अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर की तैयारी में ईरान
Monday - January 13, 2020 10:50 am ,
Category : WTN HINDI
प्रॉक्सी वॉर में ईरान को मिल सकता है कई आतंकी संगठनों का साथ
अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान के साथ संगठित हो रहे हैं आतंकी संगठन
JAN 13 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच काफ़ी दिनों से तनाव बना हुआ है। अमेरिका द्वारा ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने खुलेआम घोषणा की थी कि सुलेमानी की मौत का बदला अमेरिका से लिया जायेगा। जिसके बाद ईरान ने इराक़ स्थित अमेरिकी एयरबेस पर क़रीब दो दर्जन मिसाइलों से हमला किया था, और हमला करने के बाद ईरान ने दावा किया था कि इस हमले में अमेरिका के क़रीब 80 सैनिक मारे गये हैं। ईरान के इस दावे के बाद पूरी दुनिया में आशंकित थी कि यदि सही में ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं, तो अमेरिका इसका बदला ज़रूर लेगा।
हालांकि, बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के उस दावे को सिरे से ख़ारिज कर दिया था कि ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। वहीं ट्रम्प ने ईरान से शान्ति बनाये रखने की अपील भी की थी। वैसे फ़िलहाल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव थोड़ा कम हुआ है, और संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अन्य देश भी दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ता है, तो इससे कच्चे तेल की क़ीमतों में भारी वृद्धि होगी और इससे तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।
वैसे यदि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध होता है, तो जानकारों का मानना है कि यह युद्ध खाड़ी के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। दरअसल, ईरान जानता है कि अमेरिका की तुलना में उसकी सैन्य क्षमता काफ़ी कमज़ोर है। वहीं जानकारों का मानना है कि यदि ईरान ने अमेरिकी हितों पर हमला करने के बाद युद्ध की शुरूआत कर दी, तो इस युद्ध का अन्त अमेरिका ही करेगा और वो भी अपनी शर्तों पर।
अमेरिका के सामने अपनी सैन्य कमज़ोरी जानते हुई ईरान नहीं चाहेगा कि अमेरिका से सीधा युद्ध किया जाये, क्योंकि इस तरह की लड़ाई में अमेरिका को ईरान हरा नहीं पायेगा। इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा ले सकता है। और यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर का सहारा लिया, तो पश्चिम एशिया के आतंकी संगठन अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान का साथ दे सकते हैं।
यदि अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा लेता है, तो ईरान को लेबनान के आतंकी संगठन हिजबुल्लाह का पूरा समर्थन हासिल हो सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लेबनान में गृह युद्ध के दौरान साल 1980 में हिजबुल्लाह संगठन की स्थापना हुई थी। धीरे-धीरे यह आतंकी संगठन मज़बूत होता चला गया, और अब लेबनान के अलावा हिजबुल्लाह अन्य पड़ोसी देशों में भी सक्रिय है। बता दें कि इज़रायल के ख़िलाफ़ युद्ध में ईरान ने हिजबुल्लाह को हथियारों की सप्लाई की थी। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, हिजबुल्लाह को हर साल ईरान क़रीब 700 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देता है। इसलिए ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में हिजबुल्लाह पर सबसे ज़्यादा भरोसा है।
वहीं इराक़ और सीरिया का आतंकी संगठन कताइब हिजबुल्लाह भी अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान का साथ दे सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इराक़ में हुये अमेरिकी ड्रोन हमले में क़ासिम सुलेमानी के साथ कताइब हिजबुल्लाह का एक कमाण्डर भी मारा गया था। अमेरिका के साथ कताइब हिजबुल्लाह की पुरानी दुश्मनी है, और इसी साल इसके आतंकियों ने नये साल के अवसर पर इराक़ में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया था। इराक़ के इस नये सशस्त्र संगठन कताइब हिजबुल्लाह पर क़ासिम सुलेमानी का बहुत ज़्यादा प्रभाव था। स्वाभाविक है कि ईरान के साथ-साथ कताइब हिजबुल्लाह भी क़ासिम सुलेमानी और अपने एक कमाण्डर की हत्या का बदला अमेरिका से लेना चाहेगा।
ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में सीरिया की असद सरकार के साथ-साथ वहां के आतंकी संगठनों का भी साथ मिल सकता है। बता दें कि सीरिया में शिया मिलिशिया के दर्जनों गुट हैं और प्रॉक्सी वॉर में यह सभी मिलकर ईरान का साथ देंगे, क्योंकि ईरान इन्हें हथियार सप्लाई करता है। बात करें यमन की, तो यमन में जारी गृह युद्ध में वहां के हूती विद्रोहियों का साथ ईरान दे रहा है। जानकारी के लिए बता दें कि साल 2015 से ही यमन में हूती विद्रोहियों ने गृह युद्ध छेड़ रखा है। हूती विद्रोहियों को ईरान हथियार, टेक्नोलॉजी और युद्ध सलाह से लेकर ड्रोन भी सप्लाई करता रहा है। स्वाभाविक है कि यमन के हूती विद्रोही भी अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान का साथ देंगे।
अब आपको बताते हैं फिलीस्तीन के हमास गुट की स्थिति के बारे में। दरअसल, इज़रायल के साथ साझा दुश्मनी के कारण ईरान औऱ फिलीस्तीन के हमास गुट के आपस में सम्बन्ध हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान एक शिया बाहुल्य आबादी वाला देश है। लेकिन फ़िर भी ईरान के सुन्नी मुस्लिमों वाले हमास संगठन से उसके सम्बन्ध हैं। हमास गुट को ईरान समय-समय पर हथियार और धन मुहैया कराता रहा है। इज़रायल के ख़िलाफ़ ईरान हमेशा से ही हमास गुट का समर्थन करता रहा है, ऐसे में अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में हमास भी ईरान का साथ दे सकता है।
अब बात करते हैं अफगानिस्तान के आतंकी संगठन तालिबान की, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में अफगानिस्तान के तालिबान का साथ भी मिल सकता है। वैसे कहने को तो तालिबान सुन्नी मुस्लिमों का संगठन है, लेकिन अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में तालिबान ईरान का साथ दे सकता है। यानी साफ़ है कि अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान को कई आतंकी संगठनों का साथ मिल सकता है, और यह अमेरिका के लिए चिन्ता का कारण है।
दरअसल, खाड़ी के कई देशों में अमेरिका के एयरबेस और सैनिक अड्डे हैं। ऐसे में यदि ईरान के इशारे पर इन देशों के आतंकी संगठनों ने अमेरिकी हितों पर प्रॉक्सी वॉर की नीति के तहत हमला किया, तो अमेरिका को इन सबको सम्भालना काफ़ी मुश्किल हो जायेगा। वैसे भी ईरान कभी नहीं चाहेगा कि अमेरिका के साथ उसका सीधा युद्ध हो, क्योंकि सीधे युद्ध में ईरान की हार तय है और उसे काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह युद्ध अमेरिकी ज़मीन से काफ़ी दूर खाड़ी में ईरान की ज़मीन पर लड़ा जायेगा। ऐसे में ईरान प्रॉक्सी वॉर के ज़रिये ही अपने सहयोगी आतंकी संगठनों के साथ मिलकर अमेरिका को नुकसान पहुंचाना चाहेगा।
JAN 13 (WTN) – जैसा कि आप जानते ही हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच काफ़ी दिनों से तनाव बना हुआ है। अमेरिका द्वारा ईरान के मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद ईरान ने खुलेआम घोषणा की थी कि सुलेमानी की मौत का बदला अमेरिका से लिया जायेगा। जिसके बाद ईरान ने इराक़ स्थित अमेरिकी एयरबेस पर क़रीब दो दर्जन मिसाइलों से हमला किया था, और हमला करने के बाद ईरान ने दावा किया था कि इस हमले में अमेरिका के क़रीब 80 सैनिक मारे गये हैं। ईरान के इस दावे के बाद पूरी दुनिया में आशंकित थी कि यदि सही में ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं, तो अमेरिका इसका बदला ज़रूर लेगा।
हालांकि, बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के उस दावे को सिरे से ख़ारिज कर दिया था कि ईरान के मिसाइल हमलों में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। वहीं ट्रम्प ने ईरान से शान्ति बनाये रखने की अपील भी की थी। वैसे फ़िलहाल अमेरिका और ईरान के बीच तनाव थोड़ा कम हुआ है, और संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अन्य देश भी दोनों देशों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि यदि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ता है, तो इससे कच्चे तेल की क़ीमतों में भारी वृद्धि होगी और इससे तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।
वैसे यदि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध होता है, तो जानकारों का मानना है कि यह युद्ध खाड़ी के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। दरअसल, ईरान जानता है कि अमेरिका की तुलना में उसकी सैन्य क्षमता काफ़ी कमज़ोर है। वहीं जानकारों का मानना है कि यदि ईरान ने अमेरिकी हितों पर हमला करने के बाद युद्ध की शुरूआत कर दी, तो इस युद्ध का अन्त अमेरिका ही करेगा और वो भी अपनी शर्तों पर।
अमेरिका के सामने अपनी सैन्य कमज़ोरी जानते हुई ईरान नहीं चाहेगा कि अमेरिका से सीधा युद्ध किया जाये, क्योंकि इस तरह की लड़ाई में अमेरिका को ईरान हरा नहीं पायेगा। इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि क़ासिम सुलेमानी की हत्या का बदला लेने के लिए अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा ले सकता है। और यदि ईरान ने अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर का सहारा लिया, तो पश्चिम एशिया के आतंकी संगठन अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान का साथ दे सकते हैं।
