस की सरकार किसी भी हाल में अपने नागरिकों को इंटरनेट सेवा से वन्चित नहीं कर सकती है। वहीं फुटबाल और साण्डों की लड़ाई के लिए प्रसिद्ध देश स्पेन में भी यह तय किया गया है कि राष्ट्रीय एजेंसी टेलेफोनिया हर किसी को उचित मूल्य पर ब्राडबैण्ड सेवा देने की गारण्टी दे, और कम से कम देश के हर व्यक्ति को प्रति सेकेण्ड एक मेगाबाइट की स्पीड वाली इंटरनेट सेवा मिले।
अमेरिका के पड़ोसी देश कनाड़ा में कनाड़ा रेडियो टेलीविजन और टेलीकम्युनिकेशन भी हर किसी को इंटरनेट सेवा प्रदान करता है, और यह सेवा वह लोगों को मूलभूत अधिकार के अंतर्गत देता है। कनाड़ा में इंटरनेट सेवा को मानवाधिकार के तहत रखा गया है। तो साफ़ है कि भारत में सुप्रीम कोर्ट के अहम आदेश के बाद अब इंटरनेट नागरिकों के लिए एक मौलिक अधिकार बन गया है, और केन्द्र और राज्य सरकारें बिना किसी कारण के इंटरनेट को तब तक बंद नहीं कर सकती हैं, जब तक कि ऐसा करना देश की सुरक्षा के लिए ज़रूरी ना हो।