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अपने उपभोक्ताओं को संतोषजनक सेवाएं देने में आख़िर नाकाम क्यों हो रहे हैं बैंक?

Tuesday - January 14, 2020 10:56 am , Category : WTN HINDI
उपभोक्ताओं ने बैंकों पर लगाये लापरवाही के आरोप
उपभोक्ताओं ने बैंकों पर लगाये लापरवाही के आरोप

बैंकिंग सेवाओं के ख़िलाफ़ बढ़ रही है लोगों की शिकायतें, ध्यान ना देने के लग रहे आरोप

JAN 14 (WTN) – स्वाभाविक है कि किसी ना किसी बैंक में आपका अकाउंट तो होगा ही। वहीं बैंक में अकाउंट है, तो आपको कई बार बैंक की सर्विस से परेशानियों का सामना भी करना पड़ा होगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले एक साल में बैंकिंग सेवाओं से जुड़ी शिकायतों में तेज़ी से वृद्धि हुई है। क्या हैं यह शिकायतें, और बैंकों की सेवाओं से उपभोक्ता क्यों नाराज़ हो रहे हैं, आइये इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं। दरअसल, आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल यानी 2019 में अप्रैल महीने से लेकर नवम्बर महीने के बीच, बैंकों की सर्विस से नाराज़ लोगों की शिकायतों में 40 प्रतिशत के क़रीब वृद्धि हुई है।

दरअसल, आरोप है कि भारत में बैंकों की तरफ़ से उपभोक्ताओं को संतोषजनक सेवाएं नहीं दी जा रही हैं। वहीं बैंक की ख़राब सेवाओं की शिकायत करने पर उपभोक्ताओं को संतोषजनक जवाब भी नहीं मिल रहा है। बता दें कि सरकारी बैंक हो या फ़िर निजी बैंक, सभी बैंकों की सर्विस से उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आइये आपको बताते हैं कि वे कौन-कौन सी परेशानियां हैं, जिनका सामना बैंक के उपभोक्ताओं को करना पड़ रहा है।

सबसे पहली शिकायत बैंकों से उपभोक्ताओं की यह है कि उनकी बिना इजाज़त के ही विभिन्न सेवाओं के नाम पर उनके अकाउंट से पैसा काट लिया जाता है। दरअसल, इस शिकायत से सालों से बैंक उपभोक्ता परेशान हैं कि बैंक की तरफ़ से बिना कोई जानकारी दिये उनके अकाउंट से पैसा काट लिया जाता है। हालांकि, इस बारे में बैंक प्रशासन का कहना है कि उपभोक्ता के अकाउंट से जो भी पैसा कटता है, वो वाजिब होता है और उपभोक्ता द्वारा किसी ना किसी सेवा के इस्तेमाल होने पर ही उसके अकाउंट से पैसा काटा जाता है।
 
बैंक उपभोक्ताओं की बैंक से एक और शिकायत है कि क़र्ज़ की किस्त अदायगी होने के बाद भी ब्याज नहीं घटाया जाता है। वहीं कई बार क्रेडिट कार्ड के साथ बिना उनकी इजाज़त के कोई बीमा पॉलिसी भेज दी जाती है जिसकी उन्हें ज़रूरत ही नहीं होती है। बैंक उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी और कॉमन शिकायत है कि कई बार एटीएम से पैसा नहीं निकलने के बावजूद उनके अकाउंट से राशि कट जाती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़, इस परेशानी का सामना कभी ना कभी किसी ना किसी बैंक उपभोक्ता को करना ही पड़ा है। वैसे बैंक प्रशासन का इस बारे में कहना है कि 24 से 48 घण्टे के अन्दर सम्बन्धित उपभोक्ता के अकाउंट में वो राशि वापस आ जाती है जो कि एटीएम से पैसा नहीं निकलने के बाद भी अकाउंट से काट ली जाती है।
 
बता दें कि उपभोक्ता मंत्रालय के एकीकृत शिकायत निवारण तंत्र (इनग्राम) पर बैंक सेवाओं को लेकर शिकायतों में वृद्धि हुई है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल अप्रैल महीने में बैंकिंग सेवाओं को लेकर कुल 5,577 शिकायतें मिली थीं। लेकिन वहीं अक्तूबर के महीने में यह आंकड़ा 7,100, और नवम्बर के महीने में यह आंकड़ा बढ़कर 7,600 तक पहुंच गया। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इनग्राम पर बैंक उपभोक्ता की तरफ़ से आने वाली शिकायतों को सम्बन्धित बैंक को भेज दिया जाता है। इतना ही नहीं, बैंकों को उपभोक्ताओं की शिकायतें फॉर्वड करने के बाद उन शिकायतों का फॉलोअप भी समय-समय पर बैंकों से लिया जाता है।

उपभोक्ता मंत्रालय और बैंकों दावा ज़रूर कर रहे हैं कि बैंक उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए तेज़ी से काम किया जाता है, लेकिन बैंक की सेवाओं से अंसतुष्ट उपभोक्ताओं का कहना है कि उनकी शिकायतों को बैंक गम्भीरता से नहीं लेता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि रिज़र्व बैंक ने सेवाओं की फीस तय करने की ज़िम्मेदारी बैंकों को दे रखी है, और बैंक उनकी सेवाओं पर लगने वाली फीस की राशि उपभोक्ता के अकाउंट से काट लेते है। हालांकि, बैंकों का कहना है कि उपभोक्ता के अकाउंट से एक रुपया भी यदि किसी सर्विस के लिए काटा जाता है, तो इसकी जानकारी मैसेज और मेल के जरिये उपभोक्ता को दी जाती है।
 
बैंकों के दावे अपनी जगह पर सही हो सकते हैं, लेकिन हज़ारों की तादात में बैंकों की सर्विस के ख़िलाफ़ बढ़ती शिकायतों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि बैंकों की सेवाओं से उपभोक्ताओं की नाराज़गी बढ़ती ही जा रही है। बैंक उपभोक्ताओं का तर्क है कि बैंक की सेवाओं से सम्बन्धित शिकायतों के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को एक पोर्टल बनाना चाहिये। इस पोर्टल के होने से यह फ़ायदा होगा कि इसके ज़रिये उपभोक्ताओं द्वारा की गई शिकायतों का सही तरीक़े से फॉलोअप होता रहेगा। लेकिन इस सबके बीच बैंक की ज़िम्मेदारी सबसे बड़ी है, क्योंकि यदि उपभोक्ता उनके पास अपनी मेहनत की रक़म रख रहा है, तो उसके एक-एक रुपये की ज़िम्मेदारी बैंकों को लेना ही चाहिये।