यदि अमेरिका के ख़िलाफ़ ईरान प्रॉक्सी वॉर का सहारा लेता है, तो ईरान को लेबनान के आतंकी संगठन हिजबुल्लाह का पूरा समर्थन हासिल हो सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लेबनान में गृह युद्ध के दौरान साल 1980 में हिजबुल्लाह संगठन की स्थापना हुई थी। धीरे-धीरे यह आतंकी संगठन मज़बूत होता चला गया, और अब लेबनान के अलावा हिजबुल्लाह अन्य पड़ोसी देशों में भी सक्रिय है। बता दें कि इज़रायल के ख़िलाफ़ युद्ध में ईरान ने हिजबुल्लाह को हथियारों की सप्लाई की थी। मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक़, हिजबुल्लाह को हर साल ईरान क़रीब 700 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देता है। इसलिए ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में हिजबुल्लाह पर सबसे ज़्यादा भरोसा है।
वहीं इराक़ और सीरिया का आतंकी संगठन कताइब हिजबुल्लाह भी अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान का साथ दे सकता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इराक़ में हुये अमेरिकी ड्रोन हमले में क़ासिम सुलेमानी के साथ कताइब हिजबुल्लाह का एक कमाण्डर भी मारा गया था। अमेरिका के साथ कताइब हिजबुल्लाह की पुरानी दुश्मनी है, और इसी साल इसके आतंकियों ने नये साल के अवसर पर इराक़ में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया था। इराक़ के इस नये सशस्त्र संगठन कताइब हिजबुल्लाह पर क़ासिम सुलेमानी का बहुत ज़्यादा प्रभाव था। स्वाभाविक है कि ईरान के साथ-साथ कताइब हिजबुल्लाह भी क़ासिम सुलेमानी और अपने एक कमाण्डर की हत्या का बदला अमेरिका से लेना चाहेगा।
ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में सीरिया की असद सरकार के साथ-साथ वहां के आतंकी संगठनों का भी साथ मिल सकता है। बता दें कि सीरिया में शिया मिलिशिया के दर्जनों गुट हैं और प्रॉक्सी वॉर में यह सभी मिलकर ईरान का साथ देंगे, क्योंकि ईरान इन्हें हथियार सप्लाई करता है। बात करें यमन की, तो यमन में जारी गृह युद्ध में वहां के हूती विद्रोहियों का साथ ईरान दे रहा है। जानकारी के लिए बता दें कि साल 2015 से ही यमन में हूती विद्रोहियों ने गृह युद्ध छेड़ रखा है। हूती विद्रोहियों को ईरान हथियार, टेक्नोलॉजी और युद्ध सलाह से लेकर ड्रोन भी सप्लाई करता रहा है। स्वाभाविक है कि यमन के हूती विद्रोही भी अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान का साथ देंगे।
अब आपको बताते हैं फिलीस्तीन के हमास गुट की स्थिति के बारे में। दरअसल, इज़रायल के साथ साझा दुश्मनी के कारण ईरान औऱ फिलीस्तीन के हमास गुट के आपस में सम्बन्ध हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान एक शिया बाहुल्य आबादी वाला देश है। लेकिन फ़िर भी ईरान के सुन्नी मुस्लिमों वाले हमास संगठन से उसके सम्बन्ध हैं। हमास गुट को ईरान समय-समय पर हथियार और धन मुहैया कराता रहा है। इज़रायल के ख़िलाफ़ ईरान हमेशा से ही हमास गुट का समर्थन करता रहा है, ऐसे में अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में हमास भी ईरान का साथ दे सकता है।
अब बात करते हैं अफगानिस्तान के आतंकी संगठन तालिबान की, तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान को अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में अफगानिस्तान के तालिबान का साथ भी मिल सकता है। वैसे कहने को तो तालिबान सुन्नी मुस्लिमों का संगठन है, लेकिन अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में तालिबान ईरान का साथ दे सकता है। यानी साफ़ है कि अमेरिका के ख़िलाफ़ प्रॉक्सी वॉर में ईरान को कई आतंकी संगठनों का साथ मिल सकता है, और यह अमेरिका के लिए चिन्ता का कारण है।
दरअसल, खाड़ी के कई देशों में अमेरिका के एयरबेस और सैनिक अड्डे हैं। ऐसे में यदि ईरान के इशारे पर इन देशों के आतंकी संगठनों ने अमेरिकी हितों पर प्रॉक्सी वॉर की नीति के तहत हमला किया, तो अमेरिका को इन सबको सम्भालना काफ़ी मुश्किल हो जायेगा। वैसे भी ईरान कभी नहीं चाहेगा कि अमेरिका के साथ उसका सीधा युद्ध हो, क्योंकि सीधे युद्ध में ईरान की हार तय है और उसे काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह युद्ध अमेरिकी ज़मीन से काफ़ी दूर खाड़ी में ईरान की ज़मीन पर लड़ा जायेगा। ऐसे में ईरान प्रॉक्सी वॉर के ज़रिये ही अपने सहयोगी आतंकी संगठनों के साथ मिलकर अमेरिका को नुकसान पहुंचाना चाहेगा।